Sunday, February 17, 2008

क्‍या सवाल इतने एकतरफा हैं


निमिषा के बहाने कुछ और सवाल
निमिषा के मसले की अन्‍य बारीकियाँ, उसके बचपन, घर और परवरिश का महीन यथार्थ मैं नहीं जानती। सिर्फ एक दुखद अनुभूति है, निमिषा और ऐसी ढेरों निमिषाओं के लिए।

लेकिन इसे पढ़ने और अपने आसपास देखे कुछ अनुभवों, कुछ पढ़ी हुई किताबों के मद्देनजर कुछ उड़ते से ख्‍याल आ रहे हैं। बातें अगर ठीक-ठीक फॉर्मूलेट न भी कर पाऊं, तो भी मैं कुछ ये कहना चाहती हूं :

इजाडोरा डंकन और चार्ली चैप्लिन की आत्‍मकथा पढ़ते हुए जो बात सबसे ज्‍यादा अपील करती है, वो है उनकी मांओं का चरित्र। भावनाओं से भरी एक कलाकार स्‍त्री का मन, एक दुखद शादी, शराबी पति, आय का कोई तयशुदा स्रोत नहीं और दो बच्‍चों का बोझ। लेकिन इजाडोरा और चार्ली ने अवसाद के दौरों के बीच डूबती मांओं की ऐसी तस्‍वीर भी पेश की है, जहां वो अपने बच्‍चों के लिए पियानो बजाती हैं, उन्‍हें कविताएं और गीत सुनाती हैं, बच्‍चों के साथ नाचती हैं, खुश होती हैं, और उमंगों, सपनों और श्रम से भरी एक दुनिया का रास्‍ता खोलती हैं, अपने नन्‍हों के लिए।

ये एक सोचने वाली बात है। प्रेम और विवाह से जुड़ी उम्‍मीदों का टूट जाना तो एक बात है, लेकिन एक पिछड़े, गरीब मुल्‍क में जीवन, कला, श्रम और सपनों में मनुष्‍य का और खासकर स्‍त्री जाति का इतना क्षीण विश्‍वास भी सोचने वाले सवाल हैं। मैं ऐसी कई स्त्रियों को जानती हूं, एक दुखद शादी और प्रेम का अंत जिनकी आत्‍महत्‍या में, या अवसाद और पागलपन में हुआ। इसका एक बड़ा कारण धन और शक्ति संबंधों के प्रति इस मुल्‍क के लोगों का नजरिया भी है। उनका दुख सिर्फ प्रेम न मिल पाने का दुख नहीं था। अगर वह उच्‍च वर्गों से ताल्‍लुक रखती थीं, तो उनका दुख बिना कुछ श्रम किए आसानी से मिली एक सामाजिक पहचान और सुख-सुविधा के छिन जाने का भी था। अब अगर घर से निकलना और काम करना पड़े, तो वो उसके साथ सहज नहीं थीं। वह एकाएक छिन गई उन सुविधाओं को खोने का दुख भी नहीं झेल पा रही थीं।

कविता, संगीत, ज्ञान और कला से उनका कभी वैसा रागात्‍मक जुड़ाव नहीं रहा। भौतिक जीवन का स्‍तर ही उनके सुख और आनंद का पैरामीटर था, और दुखद शादी से वह पैरामीटर एकाएक ध्‍वस्‍त हो गया था।

मैं उन्‍हें दोष नहीं दे रही, सिर्फ चीजों को समझने की कोशिश कर रही हूं। मेरे आसपास की दुनिया में स्‍त्री-पुरुष का, पति-पत्‍नी का संबंध प्रेम और भावना से जुड़ा, बना रिश्‍ता न होकर सामाजिक पहचान, सुरक्षा और ठोस भौतिक अस्तित्‍व से जुड़ा मसला होता है। ऐसे में ये टूटते-बिखरते रिश्‍ते, आत्‍महत्‍या की ओर जातीं औरतें और भी ढेरों सवाल खड़े करती हैं। यह सिर्फ स्‍त्री के मन और देह से कमजोर होने की बात नहीं है। एक गरीब, चोटिल और अभावग्रस्‍त समाज और उस समाज में मनुष्‍यों का जीवन, शायद इन सबके बारे में ठीक से नहीं सोचा तो हम अपनी समस्‍याओं के बारे में भी ठीक-ठीक नहीं सोच पाएंगे, उनके हल खोज लेना तो बहुत दूर की बात है।

11 comments:

Rachna Singh said...
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Rachna Singh said...

मेरे आसपास की दुनिया में स्‍त्री-पुरुष का, पति-पत्‍नी का संबंध प्रेम और भावना से जुड़ा, बना रिश्‍ता न होकर सामाजिक पहचान, सुरक्षा और ठोस भौतिक अस्तित्‍व से जुड़ा मसला होता है।
you are absolutely right . we have lost the sense of belongingness to each other . we need each other not because we "Want" that each other in our life but because "this " is what everyone else " does". we are not worried about our character but only about our reputation . abraham linchon has said that chracter is a tree and reputation is the shawdow of that tree but for all of us what matters is the shawdow and not the tree

सुजाता said...

बहुत सही बात है मनीषा ,
"दुख का अधिकार " गरीबों का , श्रमिकों का नही होता है । लेखक का नाम ध्यान नही आ रहा पर इसी विषय पर एक लेख है शायद यशपाल ...
गरीब माँ रेहडी लगाती है ,बेटे की मौत का दुख मानाने का भी अवसर नही होता उसके पास ।

स्वप्नदर्शी said...

