Thursday, March 6, 2008

महिलाओं के लिए बजट की माया

पिछले दिनों आए राजस्थान बजट और केन्द्रीय बजट दोनों में एक समानता रही कि महिलाओं के लिए बहुत कुछ था। जैसे गरीब परिवार और एससीएसटी यदि महिला के नाम बैंक में खाता खोलेंगे तो उन्हें सरकार की तरफ से 1500 रुपए दिए जाएंगे। इसी तर्ज पर पढ़ाई में अच्छी लड़कियों के लिए भी काफी कुछ है। सबसे महत्वपूर्ण था पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं का 50 फीसदी आरक्षण। वसुंधरा राजे का तर्क था कि जब महिलाएं आधी आबादी हैं तो आरक्षण 33 फीसदी क्यों, 50 फीसदी क्यों नहीं। बात भी सही है जब महिलाएं मिलकर आधी आबादी बनाती हैं तो आरक्षण केवल 33 ही क्यों।
उधर, केन्द्र ने भी कोई कमी नहीं छोड़ी, आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 1 लाख 80 हजार कर दी। तरह-तरह की योजनाओं में महिलाओं के लिए हजारों करोड़ रुपए दिए जाने की घोषणा कर दी।
ये हैं वो बड़ी-बड़ी घोषणाएं जो कानों को सुनने में बहुत भली लगती है लेकिन इससे कितना अंतर पड़ेगा, सोचें जरा। ऐसा नहीं है कि पहली बार ही ऐसी कोई घोषणा हुई हो, हर दो-चार साल में वोटों के लिए महिलाओं के लिए ऐसी घोषणाएं हो ही जाती हैं पर उससे एक्चुअली अंतर कितना पड़ा है, ये तो सब जानते हैं ही। राजस्थान उन शुरुआती राज्यों में से था जिसने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित किया था, लेकिन आज दसियों साल गुजर जाने के बाद भी हालत जस के तस हैं। बस जिन गांवों में महिलाओं के लिए सीट रिजर्व हो गई । वहां पति की जगह पत्नी जीती, बेटे की जगह मां, पर असल राज-काज तो पुरुषों के हाथ में ही रहा। और वहां इनका नया नाम हो गया एसपी यानी सरपंच पति। महिलाएं घूंघट की आड़ में वहां बैठी जरूर रहतीं पर इन पंचायतों और ग्रामसभाओं का पूरा काम उनके पति या पुरुष रिश्तेदार ही देखते। कुछेक जगह महिलाओं ने फैसले खुद लेने शुरू किए , वहां हाल और ज्यादा खराब हुए। कइयों की पिटाई हुई, घर में बंद कर दिया गया, जो भी सितम ढ़हाए जो सकते थे वो जुल्म किए गए कि कहीं ये स्वतंत्र ना हो जाए , अपने अधिकारों को ना समझें और अपने हकों के लिए आवाज ना उठाएं।
पिछले दिनों तो गंगानगर और आसपास के इलाकों में एक नया ट्रेंड देखा गया जहां पर पूर्व सरपंच महिला को किसी ना किसी केस में फंसा दिया गया, ( सरपंच काल के दौरान लिए गए निर्णयों के आधार पर) वो जेल में बंद है। ऐसे 3-4 केस सामने आए और मजेदार बात ये थी कि इन महिलाओं के ये तक पता नहीं था कि वो कौनसे गलत निर्णय उन्होंने लिए थे। या घोटाले किए थे क्योंकि काम काज का तो उन्हें पता ही नहीं था और उनके नाम पर उनके पुरुष रिश्तेदार मलाई खाते रहे। जब गलत काम सामने आए तो जेल भेजा गया इन बेचारी महिलाओं को।
महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण अच्छी बात है लेकिन उससे पहले ये क्यों नहीं तय किया गया कि जो 33 फीसदी आरक्षण पहले से मिल रहा है उसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रेक्टिकली महिलाओं को इसका लाभ मिले जो कि नहीं मिल रहा है। वे ही शासन करें क्योंकि वे इन संस्थाओं में चुनी गई हैं। अगर इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़ दिया जाए तो वे बस नाम की ही पंच-सरपंच होती हैं , हकीकत तो कुछ और ही है।
चुनावी वर्ष की इन सब घोषणाओं में एक और बात खास रही वो थी कि सब योजनाएं ग्रामीण महिलाओं के लिए हैं क्योंकि वो बड़ा वोट बैंक है। शहरी क्षेत्र की महिलाओं खासकर कामकाज महिलाओं के लिए टैक्स रिलेक्सशेन के अलावा कुछ नहीं मिला है वो भी इसलिए क्योंकि पुरुषों की टैक्स रिबेट बढ़ाई जानी थी तो महिलाओं की रिबेट को तो बढ़ाना मजबूरी ही थी। कहीं कामकाजी महिलाओं के बच्चों के लिए क्रैश जैसी सुविधाओं की सुनिश्चितता तय नहीं की गई। उनके बच्चों के लिए कोई फैसिलिटी नहीं।
ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के लिए भी ऐसा कोई कंकरीट फैसला नहीं लिया गया जिससे कि एक्चुअली उनकी स्थिति में सुधार हो।

