Wednesday, February 6, 2008

पत्नियों को सताने वाले पुरुष बेटियों के अच्छे पिता कैसे हो जाते हैं...

मेरी अपनी ननद से अक्सर बात होती है । शादी की शुरुआत में उनके लिए साल 6 महीने मायके में गुज़ारना आम बात हो चली थी । एक 16 साल का बेटा और एक 12 साल की बेटी है उनकी । उनकी बेटी को देख मैं भविष्य के प्रति आश्वस्त होती हूँ बहुत हद तक । लेकिन एक बात हमेशा हैरान करती रही । गाहे-बगाहे वे अपनी कथा ले बैठती हैं । यूँ सम्पन्न परिवार हैं , आर्थिक कष्ट नही है; जैसे किसी ज़माने मे रहे । कथा उन दिनो की जब उनके जीवन का एक एक पल सर्वाइवल का प्रश्न बन गया था । उनके पति अपनी बेटी से बहुत प्यार करते हैं । बेटा अक्सर पिटता है क्योंकि पढाई में ढीला है [कुछ वयव्हार में भी पर शरीफ और सच्चा है]। बेटी होशियार है। चटर-पटर पिता को जवाब देती है । बाप की एक नही सुनती । पिता भी उसके उलाहनों में खुश होते पाए जाते हैं । फिल्म दिखाने के साथ पॉपकॉर्न न दिलाने के लिए जब पिता ने एक दिन कहा महीने का अंत है इतने पैसे नही हैं तो बेटी पट से बोली 'आय हाय कैसे कैसे भिखारी भरे पडे हैं हमारे घर में'- और पिता ठहाका लगाकर हँस पडे । यह एक चुटकुले की तरह कई दिन मुझे सुनाया और हँसती रहीं ।कुछ दिन पहले उनकी बिन्दास बिटिया और उसके उदार पापा की तारीफ करने लगी तो एक और सवाल पकड में आया । वे बोलीं -"सुजाता , तुम जो देखती हो वो आधा सच है । इस आदमी को मैने कूट-कूट कर ठीक किया है वर्ना जिस कमसिन उम्र में मेरी शादी हुई थी ये और इनका परिवार तो मुझे खत्म कर देते अभी तक । मेरे जेठ और ससुर के सामने मुँह पर खींच-खींच कर मारता था । मैने कभी ऐसी बातें नही कहना चाहीं । एक दिन पीटने लगा तो मैने हाथ पकड लिया सबके सामने और धमका दिया - मेरे भी हाथ चलते हैं । ये और बात है कि कभी नही चलाए । पहले बच्चे की जचगी में मुझे खून के आँसू रुलाए थे । 40 दिन में सीधी खडी होना भूल गयी थी । मेरी माँ 10 रुपए के जूते मेरे बेटे के लिए लाती थी , कभी चूँ नही की । जो जैसा मिला खाया-पहना ।कुछ तो था । कोई तो था जो कर देता था । पर अपनी जगह बनाने के लिए आज भी संघर्ष करना पडता है। 17 साल की शादी में कुल समय देखो तो 16 साल मैने रोकर गुज़ारे हैं । आज बच्चॉ के लिए प्रेम है ,खास तौर से लडकी के लिए । अच्छा ही है । उसके लिए मै सास ससुर ..किसी की नही सुनती । लगता है बिगाड रही हूँ ।तो ठीक ही है । ऑल राउंडर है सिमरन । पता नही पत्नियों को सताने वाले आदमी बेटी के लिए इतने बदल कैसे जाते हैं । पत्नी के लिए वे कभी नही बदलते । कभी कभी मन से निकलता है कि हर पुरुष को बेटी पैदा होनी चाहिये । वह शर्मिन्दा तभी होता है अपने कर्मों पर । किसी और की बेटी को सताने का उसका अपराध-बोध ,जिसे वह कभी कह नही पाता ,उसे उदार बनाता है बेटी के प्रति । पत्नी के आगे तो अहंकार आता है । बेटी के आगे नही । वे बेटी को डांस सिखाना चाह्ते है । पेंटिंग क्लासिज़ भेजते हैं । ऐनुअल डे पर उसके परफर्मेन्स को सी डी पर बार बार देखते हैं ।नाचती भी बहुत अच्छा है सिमरन ।[मैने भी देखा है]। "