आत्मह्त्या की कोई भी वजह हो, वो असहयता से उपजती है. सवाल है कि किस तरह से उससे लडा ज सकता है. और यहा पर व्यक्ति के अलावा, उसके समजिक सम्बन्ध भी बहुत कुछ तय करते है.
एक और बात, बात को हल्का बनाने के लिहाज़ से नही, निमिशा का छोटा बच्चा 18 महीने क था. postpartum depression, अमूमन बहुत ही कामन है, उस पर किसी तरह की मदद नही, और पति का असम्वेदंशील होना, हो सकता है निमिसा को यहा पहुंचा गया हो.

सुजाता said...

एक बिन्दु और है मनीषा ,
अक्सर पारिवारिक मर्यादाओं के बन्धन ही आत्महत्या की ओर बढाते हैं । घुटन भरा जीवन , जहाँ किसी से कुछ कहना सम्भव न हो ,दुनिया क्या कहेगी का डर जीवन की इच्छा से बडा हो जाये - वहाँ नैराश्य का चरम हो जाता है । विवाह विच्छेद का सारा भार स्त्री ही वहन करती है । बच्चे पैदा करना उसके लिये अभिशाप है अगर इस में साथी साथ देने का इरादा न रखे ।

सुजाता said...

दम घोंटू और आत्महत्या की ओर ले जाती हो अगर मरयादाएँ और संस्कार तो पतनशील होना बेहतर .....
हम आधे में टंगे है....

Bhupen said...

सुजाता, मैं आत्महत्या का पक्षधर नहीं हूं. लेकिन पतनशील होना कोई मूल्य है? यदि हां तो कैसा?

Unknown said...

Bhupenजी और सुजाता,
माफ करना जवाब मैं दे रही हूँ।
जब साधुशीलता ही स्त्री का (किसी का भी) अपेक्षित स्वभाव हो.....तो पतनशीलता से उसका पतन करना बहुत आसान हो जाता है।

पतनशीलता कोई मूल्य तो नहीं....किन्तु अगर साधुशीलता अस्तित्व को परिमित करती है....स्वयं के विनाश को नहीं रोक सकती तो ऐसे में थोड़ी पतनशीलता का ज्ञान और आचरण दोनों ही बचाव कर सकते हैं।

मनीषा पांडे said...

भूपेन, पतनशील शब्‍द एक व्‍यंग्‍य, एक सटायर है यहां, उन तमाम अच्‍छे गुणों के विरोध में, जो समाज में अच्‍छी लड़की कहलाने के लिए अपेक्षित होता है। मैं दिल्‍ली की सड़कों पर तुम्‍हारे साथ 10 बजे तक आवारा भटकूं तो मैं एक अच्‍छी लड़की नहीं हूं। मेरे चरित्र को शंका की निगाह से देखा जाना चाहिए। लेकिन 9 बजे से पहले-पहले घर पहुंच जाऊं तो भाई-भाभी और पडोसी कहेंगे, अच्‍छी लड़की है। उस दिन अशोक के घर पर तुम, अविनाश, दिलीप जी, सभी तो 12-1 बजे तक गपियाते रहे, लेकिन मैं एक अच्‍छी लड़की समय पर घर लौट गई। न लौटती तो अच्‍छी लड़की नहीं होती, अच्‍छी नहीं होती तो पतित होती। तो भईया, पतित ही‍ सही, अच्‍छी लड़की होने का बोझ अब और नहीं ढोना।

Yunus Khan said...

मनीषा तुम्‍हारी ये पोस्‍ट देर से देखी । बहुत संवेदनशील मुद्दा है । जिन धनाढ्य स्त्रियों की तुम बात कर रही हो, जिनका कविता, संगीत, ज्ञान और कला से कभी रागात्‍मक जुड़ाव नहीं रहा और पति से अलग होने के बाद जिनकी दुनिया भरभरा गयी । उनसे अलग हटकर ज़रा उन स्त्रियों के बारे में सोचो जिनका इन सबसे जुड़ाव था और जिन्‍हें अपने पति से अलग होना पड़ा । क्‍या इसी कलात्‍मक जुड़ाव ने उनकी डगमगाती दुनिया को अस्‍त-व्‍यस्‍त होने से रोका । शायद हां शायद नहीं । मुझे लगता है कि चाहे पुरूष हों या स्‍त्री, जीने का एक मक़सद, एक शग़ल तो होना ही चाहिए । जो आपको किसी भी समय अवसाद के ढलान पर फिसलने से रोके । लेकिन इसके साथ साथ कहीं परवरिश का भी दोष है । क्‍यों हमारे परिवारों की लड़कियों के मन में ये भरा जाता है कि एक पुरूष के 'सहारे' या 'नाम' के बिना उसकी दुनिया का संतुलन बिगड़ जायेगा । दरअसल हमारे यहां लड़कियों को एक स्‍वतंत्र व्‍यक्तित्‍व बनने ही नहीं दिया जाता, शायद इन आत्‍महत्‍याओं की वजह यही है ।

दूसरी बात ये कहना चाहता हूं कि हमारे यहां बहुधा पति-पत्‍नी का रागात्‍मक जुड़ाव कम ही होता है, बस साथ हैं तो हैं, एक छत के नीचे ठुंसी दो आत्‍माओं का एडजेस्‍टमेन्‍ट । इसलिए कई बार रिश्‍ते भोथरे होने के बावजूद उन्‍हें किसी तरह निभाते चले जाने की परंपरा रही है ।

dilip uttam said...

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अनुप्रिया के रेखांकन

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