Wednesday, February 13, 2008

मन की बात

इस मंच ने बहुत कुछ ऐसा कहने और सुनने का अवसर दिया ,जिसके बारे मे सामान्यत: या तो घुटन होती है या फ़िर चुप्पी । मानसि्क रुग्णता की आड़ मे स्त्रियों-बच्चियों व लड़कियों को दे्खकर कुछ महानुभाव सरेआम सडकों,गलियों ,झाड़ियों की ओट मे अभद्र्ता करते दिखायी पड़ते हैं,नतीजा …या तो लड़कियाँ रास्ता बदल देती हैं,सहमकर छिप जाती हैं या फिर ऐसी अपमानजनक स्थिति का स्वयं को जिम्मेदार मान बैठ्ती हैं और कुंठित होती हैं । महानगरीय सभ्यता मे शायद लोग इस तरह की हरकतों को नज़रअंदाज़ भी कर देते हैं मगर परेशानी होती है छोटे शहर और कस्बे की लड़कियों को जिनमे शायद उतनी हिम्मत नही होती कि वे उस व्यक्ति की तरफ़ नज़र भी उठा सके जो आये दिन उनका मानसिक शोषण करता है । कोफ़्त सबसे अधिक तब होती है जब बेटियों के पिता को भी न जाने किस भय के कारण इन सड़क चलते दुराचारियों से नज़र बचाते देखती हूं ।

बार-बार मु्ठ्ठी भिंच जाती थी,नज़र बचा कर चुपचाप साइकिल चलाते बेटे को घसीट कर घर ले आती थी । एक दिन निश्चित कर लिया, पतिदेव को बताया ,चप्पल उठायी उन महाशय को झाड़ियों से बहार निका्लकर सारी शर्म भूल कर उन्हे तब तक मारा जब तक ्मेरे हाथ से खून व मन से पिछ्ली सारी कुंठा बह नही गयी । पतिदेव मुस्कुरा रहे थे ,बोले चलो कुछ गंदगी तो कम हुई । मात्र कोई लेख या कहानी कहनी है इस उद्देश्य से मैने ये आपबीती लिखने का ्साहस नही किया बल्कि इसलिये कि यदि हमसब मे से कोई भी इस तरह की परिस्थितियों से नज़र चुराता है तो कम से कम अपनी बेटी व पत्नी को इतना सहयोग दीजिये कि वो राह चलते इन दुष्कर्मियों से स्वयं को निजात दिला सके ।

16 comments:

Anonymous said...

mera bhi yahii mannaa hae parul kii burayee ka anth usko khatam karke hee hoga ignore karke nahin

Sanjeet Tripathi said...

खुशी हुई कि आप भी यहां आ गईं!!

Keerti Vaidya said...

very lovley poem

अफ़लातून said...

सुन कर बहुत हिम्मत मिली ।

azdak said...

@Keerti Vaidya,
I'd rather say deadly poem, isn't it?

Tarun said...

काम तो हिम्मत वाला था लेकिन हमारी समझ में ये नही आया इसमें कविता जैसा क्या था। हम तब से कह रहे हैं कि कविताओं के ब्लोगस में हमसे टिप्पयाने के लिये ना कहें हमें कविता समझ नही आती

मसिजीवी said...

बहुत साहसिक काम ! अभी तक तो मैंने जबानी लडाइयां ही की हैं हाथ उठाने की कभी हिम्मत नहीं हुई !एक बार किसी अन्य लडकी के साथ अभद्रता करते व्यक्ति को बस से धकिया दिया था और बाद में डर लग रहा था कि यदि बात आगे बढ जाती तो क्या कोई मुझे बचाता ?आसपास सब मूक और बधिर बने खडे मुसाफिर ही तो थे !

स्वप्नदर्शी said...

बडा शरीफ गुंडा था जो चुप्चाप पिट् लिया. एक बार मेरी दोस्त की मा ने भी ऐसी ही हिमाकत की थी. बदले मे दो चार चांटे खा कर लौटी थी.

एक मर्तबा एक और लडकी ने भी अगले भाई साहेब को चांटा मारा तो दो खुद भी खा कर आयी थी. इसमे हिम्मत की कोई बात नही है. मै किसी को ये सलाह नही दूंगी. अभी अगला घूर रहा है, हाथापायी पर उतर जाओगे तो उल्टा भी पड सकता है.

स्वप्नदर्शी said...

http://www.apnaghar.org/indexnew.shtml
ye bhee dekhe

पारुल "पुखराज" said...

SWAPANDARSHII JI,

ye koi himaat ki kathaa nahi kahi mainey na taaliyon ki darkaar ki hai.baat yadi ghuurney tak seemit ho to zaruur ignore kiya ja sakta hai ,saaf shabdon me kahuun to aap shayad us paristhiti se guzri nahi hain . jab bachhiyan aur ladhiyaan sadko se guzrti hain aur kuch mahaapursh behuudgi kii seema bhi paar kar nagntaa par utaaru hojaayen to aap ka khuun shayaad na kahuley..mera zaruur khaultaa hai.rahi chaantey khaaney ki baat to in sajaano me agar itni hi himmat hoti to yun chhup ke behuudgi kartey na ghuumtey....aur sach maaniye aurat kaa haath purush pe uthh jaana koi asaan baat nahi,jub apni smitaa pe ban aaye tabhi is tarah ke reactions hotey hain..varna mujhey jhaansi ki raani banney ka koi shauq nahi....

