Monday, February 18, 2008

हम लड़कियां पतित होना चाहती हैं


एक पतनशील स्‍वीकारोक्ति
(सुजाता ने नोटपैड पर पतनशीलता पर कुछ विचार व्‍यक्‍त किए। मैं सच कहने से खुद को रोक नहीं पा रही हूं।)

अपने घर की बड़ी-बूढियों और पड़ोसिनों, मिश्रा आंटी, तिवारी आंटी और चौबे आंटी से अच्‍छी लड़की होने के लक्षणों और गुणों पर काफी भाषण सुना है। और-तो-और, हॉस्‍टल में भी लड़कियाँ अक्‍सर मुझमें एक अच्‍छी लड़की के गुणों का अभाव पाकर उंगली रखती रहती थीं।

अच्‍छी लड़की न होने के बहुत सारे कारण हो सकते थे।

दादी के पैमाने ज्‍यादा संकुचित थे, मां के उनसे थोड़ा उदार और हॉस्‍टल के सहेलियों के थोड़ा और उदार। लेकिन पतित सभी की नजरों में रही हूं। जैसेकि शीशे के सामने चार बार खड़ी हो गई, या कोई रोमांटिक गाना गुनगुनाया, थोड़ा ज्‍यादा नैन मटका लिए, चलते समय पैरों से ज्‍यादा तेज आवाज आई, भाइयों के सामने बिना दुपट्टा हंसी-ठट्ठा किया तो दादी को मेरे अच्‍छी लड़की न होने पर भविष्‍य में ससुराल में होने वाली समस्‍याओं की चिंता सताए जाती थी।

मां इतनी तल्‍ख तो नहीं थीं। उनके हिसाब से घर में चाहे जितना दांत दिखाओ, सड़क या गली से गुजरते हुए चेहरा एक्‍सप्रेशनलेस होना चाहिए। सामने वाले शुक्‍ला जी का लड़का छत पर खड़ा हो तो छत पर मत जाओ, घर में भले बिना दुपट्टा रहो पर छत पर बिना दुपट्टा अदाएं दिखाना पतित होने के लक्षण हैं। अड़ोसी-पड़ोसी लड़कों से ज्‍यादा लडि़याओ मत। पूरा दिन घर से बाहर रहकर घूमने को जी चाहे तो लक्षण चिंताजनक है। रात में घर न लौटकर दोस्‍त के घर रुक जाने या इलाहाबाद यूनिविर्सिटी के गर्ल्‍स हॉस्‍टल में किसी सहेली के कमरे में रात बिताने को जी चाहे तो मां की नींद हराम होने के दिन आ गए हैं, ऐसा समझ लेना चाहिए। जबकि पापा अपने कॉलेज के दिनों के किस्‍से इस उम्र में भी मजे लेकर सुनाते रहे थे कि कैसे घर में उनके पांव नहीं टिकते थे, कि साइकिल उठाए वो कभी भी दस दिनों के लिए घर से अचानक गायब हो सकते थे और इलाहाबाद से सौ किलोमीटर दूर तक किसी गांव में जिंदगी को एक्‍स्‍प्‍लोर करते 10-15 दिन बिता सकते थे।

हॉस्‍टल की लड़कियां ज्‍यादा खुली थीं। वहां मैं कह सकती थी कि 20 पार हूं, लड़कों से बात करने को जी चाहता है। आमिर खान बड़ा हैंडसम है, मुझे उससे प्‍यार जैसा कुछ हो गया है। इन बातों को लड़कियां पतित नहीं समझतीं। उनके भी दिलों का वही हाल था, इतना तो मुंह खोलने की आजादी भी थी। लेकिन वहां भी पतन के कुछ लक्षण प्रकट हुए। जैसेकि ये तू बैठती कैसे है, पैर फैलाकर आदमियों की तरह। मनीषा, बिहेव लाइक ए डीसेंट गर्ल। ये पेट के बल क्‍यूं सोती है, लड़कियों के सोने में भी एक अदा होनी चाहिए।

