Friday, February 29, 2008

भडास भी अंतत: मर्दवादी ही है

आज मोहल्ला की मुहिम देखकर मनीषा से बात हुई । अब तक इस सब को अनदेखा करने की राय बनी थी पर अब यह सम्भव नही । यह रोज़ रोज़ परोसा जा रहा है । सुबह इरफान जी की पोस्ट मे दिये लिंक से वहाँ पहुँची । पतनशीलता पर जब चोखेर बाली में मनीषा ने लिखा था तो उम्मीद नही थी कि बात "पतन' से बहकर "प्रगति" शब्द में उलझकर कहाँ किन किन नालियों में बह जायेगी ।एक पोस्ट इस पर लिखी जाने कब तक रखी रही सिर्फ इसलिये कि पतन शब्द का कुछ ज़्यादा ही इस्तेमाल और मखौल उडा दिया गया । सो व्यर्थ की ,गैर -रचनात्मक बात करने से अच्छा था कि विध्वंसात्मक बहसों को अनदेखा किया जाये । यूँ भी इस तरह की बहस में स्वविध्वंसात्मकता होती है। मनीषा ने लगातार स्पष्टीकरण दिये । स्वपनदर्शी ने भी कहा । प्रत्यक्षा ने अपने ढंग़ से कहा । ।टिप्पणियाँ भी स्पष्ट करती रहीं । पतन शीलता की इच्छा जताना सिर्फ एक लक्षण है । उसकी जड तक पहुँचने की बजाय सब ऊल जुलूल प्रसंगों की ओर बढ गये । सब पतित होने की इच्छा जताने लगे । शायद यहीं हम साबित करते हैं कि वयवस्था सारी की सारी मर्दवादी है । ये सपष्टीकरण मनीषा ने सिर्फ यशवंत को ही नही दिये उन सब को भी दिये जो "पतन" शब्द से आतंकित थे । यशवंत ने जो लिखा , वे उनके विचार थे उनसे असहमति थी और वो असहमति ज़ोरदार तरीके से दर्ज की गयी । लेकिन उस व्यक्ति से जिससे असहमति हो उसे हटा दिया जाये तो बेहद अलोकतांत्रिक नही हो जायेंगे ! अपनी डफली , अपना राग । हम बजायेँ हम ही सुनें । जैसे कि आजकल भडास खुद ही हो रहा है । खुद को अभिव्यक्त करने की आज़ादी लोकतंत्र ने आपको दी है लेकिन उसी लोकतंत्र ने मनीषा से उसके सम्मान की आज़ादी छीन ली है क्या ? दिक्कत तब शुरु हुई जब यशवंत जी के भडास पर मनीषा के नाम का दुरुपयोग होना शुरु हुआ । इस पर हमारी राय बनी थी कि इसे अनदेखा किया जाये । यह "भडास' नही है जो आती ही जा रही है और चित्त को निर्मल करने की बजाये अंतहीन वमन करने लगी है । मनीषा के स्पष्टीकरण के बाद वे चोखेर बाली पर नही लिख रहे थे ।लगा कि शायद उन्हें अहसास हो गया कि चोखेर बालियाँ क्या नही हैं । लगा कि शायद यशवंत और बाकी सब भी समझ गये होंगे कि किसी को उसके विरोध का तरीका और भाषा क्या हो यह नही सिखाया जाना चाहिये । लेकिन भडास जारी रहा । अब भी जारी है । हिज हाइनेस की ड्रामटिक एंट्री ने उन्हें सन्देह के घेरे मे ला दिया है । हमें इससे सख्त ऐतराज़ है । हिज हाइनेस वाली सभी पोस्ट भडास हटाए और इस वमन को बन्द करे । हम भडास के इन स्त्री-विरोधी तरीकों का विरोध करते हैक्योंकि भडास भी अंतत: मर्दवादी ही है । अंतत: एक पुरुष होने की पोज़ीशन {?}का फायदा उठाया जा रहा है । जैसे सार्वजनिक का मतलब है केवल पुरुषॉ के लिये वैसे ही शायद भडास का मतलब है केवल पुरुषॉ के लिये ।

20 comments:

Anonymous said...

