Monday, February 25, 2008

कौन है सुनीता चौधरी ?

मैने आज तक नही देखा उसे । पर सुना है कि वह पूरे दिल्ली महानगर में इकलौती महिला है जो यह काम करती है । मर्दों की दुनिया में पूरे आत्मविश्वास के साथ । लेकिन समाज असम्वेदनशील है ,बार बार इसका सबूत पेश करता है । फिर चाहे वह पुलिस के भेस में ही क्यो न हो । ।ऑटोड्राइवर - सुनीता चौधरी । पिछले तीन साल से ऑटो चला रही है अपना संसार चलाने के लिए ।


राष्ट्र पति [महिला] के निवास के बाहर सरे आम दिन दहाडे कानून के रक्षक ने सुनीता को ऑटो से बाहर घसीटा और गाल पर ,कान के नीचे दो तमाचे ज़ोर से दे मारे । दर्द के मारे सुनीता का सर घूम गया ।कसूर सिर्फ यह था कि उसने पिछले दो-तीन घण्टों में मुगल गार्डन देखने आयीं तीन सवारियों को उठाया -पहुँचाया था । बेशक वह मर्दाने वेश मे थी पर चोटी बनाने वाली महिला को दिन की तेज़ रौशनी में भी क्या पुलिस वाला नही देख पाया ? एक हिम्मती स्त्री को यह हमारे समाज का तोहफा था । खैर , ऑटॉ वाला यदि पुरुष भी होता तो भी पुलिसिये द्वारा उसे इस तरह घसीट कर तमाचा लगाना सही न होता । पर बात है वर्दी से मिली उस ताकत के खुमार की जिसमें उसे नही दिखाई दिया कि वह क्या कर रहा है ,क्यो कर रहा है ।
वह कोई बडा काम नही कर रही थी । बहुत साधारण काम है । औटो चलाना । पर अगर यह विशेष लगता है तो हमें ज़रूर सोचने पर विवश होना चाहिये कि एक ऐसा साधारण काम करना जो कोई भी पुरुष करता है क्यो एक स्त्री के लिये नयी और अजूबा बात हो जाती है । 5-10 महिलाएँ भी गिनाने को नही हैं जो दिल्ली मे ऑटो चलाती हों । रिक्शा चलाती हों ।बस कनडक्टर हों ।
वे बडी तादाद में घरों में बर्तन मांजती ,कपडॆ धोती मिल जायेंगी । वे कपडे सीलती मिल जायेंगी ।वे आया का काम करती मिल जायेंगी ।खाना बनाती मिल जायेंगी । वेश्यावृत्ति करती मिलेंगी ।
लैंगिक आधार पर श्रम के विभाजन के इतने ही सख्त खाँचे हैं हमारे समाज के ।और इन्हें तोडने वाली स्त्री के प्रति बेहद अस्म्वेदनशीलता ।
महिला का आई ए एस होना , बडी पोस्ट पर अफसर होना , राष्ट्रपति होना , राष्ट्र संघ की सचिव होना उसकी मुक्ति का उत्सव है पूर्ण मुक्ति नही है । पूर्ण मुक्ति तब है जब छोटे से छोटे स्तर पर भी स्त्री को काम करने के लिये अपने जेंडर के बारे में न सोचना पडे ।पूर्ण मुक्ति तब है जब उसका ऑटो चलाना या बस कनडक्टरी करना खबर बन कर सामने न आये । बल्कि एक सामान्य बात हो ।
चित्र और खबर यहाँ से ...

14 comments:

बालकिशन said...