हॉस्‍टल में मेरी रूममेट और दूसरी लड़कियां दिन-रात मुझमें कुछ स्त्रियोचित गुणों के अभाव को लेकर बिफरती रहतीं और जेनुइनली चिंताग्रस्‍त होकर सिखाती रहतीं कि अगर मुझे एक अच्‍छी लड़की, फिर एक अच्‍छी प्रेमिका, अच्‍छी पत्‍नी और अच्‍छी मां होना है, तो उसके लिए अपने भीतर कौन-कौन से गुण विकसित करने की जरूरत है।

जो मिला, सबने अपने तरीके से अच्‍छी लड़की के गुणों के बारे में समझाया-सिखाया। और मैं जो हमेशा से अपने असली रूप में एक पतित लड़की रही हूं, उन गुणों को आत्‍मसात करने के लिए कुछ हाथ-पैर मारती रही, क्‍योंकि आखिरकार मुझे भी तो इसी दुनिया में रहना है और अंतत: मैं खुद को इग्‍नोर्ड और आइसोलेटेड नहीं फील करना चाहती।

इसलिए कहीं-न-कहीं अपने मन की बात, अपनी असली इच्‍छाएं कहने में डरती हूं, क्‍योंकि मुझे पता है कि वो इच्‍छाएं बड़ी पतनशील इच्‍छाएं हैं, और सारी प्रगतिशीलता और भाषणबाजी के बावजूद मुझे भी एक अच्‍छी लड़की के सर्टिफिकेट की बड़ी जरूरत है। हो सकता है, अपनी पतनशील इच्‍छाओं की स्‍वीकारोक्ति के बाद कोई लड़का, जो मुझसे प्रेम और शादी की कुछ योजनाएं बना रहा हो, अचानक अपने निर्णय से पीछे हट जाए। 'मैं तो कुछ और ही समझ रहा था, ये तो बड़ी पतनशील निकली।'

कोई मेरे दिल की पूछे तो मैं पतित होना चाहती हूं, भले पैरलली अच्‍छी लड़की होने के नाम से भावुक होकर आंसू चुहाती रहूं।

वैसे पतनशील होना ज्‍यादा आसान है और अच्‍छी लड़की बनने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। हो सकता है, मेरे जैसी और ढेरों लड़कियां हों, जो अपनी पतनशीलता को छिपाती फिरती हैं, अच्‍छी लड़की के सर्टिफिकेट की चिंता में। डर रही हूं, कि खुद ही ओखल में सिर दे दिया है, लेकिन अब दे दिया तो दे दिया। चार और साथिनें आगे बढ़कर अपनी पतनशील इच्‍छाएं व्‍यक्‍त करेंगी, तो दिल को कुछ सुकून मिलेगा। लगेगा, मैं ही नहीं हूं साइको, और भी हैं मेरे साथ।

32 comments:

स्वप्नदर्शी said...
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Tarun said...

ये पढ़कर तो हम अब यही सोच रहे हैं कि हम भी पतित हो ही जाते हैं यहाँ आसानी से हो भी जायेंगे।

स्वप्नदर्शी said...
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Unknown said...

पिछली पोस्ट में जो टिप्पणी ड़ाली थी वही दोहरा रही हूँ....
जब साधुशीलता ही स्त्री का (किसी का भी) अपेक्षित स्वभाव हो.....तो पतनशीलता से उसका पतन करना बहुत आसान हो जाता है।

पतनशीलता कोई मूल्य तो नहीं....किन्तु अगर साधुशीलता अस्तित्व को परिमित करती है....स्वयं के विनाश को नहीं रोक सकती तो ऐसे में थोड़ी पतनशीलता का ज्ञान और आचरण दोनों ही बचाव कर सकते हैं।

सुजाता said...

यूनिवर्सिटी सेंट्रल पार्क में , सर्दियों की खिली धूप में पाँ पसार सो जाऊँ , राह चलते कभी खुशी में याद आ जाए कोई गाना तो ज़ोर ज़ोर से गुनगुनाऊँ ....अरे ..अरे पोस्ट ही लिखनी होगी ।

Ashish Maharishi said...

