Tuesday, February 26, 2008

रिपुदमन की डायरी : भाग 2


हाँ !! तो उस दौरान खूब चिट्ठीबाज़ी हुई; प्रधानाचार्य, प्रबंधकों, अनुशासकों, संचालकों, निर्देशकों के बीच। और फिर बात बढ़ते-बढ़ते जा पहुंची शिक्षा मंत्री तक। अब पूछिये… अंत में विजय किसको मिली ? बेशक… नाना जी को ही! यह था उन खर्रों का प्रभाव! ऐसा वे कहते थे।

फिर क्या था… प्रसन्नचित्त .. अपनी बेटी का हाथ पकड़, जेब में ’परमीशन लेटर’ रख, नाना जी फिर से जा पहुंचे प्रधानाचार्य के दरवाज़े पर ’ठक-ठक’ करने। पर कोई जीवन चैन से जीने दे तो ना। इस बार प्रधानाचार्य ने एक नई शर्त रखी। उसने कहा कि चूंकि स्कूल लड़कों का है सो माँ को शर्ट-पैंट में ही स्कूल आना होगा। नाना जी तुरन्त राज़ी हो गये पर औपचारिकता दिखाते हुये माँ से पूछा; “क्यों बेटा, तू शर्ट-पैंट पहन लेगी ना ?”। माँ ने मुस्कुरा कर हाँ का इशारा करते हुये सिर हिला दिया। माँ मुस्कुरा ही नहीं रहीं थीं बल्कि उनके मन में मोटे-मोटे लड्डू भी फूट रहे थे! .. क्यों ? … क्योंकि शर्ट-पैंट पहनने को मिलेगी। उस समय चलन कुछ ऐसा था कि छोटी बच्चियों के लिये भी पहनावे के तौर पर साड़ी ही सही समझी जाती थी। सोचिये, ४-५ की बच्ची अपनी माँ की साड़ी पहनकर कैसी लगती होगी। माँ को साड़ी कभी नहीं भाती थी और भाती भी क्यों; इतना सारा ताम-झाम समेटकर फिरना कितना मुश्किल होता होगा; जितना अपना वज़न नहीं उतना साड़ी का!

स्कूल जाना शुरू हुआ। मस्ती के दिन शुरू हुये, नये दोस्त बने। देश तब नया-नया आज़ाद हुआ था। सरकार की तरफ़ से शिक्षा के क्षेत्र में उदार नीतियाँ थीं; पढ़ाई को बढ़ावा देने के लिये, सभी को प्रोत्साहित करने के लिये। आजकल की तरह प्राथमिक शिक्षा के लिये कोई उम्र निर्धारित नहीं थी। यानी किसी भी उम्र का व्यक्ति, दूसरी, तीसरी या चौथी कक्षा में पढ़ सकता था। इस कारण एक ही कक्षा में, छात्रों के बीच उम्र में कुछ वर्षों से लेकर दस-बीस यहाँ तक कि चालीस साल तक का भी अंतर हुआ करता था।स्कूल में माँ का जो सबसे पहला दोस्त बना वो था पास के जंगल का एक भील। ’भील’ मध्य-प्रदेश की एक आदिवासी जाति है। उस भील का नाम याद नहीं। कभी याद आया तो बताऊँगा। वह भील एक अच्छा खासा अधेड़ उम्र का आदमी था जिसके तीन बड़े बड़े बच्चे थे। मेरी माँ उसके सबसे छोटे बच्चे से भी बहुत छोटी थीं। इसी कारण वो माँ को बहुत लाड़ करता। स्कूल में कोई भी लड़का माँ से पंगा लेने की हिम्मत नहीं करता था। कभी कोई लड़का अगर शरारत करता तो भील अपनी गर्दन घुमाकर, गोल-गोल आखें निकालकर उसे बस घूर देता…। बस इतने में ही शरारत करने वाले की छुट्टी! मास्टर जी को उसकी यह अदा बहुत पसंद थी। शायद इसी कारण उन्होनें उसे कक्षा नं। तीन-ए का 'मॉनीटर’ भी बनाया था।

डिस्पेन्सरी के साथ ही डॉक्टर सहाब का क्वार्टर हुआ करता था। भील हर सुबह डिस्पेन्सरी आ जाता। डॉक्टर साहब से ’जै राम जी की’ की, अपनी छोटी सी सहपाठिन को कंधे पर बिठाया और जी चल दिये स्कूल को। यह रोज़ का नियम था उसका। सो ऐसे माँ को ’डोर-टू-डोर’ वाली ’पिकअप-एन्ड-ड्रोप’ सुविधा भी उपलब्ध हुई। दोनों मज़े से बातें करते हुये स्कूल जाते। इस ख़याल से कि रास्ते में कहीं बच्चे को भूख न लग जाये; भील अपनी जेब में बेर भरे रहता और जब तब कुछ बेर निकाल कर माँ के छोटे-छोटे हाथों में रख दिया करता; वाह! ……

दोनो की दोस्ती बहुत गहरी थी। इसलिये ही शायद इतने सालों के बाद भी माँ को ये सब बातें याद है। और जब भी वे ये किस्सा सुनाती हैं, आप सहज ही उनकी आँखों में चमक देख सकते हैं; कभी-कभी मुस्कुराहट के साथ आखें गीली भी हो जाती हैं।

भे अकसर घर के काम भी कर दिया करता था। जैसे…कभी जंगल से लकड़ी ले आये, कभी दूध ले आये या कभी पूजा के लिये फूल ला दिये। एक संध्या नाना जी ने नानी को अपने पास बुलवा भेजा। उन दिनो नानी गर्भवती थीं। छोटे मामा ’गोपाल’ आने वाले थे। दूध की बहुत समस्या हुआ करती थी। मतलब दूर-दूर तक कोई पालतू जानवर ही नहीं। कहीं कोई राहगीर दिख गया, गाय-भैंस ले जाता हुआ, तो उसको रास्ते में रोक, निवेदन कर लिया… कि भाई ज़रा एक लोटा दूध तो निकाल दो! (कैसा लगता है ना ऐसी बातें सुनकर… आज कल क्या ऐसा होता है? ) इधर नानी गर्भवती और उधर घर में एक छोटा बच्चा, सो नाना जी ने एक दिन चिन्तित हो कर भील से कहा। “भाई ..सुनो .. बहुत समस्या है… कहीं से एक गाय का ’इन्तज़ाम’ तो करो”। भील .. “जी बाबूजी” कहकर चला गया। अगले दिन देखा तो सुबह-सुबह वो अपने साथ एक नील-गाय को रस्सी से बाँधे चला आ रहा था नाना जी कुछ झल्लाये पर फिर मुस्कुरा दिए।

नाना जी अगले तीन साल तक ’बाघ’ में ही कार्यरत रहे और माँ, मामा जी भी अगले तीन साल तक उस नील-गाय का ही दूध पीते रहे।

3 comments:

मसिजीवी said...

वाह

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

"शबर भील के बेर "
और आपकी माँ जी के बचपन के किस्से बहुत लुभावने लगे --

स्नेह,

dilip uttam said...

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