7 comments:

CG said...

बहुत ही सार्थक लेख
आशा है आगे भी ऐसे लेख यहां पढ़ने मिलेंगे

अनूप भार्गव said...

नीलिमा जी:

गणित की भाषा में कहूँ तो "सरकार और कानून के द्वारा दिया गया बराबर का दर्जा महिलाओं की उन्नति के लिये necessary condition है Sufficient Condition नहीं । कानून का संरक्षण ज़रूरी है लेकिन यह सोचना गलत होगा कि सिर्फ़ कानून के बदलने से लोगों की मानसिकता रातों रात बदल जायेगी । उसके लिये तो हमें निरंतर प्रयास करने होंगे , लड़ाई लड़नी होगी ।
अपनी एक मुक्तक याद आ रहा है जो काफ़ी बरस पहले किसी और सन्दर्भ में लिखा था लेकिन शायद यहां भी उतना ही उपयुक्त है :

मंजिल पे पहुँचने के लिये खुद पाँव बढाना होगा
राह की मुश्किलों को खुद आप हटाना होगा
कोई नहीं है जो आये और तुम को रोशनी दे दे
अंधेरे को मिटाने के लिये खुद अपने आप को जलाना होगा ।
---

ये लड़ाई ऐसी है जिस में ज़रूरी नहीं कि लड़ने वाले को स्वयं उस के ज़न्म में लाभ मिल ही जाये लेकिन सच्ची आस्था के साथ किया गया प्रयत्न कहीं न कहीं , कभी न कभी किसी को ज़रूर लाभ पहुँचायेगा ।

ये लड़ाई सम्पूर्ण पुरुष जाति को एक कटघरे में खड़े कर के उनके खिलाफ़ लड़ी जा सकती है लेकिन वह लड़ाई को अधिक कठिन बना देगा । विश्वास कीजिये , कुछ पुरुष ऐसे भी हैं जो नारी को अपने बिल्कुल अपने बराबर समझते है सिर्फ़ इसलिये नहीं कि ऐसा करना ’पोलिटिकली करेक्ट’ है बल्कि ऐसा करना ही उन्हें ’सहजता’ देता है । यदि लड़ाई उन के साथ मिल कर लड़ी जाये तो शायद कुछ सरल हो जाये ।

पूर्वाग्रहों के खिलाफ़ लड़ाई पूर्वाग्रहों को मन में रखते हुए नहीं लड़नी चाहिये ।

शुभ कामनाओं के साथ

neelima garg said...

आगे बढ़ने के लिए सहारे की बेसाखियों की ज़रूरत नही है होसले बुलंद हो तब रास्ते खुद ही निकल आते हैं ......

Pratyaksha said...

अनूप जी की बातों से सहमति है।

ghughutibasuti said...

अच्छा लेख है । अनूप जी की बात भी ध्यान देने योग्य है ।
घुघूती बासूती

सुजाता said...

महिलाएं घूंघट की आड़ में वहां बैठी जरूर रहतीं पर इन पंचायतों और ग्रामसभाओं का पूरा काम उनके पति या पुरुष रिश्तेदार ही देखते।
*****
यह एक बडी सच्चाई है । अनूप जी की बात से भी सहमत हूँ । लेकिन बहुत सी महिलाऎ ग्रामीण इलाकों में सरपंची के लिये खडी इसलिये नही होतीं कि वे जागरूक हैं बल्कि उन्हें खडा करवाया जाता है क्योंकि उनके जीतने के चांसेज़ ज़्यादा बन जाते हैं ; और अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता घर के पुरुष के हाथ में ही रहती है ।
शिक्षा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है ।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

पूर्वाग्रहों के खिलाफ़ लड़ाई पूर्वाग्रहों को मन में रखते हुए नहीं लड़नी चाहिये ।
बहुत गहरी बात कही आपने अनूप भाई !

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