भड़ास भी अंततः मर्दवादी ही है

और अब तो 'नामर्द वादी' भी. मैं हिज(डा) हाईनेस की बात....

अजित वडनेरकर said...
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मसिजीवी said...
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Neelima said...

भडास का पतन अफसोसजनक है !मनीषा के साथ वैचारिक भिडंत में यथवंत जी के मंच पर मनीषा मान के किन्नर का उदय सचमुच नाटकीय है ! इससे भी ज्यादा नाटकीय है इस नए किन्नर महाशय को ब्लॉग जगत की सारी उथल पुथल और ब्लॉगर बंधुओं से वाकफियत होना ! मसिजीवी और मेरे परिवार के लिए हिजडों और गैरहिज़डों से कहलवाए गए अपशब्द बेहद शर्मनाक और निंदनीय है !यश्वंत जी के साथ पूरी सहानुभूति और उनके साथ जुडे तमाम हिजडों ,अहिजडों की पातालगामी विमर्शशीलता को दूर से नमन ! यशवंत गैरयशवंत सभी भडासी ,भडास निकाल कर विरेचनावस्था को प्राप्त करें अभी भी इसी

Anonymous said...

पता नहीं किसी को याद हैं या नहीं पर मैने अकेले subash बहदोरिया की पोस्ट का विरोध किया था जब उन्होने अपनी पोस्ट स्त्रियाँ सपनो मे क्यो आती हैं लिखी थी , और मैने स्वयं मेल दे कर उनसे इस पोस्ट को डिलीट करवाया था जिस मै मेरा साथ शास्त्री जी ने , दुर्गा , यतीश और अमित ने दिया था . उस समय मैने ब्लोग्वानी और चिट्ठाजगत दोनों को मेल भी दी थी और ब्लॉग वाणी के ऑफिस फ़ोन भी किया था की भडास और सुबाश के ब्लॉग को अग्ग्रीगेटर पर मत लाये और क्योकी ऐसा नहीं हुआ मैने ब्लॉग वाणी से अपना ब्लॉग हटवा दिया था फिर मैने पुनेह चिट्ठाजगत को join किया क्योकि किसी ने भी उस समय इस बात को सीरियस नहीं लिया . मेरा सबसे निवेदन हैं की अगर भडास को ब्लॉग वाणी और चिट्ठाजगत से न हटाया जाये तो हम सब को अपने ब्लॉग उस अग्ग्रीगेटर से हटा लेने चाहिये . विरोध करे तो सब मिल कर सबके लिये करे पुरजोर विरोध करे क्योकि इंटरनेट पर आप जो लिख रहे हैं उसे कोई न कोई न कोई जरुर पढता हैं

Pratyaksha said...

मनीषा के साथ इस विरोध में हम सब साथ हैं।

चक्करघिन्नी said...

ये जो कुछ हिन्दी ब्लाग जगत में हो रहा है, बहुत गलत है। इसे तुरंत रोका जाना चाहिए। ब्लाग बने थे विचारों को व्यक्त करने का माध्यम... और ये सब क्या होता जा रहा है... आप लोग स्वयं विचार कीजिये।

Anonymous said...

A woman should be like Jodha - a fighter... Not a chuimui...

Dont be so afraid of things, best policy is to ignore...

More you talk about Bhadas, more ppl will see it...

Best way to kill Raj Thackrey`s policy is to ignore him, same applies to Bhadas also...

But instead of a balance reaction, here i see all the women crying loudly....

COME ON.. BE BRAVE.. SHOW THE RIGHT WAY TO LIVE IN A CYBERWORLD... FORGET AND INGNORE THE STUPIDS...

अजित वडनेरकर said...

