Friday, February 15, 2008

कहीं हम बेटियों को गुलाम मानसिकता की जंजीरों में तो नहीं बाँध रहे

(निमिषा, वरदान और अनन्या को समर्पित)


निमिषा अवस्थी। मुझे याद है। उस दिन भाई ने बात छेड़ी तो फिर स्कूल के दिनों में लौट गई थी। स्कूल में मैं टेबलटैनिस चैम्पियन थी। बहुत कम बच्चे थे । और लड़कियों को इसमें खास रुचि नहीं थी। हमेशा बहुत आराम से फाइनल्स तक पहुँच जाती थी। इस बार भी पहुँच चुकी थी।

नवीं कक्षा से बारहवीं कक्षा तक के बच्चों के बीच प्रतियोगिता थी। मैं बारहवीं में थी। फाइनल्स में एक नई लड़की थी। लंबी, गोरी ,छोटे बाल....गाल मे कुछ मुँहासे.....नाक कुछ अलग सी थी। आकर्षक व्यक्तित्व था। और बहुत आत्मविश्वास के साथ खड़ी थी।

मैने उसे आंकने की कोशिश की थी। दसवीं में मेरे हाइस्ट स्कोर के रेकार्ड को ब्रेक करेगी ऐसा सब मानते थे। मन में कुछ ईर्श्या और कुछ प्रतिस्पर्धात्मक भाव था। पर वह शांत थी। देखकर लगता था कि अपने जीत को लेकर बिल्कुल आश्वस्त थी।

खेल शुरु हुआ। और खत्म भी। मैं हार गई थी। मेरे लिये बड़ी बात थी। उसके लिये सहज सी। स्पोर्ट्समेन की तरह हाथ मिला," यू प्लेय्ड वेल दीदी ",बोलकर वह जा चुकी थी।

बाद में जैसा सबने सोचा था दसवीं में मुझसे ज्यादा अंक मिले। और फिर उसने इंजीनियरिंग की। मम्मी के बॉस की लड़की थी सो मम्मी से अक्सर सुनने को मिलता था। अंकल आंटी हमेशा गर्व से निमिषा के बारे में बताते थे। निमिषा थी भी शांत, संयत और प्रतिभाशाली।

एक छोटी सी कॉलोनी थी। दुनिया की बड़ी बड़ी चिंताओं से दूर। सब प्रांत के लोग थे। सब जात के लोग थे। सभी एक ही स्कूल में जाते थे। सभी के लिये पढ़ाई निशुल्क थी।
दहेज, स्त्री के अधिकार, दंगे फसाद....यह सब हम अखबार में पढ़ते थे। जिंदगी सीमित दायरों में बहुत जाने पहचाने अंदाज़ मे आगे चलती थी वहाँ।

निमिषा पढ़ाई कर के कहाँ गई, किससे क्यूँ शादी की, क्या करना चाहती थी, क्या नहीं कर सकी ...मुझे नहीं मालूम।

जब भाई ने याद दिलाया उसकी शक्ल आँखों के सामने आ गई।

बुरी खबर थी। अपने दो बच्चों के साथ निमिषा ने आत्महत्या कर ली थी।

मैं स्तब्ध थी। उसे मानसिक तौर पर इतना कमज़ोर देख पाने में असमर्थ थी।

एक महीने पहले निमिषा ने शिकागो (अमेरिका) में पुलिस में रपट दर्ज कराई थी
इल्जाम थे-
• मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न
• पति का ज्वाइन्ट एकाउन्ट ड्रेन करना
• लगातार बेटे को बताना की वह पागल है
• फोन, इमेल सब पर निगरानी रखना
• आत्महत्या के लिये उकसाना

निमिषा के पति ने भी रिपोर्ट दर्ज कराई थी
• निमिषा मानसिक रूप से बीमार है और गलत इल्जाम लगा रही है।

निमिषा अपने बच्चों को अपने पति से दूर रखना चाहती थी। पर उसकी इस दर्खास्त पर कोई कार्यवाही नहीं की गई थी।

कहते हैं.....

