Wednesday, February 27, 2008

आओ अपनी बेटियों को "औरत" और बेटों को "मर्द" बनाऎं

मेरी बेटी दिल्ली के बहुत प्रतिष्ठित स्कूल में पढती है ! उम्र सिर्फ पांच साल है पर आसपास के माहौल की समझ अपनी उम्र से ज्यादा है ! वह अपनी टीचरों को बहुत पसंद करती है पर उनकी कई बातों को बहुत अजीब मानते हुए उनका कारण वह हमसे जानना चाहती है ! उसकी क्लास मॆं शोर मचाने वाले लडकों के लिए सजा लडकियों को दी जाने वाली सजा से अलग क्यों है यह बात बॆटी को समझ नहीं आती ! लडकों को शरारत करने पर कहा जाता है " चुप बैठ जाओ वरना आपके फोरहेड पर बिंदी लगा देंगे !" अगर लडका फिर भी शरारत नहीं बंद करता तो कहा जाता है कि अब तो आपकी एक पोनीटॆल भी बनानी पडेगी ! बेटी का यह प्रसंग सुनकर मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गए जब रोने वाले लडके को चुप कराने के लिए टीचर कहती थीं कि शर्म नहीं आती लडकियों की तरह रोते हुए !

तब और आज की बात में पूरी एक जेनरेशन का गैप है पर हमारे समाज की रक्तवाहिनियों में बहते हुए इस लिंग भेद की भावना में कोई फर्क कहां आया है ? आज हम अपनी बेटियों को शायद अपने बेटों के बराबर खुराक ही देते हैं उन्हें लडकों जैसे (?) कपडे भी पहनाने में शान महसूस करते हैं , उसकी शिक्षा पर जमकर खर्च करते हैं पर उसके माहौल में एक गैरबराबरी का अंडरकरंट जरूर बहते जाने देते हैं !

मेरी बेटी की क्लास के सारे मासूम लडके अब तक यह समझ चुके होंगे कि लडकी होना कितने अपमान की बात है ,यह भी कि अपनी जेंडर आइडेंटिटी उनके लिए सबसे अहम है , यह भी धीरे धीरे समझ जाऎगे कि औरत होना किसी सज़ा से कम नहीं है और वे खुशकिस्मत हैं कि वे नहीं है ! मेरी बेटी यह समझ चुकी है कि टीचर की इन बातों से ब्वाय्ज़ बहुत डर जाते हैं पर गर्ल्स को लडका बनाने की बातों से नहीं डरा सकते हैं क्योंकि वो तो पहले से ब्वाय्ज़ जैसे कपडे पहनती हैं ! मैं डरती हूं कि वक्त उसे यह भी समझा देगा कि समाज में उनकी बराबरी केवल सतही है ,दिखावा है ,वंचना है ! इन सतही चीजों से लडकियों की आजादी और उनकी जेंडर आइडेंटिटी का सम्मान होना नही शुरू होने वाला !जेंडर सेंस्टीविटी अभी भी सिर्फ विमर्शों का ही हिस्सा है ! अभी तो उसे समाज के सबसे अधिक बदलाव के थपेडे सह सकने वाले तबके तक ने नहीं अपनाया है ! मेरी बेटी की अंग्रेजी स्कूलों में पढी शिक्षिकाओं को उनके समाज ने अपने स्त्रीत्व पर गर्व होना और उसके प्रति सेंसिटिविटी की उम्मीद रखना तक नहीं सीखने दिया ? हम बेटी को बेटी होने पर शर्मिंदा होना सिखाते चले आए हैं जहां वे स्त्री होने के अपमान के लिए दिल से तैयार कराई जाती हैं और सतही बदलावों के भ्रम में पाली जाती हैं !हमारी इन मानसिक संरचनाओं को हमारी शिक्षा भी बदल नहीं सकी बल्कि उसके ढांचे इसको और मजबूती से सिखाने वाले गढ भर हैं !

हम अपनी बेटियों को सजीली लंबी टांगों वाली गुडिया लाकर देते रहेंगे और वह उनसे घर घर खेलती रहेंगी और बेटों को नित नई गाडियां हम दिलाते रहेंगे ! बराबरी ही तो है ! लडकों के से कपडे और ब्वाय्ज़ - कट बाल ! देखो कितनी बराबरी है ! दोनों एक ही स्कूल में जाते हैं !जी दोनों बराबर हैं ......

