Thursday, February 21, 2008

पतनशील स्‍वीकारोक्ति क्‍या कोई भड़ासी भोंपू है


हिंदी में बहसें कैसे होती हैं। जाना होता है, भदोही, पहुंच जाते हैं भटिंडा। किसी ने एक बहस शुरू की और हिंदी में कोई बात कही। तो कोई और, जिसे टूटी-फूटी फ्रेंच आती हो, (ठीक से हिंदी भी नहीं आती) बीच में कूदकर फ्रेंच में उसका जवाब देने लगता है। फिर कोई और टपक पड़ता है और बंगाली में कुछ-कुछ विचार फेंकता चलता है। फिर कोई किनारे से गुजरता है, और कहता है कि फारसी में मनीषा ने जो बात शुरू की है, उसका हिब्रू में जवाब बहुत शानदार बन पड़ा है।

पतनशील स्‍वीकारोक्ति पढ़कर किसी भड़ासी को लगता है कि उनके भड़ासी बैंड में एक और भोंपू शामिल हुआ, तो किसी को तुरत-फुरत में ये सफाई देने की जरूरत होती है, कि वो तो मुक्‍त ही पैदा हुई हैं, उनके घर की रसोई स्‍त्री-पुरुष समानता का प्रतीक है और वो पतित या पतनशील कतई नहीं हैं। जैसाकि पहले भी कहा गया कि कुछ लपुझन्‍नों की लार भी टपकने लगती है कि वाह, चलो अब कभी परंपरा, तो कभी प्रगतिशीलता के नाम पर लड़कियों को पटाने की जरूरत नहीं। ये पतिताएं तो खुद ही आकर गोदी में बैठने को तैयार हैं।

यह पतनशील स्‍वीकारोक्ति क्‍या कोई भड़ासी भोंपू है। कौन कह रहा है कि लड़कियां अपने दिल की भड़ास निकाल रही हैं। यह मुल्‍क, यह समाज तो स्त्रियों के प्रति अपने विचारों में आज भी मध्‍य युग के अंधेरों से थोड़ा ही बाहर आ पाया है और वो बदलते बाजार और अर्थव्‍यवस्‍था की बदौलत। नहीं, तो अपने दिलों में झांककर देख लीजिए। हमारे प्रगतिशील साथी बलात्‍कार पर अदम गोंडवी की एक बेहद दर्दनाक कविता पढ़ रहे हों तो लगता है कि उनका मुंह नोंच लो। 'बैंडिट क्‍वीन' जैसी फिल्‍म के सबसे तकलीफदेह हिस्‍सों पर हॉल में बैठे लोग सीटियां बजाते मन-ही-मन उस आनंद की कल्‍पना में मस्‍त हो रहे होते हैं, बगल में बैठा कोई शूरवीर आपको देखकर बाईं आंख भी दबा देता है।

कैसा है यह मुल्‍क। इस इतने पिछड़े और संकीर्ण समाज में बिना सिर-पैर के सिर्फ भड़ासी भोंपू बजाने का परिणाम जानते हैं आप। आपको जरूरत नहीं, जानने की। अर्जुन की तरह चिडि़या की आंख दिख रही है। पतनशीलता के बहाने अपनी थाली में परोसी जाने वाली रसमलाई।

मैं यह बात आज इस तरह कह पा रही हूं, क्‍योंकि मैंने कुछ सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक सहूलियतें हासिल कर ली हैं। लेकिन सुल्‍तानपुर के रामरतन चौबे की ब्‍याहता और प्राइमरी स्‍कूल टीचर की 16 साल की बेटी से मैं इस भड़ासी बैंड के कोरस में शामिल होने को नहीं कह सकती। उनसे कुछ कहूंगी भी तो यही कि खूब-खूब पढ़ो, अपने मन और बुद्धि का विस्‍तार करो, इस काबिल बनो कि अपने लिए चार कपड़े, किताबें और सिर पर छत के लिए किसी मर्द की मोहताज न होओ। छत पर बिना दुपट्टा जाने को न मिले - न सही, पैर फैलाकर बैठने को न मिले - न सही, तेज चलने से कोई रोके तो कोई बात नहीं। किताब तो पढ़ने को मिलती है न। किताब पढ़ो, और उन किताबों के रास्‍ते वहां तक पहुंचो, जब तुम्‍हारे दुपट्टा उतार देने पर भी कोई मुंह नहीं खोलगा, क्‍योंकि तुम्‍हारे व्‍यक्तित्‍व और बुद्धि की ऊंचाइयां उनके मुंह को चाक किए रहेंगी।