कुछ कुछ घर परिवार की याद आ गई है, जहां लड़कियां यानि मेरी बहनों को छत पर जाना मना था और सड़क पर बिलकुल नीचे मुंह कर के जाने होता था यदि गलती से आंख ऊपर की थी तो मोहल्‍ले भर में चर्चा की शर्मा जी की लड़की के पर निकल आए हैं,उस वक्‍त मुझे यह समझ में नहीं आता था लेकिन यह पोस्‍ट पड़ने के बाद लग रहा है कि उस वक्‍त थोड़ी सी आवाज उठानी चाहिए थी

Anonymous said...

मनाई , बंदिश और नियम

जहाँ भी मनाई हों
लड़कियों के जाने की
लड़को के जाने पर
बंदिश लगा दो वहाँ
फिर ना होगा कोई
रेड लाइट एरिया
ना होगी कोई
कॉल गर्ल
ना होगा रेप
ना होगी कोई
नाजायज़ औलाद
होगा एक
साफ सुथरा समाज
जहाँ बराबर होगे
हमारे नियम
हमारे पुत्र , पुत्री
के लिये
अपना मन भाया कर सके पुरूष और स्त्री दोनों इसके लिये नियम एक ही हो । पतनशील का टैग पहन कर अगर अपनी जिन्दगी जीने की आज़ादी है अपने मन से तो आप मुझे जो चाहे टैग दे पर ये जरुर बताये मुझे टैग देने का अधिकार आप को किसने दिया हैं ??

पारुल "पुखराज" said...

patansheelta = munmtaabik jeena...aisa hai kya ? agar aisaa hai to fir theek hai...aur acchha bhi..

चंद्रभूषण said...

पतित होने के मायने क्या हैं? अगर ये वही हैं जो स्वप्नदर्शी ने बताए हैं, तो प्रगतिशीलता के मायने भी ठीक यही होते हैं। अगर ये कुछ और हैं तो कृपया कोई बताए। चोखेर बाली पर कुछ भी पूछो, कोई जवाब नहीं देता, किसी बात पर बहस करना चाहो तो कोई बहस नहीं करता। ऐसे कैसे होगा यार...

मनीषा पांडे said...

संभवत: यह शब्‍द पतन और पतनशीलता बहुत कन्‍फ्यूजन पैदा कर रहा है। इसके पहले वाली पोस्‍ट पर भूपेन भी इसी पतन को लेकर व्‍यथित हो रहा था। मैंने उसके जवाब में भी कहा और यहां भी कह रही हूं, कि पतनशीलता शब्‍द एक व्‍यंग्‍य, एक सटायर की तरह है, जो अच्‍छी लड़की होने के सामाजिक और नैतिक दबाव के विरोध में लिखा गया है। मैं खुद ये दबाव हमेशा महसूस करती हूं, एक अच्‍छी लड़की होने का दबाव, जो चौबीसों घंटा मेरे सिर पर सवार रहता है, जबकि कितनी सारी सीमाएं तो तोड़ी भी जा चुकी हैं। आप 27 पार अकेली लड़की एक खास डायमीटर से ज्‍यादा दांत चियारें तो अच्‍छी लड़की नहीं हैं। मोहल्‍ला वाली मेरी हॉस्‍टल डायरी के बाद मेरे आसपास की दुनिया के बहुतेरे लोग इस निष्‍कर्ष पर पहुंचे कि लड़की अच्‍छी नहीं है। मैं अपने समविचार साथियों, मित्रों की बात नहीं कर रही। उसके बाहर की एक बड़ी दुनिया, जिसमें दिन-रात रहना होता है। किराए पर कमरा देने वाली मकान-मालकिन सिर से पांव तक चेक करती है, अकेली रहोगी, पता नहीं अच्‍छी लड़की है भी या नहीं। मुंबई में मैं अपनी बिल्डिंग में किसी कुलकर्णी, पंड्या, आहूजा और करमरकर आंटी के अंकलों के सामने दांत नहीं खोलती थी, दोस्‍तों से कहती, मम्‍मी-पापा के रहते सब लोग आकर अपनी सूरतें लीगलाइज करा जाओ, क्‍योंकि मैं एक अच्‍छी लड़की हूं। अच्‍छी लड़की का सर्टिफिकेट किसी कीमत पर लूज नहीं करना चाहती। दूर क्‍यूं जाते हैं, आपके ऑफिस में भी तो होंगे, ऐसे सर्टिफिकेट इशू करने वाले शूरवीर। फलानी लड़की अच्‍छी है, और फलानी अच्‍छी नहीं है, लूज कैरेक्‍टर।