मैं आपकी बात से सहमत हूँ. सुनीता जी के साथ जो भी हुआ बहुत ही ग़लत और निंदनीय है.
लेकिन एक चीज कहना चाहूँगा की सिर्फ़ बराबरी की दुहाई देकर किसी भी चीज को सही ठहराना उचित नहीं जान पड़ता. श्रम का विभाजन अगर लैंगिक आधार पर किया भी जाय तो क्या ये ग़लत है?
हम सब को ये सब कहने से पहले क्या प्रकृति को ध्यान मैं नही रखना चाहिए. जिसने की बनाते समय ही कुछ बुनियादी और महत्वपूर्ण भेद लिंग के आधार पर स्त्री और पुरूष मे किए है.
और प्रकृति के खिलाफ जाना हर देश हर काल मे मनुष्य जाती के ऊपर भारी पड़ा है और पड़ रहा हैं.

सुजाता said...

बाल किशन जी
श्रम विभाजन का आधार लिंग क्यो हो ? व्यक्तिगत क्षमताये क्यो नही ।मै नही चाह्ती वाला कारण समझ आता है पर "नही कर सकती' क्योंकि समाज ऐसा नही करने देता ; यह नही होना चाहिये । मेरा काम मेरी रुचि और क्षमता के हिसाब से हो तो कोई कुण्ठा नही रहेगी । जो काम जैविक रूप से स्त्री ही कर सकती है या पुरुष ही कर सकता है उनकी बराबरी की बात ही नही है । दरअसल जेंडर शब्द इसे व्यक्त करने को ज़्यदा उपयुक्त है ।

Sharma ,Amit said...

आज तक समझ नही आया की लोग लिंग भेद की ढपली क्यों बजाते रहते है? अरे जब कुछ नही कर सकते तो बैठो अपने घर और कर सकते हो तो आओ मैदान में| जहाँ तक बात है स्त्रियों के काम की, आप साउथ इंडिया आ कर देखे, कितनी स्त्रियाँ है को बस कन्डक्टर है, ऑटो चलती है या और कोई म्हणत का काम करती है और वो भी पुरुषो से ज्यादा| सलाम है उन को|
खैर ये तो दूसरी बात थी| जहाँ तक बात सुनीता की है तो इस में न तो सुनीता का कोई कसूर है , न हमारी सरकार का न किसी और का| ये तो बहुत ही साधारण si बात है| सब किसी व्यक्ति का आतम सम्मान ही मर जाए और उसे इतना भी भान न रहे की वो किस से क्या हरकत कर रहा है तो वो इंसान/ मानव ही नही है और जो मानव ही नही है आप उस से मानवता या इंसानियत की आशा करते है तो गलती आप की है| इस तरह का मानव रूपी पशु ज़रूरी नही है की वर्दी में ही हो, बिना वर्दी की भी बहुत से है| इन से बचने का उपाय या तो इनका दमन है या फिर इनमें से एक होना है|
किसे चुनना है ये आप के हाथ है ...

बालकिशन said...

मैं आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ सुजाताजी.
कहना ये चाहता हूँ कि व्यक्तिगत क्षमता की तरह जातिगत (लिंग आधारित) क्षमता भी कोई चीज होती है. उदाहरण के लिए बोझा उठाने वाले मजदुर जो एक साथ ६०-७०-८० किलो तक उठा सकते है और उठातें हैं. यही काम किसी स्त्री के लिए कष्टदायक हो सकता है. या फ़िर व्यक्तिगत अनुभव की एक बात आपकी नज़र मे लाना चाहूँगा कि कुछ ऐसी इंडस्ट्रीज होती है जंहा छंटाई का काम (बहुत से माल मे से काम का माल छाँट कर निकालना ) करवाना पड़ता है जैसे पेपर इंडस्ट्री वंहा हर समय इस काम के लिए स्त्रियों को ही प्राथमिकता दी जाती है उनकी कुछ विशेषताओं के कारण. इसी तरह अगर हम गौर करें तो अपने आस पास ऐसी बहुत सी चीजे पायेंगे जो या तो सिर्फ़ स्त्रियाँ अच्छे से कर सकती हैं या फ़िर पुरूष.
मैंने अपनी बात इसी सन्दर्भ मे कही थी.

Anonymous said...