यशवंत जी, आपके सारे सुझाव एक गरीब, दुखी देश की दुखी लड़कियों के रसालत में पड़े जीवन को और भी रसातल में लेकर जाते हैं। मेरी पतनशील स्‍वीकारोक्तियों का सिर्फ और सिर्फ एक प्रतीकात्‍मक महत्‍व है। उसे उम्‍दा, उत्‍तम, अति उत्‍तम स्‍त्री विमर्श का ताज मत पहनाइए। ऐसे सुझाव देने से पहले ये तो सोचिए कि आप किस देश, किस समाज के हिस्‍से हैं। मुझ जैसी कुछ लड़कियां, जिन्‍होंने कुछ सहूलियतें पाई हैं, जब वो नारीवाद का झंडा हरहराती हैं, तो क्‍या उनका मकसद लड़कर सिर्फ अपनी आजादी का स्‍पेस हासिल कर लेना और वहां अपनी विजय-पताका गाड़ देना है। मैं तो आजाद हूं, देखो, ये मेरी आजाद टेरिटरी और ये रहा मेरा झंडा।

आपको लगता है कि स्‍त्री-मुक्ति इस समाज के बीच में उगा कोई टापू है, या नारियल का पेड़, जिस पर चढ़कर लड़कियां मुक्‍त हो जाएंगी और वहां से भोंपू बजाकर आपको मुंह बिराएंगी कि देखो, मुक्ति के इस पेड़ को देखो, जिसकी चोटी पर हम विराजे हैं, तो हमें आपकी अक्‍ल पर तरस आता है। तिनका-तिनका आजादी पाई किसी भी स्‍त्री का अगर स्‍त्री की वास्‍तविक मुक्ति के प्रति थोड़ा भी सरोकार है, तो ऐसा कोई बाजा बजाने के बजाय वो पढ़ेगी, और खूब-खूब पढ़ेगी, अपनी आजादी को पोज करने के बजाय बड़े फलक पर चीजों को समझने की कोशिश करेगी, वह वास्‍तवकि अर्थों में बौद्धिक और भावनात्‍मक रूप से एक मुक्ति और आत्‍मनिर्भरता हासिल करेगी।

ये सब कैसे होगा, इस पर और भी बहुत कुछ गुनना-बुनना होगा। लेकिन फिलहाल भडा़सी बैंड की सदस्‍यता से हम इनकार करते हैं। आप अपने कोरस में मस्‍त रहें।

9 comments:

भगवती प्रसाद said...

यशवंत जी को सही जबाव , मनीषा आपने यशवंत जी के सुझावो से अंतिम सुझाव की अन्तिम लाइन का सही से मतलब समझा और जिस युद्ध को टाल रही हैं, इस समाज के खिलाफ जिस एक अंतिम धक्के को लगाने जरुरत थी वह अपने लगा दिया

सलाम बाली
भगवती

भगवती प्रसाद said...

यशवंत जी को सही जबाव , मनीषा आपने यशवंत जी के सुझावो से अंतिम सुझाव की अन्तिम लाइन का सही से मतलब समझा और जिस युद्ध को टाल रही हैं, इस समाज के खिलाफ जिस एक अंतिम धक्के को लगाने जरुरत थी वह अपने लगा दिया

सलाम बाली
भगवती

सुजाता said...

बहुत तेज़धार और बहुत ज़रूरी लिखा ।
तुमहारी हमारी पतनशीलता की कामना के ब्लॉग पुरुषो द्वारा बहुत मसखरा पन और चेतावनियाँ दी जा चुकीं । अभी तक कोई समझा नही कि "पतनशीलता की इच्छा " व्यक्त करना तो मात्र सिमप्टम हैं ।मूल कारण की तक पहुँचने की बजाय सब केवल पतन की जगह कौन सा शब्द हो और पतनशीलता से क्या क्या ध्वनित होगा के खतरे पर ही विचार कर रहे हैं ।
यह वैचारिक परिवेश सचमुच दुखद है ।