कितनी चिंता करती हूं, मैं उस सर्टिफिकेट की।

पतित होने का असल मायने प्रगतिशील होना ही है। मन और आत्‍मा से मुक्‍त होने का प्रयास करना, कोई व्‍यक्तिवादी, अहंवादी, निजी किस्‍म की मुक्ति नहीं, एक मनुष्‍य के रूप में समस्‍त मेधा और उदात्‍तता के साथ मुक्ति। पतन शब्‍द सिर्फ सटायर है, इसे प्रतिक्रिया की भाषा न समझें। हालांकि इस पर और विस्‍तार से लिखने की जरूरत है, वरना गलत समझे जाने का खतरा भी बना रहेगा।

Arun Arora said...

काहे जी अब तो जिनकी नजरो मे आप पतित थी उन्होने एक पावन ढूढ कर आपको भी पतित से पावन कर दिया है..अब तो आप सीता राम की श्रेणी मे आ गई है ना..तो अब काहे..:)

Anonymous said...

मनीषा, स्त्रीमन के विचार जानकर अच्छा लगा। तीन पीढ़ियों का द्वंद मजेदार है। विचार काफी कुछ तस्लीमा नसरीन के "मेरे बचपन के दिन" की भावनाओं से मेल खाते हैं। आपका लेख हमने तहलका हिंदी वेबसाइट पर साभार अपने "ब्लॉगिरी" कॉलम में लगाया है। समय हो तो देखें।

मनीषा पांडे said...

अनॉनिमस जी,
तहलका के उस पेज का लिंक तो दे दीजिए।
मुझे मिल नहीं रहा है, ब्‍लॉगिरी कॉलम।
मनीषा

ghughutibasuti said...

मुझे थोड़ा सा आश्चर्य हो रहा है । आप में से, लगभग क्या मेरे खयाल से, सभी ७० के दशक या उसके बाद की हो । बहुत हुआ तो कोई शायद ६० के दशक के अन्तिम वर्षों में पैदा हुई होगीं । फिर भी इतने बन्धन थे !
चंद्रभूषण जी ,
शायद आप लड़कियों व स्त्रियों से जो अपेक्षा की जाती है , जो अच्छी लड़की होने की परिभाषा होती है और उस पर १०% भी खरे उतरने के लिये कैसे अपने मन ही नहीं, अपने स्व का भी होम करना पड़ता है वह नहीं समझ रहे । इसीलिये यह कहा जा रहा है कि पतित होना ही बेहतर है । क्योंकि यदि अपने होने का आभास भर पाने के लिये बुरी लड़की बनना आवश्यक है तो वही सही । ना होने से तो बुरा होना ही बेहतर है ।
आशीषजी,
सच में मुझे आश्चर्य है कि आपका ध्यान अपनी बहनों पर लगे बंधनों पर नहीं गया । आप जो अल्पसंख्यक होने का दर्द समझ पाते हैं और सोच ही नहीं पाते कि यदि आप मुसलमान होते तो कैसे जीते इस देश में ! वही आप यह ना सोच पाए कि यदि आप आप ना होकर आपकी बहन होते तो कैसे जीते । एक ही व्यक्ति इतना संवेदनशील होकर स्त्रियों और वह भी अपने घर की,के प्रति संवेदनशील ना हो पाया जानकर मुझे बहुत दुख व निराशा हो रही है । फिर हम शेष समाज से क्या आशा कर सकते हैं ? कृपया सोचिये और उत्तर दीजिये ।
घुघूती बासूती

काकेश said...

