Monday, February 11, 2008

क्या आप अपनी बहन को अपनी दुकान , मकान ज़मीन में बराबर हकदार मानते हैं ?

विवाह विस्थापन जैसा होता है , और सर्वप्रथम लडकी ससुराल में शरणार्थी की हैसियत से पहुँचती है । ऐसे में सम्पत्ति पर उसका अधिकार उसे आत्मविश्वास दे सकता है । कानून बहुत हैं लेकिन लोचे भी हैं । जिन्हें नीलिमा की पोस्ट में समझाया गया है । इस पोस्ट पर आयी टिप्पणियाँ दो बातें साबित करती हैं - पहला, कि यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है [टिप्पणियों का दीर्घ आकार देखिये] दूसरा , अभी भी हम में से इस प्रश्न से जी चुराते हैं । भाई-बहन के रिश्ते तभी बने रहेंगे जब बहन सम्पत्ति में अपना कानूनी हक न मांगे ।माँगे बिना दिया नही जायेगा ।क्यो टूटते हैं रिश्ते जब बहन अपना हक मांगती है। रचना की बात शायद सही है कि कानून के साथ साथ मानसिकता बदलनी होगी -

किसी भी समस्या का समाधान , समस्या मे ही होता है । कानून क्या कहता हैं ये बहुत बाद की बात हैं , सबसे पहले आप को ये पता होना चाहीये की आप चाहती क्या है ? अगर आप समाज मे पुरुष का संरक्षण पाकर अपने को सुरक्षित समझती है तो आप को किसी भी चीज़ मे बराबरी का दावा नहीं करना चाहीये ? कानून से जायदाद का हक मिल जाना एक बात हैं पर मानसिक रूप से आप को समान अधिकार मिलना दूसरी बात है । अपने हक के प्रति जो जागरूक है वह पहले अपने को मानसिक रूप से स्वतंत्र करे जो इतना आसान नहीं हैं । पिता ही नहीं माता को भी पहले दिन से अपनी पुत्री और पुत्र को अपनी दो आंखो की तरह देखना होगा । समाज की नींव घर से होती है , हम अपने घर को सुधार ले समाज अपने आप सुधर जाएगा । व्यक्तिगत रूप से मै मानती हूँ की माता पिता कि जायदाद पर किसी का भी "अधिकार " नहीं होना चाहिये । जिनकी चीज़ हैं वह जिसको देना चाहे दे । हमे इस सब मै कानून का साथ नहीं लेना चाहीये , हमे ये सोचना चाहीये की माता पिता अपनी पुत्री के साथ क्यो अपने को सुरक्षित नहीं समझते । एक पुत्री चाहे विवाहित हो या अविवाहित उसे भी अपनी आय का हिस्सा अपने माता पिता को देना चाहीये

स्वप्नदर्शी के अनुसार यह परवरिश का अंतर है और लडकियों को भी कुछ कीमत चुकानी होगी अधिकार पाने के लिए-

दहेज के नाम पर भी जो मिल्ता है, उसमे कितनी स्त्रियोन को उस सम्म्पति को अपने अनुसार खर्च करने की आज़ादी होती है? और कितनो के काम दहेज का पैसा गाडे वक़्त मे काम आता है?

लड्की की शादी को जो रोना है, उसमे सारा का सारा खर्च बारतियोन की आव्भगत, सम्बन्धियो को लेन देन, और शोबाज़ी मे जाता है. क्या पिता लडकी से पूछ्ता है कि उसे वो पैसा किस रूप मै चाहिये?
फिर बडे दिखावे वाली शादियो के लिये लड्किया भी उतनी ही उतावली रहती है, कुछ दोष उनका भी है.
बहुत कम लड्किया मेहनत से पढायी करती है, और शादी उनके जीवन को एक स्थायी आर्थिक-सामाजिक सुरक्शा देती है. पढायी के अलावा भी, क्योन नही लड्किया, अपने पैसे के सही मेनेज्मेंट के प्रति सतर्क रहती है.
पता नही पढी-लिखी लड्किया कभी अपने पिता से इस बारे मे सवाल करती भी है या नही?
आज़ादी कोई भीख की तरह नही मिलती, उसकी भी कीमत होती है.


