Thursday, March 20, 2008

रेनू की कहानी

रेनू की कहानी{पहला भाग }
भाग-2
रेनू की कहानियाँ पत्रिकाओं में छपने लगीं और पसन्द भी की जाने लगीं। उसे पाठकों के सराहना भरे पत्र मिलने लगे। संपादक उससे नई कहानियों के लिये आग्रह करने लगे। रेनू की रचनात्मकता को एक ठोस रूप मिलने लगा थ। पर रेनू की इस रुचि ने उसके लिये बहुत बड़ा संकट खडा़ कर दिया। उसके पति सुरेन्द्र उसकी बुद्धिजीवी रुचि को, उसकी सफलता को सहन नहीं कर सके। वह चाहते थे कि रेनू लिखना बन्द कर दे, पर रेनू इस अन्यायपूर्ण आदेश को मानने के लिये तैयार नहीं हुई। पति के अहंकार को ठेस पहुँची तो वह बदला लेने पर उतर आये। उन्होंने रेनू को घर का खर्च देना बन्द कर दिया। रेनू के घर में अनाज गाँव की खेती-बारी से आ जाता था। बाकी ज़रूरतों के लिये रेनू ट्यूशन करने लगी। कुछ पारिश्रमिक रचनाओं का भी मिल जाता था। बच्चों की पढ़ाई, कपड़े और रोज़ के खर्च, सबका इन्तज़ाम अब उसे ही करना था।
सुरेन्द्र रेनू को इस तरह नहीं झु्का पाये तो और भी गिरी हुई हरकतों पर उतर आये। उसे बात- बात पर मारने-पीटने लगे। यही नहीं, उसके चरित्र पर कई तरह के लांछन भी लगाने लगे। उन्होंने रेनू का घर से बाहर निकलना, लोगों से मिलना-जुलना बन्द कर दिया। रेनू की ज़िन्दगी दिन पर दिन घुटन भरी होती जा रही थी। बेचारी रेनू...घर की सबसे छोटी बेटी, सबकी दुलारी और अब इस तरह की प्रताड़ना भरी ज़िन्दगी बिता रही थी।
भैया रेनू की यह हालत देख कर बहुत दुखी थे। अपने हिसाब से उन्होंने बहुत देख-भाल कर रेनू की अच्छी शादी की थी लेकिन आज वही शादी रेनू को तबाह कर रही थी। इस बीच सुरेन्द्र के परिवार के मुखिया, उनके चाचाजी का असमय देहान्त हो गया था इसलिये उन पर किसी का कोई अंकुश भी नही रहा था। हम लोग निरुपाय रेनू की दुर्दशा देख रहे थे। रेनू कई बार इतनी परेशान हो जाती कि उसके मन में अपने को खत्म करने का विचार आता, पर बच्चों का मोह उसे जीवन से बांधे हुए था। सुरेन्द्र ने तो पहले ही सारी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से हाथ खींच रखा था।
उसकी इसी मनस्थिति में भैया रेनू को तीनों छोटे बच्चों के साथ अपने पास सरयूबाग ले आये। मैं उससे मिलने गयी तो उसकी सब व्यथा कथा सुनी। समझ में नहीं आया कि कोई इन्सान अपने ही बीवी-बच्चों के प्रति इतना क्रूर कैसे हो सकता है। मुझे लगा कि सुरेन्द्र मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं। पर रेनू सोचती थी कि यह सिर्फ़ उनका मेल ईगो ’ है जो उसे त्रस्त देख कर सन्तुष्ट होता है।
रेनू ने तय किया कि अब वह मायके ही रहेगी। पढ़ी- लिखी है, अपना और अपने बच्चों का भरण पोषण करने की सामर्थ्य उसमें है। वह एक कोचिंग इंस्टिट्यूट खोलेगी और उससे अपनी जीविका चलायेगी। भैया उसकी योजना से सहमत थे, पर उनकी राय थी कि बच्चों की ज़िम्मेदारी सुरेन्द्र को ही सँभालनी चाहिये, आखिर वे बच्चे सुरेन्द्र के भी तो थे।
भैया ने सबसे छोटे मंटू को रेनू के पास छोड़ा और दोनों बेटियों को सुरेन्द्र के पास पहुँचा आए। बड़ा बेटा पिंटू वहाँ पहले से था ही। सुरेन्द्र ने भैया से कहा कि वह अपने बच्चों को सँभाल लेंगे।
पर एक सप्ताह के बाद ही सुरेन्द्र बच्चों सहित सरयूबाग में दिखाई दिये। कहना आसान होता है, पर बच्चों की ज़िम्मेदारी बड़े धैर्य और जीवट वाले ही उठा सकते हैं। सुरेन्द्र अकेले बच्चों को नहीं सँभाल सके। उन्होंने अयोध्या आकर बहुत आग्रह और मान-मनुहार से रेनू को मनाया। बच्चों का मोह आखिर रेनू को वापस उसके पति के घर खींच ले गया। कुछ दिन सब कुछ ठीक चला, पर आखिर किसी का स्वभाव कैसे बदल सकता है? सुरेन्द्र ने फ़िर रेनू को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। फ़र्क बस इतना था कि यह प्रताड़ना अब शब्दों तक सीमित थी। वह रेनू पर हाथ नहीं उठाते थे। रेनू ने इस अपमान को अपनी नियति मान लिया।
समय बीतता गया। बच्चे बड़े हो चले थे। पढ़ने में अच्छे थे। इस माहौल में भी पढ़ाई में अच्छे परिणाम लाते रहे। पिंटू भारतीय सेना में अफ़सर बन गया। रिप्पल बी ए में पढ़ने लगी थी और रोज़ी बारहवीं में थी। पिंटू की शादी उसकी पसन्द की लड़की से तय हो गई। रेनू ने सब रिश्तेदारों को बुलाया और बड़े शौक से बेटे की शादी की। जिस दिन पिंटू की बारात गई, घर में रात को खूब नाच-गाना हुआ। हमेशा की तरह रेनू गाने-बजाने में सबसे आगे रही, उसकी आवाज़ सबसे बुलंद थी। उसे खुश देख कर हमें बहुत अच्छा लगा। लगा कि उसकी वर्षों की तपस्या सफल हो गई है। सुरेन्द्र बाबू का व्यवहार भी रेनू के प्रति ठीक लगा। हमें लगा जैसे बहुत दिन बाद उसकी गृहस्थी की गाडी़ पटरी पर आई है।