दुर्घटना के दिन निमिषा ग्यास स्टेशन गई। पेट्रोल खरीदा। बच्चों के लिये खिलौने खरीदे। अपने घर पहुँच दूसरी मंजिल के बेडरूम में पहले बच्चों पर फिर खुद पर पेट्रोल ड़ाला। फिर आग लगा दी। रास्ते से जाते किसी ने पुलिस को बुलाया। गंभीर हालत में सभी को अस्पताल पहुँचाया। कोई भी बच नहीं सका।

अंकल को विश्वास नहीं हुआ। मुझे नहीं हो रहा था। भाई विचलित था। लोग हैरान थे। एक माँ ऐसा कैसे कर सकती है। पड़ोसी ऐसी किसी भी सँभावना के बारे में कल्पना नहीं कर सकते थे।

क्या वजह थी
• निमिषा पीड़ित थी
• बेबस थी
• बीमार थी
• अकेली थी

मैं समझ नहीं पा रही। वह लड़की जिसमें इतना आत्मविश्वास मुझे दिखा था वह इतनी कमज़ोर कैसे हो गई? रिश्ता अगर इस कदर बिगड़ चुका था तो उसे तोड़ा क्यूँ नहीं? कौन सी बेडियों में बँधी थी जो स्वयं को आज़ाद नहीं कर सकी? पढ़ी लिखी, प्रतिभाशाली , आर्थिक रूप से आज़ाद लड़की इतनी बेबस क्यूँ?

चूड़ियाँ, पायल, मंगलसूत्र ....सब पहनाते पहनाते कहीं हम बेटियों को गुलाम मानसिकता की जंजीरों में तो नहीं बाँध रहे? हर तरह का अवसर देने के बाद उसे किसी सोच में कहीं कैद तो नही कर रहे? सहनशील, शांत और औरत बनाने की कोशिश में उसकी स्वयं के लिये लड़ने की इच्छा शक्ति को तो क्षीण तो नहीं कर रहे?!!

यह सवाल अहम है। और इनसे हमें आज जूझना होगा। जीन्स या साड़ी, रसोई से दूर या गोल रोटियाँ बेलती हुई....अधिक पढ़ी लिखी या कम...आर्थिक रूप से स्वतंत्र या निर्भर.....

स्त्री को अपनी सोच को आज़ाद करना होगा। खुद के खुद होने पर गर्व करना होगा। गलत को सहना और बढ़ावा देना बंद करना होगा। विचारों को स्वतंत्र करना होगा।

ऑफिस जाती, कार चलाती आत्मनिर्भर औरत आज़ाद है ...कोई जरूरी नहीं है....

घर में बैठ,साड़ी पहनी ,खाना बनाती अपने बच्चों की परवरिश करती औरत परतंत्र हो यह भी जरूरी नहीं है....
.
प्रतीक मात्र हैं...जिनसे कुछ सिद्ध नहीं होता....

जब तक निमिषा अवस्थी निमिषा तिवारी बनने पर बेबस बनती रहे....कुछ बदला नहीं है....


बदलाव के लिये जरूरी है हमारा योगदान। हर लड़की की परवरिश उसे व्यक्ति बनाने के लिये हो। ऐसा व्यक्ति जिसके व्यक्तित्व से आत्मविश्वास झलकता हो ....जो जिन्दगी के चुनौतियों से मात्र स्त्री होने की वजह से हार ना मान ले।

यही जगह है जहाँ बदलाव जरूरी है...।



(फोटो- cbs2chicago.com से साभार)

14 comments:

Rachna Singh said...

"स्त्री को अपनी सोच को आज़ाद करना होगा। खुद के खुद होने पर गर्व करना होगा। गलत को सहना और बढ़ावा देना बंद करना होगा। विचारों को स्वतंत्र करना होगा। "