हालिया मसला तो गंभीर है ही। हम मनीषा के साथ हैं उस पोस्ट से ही जिस पर से बवाल शुरू हुआ। भड़ास के उद्धेश्य को लेकर मै शुरु से सशंकित था, और वही हुआ । पाखंड और छिछलापन दिखाने का खुला आमंत्रण भड़ास के नाम पर । गोया इस देश के नौजवान साइबेरिया के कंसेन्ट्रेशन कैंप में रह रहे हैं। उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी भी नहीं है। कमाल है।
अजीब तब लगा जब पढे लिखे लोगों ने इस प्रवृत्ति को यूं सराहा मानो क्रांति हो गई है। क्या नया विचार दे दिया है भड़ास ने बीते अर्से में। ये तारीफ करने वालों को भी सोचना चाहिये था कि परख किसकी कर रहे हैं । चलते रास्ते पिच्च से कहीं भी थूकने ,चलते रास्ते गालियां बकने, राह चलती औरतों को घूरने, उनसे रिश्तेदारी की बातें सोचने , उन्हें बेइज्जत करते वक्त अपनी माँ बहनों को भूलने और बेशर्मी के साथ इतराने वाले हर गली, मोहल्ले, चौराहे पर मिलने वाले हिन्दुस्तानियों को क्या सचमुच किसी भड़ास जैसे मंच की ज़रूरत थी ?

मनीषा पांडे said...

सुजाता, अच्‍छा किया, तुमने बात उठाई। जैसाकि पहले हमने तय किया था, इस पूरे प्रकरण को इग्‍नोर करने का हमारा स्‍टैंड ज्‍यादा बुद्धिमत्‍तापूर्ण था। अब देखो, कीचड़ में रेंग रहे सांप पर पत्‍थर फेंका तो अपने ही कपड़े पर कीचड़ उछल-उछलकर आ रहा है। वैसे चोखेरबाली समूह के सदस्‍यों समेत हर सुलझा हुआ और समझदार व्‍यक्ति हमारे साथ है। किसी ने कहा है न -
काजल की कोठरी में ने‍कु ही सयाने जाए,
एक लीग लागिहे पे लागिहे जरूर
ये वही काजल की कोठरी है। इसमें घुसेंगे तो कालिख से खुद को बचा नहीं सकेंगे।

रिपुदमन पचौरी said...

सुभाष भदौरिया जी की भाषा और छिछले व्यंगों को लेकर मैंने उनको पिछले साल पत्र लिखा था। उसके बाद मुझे लगा था कि या तो वे बहुत व्यस्त हैं या उन्होंने लिखना ही ब्न्द कर दिया। आज देखा... वही नाटक फिर से हो रहा है।

भ्डास वाले बलौग पर क्या लिखा है मैं पूरा नहीं पढ़ पा रहा हूँ; ब्लोग खोल्ते ही सिस्टम हैंग हो जाता है। पर हाँ शुरु की कुछ बेहूदी बातें ज़रूर देखीं ।

विसतार से अपने विचार फिर लिखूँगा।

Sanjeet Tripathi said...

पिछले तीन चार दिनों से ब्लॉगजगत पर ठीक से आना नही हो पाया, यदि भड़ास पर मनीषा के जी के लिए व्यक्तिगत स्तर पर बात की जा रही है तो यह वाकई गलत है!!
अभी भड़ास पर मैने डॉ रुपेश की एक पोस्ट देखी उसमें तो मनीषा जी का मोबाईल नंबर भी डाल दिया गया है, यह तो हद है, किसी लड़की का मोबाईल नंबर ऐसे नेट पर सार्वजनिक कर देना, यह एक डॉक्टर की हरकत है या टीन एजर की?

Anonymous said...

ये ही यशवं‍त सिंह स्‍टार न्‍यूज के सीनियर पत्रकार विनोद कापड़ी से भिड़ गए और उल्‍टा पुल्‍टा कहा था जिसने इनकी बात टेप कर जागरण अखबार के मालिकों को सुना दी जिसकी वजह से यशवंत को वहां से रवाना कर दिया गया। यह बात यशवंत जी जगजाहिर क्‍यों नहीं करते कि वे अपनी वाणी के साथ साथ दिमाग में भी कूडा रखते हैं।

Priyankar said...

पूरी तरह मनीषा के साथ हूं . सबको होना चाहिए .