जबकि श्रीमान विखण्डन के अनुसार पहला सवाल हमारी [पुरुषॉ]की तरफ पहले उठता है -
अभी यहाँ नया हूँ , देख रहा हूँ , सामने यह ब्लॉग आया और मुद्दा बडा वजिब लगा क्योंकि यह सवाल हमारे सामने कई बार उठता है और हम किनारा करने में भलाई समझते हैं ।
सम्पत्ति के विभाजन का सवाल ही क्यों उठता है,बेटियों को ही घर छोड कर क्यों जाना होता है विवाह के बाद ? किस कानून में लिखा है? पर अगर लिखा है तो पडताल ज़रूरी है ।
अगर बेटा घर छोडता है किसी कारण तो उसका तो जायदाद के ऊपर हक रहता है । लेकिन लडकीअगर एक बार घर छोडती है तो बाप का घर हर मायने में उसके लिये पराया हो जाता है , सम्पति तो बहुत दूर की बात है ।
दहेज और तीज त्योहार पर लडकी को जो दिया जाता है उसके नाम पर बाकी सब जगह से उसका नाम माइनस हो जाता है । दहेज भी ससुराल की सम्पत्ति हो जाता है और पति के घर की सम्पत्ति पर उसका नाम कागज़ में ही रहता है ।
कुछ आदिवासी समाजों में शादी के बाद लडका घर छोडता है और लडकी के घर आता है, और सम्पत्ति का बंटवारा लडकियों के बीच होता है । लेकिन विसंगति देखिये हम उन्हें पिछडा कहते हैं । भला क्यों ? पिछडा कौन है ? क्या हम अपने मकान , दुकान ,ज़मीन में से अपनी बहन को हिस्सा देने को तैयार हैं ? अगर नही तो पहले अपने ऊपर प्रश्नचिह्न लगाना होगा !!


जबकि तरुण कहते हैं कि कानूनों को समय के हिसब से संशोधित करना होगा और सबसे पहले ऐसे सवालों पर बात कर सकने की मानसिकत तैयार करनी होगी -

कानून ऐसा है समस्या इस बात पर नही है, समस्या ये है कि ऐसे कानून बदले नही जाते। यही नही देश में ऐसे कितने ही कानून होंगे जिनका आज के परिवेश में या तो कोई मूल्य ही होगा या कभी इन्हें Implement करने की कोई पहले ही नही हुई होगी।और कामकाजी लड़कियों को भी चाहिये कि वो अपनी आय का कुछ हिस्सा घर के लिये भी दे इससे Parents को भी इस बात का ऐहसास होगा।

लड़कियों और महिलाओं को भी चाहिये कि वो अपनी सोच को बदलें, जब तक वो सास-बहू के मैलोड्रामा से नही उठती कुछ नही हो सकता अगर आप को लगता है इन मैलोड्रामा का इस बात से क्या संबंध, तो है और बहुत बड़ा है क्यों कि इन्हें पाठ्य पुस्तक की तरह देखने वाले इसकी चर्चा से ही नही उबर पाते तो वो इस तरह के बदलाव का हिस्सा कैसे बनेंगे।

5 comments:

Bandmru said...

इससे पहले कि वे आ के कहें हमसे हमारी ही बात हमारे ही शब्दों में और बन जाएँ मसीहा हमारे , हम आवाज़ अपनी बुलन्द कर लें ,खुद कह दें खुद की बात ये जुर्रत कर लें ....

aap ki hi ye line hain.
bahut hi karwa sach hain ..
is pr amal karne ki jarurat ahin.

Anonymous said...

मर्दों की ज़बान आपके सवाल का उत्तर देने में बहुत सफाई नहीं बरतेगी, लेकिन ये बताइए सुजाता जी, क्‍या आपने अपने घर में पिता और भाइयों से उनकी संपत्ति में हिस्‍सा मांगा?

सुजाता said...

अनिकेत जी ,
भाई नही है ,सो मुझ पर सवाल ही बेमानी है । माता पिता के पास जो है सो हमारा ही है ।
और यदि भाई होता भी तो कुछ अलग न होता ।आप के ही समाज में से होता ।
मांगने की ज़रूरत न पडे ,यह सवाल ही न उठे , यही तो बदलाव लाना है ।
फिलहाल तो माँगने पर बहने दुश्मन हो जाती हैं भाई की , है न!
फिलहाल आप बताइये कि आपसे बहन मांगे इसका इंतज़ार है या क्या स्टैंड है ?बिना मांगे ही दे दोगे :)

अविनाश वाचस्पति said...

देखिये बेटियों को तो सब देना चाहते हैं पर बहनों के नाम पर सांप सूंघ जाता है. विस्तार पर फिर ...

dilip uttam said...

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