Arun Arora said...

कभी ना कभी तो अन्याय का विरोध करना ही पडेगा..सही किया

स्वप्नदर्शी said...

आपने जो किया सही किया, पर मेरा आशय ये है, की क्या यही समाधान है???
ये बहुत ही व्यक्तिगत किस्म का समाधान है, और इससे नयी किस्म की मुसीबत खडी हो सकती है.
क्या इस दिशा मे कोई संगठित पहल हो सकती है. क्या एक नागरिक के बतौर , और एक सचेत नागरिको के समूह के बतौर इस तरह की हरकत करने वालो, या फ़िर लड़कियों का पीछा कराने वालों के ख़िलाफ़ कोई मुहीम चलायी जा सकती है ? किसी तरह के कड़े क़ानून बानाने और उन्हें अपनाने के लिए हमारे जनतंत्र पर दबाव डाला जा सकता है?
व्यक्तिगत समाधान की एक सीमा है. पर ultimately ये एक सामाजिक समस्या है, क्या इसका कोई सामाजिक समाधान सम्भव है?
लड़कियों की छेड़छाड़ के मुद्धे, abuse, अगर व्यक्तिगत ब़ना दिए जे तो वों वही खत्म हो जाते है. और इस मुद्दे को एक सामजिक मुद्दा बनाने मैं मुझे ज्यादा खुशी होगी. बाकी किसी को कम , किसी को ज्यादा, हम सभी इन्ही गलियों से गुजरते है. मैं भी अपवाद नही.

मनीषा पांडे said...

स्‍वप्‍नदर्शी जी, ये तो बड़ी मामूली-सी बात है, आप बेवजह का हौवा बना रही हैं। सड़क चलते कोई आपको इधर-उधर छूकर, फिकरे कसकर निकल जाए और आप गऊ माता बनी सिर झुकाए खड़ी रहिए। ये तो बड़ी साधारण-सी बात है कि आप आगे बढ़कर एक चांटा या एक जूता रसीद करिए। इसमें रानी लक्ष्‍मीबाई बनकर फूलने, कुप्‍पा होने जैसी भी कोई बात नहीं है। कोई आपके स्‍पेस में दखल दे और बदले में आप उसे दो लात दें, यह बड़ा स्‍वाभाविक है। जो लात लगाने में डरती हैं, उन्‍हें थोड़ा और इंसानी हिम्‍मत से लबरेज होने की जरूरत है।

पारुल "पुखराज" said...

swapandarshi ji,

aapki baat bilkul uchit hai ki muhim chalayii jaani chaahiye,samaadhaan dhuundhey jaaney chaahiye . magar mainey yahi dekha hai ki avall to LADKIYON se related topics dabaa diye jaatey hain ya phir unkey aane jaaney ke raastey hi badal diye jaatey hain...khair problem vo nahi hai...mera man na ye hai ki mera samaaj mujhse shuruu hota hai aur agar merey aas pass ke log khidkiyaan band kar ke pardon ke peechey se jhaanktey hain to rahen vaisey hi...mujhey kam se kam apney liye vo jagah vo vaataavarn saaf rakhna hai jahan mai apney bachhon ke saath izaat aur befikri se khadi ho sakuun .

mehek said...

parul ji apne jo kiya sahi kiya,himmat hi khud ko buland banati hai,aur hum khud ki nazaron se girne se bach jate hai.

dilip uttam said...

see my site www.thevishvattam.blogspot.com & hiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii my aim worldpeace is a my life my dream&concentration as a breath to me.it is not a side of money/selfbenifit.i want do socialwork with honesty;not a only working for it but more harderwork.my book A NAI YUG KI GEETA..is completed.This is in hindi languages .nowadays im suffering many problems like.1.publishers says that u have no enough degree&b.tech students is not a enough for it.&who know you in your country/world so they advice me firstly you concentrate for degree because of at this stage nobody read your book but they also said that your book is good. 2.publishers wants to data for publishing the book.means from where points did you write your book but i have no data because of my book is based on my research.book chapter name is. 1.MAHILA AAJ BHI ABLA HAI KYO . 2. AIM PROJECT {AAP APNA AIM KA % NIKAL SAKTE HO }. 3. MY PHILOSPHEY 4.MERA AIM VISHVSHANTI. 5.POETRY. 6.NAYE YUG KI GITA VASTAV MAY KYA HAI. 7. WORLD {SAMAJ} KI BURAIYA. 8. VISHV RAJ-NITE. ALL THESE CHAPTER COVERD BY ME. 3.max. people told me that firstly u shudro than worry others. they told me now a days all lives for own .why u take tansen for world . i cant understands thease philoshpy. according to my philoshpy in human been charcter; huminity; honesty; worlrpeace &do good work. i have two problem 1. DEGREE. 2. LACK OF MONEY because my parents told me your aim is not any aim &u tents to many difficulties. PLEASE ADVICE ME. IF U CAN GIVE ME YOUR POSYAL ADDRESS &PHONE NO. THAT WILL BE GOOD . THANKS. " JAI HINDAM JAI VISHVATTAM " THANKS.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...