चंद्रभूषण said...

काकेश क्या said? खैर, जो भी said, घुघूती बासूती जी, मेरा कहना यह है कि यहां मनीषा की पोस्ट और स्वप्नदर्शी की टिप्पणी से पतनशीलता के जो भी लक्षण उभर रहे थे, उन सब के लिए प्रगतिशीलता नाम का एक कुजात घोषित किया जा चुका शब्द पहले से हिंदी संसार में मौजूद है। उसके इस्तेमाल में हम आजकल इतना शर्माने क्यों लगे हैं- हम, यानी प्रमोद जी और मनीषा जी, और जिसको भी, जहां भी मौका मिल रहा है वही?

क्या यह हिज मास्टर्स वॉयस बोलने के आदी हो चले कम्युनिस्ट कैडरों द्वारा कर दिए गए इस शब्द के अनर्थ के चलते है? ऐसा हो तब भी, एक इतने अच्छे शब्द के पुनर्जीवन में क्या बुराई है? राहुल सांकृत्यायन और अहिल्या रांगणेकर जैसे जाने-माने आवारों ने अपनी आत्मा के सत्त से बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में यह शब्द गढ़ा था। क्या हम इसे इतने सस्ते में खुद से जुदा हो जाने देंगे?

चोखेर बाली पर इस शब्द के प्रयोग को लेकर मेरे मन मे जो कुछ घपला सा हो रहा था, मनीषा के जवाब से वह काफी कुछ साफ हो गया है। अलबत्ता जोड़ के तौर पर यह जरूर कहना है कि मां-बाप और समाज की नजर में अच्छा होने का दबाव लड़कियों पर ज्यादा और लड़कों पर कम, लेकिन होता सभी पर है। जो लोग भी इस दबाव से निकल पाते हैं, उन्हें सिर्फ इतना करना होता है कि अच्छे-बुरे की अपनी तमीज खुद बनानी होती है और उसके अनुसार अपना जीवन बरतना होता है- खुद को इस चिंता से यथासंभव मुक्त रखते हुए कि बाकी दुनिया उनके बारे में क्या सोच रही है।

अगर कोई ज्यादा गले पड़ता है तो उसे अपनी बात समझाने की कोशिश करते हैं, वरना कबीर साहब के शब्दों में यह मानकर संतोष कर लेते हैं-'श्वानरूप संसार है, भूंकन दे झख मार'। निरंतर यह झींखते रहने की कोई वजह मुझे समझ में नहीं आती कि बैरी जमाना आपको समझ नहीं रहा है, वरना ऐसे तो बुरे भी आप नहीं हैं। इस शाश्वत झींख को कोई प्रगतिशीलता नाम दे या पतनशीलता, मेरे लेखे दोनों बराबर हैं।

बालकिशन said...

हम लड़के भी पतित होना चाहते है.
कैसा रहे अगर सब मिल कर एक साथ पतित हो और खूब पतित-पतित खेलें.
फ़िर ये लोग ( घर की बड़ी-बूढियों और पड़ोसिनों, मिश्रा आंटी, तिवारी आंटी और चौबे आंटी) कुछ कर भी नही सकेंगे.
सब पतित मिलकर एक पतित ब्लोगर्स संगठन बना लेंगे.
और भी बहुत से विचार है एक बार शुरूं करले तो सब सुलझ जायेगा.

सुजाता said...

चन्द्रभूषण जी , लडकियों के मामले में दोनो शब्दों के मायने एक हैं । पर पतनशीलता से जो व्यंग्य टपकता है वह प्रगतिशील से नही झलक पाता । जिसे आपके मामले में प्रगतिशील कहेगा उसे ही किसी लडकी के सम्बन्ध में देख कर कोई भी "बुरी लडकी" "पतनशील लडकी" "चरित्रहीन लडकी" कहेगा । हैरानी की बात है न लडकी पार्क की सार्वजनिक बेंच पर लेटी दिखे या ज़ोर ज़ोर से रास्ते मे गाती या रात को देर से घर लौटती दिखे तो वह प्रगतिशील नही करैक्टर्हीन कहा जाता है । इन्हीं विसंगतियों को उभारता है यह शब्द कि अगर " मन की स्वाभाविक मानवी इच्छाएँ पूरी करना पतन कहलाता है तो .. मैं पतित होना या कहलाना पसन्द करूंगी " ।

सुजाता said...