नहीं ,तब भी नहीं .......कल नहीं तो परसों मेरी बेटी जान जाएगी कि उसके तथाकथित बराबरी वाले माहौल ने कैसे उसे भरमाए रखा और कैसे उसके भविष्य को रपटीला बना दिया ! वह हमसे पूछ बैठेगी तो हम क्या जवाब देंगे ? क्या अपनी पिछली पीढी को कोसने लगें गे और मुंह चुराकर , अपने बुढापे की दुहाई देकर , अपनी मुसीबतें खुद सुलटा लो की नेक सलाह देंगे ?

18 comments:

ghughutibasuti said...

बहुत अच्छा लिखा है । यही सब होता है । हमारे समय में भी होता था , फिर मेरी बेटी के समय में भी और अब आपकी बेटी के समय भी । मेरी बेटी ने तो जब यह असह्य हो गया तो शाला बदल हॉस्टेल में रहना पसन्द किया ।
घुघूती बासूती

note pad said...

बहुत सही बात कही है । मुद्दा गम्भीर है और शायद हम सब के पास गम्भीर बातों को सोचने का समय नही है ।सनसनी के लिये तो फिर भी वक़्त निकल आता है । विडम्बना है ।

99% Bachelor said...
This comment has been removed by the author.
99% Bachelor said...

Really very article...
Nice thinking..
Keep continue..

Anonymous said...

सच्चा लिखा है.
सच कहा है
पर आप लगे रहिये
अवश्य माहौल बद्लेगा
जो चाहते हैं
आप, हमारी बेटियां
वो ज़ल्द तो नहीं
पर है ऐसा विश्वास
कि हासिल ज़रूर होगा
होना भी चाहिये

बेटियों का अधिकार
कार पर
बेटों का सरकार पर
बेटियों का भी सरकार पर
पर नहीं है तनिक भी उम्मीद
कि हमारे बेटे
कभी गुड्डे का ब्याह रचायेंगे.

बेटियों के सम्बन्ध में
सम्भावना भरपूर है
बेटा उम्मीदों से भी
कोसों दूर है.

आप लगे रहिये
जमे रहिये
युग बदलेगा.

azdak said...

सही लिखा, भई.. सबसे पहले ऐसे टीचरों के मुंह पर गोबर की कलमकारी करनी चाहिए. हद है, और राजधानी में टीचिंग करते हैं.

Anonymous said...
This comment has been removed by a blog administrator.
अनूप भार्गव said...

सदियों से चली आ रही रूढियों और मानसिकता को बदलने में समय लगेगा । यदि कोई गलत काम कानून के संरक्षण में हो रहा है या कानून तोड़ा जा रहा है तो उस के खिलाफ़ सामूहिक आवाज़ उठाई जा सकती है लेकिन लोगों की निजी मानसिकता और पूर्वाग्रहों से लड़ने के लिये तो उन से निजी स्तर पर ही लड़ना होगा । हां ये किया जा सकता है कि जो यह लड़ाई स्वयं नहीं लड़ सकते उन्हें हम ’नैतिक सहयोग’, मार्गदर्शन, सम्बल और उन्हें अपनी बात कहने के लिये सही शब्द दें । लेकिन अपनी लड़ाई तो खुद ही लड़नी होगी ।

कहना सरल है लेकिन अपनी बिटिया को अपनी लड़ाई अभी से स्वयं लड़ना सिखायें । विश्वास कीजिये पांच साल की बच्ची की स्वयं उठाई गई आवाज़ हम सब की आवाज़ से ज्यादा असर रखेगी ।

अनूप भार्गव said...

अनोनिमस जी:
अपने ’बेडरूम’ में होने वाले निजी अनुभव को सार्वजनिक मंच पर विज्ञापित करने के लिये धन्यवाद लेकिन यदि आप अपनी बात ’अपने नाम’ से कहने की हिम्मत रखते तो शायद आप के पुरुष होने का सबूत मिलता ।

आप के स्तर पर बात करने के लिये अफ़सोस है लेकिन दूसरे कोई शब्द भी नहीं सूझ रहे हैं ।

रिपुदमन पचौरी said...

hhmmmmm...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आज "चोखेर बाली" जाल घर से जुड़कर , अपनी एक कविता " भारत की कन्या " को अर्पित करते हुए नीलिमा जी आपकी बिटिया के स्कूल का अनुभव पढ़कर , मेरी बेटी जब बंबई के स्कूल में थी वही सारा याद आ गया !