नीलिमा जी ! भड़ास का कोई ताजा-ताजा पतन नहीं हुआ है,वह सदा से घोषित रूप से ऐसा ही था . आपने चश्मा अब उतारा है . शायद इसलिए आपकी पुरानी पुलक नदारद है . कोई बात नहीं . देर आयद दुरुस्त आयद .

Ashok Pande said...

दिलीप मंडल ने कुछ समय पहले मोहल्ले पर अपनी एक पोस्ट में इस भय को अभिव्यक्ति दी थी कि कहीं हिन्दी साहित्य वाला रोग ब्लॉग को न लग जाए। इधर उसके बाद इस ब्लॉग जगत में जो जो कुछ हुआ है वह दिलीप मंडल को महसूस हुए आसन्न भय से भी ज़्यादा डरावना है और मुझे यह स्वीकार कर लेने में बहुत शर्म महसूस हो रही है कि जिस हिन्दी साहित्य की कुकुरगत्त करने में आत्ममोह में आकंठ डूबे चुनिन्दा रचनाकार-आलोचकों की सेना को सवा शताब्दी से अधिक समय लगा था, उसकी टक्कर का महाकार्य करने में ब्लॉगवीरों की एक जमात ने कुछ महीने भर लिए। यानी रसातलयात्रा अभी और आगे तक जारी रह सकने की भरपूर गुंजाइश है।

आज इरफ़ान, अविनाश और सुजाता और कुछ अन्य लोगों की पोस्टों में इस महाकार्य से उपजी खीझ की तार्किक और आवश्यक परिणति है। भड़ास नाम का ब्लॉग के प्रमुख मॉडरेटर जब काफ़ी शुरू में हमारे समय के सबसे सचेत कवि वीरेन डंगवाल को उदधृत कर रहे थे तो लगता था कि शायद हिन्दी पत्रकारों की किसी उतनी ही सचेत जमात आप से रू-ब-रू है। उस के बाद भाषा की दुर्गति करने का जो कार्य लगातार इस ओपन स्पेस में किया गया, वह गलीज और तीव्र पतनगामी होता चला गया और उस के बाद स्त्रियों को लेकर जिस तरह की अश्लील ज़बान में तंज़ कसे गए, वह मेरे हल्द्वानी शहर के सबसे हलकट और कमीन गुण्डों को शर्मसार करने को पर्याप्त थे।

फिर चोखेरबाली और अन्ततः मनीषा पाण्डेय इस दिशाहीन, चरित्रहीन 'मुहिम' के निशाने पर आते हैं। अब यह 'मुहिम' (इसे 'डिफ़ेन्ड' तक करने को यहां तर्क-कुतर्क पेश किए जा रहे हैं)। भड़ास नाम के ब्लॉग के प्रमुख मॉडरेटर ने यदि वीरेन डंगवाल (जो हमारे कबाड़ख़ाने के श्रेष्ठ कबाड़ियों से सरगना भी हैं) को पढ़ा है ('गुना है' पढ़ा जाए) तो वे वीरेन दा की "रक्त से भरा तसला हैं हम औरतें" वाक्य से शुरू होने वाली कविता की आखिरी पंक्ति से ज़रूर परिचित होंगे: " वंचित स्वप्नों की चरागाहों में हमें चौकड़ियां तो भर लेने दो, कमबख़्तो!"

अपनी भाषा और अपनी औरतों के साथ जाने-अनजाने बुरा व्यवहार करने वाली क़ौमें उजड़ जाने के लिए अभिशप्त होती हैं।