आज ही कॉलेज के एक वरिष्ठ व्याख्याता ने एक एडहॉक महिला व्याख्याता को बिना दुपट्टे का सूट [जिसके भीतर हाइनेक स्वेटर था ]पहन कर आने पर टोक दिया । उसका निरुत्तर रहना और बाद में हमे यह बताना मुझे बहुत खला ।

काकेश said...

काकेश said

कि यह अब देशी पंडित में भी पतिया रहा है. लिंक दिया था जो आपने ग्याब कर दिया जी.

देखें...यदि गायब ना हो तो..

http://www.desipundit.com/2008/02/18/girls-also-want-to-fly-like-boys/

या

http:
www.desipundit.com
/2008/02/18/
girls-also-want-to-fly-like-boys/

मसिजीवी said...

इस शब्‍द के क्‍वाइन हो पाने की ऐतिहासिकता को समझने की जरूरत है...तथा डाइल्‍यूशन से बचने की भी। हमारी सलाह तो बस इतनी है कि तत्काल हड़बड़ाहट में अर्थ कोडिफिकेशन कर इसे प्रगतिशीलता के संदर्भ में देखने से बचा जाना बेहतर होगा।
कौन कहता है कि प्रगतिशीलता ही है पतनशीलता... अगर वह है तो प्रगतिशील (लेखक संघ/यूपीए/...) आदि में वही अच्‍छापन क्यों है जिसका नकार पतनशीलता में है। किसी ससुरे प्रगतिशील को मठाधीश न बनने दो अपना। ...चोखेरबाली हो...पतनशील रहो...उनकी आंखों में चुभती रहो। ये क्‍वाइनेज एकदम नई है क्‍योंकि ये नकार का ये आत्‍मविश्‍वास भी नया है।

Yunus Khan said...

मनीषा ये पतनशीलता बहुत अच्‍छी है ।
इस पतनशीलता के एक मायने आज़ादी भी हो सकते हैं । चलो पतनशीलता वाले रस्‍ते पर तुमने कुछ बत्तियां जला दी हैं । हो सकता है कि कुछ और लड़कियां इस तरफ चली आएं । या चलो ये तो दुआ करें कि कुछ मां बाप तुम्‍हारी इस पोस्‍ट को पढ़कर दिमाग के दरवाजे खोलें ।

स्वप्नदर्शी said...

चन्द्रभूषण जी ये देखे
http://swapandarshi.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.html

Sanjay Karere said...

@मनीषा तहलका पर जो लेख लगा है उसका लिंक यह रहा
http://www.tehelkahindi.com/SthaayeeStambh/----/415.html

dilip uttam said...

see my site www.thevishvattam.blogspot.com &
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Unknown said...

कुछ दिन पहले एक महिला केन्द्रीय मंत्री ने कहा था की भारतीय पुरुषों को क्वांरी पत्नी पाने की आशा छोड़ देनी चाहिए. विवाह से पूर्व शारीरिक संबंधों की वकालत कुछ सेलब्रिटीज ने भी की है. इसके लिए भारत सरकार कालिजों में कंडोम उपलब्ध कराने की बात करती है. क्या यह सब स्वयम को प्रोग्रेसिव साबित करने के लिए किया जा रहा है? पतित होना और प्रोग्रेसिव होना अलग अलग बातें हैं. जो पतित होना चाहती हैं यह उन का व्यक्तिगत मामला है. पर जो प्रोग्रेसिव होना चाहती हैं उन्हें पतित होने की जरूरत नहीं है.

Suyash Suprabh said...

