Wednesday, March 19, 2008

रेनू की कहानी


वन्दना पांडेय ने अपनी 75 वर्षीय माताजी -शकुंतला दुबे का एक संस्मरण चोखेर बाली में भेजा है । वन्दना से परिचित तो नही हूँ लेकिन स्त्री के अनुभवों की कम से कम कोई एक कडी उन्हें परिचय की सीमाओं और ज़रूरतों से परे कर देती है । एक अनुभव संसार ऐसा है जहाँ कोई स्त्री एक दूसरे से अपरिचित नही है , फिर चाहे बीच में आयु के अंतराल हों या शिक्षा के या सामाजिक प्रतिष्ठा के ।
शकुंतला जी के शब्दों में उनकी बहन रेनु की इस स्मृति को दो भागों में प्रस्तुत कर रहे हैं --
रेनु की कहानी { पहला भाग }

माँ अपनी ढलती उम्र में जन्मी सन्तान रेनू के भविष्य को लेकर काफ़ी चिन्तित रहा करती थीं। कौन इसे पढ़ाएगा, इसकी शादी करेगा? चाचा, यानी मेरे पिता, जिन्हें हम सारे बच्चे चाचा कहा करते थे, इस बात को लेकर अधिक चिन्ता नहीं करते थे।
“इतनी चिन्ता मत करो बच्ची के लिये। भगवान सबके लिये इन्तज़ाम करता है। मैं नहीं रहूँगा तो इसके भाई इसकी ज़िम्मेदारी उठाएंगे। पिता न हो तो बड़ा भाई ही पिता समान होता है,” वह कहते थे।
जिस बात का माँ को डर था वही हुआ। रेनू जब तेरह बरस की थी, हमारे पिता का देहान्त हो गया। रेनू बहुत दुखी थी और अपने भविष्य को लेकर चिन्तित भी। भैया ने उसे बुला कर कहा, “तुम्हें चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। चाचा चले गये, उनकी कमी हमेशा रहेगी पर मैं अब भी तुम्हारे साथ हूँ। तुम्हारी सारी ज़िम्मेदारी अब मुझ पर है। किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो सीधे मुझसे कहना। तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई में कोई बाधा नहीं आयेगी।”
चाचा का कहना भी सच हुआ था। भैया ने रेनू के पिता का स्थान ले लिया था। एक बार माँ ने किसी बात पर रेनू को एक तमाचा लगा दिया। रेनू रोती हुई भैया के पास पहुँची। भैया ने उसे चुप कराया। शाम को माँ से बोले, “अगर कोई रेनू को मारता है तो वह मार रेनू को नहीं मुझे लगती है।”
माँ ने फ़िर रेनू को कभी नहीं मारा।
रेनू कुशाग्रबुद्धि थी। उसने अयोध्या की तुलसी कन्या पाठशाला से अच्छे अंकों से हाईस्कूल पास कर लिया और फ़ैज़ाबाद के एक कालेज में इंटर में प्रवेश ले लिया। उस समय तक हमारे परिवार में लड़कियों की शिक्षा को लेकर चेतना आ गई थी और उन्हें पढ़ने के लिये पास के शहर में भेजा जाने लगा था। भैया अब रेनू के लिये अच्छे घर-वर की तलाश में जुट गये थे। थी तो वह सिर्फ़ सत्रह साल की, पर भैया के लिये उसकी शादी एक बहुत बडी़ ज़िम्मेदारी थी। भैया ने हम सबकी सहमति लेकर संपन्न घर के एक सुन्दर, सुसंस्कृत वकील लड़के, सुरेन्द्र से उसकी शादी तय कर दी। सुरेन्द्र उस समय लखनऊ में आगे की पढ़ाई कर रहे थे।
रेनू की शादी सरयूबाग से धूम-धाम से सम्पन्न हुई। सुरेन्द्र विधवा माँ की इकलौती संतान थे। उनका परिवार एक सम्मिलित परिवार था। घर के मुखिया उनके चाचा थे जो गोरखपुर विश्वविद्यालय में कानून विभाग में डी़न के पद पर थे। उन्होंने फ़ैसला किया कि रेनू दो साल उनके यहाँ रह कर बी ए की पढ़ाई करेगी। मैं खुश थी कि रेनू अब मेरे ही शहर में आ गई थी। अक्सर वह छुट्टी के दिन मेरे घर आ जाती।
रेनू की ससुराल में पहले तो सब कुछ ठीक रहा, पर धीरे- धीरे सम्बन्धों में कड़वाहट घुलने लगी। कभी-कभी वह अपनी उलझनें मुझसे कहा करती थी। खैर, उसकी बी ए की पढ़ाई समाप्त हुई और वह अपने पति के पास लखनऊ चली गई। एम ए की परीक्षा उसने प्राइवेट विद्यार्थी के रूप में उत्तीर्ण की। इस बीच उसकी गोद में उसका पहला बेटा पिन्टू आ गया था। फ़िर उसकी दो बेटियाँ रिप्पल और रोज़ी आईं और आखिर में सबसे छोटा बेटा मन्टू। वह घर की ज़िम्मेदारियों मे पूरी तरह रम गयी थी। सुरेन्द्र सीतापुर में वकालत करने लगे थे।
रेनू की साहित्य मे बचपन से रुचि थी। जब वह इंटर में थी, तबसे कहानियाँ लिखती थी। कालेज की पत्रिका में उसकी कहानियाँ छ्पा करती थीं। यह शौक उसकी शादी के बाद भी बरकरार रहा। अब उसकी रचनाओं में ज्यादा परिपक्वता आ गई थी और वह उपन्यासों के कथानक भी ढूँढ़ने लगी थी। एक बार मैंने उससे पूछा कि वह नये- नये कथानक कैसे ढूँढ़ लेती है तो वह बोली,
“दीदी, कहानियाँ तो अपने आस-पास ही बिखरी हैं। हर ज़िन्दगी एक कहानी है, हर परिवार एक उपन्यास। शब्दों के कलेवर में मैं उन्हें ही मूर्त कर देती हूँ। हर रचना का आधार तो जीवन ही है। इस कैनवास के बिना तस्वीर थोड़े ही बनाई जा सकती है?”

शेष अगली पोस्ट में ......

2 comments:

अनूप भार्गव said...

मजाक नहीं कर रहा हूँ लेकिन अब तक की कहानी में सिर्फ़ एक बात गलत लगी ।
रेनू के चार बच्चे क्यो ?

भाग दो का इंतज़ार रहेगा ।

Vandana Pandey said...

रेनू का जन्म पिछली सदी के पाँचवें दशक में हुआ था । सन्तानों की संख्या क्या हो यह निर्णय लेने का अधिकार उस पीढी की औरतों को नहीं दिया गया था। हो सकता है यह विधवा सास का आग्रह रहा हो कि उनके इकलौते पुत्र की ढेर सारी संतानें हों। या फ़िर पति ही चाहते रहे हों कि उनके दो बेटे हों। मेरी दादी अक्सर एक कहावत दुहराया करती थीं- एक आँख न आँख कहाई,
एक पूत न पूत कहाई।

-वन्दना

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