हमारी बेटियों को एक विस्तृत आकाश अब हमीं देंगें

Tarun said...

बेटी को बेटी और बेटों को बेटे नही बना सकते क्या, औरत और मर्द तो ये वैसे भी बन जायेंगे। पहले भी बनते आये हैं आगे भी बनते रहेंगे। मुझे कई बार लगता है कि आप लोगों का हर समय इस तरह का राग गाना कुछ कुछ वैसा ही है जैसे अंग्रेजों को भारत आकर फोटो खिंचने के लिये सिर्फ या तो गरीब नजर आते हैं या गंदी गंदी जगहें और या फिर झुग्गी झोपड़ियाँ।

Anonymous said...

kyaa aap samet kisii bhi parent naey is vishay mae koi kadam udaayaa . kyaa is samasyaa kaa nidan kaise ho is vishaya mae kisii PTM mae baat hui . vyaktigat aaksep yaa tippani nahin kar rahee hun per kyaa aap ne vyaktigat rup sae is vishay mae kuch kiya . agar haan to please ham sab kae saath share kare takki auro ko kuch prernaa milae kuch karne kii
regds
rachna

Anonymous said...

@अनोनिमस
aap jaise ko liyae to koi shabd hee nahin haen .nirlajtaa kii bhi seema haen per aap to nirlaj bhi nahin haen kyokii app baccho kii samasyaao per aadhrit maansikta ko bhi kewal kaam kii nazar sae deakh saktey haen . aap mae aur nithari kae pandher mae koi khaas farak nahin hoga . and which ever woman is on top of you , if reads this comment will always regret why she did not trash you .
yae anam ling jo blogging mae haen naa to pursuh haen naa stri aur hijrae bhi samanit sadaysn haen is smaajkae is liyae in anonymous ko to mae woh bhi nahin kehan chahugii अनाम इस लिये बन जाते है ताकि मर्यादा छोड़ कर अपनी बात कह सके

Neelima said...

ऎनोनिमस भाईसाहब ,
आपने इस मंच का इस्तेमाल अपने निजतम विचारों को सार्वजनिक करने के लिए किया पर आप स्त्री को इतनी आजादी देने (?) वाले अनाम क्योंकर इतने शर्मसार हैं कि अनाम ही रह गए ??

अबरार अहमद said...

very nice. mudda sadiyon purana hai. samadhan bhi sochna hoga.

Vikash said...

शिक्षकों के ऊपर कितनी बड़ी जिम्मेदारी है, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. निश्चय ही यह महान चिंता का विषय है.

dilip uttam said...

see my site www.thevishvattam.blogspot.com &
hiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii my aim worldpeace is a my life my dream&concentration as a breath to me.it is not a side of money/selfbenifit.i want do socialwork with honesty;not a only working for it but more harderwork.my book A NAI YUG KI GEETA..is completed.This is in hindi languages .nowadays im suffering many problems like.1.publishers says that u have no enough degree&b.tech students is not a enough for it.&who know you in your country/world so they advice me firstly you concentrate for degree because of at this stage nobody read your book but they also said that your book is good. 2.publishers wants to data for publishing the book.means from where points did you write your book but i have no data because of my book is based on my research.book chapter name is. 1.MAHILA AAJ BHI ABLA HAI KYO . 2. AIM PROJECT {AAP APNA AIM KA % NIKAL SAKTE HO }. 3. MY PHILOSPHEY 4.MERA AIM VISHVSHANTI. 5.POETRY. 6.NAYE YUG KI GITA VASTAV MAY KYA HAI. 7. WORLD {SAMAJ} KI BURAIYA. 8. VISHV RAJ-NITE. ALL THESE CHAPTER COVERD BY ME. 3.max. people told me that firstly u shudro than worry others. they told me now a days all lives for own .why u take tansen for world . i cant understands thease philoshpy. according to my philoshpy in human been charcter; huminity; honesty; worlrpeace &do good work. i have two problem 1. DEGREE. 2. LACK OF MONEY because my parents told me your aim is not any aim &u tents to many difficulties. PLEASE ADVICE ME. IF U CAN GIVE ME YOUR POSYAL ADDRESS &PHONE NO. THAT WILL BE GOOD . THANKS. " JAI HINDAM JAI VISHVATTAM " THANKS.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...