एक बात तो बिल्कुल साफ़ हो चुकी है कि भारत में अधिकतर ब्लॉग-पाठक शब्दों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति को समझने में असमर्थ हैं। मनीषाजी के व्यंग्य को बहुतों ने दूसरे अर्थ में ले लिया। व्यंग्य में हम अक्सर अपनी बातों को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि उसे पढ़ने वाला हमारे जीवन के अनुभव की कड़वाहट को विनोद और समझदारी की चाशनी के साथ ग्रहण करता है। मनीषाजी ने जो लिखा, वो उनके जीवन का कड़वा सच है। लडकियां अगर सहज होकर जीना चाहें, तो समाज उस सहजता को पतनशीलता मान लेता है। क्या आराम से बैठना, इधर-उधर घूम कर आना आदि पतनशीलता है? मगर समाज इन बातों में भी पतनशीलता के तत्त्व ढूँढ लेता है!!

Rajat Yadav said...

मुझे इस 'पतनशीलता' शब्द पर ही आपत्ति है. पतनशील होना अच्छी बात नहीं है. आप यदि इसे सही मानती हैं तो इसे उचित कह कर प्रगतिशील कहकर या पुराणी ग़लत बातों से ऊपर उठना कहिये, पतनशील क्यों !!

Rajat Yadav said...

पुराणी को पुरानी पढियेगा, धन्यवाद.

Unknown said...
This comment has been removed by the author.
Unknown said...

Dosto, jaisa mujhe samajh mai aa rahaa hai patit hone ko ek mohavre ke roop mai vyang ke saath prayog kiya gayaa hai iskaa baastavik charitrik patan se koi sambandh nahee hai. Mujhe lagtaa hai ye ek kheej aur jhallahat kaa parinaam hai. Jaise mujhe slum dog shabd se chot pahuchee to maine apne blog mai lekh ke saath hari-dog naam likhaa.
1 line mai likhnaa chahungaa atma prakaash shuklaa jee kee -
Swatantra hai prakriti parantu bandhano kee haat mai kutil kuber kee dukaan ho gaya hai aadmee.
So patit hone kaa sandarbh ye hai ki ghar parivaar samaaj mai jo laadee hui varjnaaye hain jinko lok maanyataa milee hui hai unse mukti. shiksha ke prasaar ke saath bahut see varjnaaye toot rahee hai aur bahut see toot jaayengee aur ismai sabhyataa ka bhalaa hee hai. varjnaaye purush bhee tod rahe hai aur mahilaye bhee dono kaa swaagat hai
aapkaa apna
patansheel-hari

syed naqi haider naqvi said...

औरत होना भगवान का एक उपहार है dunya की kalpna karna बहुत kathin है अगर औरत को इस से hata दिया जाये ये औरत ही है जो कभी माँ बन कर हर दुःख को अपने aan chal मैं छुपा leti है कभी behen बन कर अपने भाई के akele pan को dor करती है कभी patni बन कर अपने pati के हर सुख दुःख में साथ khadi हो जाती है और जब दिल udas हो तो एक beti की surat मैं अपने pita के दिल को sukoon deti है laikin sawal इस padhe likhe samaj से यही है उस samaj से के जो एक औरत के vajod को कभी devi banakar mandir में pojta है कभी दिवाली पर उस से dhan daulat में adhikta mangta है vahi जब usi devi की shakl मैं औरत samne आती है तो kiun उसको वो izat नहीं देता वो samman नहीं देता जो usi की shakl की एक pathar की murat को देता है कहीं balatkar कहीं ashlil cd कहीं dahej utpidan कहीं अपने ही घर में अपने ही भाई के muqable में tiraskar .किया यही है ishwar की सबसे sundar और utkrisht kala का saman .\
एक shayer का sher yad aaraha है
"""""bad नज़र uthne ही vali थी किसी की janib
अपनी beti का khayal आया तो दिल kanp गया""
gahir ladki पे ghalat ankh uthane vale
तेरी beti भी किसी रोज़ sayani होगी""

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...