Tuesday, March 11, 2008

लगी रहो मुन्नी बहन

हम भी हैं जोश में

आभा

सात मार्च के अमर उजाला में छपे सुजाता नेवतिया के आलेख में अपना नाम देख कर अच्छा लगा। पूरा लेख पढ़ने के बाद लगा बेजी, घुघूती, नीलिमा सब बिल्कुल सही कह रही हैं...वहीं प्रत्यक्षा और मनीषा से असहति भी नहीं जताई जा सकती......क्योंकि उनकी बातों में कहीं न कहीं दम भी है...

फिलहाल यही कहना चाहूँगी कि लगी रहो सब 'मुन्नी बहन' बात खुद ब खुद निकल कर आएगी। और जब बात लिकनेगी तो दूर तक जाएगी......गई भी है सुजाता के इस आलेख से....चोखेर बालियों की धमक वे भी सुनेंगे जो अपने कान में रुई डाल कर पड़े हैं....यानि वे भी सुनेंगे जिन्हें अपनी घरेलू दिन चर्या के अलावा दुनिया जहान से कोई लेना-देना नहीं है... एक बार फिर कहूँगी लगी रहो मुन्नी बहन...बातें बहुत हैं फिर कहूँगी....आज मेरी बहुत पुरानी लेकिन एक छोटी कविता पढ़े-
औरत एक पंछी
एक औरत
पंछी की तरह उड़ना चाहती है
वह भूल गई है
कि वह एक औरत है
वह पाना चाहती है
वह सब कुछ
जो खो गया था कहीं
या छूट गया था किसी डाल पर
किसी घोसले में
वह उड़ती है बार-बार
गिरती है बार-बार
वह औरत है
वह ढीठ है...
वह निर्लज्ज है
बेहया है वह...कि
मार धिक्कार और फटकार के बाद भी
उड़ती है बार-बार
गिरती है बार-बार
पंख कट रहे हैं...
दम घुट रहा है
पर
उड़ने का सपना कभी नहीं छूट रहा है...
एक औरत
पंछी की तरह उड़ना चाहती है
वह भूल गई है
कि वह एक औरत है।
५ अप्रैल 2003

अपनाघर ,आभा,उडान,औरत ,पंछी

10 comments:

अजित वडनेरकर said...

बहुत बढ़िया ।

Udan Tashtari said...

सही है..अति उत्तम.

अनूप शुक्ल said...

सही है। सपने साकार हों।

सुजाता said...

हम भी हैं जोश में
----
यह पंक्ति बहुत अच्छी लगी :-)

अनूप भार्गव said...

सुन्दर कविता है ।

मनीषा पांडे said...

भूले नहीं तो जिंदा कैसे रहे।

Sanjeet Tripathi said...

बहुत बढ़िया!!

चाहत उड़ने की पूरी होगी ही
आसमान होगा कभी तो मुट्ठी में

परमजीत सिहँ बाली said...

सुन्दर रचना है।

ghughutibasuti said...

आभा जी, बोलने व असम्मति में शामिल होने के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती

Vibha Rani said...

chalie, aap ke mukh se na sahii, dekhane v padhne ko to mil gaii. badhaaii.

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