Wednesday, February 6, 2008

कुछ नहीं समझती ये नादान लड़की

पति अपना धौंस जीवन भर चलाता रहा । पत्नी से तू तड़ाक । कभी सीधे मुँह बात नहीं की । पत्नी के लाये लाखों के दहेज़ पर न सिर्फ ऐश किया , इस बात से भी कहीं पत्नी से दब गया हो ऐसा कभी सपने में भी नहीं हुआ । पत्नी ने कभी गलती से भी कह दिया कि मेरे पिता ने ये दिया वो दिया तो ऐसी मलामात हुई कि याद करना भी छोड़ दिया पिता ने क्या दिया ।

पत्नी जबकि अच्छी नौकरी में थी । कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी लगी थी तब पिता ने कहा था अब शादी में सुभीता होगा । पैसे कमाने वाली लड़कियों की डिमांड मैरेज मार्केट में ज़्यादा है । देखने दिखाने का प्रकरण चलता रहा । कुछ बराबरी की नौकरी वाले , कुछ नीची नौकरी वाले .. सब आते “देखते” , उलजलूल प्रश्न पूछते .. कितनी सैलरी है ? घर और गाड़ी के लिये लोन मिलता है ? यहाँ तक कि अब तक की नौकरी से कितना बैंक बैलेंस इकट्ठा किया ? लड़की सर झुका कर जवाब देती , अंदर खून के घूँट पीती । ऐसे चिरबिल्ले दो कौड़ी के लड़कों को कॉलेज के ज़माने में कितनी खरी खोटी सुनाई थी , कितना हेय दृष्टि से देखा करती थी । आज उन जैसों के सामने मुँह सीये बैठी है । पिता अपना ज़माना भूल गये हैं (सुना है दादी के मुँह से कितनी कन्यायों को दबा रंग , ऊँचे दाँत ,नाटे कद के लिये छाँटा था ), निरीह नज़रों से याचना करते हैं , बेटा कुछ उलटा सीधा मत बोलना । उम्र निकलती है तुम्हारी । कैसे ब्याह हो जाये । लड़के वालों से बढ़ा चढ़ा कर उसकी आमदनी गिनाते हैं , चारा फेंक रहे हों जैसे । लड़की को लगता है उसके अस्तित्व को नकार दिया गया हो , उस अस्तित्व को जिसे बड़े हौसले और विद्रोह से खड़ा किया था , हर दिन की छोटी लड़ाई .. पढ़ते वक्त मुझसे चाय बनाने को मत कहो माँ , जितना मैं पढ़ती हूँ उतना ही भैया भी तो फिर उसे दूध बादाम और मुझे ? मुझे ताकत की ज़रूरत नहीं ? मैं भी बाहर कोचिंग करूँगी , मुझपर भी पैसे खर्च करो । पिता कहते , पैसे तुम्हारी शादी के लिये भी तो जमा करना है । फिर मैं नौकरी करूँगी शादी नहीं , अब तो कोचिंग के पैसे दो । पिता सर हिलाते , कुछ नहीं समझती ये नादान लड़की ।

लड़की ज़्यादा समझती थी । कमसिन नाज़ुक लड़की का मोटा तोंदियल पति , उससे पैसे कम कमाता , उसके रोज़के खर्च के लिये उसके ही पैसे मिन्नत चिरौरी पर देता , दस सवाल किसलिये , क्यों ,पिछले हफ्ते ही तो इतना दिया था फिर ? , टाँग पर टाँग चढ़ाकर हुक्म चलाता , तबियत खराब पर ऊँगली से छूता कोंचता ..चाय बना दे , ठीक से छू लेने पर बुखार का अंदाज़ा जो हो जायेगा फिर स्नेह नहीं सामाजिकता में लेटे रह , कहना होगा , पालतू पशु से बदतर हाल । और माँ बाप नाते रिश्ते आड़ोस पडोस ..सब कहते ..लाली का पति खूब अच्छा है । कोई बुरी आदत नहीं । महीने में एक साड़ी ला देता है , दो महीने में मायके घुमा देता है , तीन में सिनेमा दिखाता है । और क्या चाहिये एक स्त्री को ।

लाली को नहीं पता कि अपने जट्ट ज़ाहिल पति से उसकी उम्मीदें किस आसमान को छूती हैं । कैसी मानसिक चाहरदीवारी के अंदर की बेचैन छटपटाहट है । सुबह से उठकर रसोई घर कॉलेज रसोई का ट्रेडमील उसे कहाँ ले जा रहा है । उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता एक मिथ्या है । उसका बैंक बैलेंस कितना है ? उसके इंवेस्टमेंट कहाँ और किन जगह हैं , उसके अकाउंट का और पी एफ का नॉमिनी कौन है , वो अपने कमाये पैसे कहाँ और कितना खर्च करेगी ..इन सब पर उसका अख्तियार कुछ नहीं है । उसकी लड़ाई लड़ाई नहीं । इस लड़ाई का कोई अक्नॉलेजमेंट तक नहीं ।

5 comments:

azdak said...

समाज को बदल डालो? माने पति को?

ghughutibasuti said...

प्रत्यक्षा जी, यह सच है जीवन का कटु सत्य । परन्तु समय आ गया है कि अपने अस्तित्व के लिए और उससे भी अधिक अपने आत्म सम्मान के लिए यदि वैवाहिक जीवन को होम करना पड़े तो कर दिया जाए । विवाह की इच्छुक केवल स्त्रियाँ ही नहीं हैं । यह नकली डिमाँड और सप्लाई है । सच यह है कि स्त्रियाँ कम हैं व पुरुष अधिक । एक बार स्त्री यदि यह सब सहना बंद कर देगी तो एक पीढ़ी से भी कम में समाज बदलेगा । जो डरता है उसे ही डराया जाता है ।
घुघूती बासूती

neelima garg said...

u r right.This mentality is seen everywhere.But women will have to fight themselves. Noone else can do anything...when one is strong ..

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...
This comment has been removed by the author.
नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

इट्स द सेम ओल्ड स्टोरी। जो नहीं कमाती वहां पति धमकाता है कि ये मेरा पैसा है मेरी मर्जी जहां चाहे जैसे चाहे खर्च करूं। जो कमाती है उसका भी सब पति का । आखिर तुम्हारा खर्चा भी तो मैं ही चलाता हूं। मूरख तुझे तो ये भी नहीं पता कि पैसे रखते कैसे हैं।

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