कविता-स्त्री विमर्श-समाज-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-सरोकार वगैरह शब्द सुनने-बोलने में बहुत अच्छे लगते हैं लेकिन इन विषयों में डील करते हुए जिस मर्यादा और भाषाई संयम की दरकार होती है, उस लिहाज़ से भड़ास का एकमात्र एजेन्डा यह लगने लगा है कि किसी भी तरह यहां ब्लॉग के संसार में भी आत्ममोह में लिथड़ी लिजलिज पैदा की जाए ताकि इस नवीन और अतिप्रभावी माध्यम में आने वाली पीढ़ियां हमारी पीढ़ी को लगातार गालियां देती जाए। यह तय है अभी और भी विवेकवान और ऊर्जावान युवतर पीढ़ियां आने वाले सालों में अपने लिए और बाकी लोगों के लिए इस ओपन स्पेस को कई गुना अर्थपूर्ण बनाएंगी। रहा सवाल भड़ास से पैदा हुई मेरी व्यक्तिगत निराशा और वितृष्णा का तो अपने अज़ीज़ दोस्त नूर मोहम्मद 'नूर' का एक शेर पेश करते हुए मैं इरफ़ान की हर बात का अनुमोदन कर रहा हूं:

बेमुरव्वत सभी बेदर्द लुटेरे निकले
जिनको मल्लाह समझते थे लुटेरे निकले

(ताज़ा समाचार यह है कि भड़ास पर मनीषा पाण्डेय का मोबाइल नम्बर तक सार्वजनिक कर दिया गया है। इस कृत्य की सराहना तो क़तई नहीं की जा सकती। बस साहब लोगों से इस नम्बर को तुरन्त हटाने का अनुरोध ही किया जा सकता है।)

*इस टिप्पणी को मैं 'कबाड़ख़ाने पर स्वतंत्र पोस्ट की तरह भी लगा रहा हूं.

Anonymous said...

ये यशवंत ि‍संह को लात मारकर दैनिक जागरण से निकाला गया था। दैनिक जागरण के सीनियर मैनेजमेंट के लोगों ने ऐसा किया था और 10-12 साल पत्रकारिता करने के बाद अब ये आदमी किसी मोबाइल कंपनी में काम करता है। क्‍योंकि पत्रकारिता से इसे जूता मारकर निकाल दिया गया। विनोद कापड़ी को इस आदमी ने दारू पीकर गाली-गलौज की थी और खूब गंदी-गंदी बातें बोली थीं। उन्‍होंने ये बातें जागरण के मैनेजमेंट के लोगों को सुना दीं और ये तुरंत वहां से खदेड़े गए। ये पत्रकार की औलाद उस पर कुछ क्‍यूं नहीं बोलते हैं। यहां ब्‍लॉग पर अपने दिमाग का कूड़ा निकाल रहे हैं। ये आदमी एक गंदा दिमाग और गंदा चरित्र रखता है। दैनिक जागरण से जूता मारकर निकाले जाने की घटना की बात आते ही पैंट में मूतने लगते हैं।

Anonymous said...

भड़ास के इस्तेमाल की धमकी देकर यशवंत ने कापड़ी को बदनाम करने की बात भी कही थी और उसे जागरण से केवल निकाला नहीं गया था, जिस हद तक जलील किया गया उससे किसी भी स्वाभिमानी आदमी के लिए खुदकुशी करने की ही नौबत आ जानी चाहिए। वहां तीन बजे रात में इस आदमी ने सभी लोगों की मौजूदगी में लोगों के पैर पकड़ कर रिरिया कर माफी मांगी थी और अपना ब्लॉग भड़ास डिलीट किया था। लेकिन उल्टियां करने की आदत नहीं गई और फिर से भड़ास बन गया। आपलोग क्या समझते हैं, इतना जलील होने के बाद कोई आदमी सामान्य और सभ्य आदमी के रूप में व्यवहार करेगा? अभी उसकी निजी जिंदगी के कई पहलू ऐसे हैं, जो अगर सामने आए तो पता नहीं क्या हो जाए। कोई उनकी पत्नी से संपर्क करे, वह उसकी असलियत बताएगी और उसकी उल्टियों के राज सामने आएंगे।

मनीषा पांडे said...
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Anonymous said...

क्‍यों गुरु यशवंत, जैसे दैनिक जागरण से लात मारकर निकाले गए, वैसे ही चोखेरबाली से भी लतियाकर-धकियाकर निकाल दिए गए। हमको तो दुइए जगह लतियाए जाने की जानकारी प्रज्ञपत हुआ है। और कहां कहां से लतियाए गए हो गुरु, तनि हमें भी बताओ।

dilip uttam said...

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स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

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