Tuesday, February 19, 2008

एक और कायर

इस कविता में भी मैं एक आत्महत्या के विषय में लिख रही हूँ । मैं आत्महत्या को बिल्कुल भी सही नहीं मानती । यह गलत है । हर हाल में गलत है । एक जीवन को समाप्त करना, चाहे वह अपना ही क्यों न हो, विशेषकर, तब जब यह जीवन सम्भावनाओं से भरा हुआ हो, सर्वथा गलत है । किन्तु मैं उन परिस्थितियों के बारे में लिखना चाहती हूँ जो किसी को ऐसा कदम उठाने की तरफ बढ़ने में सहायता करते हैं । थोड़ा सा सहारा, थोड़ा सा सकारात्मक रवैया शायद उन्हें ऐसा करने से रोक दे । तब भी कुछ लोग बिना किसी को अपना दुख बताए शायद जीवन समाप्त कर लें, तब शायद कोई भी उनकी सहायता न कर सके । किन्तु अधिकतर मामलों में लोग मरना नहीं चाहते । वे मृत्यु को तभी चुनते हैं जब उन्हें सारे रास्ते बंद नजर आते हैं । जब वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनों से सहायता माँग चुके होते हैं और जब उन्हें विश्वास हो जाता है कि कोई उनकी सहायता नहीं करेगा विशेषकर उनके अपने ।
यहाँ पर मैं एक विवाहिता नवयौवना की पीड़ा के विषय में लिख रही हूँ । उसे अपने पति या ससुराल से क्या शिकायत थी लिखना कोई आवश्यक नहीं है । आप स्वयं ही कयास लगा सकते हैं । जो अधिक महत्वपूर्ण है वह है उसके अपनों का उसके प्रति संवेदना रहित व्यवहार !वह केवल थोड़ा सा सहारा चाहती थी ..........
एक और कायर

मैंने चाहा था हँसकर जीना
जीवन मेरा हो गया दुश्वार
बहती जलधारा सी मैं थी
मैं बन गई बांध बंधी धार
जितना मैंने उड़ना चाहा
पंख मेरे थे उसने कतरे
माँ से भी मैं बोली थी
अब ऐसे ना जी पाऊँगी
आ माँ, मुझे ले जा ले आकर
जीवन मेरा बना अंगार
कहती थी वह बिटिया मेरी
कैसे भी निभा तू लेना
अब ना वापिस तुझे ला पाऊँगी
मेरी भी तू सोच कुछ
कैसे समाज में मुख दिखलाऊँगी ।


सारे रास्ते जब बंद हो गए
जीवन से थी मैंने पाई हार
सुलगा कर इक माचिस को मैंने
करना चाहा जीवन उद्धार
मरने पर तो सब जलते हैं
पर मैं बन गई जीती मशाल ।


आज मुझे कायर तुम कहते हो
कहाँ गई थीं कल ये सब बात
मैंने भी था जीवन जीना चाहा
पर ना जीने देते थे हालात
ओ बड़ी बातें करने वालो
क्या तुम दे पाते मेरा साथ
तुम जलती माचिस को छू लो
फिर देना मुझे उपदेश
ओ मुझे कायर कहने वालो
क्या जानो तुम दर्द मेरा
कैसे होता है मन इतना पीड़ित
कि जीवन ज्योति बुझा हम पाते
तुमने तो दुनिया देखी है
क्यों न मुझे तुम लौटा थे लाते ।


इतना ही तो मैंने चाहा था
कुछ ऐसा हो जाए कि मैं
कर पाऊँ नवजीवन की शुरुआत
कुछ दिन मुझे सबल बनाते
अपने घर में मुझे ठहराते
मेरे घावों पर मरहम लगाते
फिर कोई नई राह निकलती
अपनी मंजिल खुद पा लेती ।

सुलग रही जब आत्मा चिता सी मेरी
क्यों तुम ना थे तब आग बुझाते
देखो मैं हवन कुंड बन गई
जीवित हूँ पर भूत बन गई
पोर पोर में होती पीड़ा
बाल मेरे हैं झुलसाए
अब तो मेरे अपने भी
मुझसे हैं आँख चुराएँ ।


कुछ घंटों या दिन की ये पीड़ा
जीवन पर्यन्त सुलगने से बेहतर
मन आत्मा की पीड़ा के बदले
जलने की पीड़ा को गले लगाया
नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाए
वह मृत्यु ही अब मुझे है भाए ।

जीने की हुई खत्म लालसा
मरने की थी बेला आई
जीने के इस अद्भुत खेल में
हार सदा से मैं पाती आई
अब तुम जाओ रपट लिखाओ
मेरे मरने का केस बनाओ
जीते जी ना साथ दे सके
अब मरने पर रस्म निभाओ ।
घुघूती बासूती



2 comments:

Anonymous said...

आत्महत्या galat haen saraasar pr jindgii mae bahut kuch haen ek rasta band ho jayae to bhi bas apnae liyae nayae raaste kohlnae hogae

dilip uttam said...

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