सही लिखा है बेजी आपने स्त्री की सोच बंद हो जाती है पुरूष की बाहों मे , जिस दिन स्त्री इन बाहों मे अपना संरक्षण ना ढ़ूड़ कर अपने लिये केवल प्यार खोजेगी उस दिन वो स्वतंत्र होगी "सोचने " के लिये । क्यो स्त्री ये समझती हैं की वो कमजोर हैं । सही हैं शरीर की संरचना मे पुरूष शरीर बलशाली हैं पर स्त्री कब हारती है जब वह भावना मे बहती ये सोचती हैं कि पुरूष स्वामी है , पुरूष रक्षक हैं । और जब भी स्त्री को पुरूष से अलग होना होता है उसे एक वैक्यूम से गुजरना होता है जिस मे वो अपने को अक्षम पाती हैं और फिर ऐसी घटना होती हैं । पुरूष के लिये स्त्री सम्पूर्णता का एहसास नहीं है , पुरूष के लिये पिता बनना सम्पूर्णता का एहसास नहीं हैं पुरूष के लिये सम्पूर्णता का अर्थ {मै ग़लत हो सकती हूँ क्योकि हूँ तो स्त्री } नौकरी , कैरियर और घर मे वह कितना आर्थिक सहयोग करता है पर , आ कर समाप्त हो जाता है पर स्त्री की सम्पूर्णता क्या हैं ?? मै सवाल मे खो गयी हूँ , किसी स्त्री को इस सवाल का जवाब पता हो तो लिखे , पुरूष भी लिखे की स्त्री क्यो परतंत्र होती है मन से ।

स्वप्नदर्शी said...
This comment has been removed by the author.
azdak said...

ऑफिस जाती, कार चलाती आत्मनिर्भर औरत आज़ाद है ...कोई जरूरी नहीं है... घर में बैठ,साड़ी पहनी ,खाना बनाती अपने बच्चों की परवरिश करती औरत परतंत्र हो यह भी जरूरी नहीं है... प्रतीक मात्र हैं...जिनसे कुछ सिद्ध नहीं होता...

बड़ी वाजिब बातें हैं. कैसे बदलेगा सब? मैं कहां से बदलना शुरू करूं?

anuradha srivastav said...

निमिषा के लिये अफसोस है ........ परिस्थितियों का सामना ना कर पाना व सामाजिक दबाव शायद ऐसी घटनाऒं के लिये जिम्मेदार है।

Anonymous said...

केवल पति ही नहीं लड़की मे मायके वाले भी दोषी हैं जिंहोंने लड़की को यूँ छोड़ दिया ऐसा क़दम उठाने के लिए।
दोष ससुराल वालों को मिलता है पर सचाई यह है कि मायके वाले भी साथ नहीं देते हैं किसी लड़की की ऐसी परेशानी के समय में। बोझा समझली जाती है विवाहिता लड़की अगर उसका ससुराल में संबंध ठीक न हो।
अकेली लड़की क्या करेगी?
-प्रेमलता

Anonymous said...

Roman mein hindi ke liye kshama.
Mai ek Ladka hoon isliye apne anubhav se likh raha hoon.
Ye hamari vyavastha aur isme mata, pita..ye ladki ko kya ladko ko bhi aazad nahi hone dena chahte (Kyonki yadi vo azad ho gaye to unka niyantran khatm ho jayega, unhe lagta hai ki fir unhe poochega kaun). Vo ladke ya ladki kisi ko bhi apne nirnay khud nahin lene dena chahte. Aur yadi kabhi vo lete bhi hain to unhe parinam ke prati aisa darate hain jaise ki koi prlay aa jayegi. Kynoki shuru se hi aisi training nahin hoti isliye jab kathin paristhitiyon mein nirnay lena hota hai to kai bar app le hi nahin pate ya galat nirnay lete hain.
Isliye jab shadi jaisi baat aati hai to ladki kya ladkon se bhi kuch nahin poocha jata aur unki koi nahin sunta.
Aur ye sari vyavastha ladkiyon ke liye ladko se bahut jyada mushkil hai. Kyonki cultural upbringing hi baised hai.
Lekin hum apne bacchon ko to vo sab sikha sakte hain. Taki samay aaney par vo hamari tarah galti na karen. Mera ek beta hai. Bhagwan ne beti di thi par vapas le li.
Main apne 5 saal ke bete ko abhi se apne nirnay khud lena sikhata hoon. Jab vo ppochta hai, use sahi ya galat parinam ke bare mein batata hoon par antim nirnay uska hi hota hai. Aur use parinam ko (galat ya sahi) accept karna sikha raha hoon.
Hum sab dahej ko lekar bahut kehte hain. Chalo mana humme se bahuton ki shadi mein liya diya gaya hoga aur hum shayad chah kar bhi kuch nahin kar paye honge. PAr kyon nahin hum nirnay lete ki apne bachhon ko unki pasand ke jeevan saathi chunne denge aur unki shadi mein koi dahej nahin lenge ya denge. Is tarah hum bhavishya mein ye sab buria dhere dhere khatm kar sakte hain.

