Tuesday, February 5, 2008

सार्वजनिक का मतलब है -पुरुषॉ के लिए !

सार्वजनिक पार्क की सार्वजनिक बेंच । कभी देखा है कडकडाती ठंड में धूप सेकने को या यूँ ही चलते चलते थक कर कोई स्त्री उस पर लेट जाना चाहती हो और लेट गयी हो ? और लेटी रह पायी हो ,तब तक जब तक कि उसने चाहा हो ? या राह चलते किसी स्त्री ने चहकते हुए गुनगुनाना चाहा हो कोई गाना और वह ऐसा कर पाई हो ? क्या लडकियों के झुंड को चाय के खोके पर निष्प्रयोजन ,घण्टों खडे देखा है ?सार्वजनिक शौचालयों [चाहे यह सार्वजनिकता दीवार की ओट हो या पेड का तना या घनी झाडी या नाला ] में बहुत आपात स्थिति के बाद भी स्त्रियाँ क्यों नही जा पातीं ?
'हम' समझ जाते हैं कि 'सार्वजनिक 'का मतलब है कि बेंच पुरुषों के लिए ही
सार्वजनिक है । जिस स्त्री ने सार्वजनिकता को चरितार्थ करने
का दुस्साहस किया है वह समाज की दृष्टि में भयानक रूप से हेय हो जाती है ।
पार्क की बेंच एक बहुत साधारण चीज़ है , लेकिन स्त्री की आजीवन कैद का खुलासा
करने वाला एक बडा प्रतीक बन जाती है ।


[कृष्ण कुमार , स्त्री कितना डराएगी , आज के प्रश्न -7 सं-राजकिशोर , वाणी प्रकाशन ]

9 comments:

Ashish Maharishi said...

आपके इस सवाल ने सोचने पर विवश कर दिया है

Sanjeet Tripathi said...

बहुत सही!!

Poonam Misra said...

और ठहाके लगाना .दोस्तों के साथ ,सहेलियों के झुंड में ,सार्वजनिक स्थान पर .यह भी कहाँ हो पाता है.

काकेश said...

विचारणीय

अफ़लातून said...

हार्दिक बधाई । बहनापा जिन्दाबाद ।

Batangad said...

सच इस नजरिए से तो कभी पार्क की बेंच को देखा ही नहीं थी।

Sharma ,Amit said...

सवाल बहुत ही अच्छा है, मगर इसका एक पहलू और भी है.
आपने ने सही ही सोचा है की ये सब कदाचित स्त्रियों के लिए लगभग एक दुसाहस ही है, परन्तु कितनी स्त्रियाँ ऐसी हैं जो की एक सम्माननीय आमंतरण पा कर इन सब में से किन्ही परिसिथिओं में अपने को सहज पायेंगी. जाने क्यों वो कई बार अपने बढ़ते कदम रोक लेती है ...

Asha Joglekar said...

बहुत जायज़ सवाल रचना जी ।

अमित जी जानें क्यूं नही, वह यह सब इसलिये नही कर पाती क्यूंकि अपने को सुरक्षित नही पाती । और जब तक हमारे पुरुषों की मानसिकता नही बदलेगी ये नही बदलेगा । और इस मानसिकता को स्त्रियाँ ही बदलेंगी आखिर ।

dilip uttam said...

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