Friday, February 22, 2008

दान

कुछ बातें ,कुछ शब्द बहस से परे ज़माने से हमारे -आपके परिवारों मे बोले सुने और दोहराये जाते है…मगर कहीं न कहीं मन मे अटकते और न जानें क्यों खटकते भी रहते है………


हमारे घर में नियम है जब सब लोग मिल बैठ्ते हैं तो किसी एक सदस्य को टार्गेट करके खूब हैरान किया जाता है । मस्ती मज़ाक़ चलता रहता है। उस दिन बारी मेरी थी । बातों बातों मे मेरे पापा बोल बैठे तुम्हारा कन्यादान करके मुझे बहुत पुण्य मिला दूसरी तरफ़ से मेरे बेटर हाफ़ चिढाते हुए बोले हाँ पापा वो दान मुझे मिला और मै भी उतने ही पुण्य का भागी हुआ सब खिलखिलाकर हस दिये,मै भी हस पड़ी । मगर उस एक पल मेरी नज़र माँ से टकरा गयी……हम दोनो की ही आँखो मे नमी थी । बात हंसी की थी ,हंसी मे ही उड़ा दी गयी । ऐसा नही कि पापा मेरे घर से जाने के बाद छिप छिप कर रोते नही, उदास नही होते । इस दान के बाद उन्हे कितना कष्ट हुआ मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता मगर ना जानें क्यों मन घूम-फिर कर वही अटक गया कि जिसे दान मिला वो पुण्य का भागी,जिसने दान किया वो भीपरन्तु क्या कभी बेटी का दान हो सकता है ??/

10 comments:

Anonymous said...

समय बीत जाने के बाद आत्म मंथन से क्या होता हैं ?? जब दान होता , जब दहेज़ लिया दिया जाता हैं , जब पार्टी और जेवर पर पैसा खर्च किया जाता हैं उस समय घूघंट ओढ़ कर आंखे झुका कर जितनी महिलाये अपनी मूक स्वीकृति देती हैं वोही बाद मे सब से ज्यादा आत्म मंथन करती हैं और इसके विरोध मे लिखती हैं . समय रहते विरोध कर के कष्ट के साथ आत्म समान कितनी महिलाओं को चाहीये ?? जिनेह चाहीये वह ही चोखेर बाली हैं शायद !!!

mamta said...

पारुल जी आपने कितनी सादगी से इतनी बड़ी बात कह दी।

पारुल "पुखराज" said...

rachanaa
दहेज जैसी कुप्रथाओं पर झंडा ऊंचा करके लम्बी-चौड़ी बहस की जा सकती है,मगर "कन्या" के साथ "दान" शब्द क्यों ? इस पर बहस नहीं आत्म मंथन व मनन की ही ज़रूरत है ।

नीरज गोस्वामी said...

पारुल जी
"जिसे दान मिला वो पुण्य का भागी,जिसने दान किया वो भीपरन्तु क्या कभी बेटी का दान हो सकता है ?"
बहुत शाश्वत बात कह दी आपने. मेरी समझ में दान देने वाला ९९% पुण्य का भागी है लेकिन लेने वाला शायद उतना नहीं, देखा गया है की दान लेने वाला अक्सर दान में मिली वस्तु को उतना आदर नहीं देता जितना कमा कर लाई वस्तु को. जब तक पिता कन्या दान करते रहेंगे कन्यायें शायद ऐसे ही दान में आयी बछिया की तरह ज़िंदगी काटती रहेंगी.
नीरज

रिपुदमन पचौरी said...

यह है तो गहन चिंतन का विष्य!
तो फिर आपने क्या निशकर्ष निकाला ?

बालकिशन said...

गंभीर चिंतन का विषय छेड़ दिया आपने.
लेकिन मैं रचना जी बात से सहमत हूँ.

Mohinder56 said...

मेरी सोच कहती है... कन्या विवाह के समय "कन्या दान" शब्द शायद इसलिये प्रचलन में आया कि दान में दी हुई बस्तु वापस नही ली जाती (पराई हो जाती है) साथ ही शायद पुण्य को जोड कर मां बाप को एक सांत्वना देने की बात हो सकती है.

शब्दो कोई भी हो.. जितना गहराई में जाओ, कब्र खोदो... बास ही निकलेगी..

नाम को नाम ही रहने दो.... अर्थ न निकालो..

Sharma ,Amit said...

कन्या दान काफ़ी चर्चा में रहता है| पता नही ऐसा क्या है इस में? मुझे नही समझ आया कि "कन्या दान" दोनों शब्द मिल कर ऐसा क्या करते है जो आधी दुनिया सुनते ही विचलित हो जाती है? अगर कुछ ऐसे देखें
१. दान: वो जो दे कर वापस न लिया जाए और ऐसा नही है कि अगर आप की बेटी/ बहिन खुश नही है अपने पति के साथ तो आप उसे वापस अपने यहाँ न ला सके| अगर नही ला सकते तो आप की कमजोरी और कमज़ोर आदमी दान नही करता| इसका मतलब ये दान नही हुआ|
२. दान: किसी व्यक्ति को दान में वो चीज़ दी जाती है जिसकी उसके पास कमी हो या ज़रूरत हो| एक पुरूष, नारी के बिना अधूरा है और नारी उस से मिलकर उसे पूरा करती है, सो जो चीज़ किसी को पूरा करती है उसका सम्मान कभी कम नही हो सकती और जिस चीज़ का सम्मान होता है उसे कोई दान नही करता| और जो आदमी अपना सम्मान दान करता है, उसके बारे में आप स्वं निर्णय कर ले.
३. समस्या और कुछ नही बस एक शब्द "दान" है जिस का विरोध है| कन्या दान बस एक रस्म का नाम भर है जिस को हम अपनी स्वेइचा से अपनी या कम से कम अपनी विवहा परम्परा से तो निकाल सकते ही है अगर हम इस के साथ नही चल सकते| कन्या दान = वर कल्याण , यह नाम भी चल सकता है| और सब से अच्छा है की यह रस्म खत्म कर दे या एक ऐसा नया नाम दे जिस में न तो वर हो न कन्या और ना ही दान...
नाम दे सकते है "नींव एक नव जीवन की "

पारुल "पुखराज" said...

amit jii...aapki tippadi ne merey lekh ko saarthak kiyaa...khushi hui..shukriyaa

dilip uttam said...

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