अगले दिन रेनू हम लोगों को नैमिषारण्य घुमाने ले गई जहाँ एक मंदिर था। हम वहाँ बस से और फ़िर एक विचित्र ठेलेनुमा सवारी- खड़खड़िया-पर बैठ कर गए। हमने मंदिर में दर्शन किये और साथ के सरोवर में स्नान किया। हम लोगों को इस यात्रा में बहुत आनंद आया। रेनू का उत्साह तो देखते ही बनता था। उसके घर का पहला समारोह था और वह उसमें और अपने अतिथियों की देख-भाल में कोई कमी नहीं रहने देना चाहती थी। यह यात्रा हमारे लिये अविस्मरणीय थी। जितना आनंद घूमने में आया था, उतना ही परिवार के लोगों के साथ समय बिताने में। तब नहीं मालूम था कि हम रेनू के साथ यह आखिरी खुशी के दिन बिता रहे हैं।
पिंटू की शादी को बमुश्किल ढ़ाई महीने गुज़रे होंगे। एक दिन खबर मिली कि पिंटू के साथ कुछ कहा-सुनी के बाद रेनू घर छोड़ कर चली गई है। न वह सरयूबाग पहुँची, न किसी बहन के यहाँ, न और किसी रिश्तेदार के यहाँ। सब सोच रहे थे कि नाराज़ हो कर गई है, गुस्सा शांत होगा तो लौट आयेगी। कितने दिन अपनी बेटियों और दस साल के छोटे बेटे को छोड़ कर रह पायेगी? उसकी ममता उसे वापस खींच लायेगी। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हम समझ नहीं पा रहे थे कि जिस रेनू ने बच्चों की खातिर जीवन के सभी झंझावातों को धैर्य से झेल लिया था, वह अब कैसे विचलित हो गयी? पर शायद ऐसा ही हुआ। रेनू ने बच्चों की खातिर सब दुख सह लिये थे, यह सोच कर कि पति न सही, बच्चे उसके संघर्ष को, उसकी ज़िन्दगी से हुई जद्दोजहद को समझते हैं। जिस बेटे की आँखों के सामने उसने यह लड़ाई लडी़ थी, उसकी उपेक्षा ने शायद उसका दिल तोड़ दिया और वह सब माया मोह के बन्धनों को पीछे छोड़ कर आगे कहीं निकल गई, सबसे दूर।
छः महीने बाद सुरेन्द्र की गहरी बीमारी की खबर मिली तो हम उनसे मिलने सीतापुर गये। रेनू के बिना घर कितना सूना लग रहा था, कितना विषादग्रस्त। विश्वास करना मुश्किल था कि हमने इसी घर में कुछ महीने पहले इतनी खुशी के पल देखे थे। सुरेन्द्र हमें देख कर रोने लगे, “ रेनू एक बार आ जाती तो मैं उससे अपने गुनाहों की माफ़ी माँग लेता।”
उदास रिप्पल ने मुझसे कहा, “मम्मी ने इस घर में बहुत दुख देखे। वह जहाँ भी होंगी, इससे तो ज्यादा सुख से होंगी।”
सुरेन्द्र के दिल की आवाज़ रेनू तक नहीं पहुँची। कुछ दिन बाद पश्चात्ताप का बोझ अपनी आत्मा पर लिये हुए वह परलोक सिधार गए।
रेनू को गए बारह साल बीत गए हैं। कभी- कभी लगता है कि वह अब इस दुनिया में ही नहीं है। होती, तो क्या इतने सालों में कभी उसे अपने बच्चों की, अपने भाई बहनों की याद नहीं आती? क्या इतना कुछ लिख डालने वाली रेनू एक चिट्ठी भी
नहीं लिख पाती? पर उम्मीद की एक हल्की सी रेखा है जो अबतक कायम है। शायद हमारी छोटी सी बहन कभी वापस आ जाए....
-शकुन्तला दूबे {मां का जन्म सन १९३३ में अयोध्या के एक गाँव में हुआ था। अपने परिवार द्वारा चलाये जा रहे
स्कूल में पाँचवीं तक पढाई हुई फ़िर ’सयानी’ हो जाने के कारण घर बैठा दिया गया। दृढ
इच्छा शक्ति के चलते घरेलू काम काज को निबटाने के साथ-साथ दसवीं की परीक्षा प्राइवेट
पास कर ली, फ़िर शादी हो गई। चार बच्चों को पाल पोस कर एक बार फ़िर किताबें पकडीं
और इस बार एम ए (समाज शास्त्र) तक पढ गईं। एक निहायत कंज़र्वेटिव माहौल में पले बढे
और ब्याहे जाने के बावज़ूद हर विषय पर स्वतन्त्र विचार रखती हैं, राजनीति पर भी।
लिखने पढने का शौक बचपन से रहा है। बहुत सी कविताएं कहानियां लिखीं, कुछ स्थानीय
पत्रिकाओं- अखबार में छ्पीं भी, पर ज्यादातर उनका लेखन स्वांतः सुखाय ही रहा। पिछ्ले
चार-पाँच साल से घुटनों के दर्द की वजह से ज़्यादा चल फ़िर नहीं सकतीं तो अपनी
रचनात्मकता को जाडे में स्वेटर बुन कर और गर्मी में लिख कर संतुष्ट करती हैं। इन सालों में
अपने शुरू के पैंतीस साल के जीवन की कहानी एक आत्म कथा के रूप में लिख चुकी हैं। रेनू मौसी
की कहानी उस का ही एक भाग है।---Vandana Pandey}