मैं हतप्रभ थी । शायद वे सही थीं । लेकिन अगर सही थीं तो मसला गम्भीर है । क्या इस सवाल का जवाब है कि पत्नियों के लिए अनुदार और असहिष्णु पति बेटी के लिए कैसे दिलदार हो जाते हैं ? या मैं ननद के जवाब को सही मानूँ किसी और की बेटी को सताने का अपराध बोध और पॉलिटीकली करेक्ट साबित होने क लिए ऐसा करना उनकी मजबूरी होती है ?

4 comments:

स्वप्नदर्शी said...

मेरा ख्याल है कि ये सरलीकरण होगा, हलाकि इसमे कुछ् सच हो सकता है. जिन लोगो की कम उम्र मे शादी होती है, और लोग सन्युक्त परिवार मे रहते है, वहा अलग तरह के दबाव होते है, अपनी पह्चान, और पत्नी के साथ, एक नये परिवार की नीव रखना, और पुराने परिवार मे रहते हुये, नया परिवार बनाना, बडा ही मुश्किल पचडा है. इसके लिये आर्थिक आधार, और अपने मा-बाप के सामने एक बच्चे की भूमिका से बाहर निकल कर एक व्यस्क का रोल अपनाना पडता है. जो हमारे समाज मे पुरुषो के लिये एक बेहद दर्द्ननाक प्रक्रिया है, और जो साहस की मांग करती है.

विरले ही पुरुष इस परीक्षा को पास करते है. पर अगर घर के बाकी लोग समझदार हो तो ये प्रक्रिया आसान हो जाती है.

समय के साथ इंसान के भीतर आत्मविस्वास आता है, फिर बाहर का सामाजिक-आर्थिक वातावरण भी बदल गया है दो पीढीयो के बीच.

ghughutibasuti said...

सुजाता, इसका एक सीधा व सरल कारण है । यदि किसी को दबा कर रखना है तो सबसे पहले उसके अपने अहम् ,स्वतत्व,आत्मसम्मान को तोड़ दो । यह हो जाए तो तीन चौथाई युद्ध जीत लिया । यह बात और है कि जो पुरुष अपनी पत्नी को विरोधी दल व दाम्पत्य को युद्ध माने वह जीवन में क्या सच्चा सुख पाएगा ?
घुघूती बासूती

Arun Arora said...

"इस आदमी को मैने कूट-कूट कर ठीक किया है वर्ना जिस कमसिन उम्र में मेरी शादी हुई थी ये और इनका परिवार तो मुझे खत्म कर देते अभी तक । मेरे जेठ और ससुर के सामने मुँह पर खींच-खींच कर मारता था । मैने कभी ऐसी बातें नही कहना चाहीं । एक दिन पीटने लगा तो मैने हाथ पकड लिया सबके सामने और धमका दिया - मेरे भी हाथ चलते हैं । ये और बात है कि कभी नही चलाए ।यही जरूरत भी है आज की

Batangad said...

न तो, वो कूटने से ठीक हुआ न तो उसका अपराध बोध था। लेकिन, फिर भी अच्छा है कि अगर बीवी से कुटने के डर से पति आगे की पीढ़ी के साथ इतना सुखद बर्ताव करने लगे। वैसे, मुझे जो लगता है ये शायद समय की वजह से हुआ। मेरे घर में लड़कियों को तो कोई मारने की बात सोच भी नहीं सकता। डांट खाना-पिट जाना भी अगर कभी हुआ तो, लड़कों का ही होता है। हम भाई बहनों में जो सबसे छोटे भाई बहन हैं। उनको तो, शायद ही कभी डांट पड़ी हो।

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