Friday, March 14, 2008

गिव अ मैन अ फ्री हैंड एंड ही विल ........


रोज़ सुबह हम-आप उठते हैं ,चाय के चुस्की के साथ जुर्म का एक पुराना संसार नये रोगन में सामने प्रस्तुत होता है ।एक च.च..च..! क्या होगा इस देश का और कुछ देर मौन मुद्रा में शोक मना कर हम उठ खडे होते हैं । और क्या कर सकते हैं ? क्या वाकई कुछ कर सकते हैं ? या कर सकते हैं ? बहुत् से सवाल खडे हो जाते हैं मुँह बाए , आप किस किस को तवज्जो देंगे !
देखिये ,पहले मुम्बई में सामूहिक छेडछाड के बाद गोआ में विदेशी किशोरी स्कारलेट {Scarlett Keeling}का बलात्कार और हत्या । विदेशी हो या देसी कोई फर्क नही पड्ता । मादा होनी चाहिये । वर्ना क्यों जोहानिस्बर्ग में एक 25 साल की महिला को मिनी स्कर्ट पहने देख टैक्सी ड्राइवरों ने छेडछाड का निशाना बनाया ।
ऐसा नही कि इस बीच स्त्री के खिलाफ कहीं हिंसा नही घटी । कुछ दर्ज हुईं , बहुत सी छूट गयीं , बहुत सी छिपा दी गयीं । बार -बार यह बर्बर सलूक सामूहिक अवचेतन में बसी कुंठाएँ सामने लाता है । व्यापक प्रश्न उठता है कि स्त्री भोगी जाने वाली चीज़ है , एक चॉकलेट जिसे खाया जा सके, खाओ जहाँ और जैसे भी मिले -क्या कभी पुरुष-अवचेतन से बाहर होगी ?
क्या सभ्य से सभ्य पुरुष भी, अवसर और एकांत मिल जाए तो महिला साथी ,मित्र से सामीप्य नही चाहता ? शायद मौका पडने पर बहुत कम पुरुष अपने शील {?}की रक्षा के बारे में सोचते होंगे {?}रुकते होंगे तो दिल पर पत्थर रख कर ।
कहीं एक कहावत पढी थी -
"give a man a free hand and he'll run it all over you "

यह सही है कि सब पुरुष हिंसक नही होते , लेकिन ज़्यादातर होते हैं कर्मों मे न सही अपनी मानसिकता में ।अपनी स्त्री कुलीग के लिए पुरुष अपने सहज वार्तालाप में जो कुछ डिस्कस करते हैं वे आप सब बेहतर जानते हैं ।
स्त्री के सामने पडते ही उसे "ऐज़ चैलेंज" लेने की मानसिकता से पुरुष को छुटकारा नही चाहिये ?

9 comments:

अजय कुमार झा said...

main maantaa hoon ki aapkee baatein sachee hain magar kya sirf aur sirf purushon kaa hee dosh hai har baar har jagah. mujhe nahin lagtaa ki meri maataa jee ke jamaane mein bhee aisaa hotaa tha , to fir kuchh to aisaa hai jo ye badhaa raha hai.kya, ye sochne aur samajhne kee baat hai.

Ghost Buster said...

सौ फीसदी सच बात. इस रोग की जड़ें बहुत गहरी हैं. समय लगेगा. २५ वर्ष और लग सकते हैं मगर बदलाव जरूर आएगा.

K. Krishan Anand said...

पच्चीस बरस बाद हालात बदलेंगे जरूर पर रहेगा सबकुछ वैसा ही, बस भूमिकाएं बदल जाएंगी तब ये कविता महिलाएं नही पुरुष कह रहे होंगे। जरा गंदी लड़की के ब्लॉग पर उससे मिलिए बदलाव साफ दिखेगा तो ज्यादा फिक्र की बात नहीं है कभी गाड़ी पर नाव कभी नाव पर गाड़ी

सुजाता said...

घोस्ट बस्टर जी ,
क्या वाकई 25 साल और ....? आपको यकीन है ? या 250 साल ....या कभी नही ....
कृष्ण जी ,
"ज़्यादा फिक्र के बात?" कैसे नही है । यहाँ रोल- रिवर्सल का मुद्दा नही है । क्या गन्दे होने की होड करने से किसी को सम्मान और समानता नही मिलने वाली।अव्वल तो ऐसा हो ही नही सकता लेकिन कल स्त्री बलात्कारी हो जाए तो मतलब समस्या खत्म माने ...?

Ghost Buster said...

सुजाता जी, आपकी कटुता समझ में आती है. कृप्या शब्दों को मत पकड़ें. घुमावदार साहित्यिक भाषा में न लिख पाने की हमारी अक्षमता को क्षमा करें.

Arun Aditya said...

सुजाता जी आपकी बात सही है। स्त्री विहीन महफिलों में अपने कई दोस्तों को ऐसी भाषा में बात करते देखा है, जिसे स्त्री के प्रति मानसिक हिंसा ही कहा जा सकता है। किसी स्त्री के आ जाते ही ऐसे लोगों की भाषा बिल्कुल बदल जाती है और वे स्त्री की गरिमा के सबसे बड़े हिमायती बन जाते हैं। 'सबसे बड़ा हिमायती कौन' के चक्कर में दोस्तों में विवाद होते भी देखे हैं। आपने भी देखे होंगे।

अजित वडनेरकर said...

सहमत है जी और परेशान भी ...कब तक आखिर , आखिर कब तक...

रिपुदमन पचौरी said...

ह्ह्म्म्म्म बात तो सही है ........

Hindia said...

poori duniya men jitnee bhi mahilaon ke sath balatkar huye, chhedkhani,katl, maansik pareshani huyee unki tulna is se karkar to dekhen ke dharti par sabse zyada katl aadmiyon ke hi huye hain, uska zimmedar bhi aadmi hai, aadmi, ladkon ko kya dar nahin lagta raat ko bahar nikalne men, to kya ab aadmi v/s aadmi ki bahas nahin ho jaye. sab ko dosh dena sahi nahin hai. kyonki aaj har aadmi kisi se darta hai to wo dusare aadmi se, balki aurton ki tulna men aadmi ko jyada darkar soch samajhkar rahna hota hai, kya aapke pati, yaa aapka beta bhai aisi kisi ladki kee majboori kaa fayda uthenge, aise hi sekdon buri aurton aur ladkiyon ki wajah se ham apnee maa-bahan par shak nahin karte jaise ki aap puri purush ko rakshas kahdete hain, zara sochiye ek 10 sal ka ladka jab aisi khabren tv par sunta hai, paper men padta hai, yaa aurton ke muh se sunta hai to usko ye pata nahin hota kya? ki wo bhi ladka hai, par uske bare men abhi nahin to kabhi jab wo bada ho jayega isi tarah ke vichar bana liye jayenge. is bare men sochte huye aapke bacche ki dhadkanen mahsus karna, apko doori par bhi sunai degi. aur wo nazar jhukaakar faili bhoh kiye muh chhupane ki koshish zaroor karega. agar aap jaan payen ki uske man men kaise kaise vichar aate hain yeh sab jankar tao shayad agar aap ladka-ladki men farak naa karen to aapko uske andar chalte vicharon ke tufan ko jaakar aapke aankhon men aansoo aa jayenge

maaf kijiyega likhna nahin aata mujhe.

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