मै फिर यही कहना चाहुगी कि स्त्री को अपनी क्षमता पता हैं है अगर एक स्त्री सूमो पहलवान बनना चाहती हैं तो क्या आप उसे रोक देगे । लिंग कभी भी किसी भी विभाजन का आधार क्यों होना चाहीये । मै १९९२ मै पहली बार जर्मनी गयी थी और वहाँ मैने रात को ३ बजे के लिये टैक्सी बुक कराई होटल से एअरपोर्ट के लिये और मुझे बहुत सुखद आश्चर्य हुआ जब रात मै उस टैक्सी की ड्राइवर महिला थी । वह महिला आज भी मुझे याद हैं क्योकि उसकी कद काठी बहुत अच्छी थी । उससे बात करने पर पता चालला की वहाँ की सरकार ने नियम बना रखा हें की रात मी एकल महिला सवारी को महिला ड्राइवर ही मिलेगी । हमे क्या व्यवसाय करना हैं , क्या काम करना हैं ये बताना गलत है हमे हमारी क्षमता पता हैं और अगर कोई महिला अपनी क्षमता से ऊपर काम करना चाहती हैं तो वह परितोशक की अधिकारी है । हमारी मेट्रो रेलवे महिला ड्राईवर ही चलाती हैं । पर इसके साथ ही महिला जो भी काम करे उसमे महिला ही ना बनी रहे । अगर पुलिस वाले ने सुनीता को इसलिये मारा होता की वह महिला है तो अलग बात होती पर ये तो खराब system की बात हैं । कोई भी महिला ड्राईवर अगर ऑटो चलाती हैं तो उसे इन सब बातो के लिये तैयार हो कर आना होगा । सुनीता पहली ऑटो ड्राईवर है इस लिये अवश्य चोखेर बाली हैं पर पुलिस ने उसको मारा इसका सम्बन्ध ख़राब system और एक संवेदन शील जगह पर ऑटो को बार बार लाना हो सकता है । नारी कोमल हैं इस वज़ह से उस पर नियम दूसरे हो ये ग़लत हैं अगर काम एक सा तो नियम भी एक सा अन्यथा ये लिंग भेद उल्टा होगा जो आगे चल कर एक परेशानी बनेगा

अजित वडनेरकर said...

लिंग विभाजन बेमानी बात है। कोई भी , कुछ भी काम कर सकता है। विभाजन काम में हो सकता है, करनेवाले में नहीं। कोई काम नैतिक है या अनैतिक यह महत्वपूर्ण है और इसकी सामान्य समझ सभी को होती है। अच्छी पोस्ट ।

सुजाता said...

बाल किशन जी आपने कहा -
इसी तरह अगर हम गौर करें तो अपने आस पास ऐसी बहुत सी चीजे पायेंगे जो या तो सिर्फ़ स्त्रियाँ अच्छे से कर सकती हैं या फ़िर पुरूष.
मैं मानती हूँ कि ऐसा है । आपकी बात समझ रही हूँ । लेकिन सोचती हूँ कि कहीं ऐसा इसलिये तो नही है कि ऐसा ही उन्हें बचपन से सिखाया जाता है । मसलन खाना बनाना ,घर की साफ सफाई , चीज़ें करीने से रखना ,घर के सौन्दर्यीकरण का ध्यान रखना ,... और बहुत कुछ स्त्री शाय्द समाजीकरण की प्रक्रिया मे सीखती है और उसमे निपुण हो जाती है । यदि इसी तरह का पालन लदके का किया जाये तो शायद वे भी उन सब कामों को उतनी ही ध्यान से करेंगे जितना कि कोई स्त्री । मैने देखा है ऐसे एक दो लडकों को । उन्हें फेमिनिन कह दिया जाता है । यह तो धब्बा है । लदकी को मस्क्यूलिन कहा जाये तो धब्बा नही है ।शान है । खूब लडी मर्दानी ...
वह तो झाँसी वाली रानी थी ...

याद है न !