3 comments:

अनूप भार्गव said...

इस में कोई दो राय नहीं हो सकती कि :
१. रेनू की कहानी बहुत करुण और दर्दनाक है ।
२. सुरेन्द्र का व्यवहार बहुत ही ’गैरजिम्मेदाराना’ था ।

ये भी माना जा सकता है कि :
१. सुरेन्द्र की तरह के आदमी शायद पहले अधिक हों लेकिन अभी भी बड़ी तादाद में समाज में विद्यमान हैं ।

लेकिन रेनू की कहानी पर आंसू बहाने और सुरेन्द्र व समूचे पुरुष वर्ग और समाज को धिक्कारने की बजाय क्या हम चर्चा को इस तरफ़ मोड़ सकते हैं कि :

१. दी गई परिस्थितियों में ’रेनू’ क्या कुछ ऐसा कर सकती थी कि कहानी का अन्त कुछ और होता ? रेनू के गायब हो जाने को समझा जा सकता है सराहा नहीं । यहां जो ’odds' रेनू के खिलाफ़ थे उन्हें ध्यान में रखने के साथ साथ यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि रेनू को पढने का मौका मिला था और वह सोचने की क्षमता रखती थी। यह बिल्कुल असंभव है हम अपने आप को ’रेनू’ की जगह रख सकें (जैसे अंग्रेजी में कहते है कि put ourselves in her shoes)लेकिन फ़िर भी कोशिश कर के देखें ।
२. रेनू को आज के परिपेक्ष में रख कर देखें कि क्या बेह्तर हो सकता है ? रेनू स्वयं क्या कर सकती है ? हम रेनू की क्या सहायता कर सकते है?

जो गलत है सिर्फ़ उस की भर्त्सना करने की बजाय उस ’गलत’ को समझने और उसे सुधारने की लिये क्या कदम उठाए जा सकते हैं , इस पर चर्चा हो तो अधिक सार्थक होगी ।

पुनश्च :
यदि मेरी टिप्पणी से इस कहानी के वास्तविक पात्रो को चोट पहुँची हो तो अग्रिम क्षमायाचना चाह्ता हूँ लेकिन सार्वजनिक मंच पर आ जाने के बाद ’कहानी’ या उस पर की गई टिप्पणी निजी नहीं रह जाती । भावनाओं से उठ कर तथ्यों पर विचार की गुज़ारिश है।

डा. अमर कुमार said...

एक नितांत कारूणिक सत्य का निरूपण करने में आप सफ़ल हैं ।किंतु क्या एक बात पूछ सकता हूँ,इस कथा से यह निष्कर्ष तो निकला ही नहीं कि सभी पुरुष ऎसे ही होते हैं ?एक घर के टूटने में स्त्री का अहं भी आड़े न आता हो,ऎसा मैंने तो देखा नहींआग्रह है कि एकांगी चित्रण से बचें ।एक स्वस्थ संवाद की पहल करके देखें कि कितने जन आपके साथ स्वतः जुड़ जाते हैं !

सुशील छौक्कर said...

नारी तेरी यही कहानी, जब तक ना बदले समाज की सोच पुरानी.

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