यशवंत जी ने यहाँ सदस्य होने का आग्रह किया था । वे लिखें ज़रूर ।पर भडासी होकर नही ।बहुत कुछ वे अब तक समझ गये होंगे ।
यह स्पष्ट हुआ , जो बहुत ज़रूरी था , कि चोखेर बाली भडास नही है । भडास कोई नकारात्मक बोध के साथ नही कह रही । पर्सपेक्टिव और उद्देश्यों की भिन्नता को लेकर कह रही हूँ ।
चोखेर बाली स्त्रियो का मोहल्ला भी नही है ।
वह "बेटियों का ब्लॉग " से भी समानता नही रखता ।वह क्या नही है यह साफ साफ समझ आ रहा है ।
वह क्या है ? इस पर पहुँचने की जल्दी नही । यह यात्रा ही सुखद है । गनतव्य अंत है ।

स्वप्नदर्शी said...
This comment has been removed by the author.
Anonymous said...

it looks like i am not wriing on a community blog but on a blog which is someone elses . i have withdrawn my previous posts and have no relation to the view points expressed here in
thanks

स्वप्नदर्शी said...

मित्रो,
हम सब अपनी इच्छा से चोखेर बाली से जुडे है, बिना शर्त, बिना किसी फायदे नुकसान को ध्यान मे रखकर. क़म से कम मुझे किसी फायदे या फिर
किसी एजेन्डा क कोई इत्तला नही है. इसीलिये, मेरे लिये चोखेर बाली सिर्फ एक मंच था, जहा पर मिलकर कुछ सकारत्मक करने की चाह रही. पर यहा पर ये सम्म्भावना नही दिखती.
अपनी सारी अब तक की पोस्ट हटा चुकी हू. अपनी इस ब्लोग की सदस्यता भी खत्म कर रही हू.

मेरी तरफ से इसे सुजाता का व्यक्तिगत ब्लोग समझा जाय.

dilip uttam said...

see my site www.thevishvattam.blogspot.com &
hiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii my aim worldpeace is a my life my dream&concentration as a breath to me.it is not a side of money/selfbenifit.i want do socialwork with honesty;not a only working for it but more harderwork.my book A NAI YUG KI GEETA..is completed.This is in hindi languages .nowadays im suffering many problems like.1.publishers says that u have no enough degree&b.tech students is not a enough for it.&who know you in your country/world so they advice me firstly you concentrate for degree because of at this stage nobody read your book but they also said that your book is good. 2.publishers wants to data for publishing the book.means from where points did you write your book but i have no data because of my book is based on my research.book chapter name is. 1.MAHILA AAJ BHI ABLA HAI KYO . 2. AIM PROJECT {AAP APNA AIM KA % NIKAL SAKTE HO }. 3. MY PHILOSPHEY 4.MERA AIM VISHVSHANTI. 5.POETRY. 6.NAYE YUG KI GITA VASTAV MAY KYA HAI. 7. WORLD {SAMAJ} KI BURAIYA. 8. VISHV RAJ-NITE. ALL THESE CHAPTER COVERD BY ME. 3.max. people told me that firstly u shudro than worry others. they told me now a days all lives for own .why u take tansen for world . i cant understands thease philoshpy. according to my philoshpy in human been charcter; huminity; honesty; worlrpeace &do good work. i have two problem 1. DEGREE. 2. LACK OF MONEY because my parents told me your aim is not any aim &u tents to many difficulties. PLEASE ADVICE ME. IF U CAN GIVE ME YOUR POSYAL ADDRESS &PHONE NO. THAT WILL BE GOOD . THANKS. " JAI HINDAM JAI VISHVATTAM " THANKS.

Unknown said...

भडा़सी बैंड की सदस्‍यता से इनकार करके आप बिल्कुल सही करती हैं । भोंपू बजा कर पतनशील होने की घोषणा करना किस उद्देश्य से जरूरी है? प्रोग्रेसिव होने के लिए पतित होना जरूरी नहीं है. नारी पुरूष से कम नहीं है. उसे स्वयम को साबित करने की जरूरत ही क्या है. उसे आगे बढ़ना चाहिए और पुरूष से आगे निकल जाना चाहिए. पुरूष को स्वयं को नारी के बराबर साबित करने के लिए संघर्ष करना पड़े इसी में नारी की शान है.

Unknown said...

dear manisha ji
plz cum out of this dirty feminism of "patansheelta". actually when a women call a men to his place in late hours and want him to stay overnight. Then tell me where this "patansheelta" gonne.When you need a man in your life at every step then why to curse him. And there are so many ladies who had suffered a lot. but they are not simply cursing them but preventing society from the newscence. Plz give us a break from this kind of femenism and do something natural and remarkable.
It is ur land u can remove my comments but just think before doing this.

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