रंजू भाटिया said...

बदलाव शुरू होगा तभी ही ..जब आस पास का माहोल बदलेगा ..और उस में अभी वक्त लगेगा !!

Unknown said...

.. हर लड़की की परवरिश उसे व्यक्ति बनाने के लिये हो। ऐसा व्यक्ति जिसके व्यक्तित्व से आत्मविश्वास झलकता हो ....जो जिन्दगी के चुनौतियों से मात्र स्त्री होने की वजह से हार ना मान ले।
मेरी अपनी बेटियों सहित समस्त नारी जगत में यही भाव व्याप्त हो सके यही कामना करता रहता हूँ परन्तु कब हो पायेगा ऐसा .... शायद इसी सदी में ... !!
अस्तु मेरे अपने भावों को आपके आलेख में अभिव्यक्ति देखकर अच्छा लगा शुभकामना

सुजाता said...

ओह !
कितनी बातें कह दी गयीं ।
और बहुत सही ।
स्त्री को अपनी सोच को आज़ाद करना होगा ।
मायके वाले भी दोषी हैं जो एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह लडकी को नही पालते ।
पिछली पीढी की नियंत्रण की चाह और बच्चॉ के स्वयम लिये निर्णयों के सम्भावित भयावह अंजामों से उन्हें डराकर दब्बू बनाना ........

इतनी विमर्शात्मक टिप्पणियाँ ....
क्या हम खुद अपनी अगली पीढी से पहल करने का साहस नही कर सकते ?
यह सुनहरा अवसर है ,
वर्ना कल हम कटघरे में खडे होंगे ...
और शगल के तौर पर होने वाले इस विमर्श की जवाबदेही भी न कर पाएंगे ...
निश्चय अभी , आज , करना होगा

स्वप्नदर्शी said...

बहुत आश्चर्य की बात है, कि इस घटना का विमर्श भी, लडकी के कम आत्म्विश्वास, और उसके माता-पिता की परवरिश पर खतम हो गया. अंत मे यहा भी स्त्री दोशी, उसके मा-बाप दोशी.

क्या पति का कोइ दोष नही, एक पढी -लिखी, लडकी को इस हालत मे पहुंचाने का? उसके पास दूसरे विकल्प नही छोदने का. क्या पति की पर्वरिश पर, उसके माता-पिता पर कोई बहस नही होगी. क्या ससुराल जाने के बाद भारतीय समाज की हर परम्परा, हर आदर्श, पारिवारिक सुख-शांतिइ की कीमत, बहु के स्वतंत्र व्यक्तितव के हनन से नही जुडी है?

ghughutibasuti said...

निमिषा , काश तुम मेरी बेटी होतीं । मैं कोई प्रश्न ना पूछती, सिवाय इसके कि बिटिया, तुम क्या चाहती हो । फिर जब माँ के आँचल की छाँव तले तुम्हारे घाव भर जाते तो कहाँ क्या चूक हुई सोचते । मुझे पता है कि बाबा भी यही करते । कुछ वर्ष पहले जब हमारे जान पहचान वाली एक लड़की के साथ कुछ दुर्व्यवहार हुआ था तो उन्होंने भी उसके पिता से यही कहा था । पहले उसके आँसू पोछो, फिर घाव भर जाने पर आगे क्या करना है सोचो। तब तक उसे राजकुमारी की तरह रखो, ताकि उसे अपने बहुमूल्य होने का एहसास हो जाए । यह सबसे आवश्यक है ।
घुघूती बासूती

रिपुदमन पचौरी said...

ह्ह्म्म्म . पढ़ा ...

मेरी संवेदनाएं।

neelima garg said...

Things are really serious . Life is difficult for women.They have to fight everywhere to get their respectable position in society....

dilip uttam said...

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