खैर मेरा मानना है का काम का विभाजन जेन्डर के आधार पर है ।
बहुत जगह महिलाएँ रिक्शा या ऑटो चलाती है ,पेट्रोल पम्प पर मिलेंगी ।ये मेरा कहना नही कि यह नही होता । पर ऐसा होना हतोत्साहित किया जाता है । और फिलहाल यह दिल्ली का पहला उदाहरण है ।
यह उम्मीद भी है कि भविष्य़ मे यह न कहना एक खबर न हो कि देखिये एक महिला ऑटो चला रही है :)

सुजाता said...

कृपया 'यह कहना एक खबर न हो' पढें ।

Anonymous said...

unless you know the full details of the incident the forum has no right to discuss what's right or wrong and whose (gender) favor. So please whenever you try to discuss your positions try doing it in a neutral way.

The policeman should not have done it in the first place, no matter the driver was a male/female. Everyone has the right of law and especially people associated with law-enforcement agencies should never take the law in their hands. The act of the slapper must be condemned and appropriate authorities should send a message to their workforce that it should never happen, without exception to race/caste and gender.

सुजाता said...

अनॉनीमस जी आपने सही कहा है ।
मैने पोस्ट मे यह भी लिखा है -***
खैर , ऑटो वाला यदि पुरुष भी होता तो भी पुलिसिये द्वारा उसे इस तरह घसीट कर तमाचा लगाना सही न होता ।***
एक उदाहरण के ज़रिये और भी बातें कही गयी हैं ।
बालकिशन जी से भी सहमत हूँ । मै किसी और कोण से देखने की कोशिश कर रही हूँ बस

Anonymous said...

bring a lawyer and policeman in the debate and ask for their views. Seek the retired and a on-service people to get the views from both ends.

अनूप भार्गव said...

- लिखना शायद ’पोलिटिकली करेक्ट’ न हो लेकिन फ़िर भी मन हो रहा है ।
- मुद्दा सही है लेकिन उदाहरण गलत है ।
- जो कुछ हुआ उसे किसी भी दृष्टि से सही नहीं ठहराया जा सकता लेकिन वह सिर्फ़ एक ज़ाहिल, सत्ता के मद में चूर पुलिस आफ़िसर की बदतमीजी है जिस के लिये उसे दंड मिलना चाहिये ।
- लिंग भेद , हर किसी को अपनी क्षमता और इच्छा के अनुसार काम करने की छूट अच्छे मुद्दे है जिन पर विचार आवश्यक है लेकिन चर्चा शुरु करने के लिये इस तरह की घटनाओं की बैसाखी की ज़रूरत नहीं है ।
-सवाल ये है :
अ)क्या पुलिस आफ़िसर नें यह व्यवहार इसलिये किया कि ’सुनीता चौधरी’ एक स्त्री थी ?
ब)क्या ’सुनीता चौधरी’ एक स्त्री होने के नाते ’स्पेशल ट्रीट्मेंट’ की अपेक्षा रखती हैं या उस की हकदार है ?
- बात को दोहाराते हुए : पुलिस आफ़िसर का व्यवहार उतना ही गलत है , चाहे वो सुनीता चौधरी के साथ हो या सुनीत चौधरी के साथ ।
- लेख में उठाये गये अन्य प्रश्न अच्छे हैं और मेरी उन से लगभग पूरी सहमति है ।
- शेष अगली चर्चा में ....

Tarun said...

कोई और होता, तो भी ये पुलिस वाला ऐसा ही करता यहाँ कोई और से मरा मतलब "आम आदमी" से है। हाँ कोई आतंकवादी होता तो पुलिस वाले को नजर नही आता ये पक्का है फिर जब नजर ही नही आता तो उसके साथ ये सब होने की गुंजाईस ही नही रहती।

सवाल यहाँ ये नही होना चाहिये कि स्त्री को मारा या पुरूष को बल्कि कानून के इन रखवालों को जरा तमीज सिखाने का होना चाहिये।

dilip uttam said...

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