Saturday, February 23, 2008

मेरी डायरी [ रिपुदमन ] ; भाग - १

परिचय मेरा कुछ नहीं है एक आम व्यक्ति हूँ आम जीवन जी रहा हूँ । फिर भी दुनिया के लिये औपचारिक परिचय यह है --संगणक विज्ञान और अभियंत्रिकी में स्नातक। साहित्य का अनौपचारिक अध्यन। मासिक पत्रिकाओं में गीत प्रकाशित। साहित्य पढ़ना और चर्चा करना पसंद है। गायन और चित्रकला में भी रुचि। फिलहाल तकनीकी सलाह्कार एंव प्रबंधक के तौर पर संयुक्त राज्य अमरीका में कार्यरत।
मेरी डायरी
रिपुदमन पचौरी

बचपन में, माँ अपने छुटपन की बहुत सी कहानियां, बहुत से संस्मरण सुनाया करती थीं। सभी एक से बढ़कर एक रोचक, मनोरंजक, संवेदनशील और सम्मोहित कर देने वाले होते थे। बातें बहुत सी थीं, मुझे जो कुछ याद हैं वही अक्सर लोगों को सुनाया करता हूँ।



माँ का जीवन बहुत नाटकीय सा रहा। यह बातें सन १९४४ और १९६० के बीच की हैं। माँ का जन्म सन १९४४ में हुआ। नाना जी एक सरकारी डॉक्टर थे। वे मध्यप्रदेश सरकार के एक सरकारी अस्पताल में काम किया करते थे। उस समय देश में डॉक्टरों की जितनी कमी थी, समाज में उनका आदर भी उतना ही अधिक था। आज भी होता है, पर उस समय की बात ही कुछ अलग थी। अधिकतर लोग कम पढ़े-लिखे हुआ करते थे, ऐसे में किसी का डॉक्टर होना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात थी। नाना जी का तबादला राज्य के भिन्न-भिन्न गाँवों और कस्बों में निरंतर होता रहता था। वे कभी भी एक स्थान पर २-३ साल से अधिक नहीं रुके। उनका स्थाई निवास ग्वालियर में था। घर के अन्य बच्चों की पढ़ाई लिखाई को ध्यान में रखते हुये, घर के बाकी बच्चों को, एक जगह से दूसरी जगह न लेजाकर ग्वालियर में ही रहकर उनका पालन पोषण करना सही समझा गया; सो नानी जी के साथ घर के अन्य बच्चे ग्वालियर में रहा करते थे। नाना जी जहाँ भी रहे, माँ सदा उन ही के साथ रहीं।


ऐसे ही एक बार नाना जी का तबादला हुआ ’बाघ’ में। ’बाघ’ जनपद मध्य-प्रदेश में एक छोटी सी जगह है। छोटी होने के बावजूद भी यह जगह अपने बीहड़ों और वहां के डाकुओं के कारण विख्यात ( या यूँ कहें कुख्यात ) है। माँ का जन्म सन १९४४ के मई मास की भरी गर्मियों, में इसी बाघ जनपद में हुआ। अपनी माँ के बिना, बचपन से ही हमेशा पिता के साथ रहने के कारण वे जिम्मेवार, निर्भीक, साहसी और आत्मविश्वास से भरी एक संवेशनशील व्यक्तित्व वाली बालिका के रूप में पनपीं।



अपनी पढ़ाई के अलावा अपने पिता के लिये एक वयस्क महिला की तरह ही रोज़मर्रा के काम करना, खेल कूद, और इलाज करवाने आए मरीज़ो से बातें मारना॥ बस यही कुछ काम उनकी दिनचर्या में शामिल थे।



’बाघ’ जिले में विद्यालय के नाम पर बस एक ही विद्यालय था, वो भी केवल लड़कों के लिये। लड़कियों के पढ़ने के लिये कोई व्यवस्था नहीं थी। माँ की उमर जब ४-५ साल ही हुई तो स्कूल में दाखिले के बारे में सोचा गया। सो, एक दिन डॉक्टर साहब अपनी बच्ची की उंगली पकड़कर जा पहुंचे पंजीकरण करवाने। स्कूल के प्रधानाचार्य ने तुरंत ही डॉक्टर साहब को बाहर का रास्ता दिखा दिया; यह कहकर कि स्कूल केवल लड़कों के लिये ही है…सो आपकी बेटी को यहां दाखिला नहीं मिल सकता। फिर क्या था; (प्रदेश में लड़कियों के लिये शिक्षा उपलब्ध नहीं हो तो क्या उनकी बेटी बिना पढ़ी रह जायेगी ! क्या यह बच्ची का दोष है या स्वयं उनका ?) नाना जी तो आग-बबूला हो गये। और फिर!! सिलसिला शुरु हुआ ’खर्रे’ लिखने का। ’खर्रे’ यानी ये-लम्बे-लम्बे पत्र, याचिकायें, निवेदन-पत्र। माँ बताती हैं कि वे छोटा पत्र तो कभी लिखते ही नहीं थे। जब भी लिखा… खर्रा ही लिखा… यानी… किसी दैनिक अख़बार के पन्ने की तरह जो अगर शुरु हुआ तो बस कम से कम दस पेज के बाद ही रुकने का नाम लेता।




शेष आगे .........

9 comments:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बहुत बढिया ...आगे का किस्सा भी जल्द सुनवाओ भई ...रिपुदमन .जी .

Neelima said...

आगे का किस्स बयान करिए ,हम उत्सुक हैं ..

विखंडन said...

जी हम तो आप की भाषा की सरलता से बहूत प्रभावित हुए । अगली खेप का इंतजार है।

Sanjeet Tripathi said...

पढ़ रहा हूं, प्रतीक्षा है अगली किश्त की

रंजू भाटिया said...

रोचक ....अगली किश्त की प्रतीक्षा है!

मसिजीवी said...

कहानी के कुछ टुकड़े के पहले सुने हैं पर अब सिलसिलेवार सुनने का मिलेगा ये बहुत अच्‍छा है।
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माताजी खुद भी लिखें तो कितना अच्‍छा रहे...क्‍यों न उनहें भी लाएं चोखेरबाली पर..पहले पाठक के रूप में, बाद में हो सके तो शायद लेखक के रूप में।

सुजाता said...

मसिजीवि जी ने मन के बात कही । रिपुदमन जी सुनें और माताजी को उकसाएँ :)

रिपुदमन पचौरी said...

जी...कहने, सुनने के लिए बातें अभी शेष बड़ी हैं। जल्दी ही आगे लिखूंगा।

वैसे उनका यह सब बताना बेहतर होगा पर मुझे आशा कम ही है कि वे खुद लिखेंगी। किन्तु फिर भी प्रयास करूँगा।

dilip uttam said...

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