Friday, March 21, 2008

आस पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।

कई साल पहले एक फ़िल्म देखी थी, फ़िज़ा। देखने के बाद एक बात बहुत देर तक मन को कुरेदती रही। एक विधवा माँ, जो सालों और बहुत कोशिशों बाद अपने खोए बेटे को वापस पाती है, बेटे को आतंकवादियों के हाथों एक बार फ़िर खो देने के बाद निराश हो कर आत्महत्या कर लेती है। वह एक बार भी नहीं सोचती कि उसके जाने के बाद उसकी युवा अविवाहित बेटी पर क्या बीतेगी। क्या उसका बेटा ही उसके जीने की वजह था? बेटी की खुशियों का कोई मूल्य नहीं था उसकी नज़र में?
रेनू की कहानी पढती हूँ तो फ़िर वह सवाल मन में उठता है। पति और बडे बेटे के तिरस्कारपूर्ण रवैये के कारण माँ को क्या अपनी किशोर वय की निर्दोष बेटियों को भी भूल जाना चाहिये था? अपने कठिन जीवन से पलायन करके अपने बाकी बच्चों को अपने वात्स्ल्य से, अपने सहारे से वंचित कर देना, क्या यह स्वार्थपूर्ण आ़चरण नहीं था?
या गहरी चोट खाई हुई स्त्री के जीवन में एक कमज़ोर क्षण होता है जिसमें वह अपनी तकलीफ़ के आगे कुछ सोच ही नहीं पाती।
कहीं ऐसा तो नहीं कि जो हिम्मत परिस्थितियों से लडने के लिए स्त्री में युवावस्था में होती है, वह मध्य वय तक आते आते चुक जाती है और उसे अपनी लडाई ’गिव अप’ कर देना ज़्यादा आसान लगता है।
पता नहीं.. अपने को किसी और के स्थान पर रख कर सोचना आसान नहीं होता। फ़िर भी सोचती हूँ कि किसी भी स्थिति में अपने जीवन को इतना सस्ता नहीं करना चाहिए कि किसी और की गलती की वजह से उसे खत्म कर दिया जाए। अपने जीने की कोई नई वजह ढूढना इतना भी मुश्किल नहीं होता। अपनी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ लिख रही हूँ-

आस पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।
अनजान निर्जन पथ अंधेरी रात है,
एक भी आकाश में तारा नहीं,
दूर तक बस तिमिर का ही साथ है,
मुझको पता है पर, कि उस ओझल क्षितिज पर,
स्वर्ण सी एक ज्योति की रेखा खिंची है
आश पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।

क्लांत आँखें और बोझिल पाँव हैं,
थका-थका तन, बुझा हुआ मन,
दूर बहुत लगता, अपना घर-गाँव है,
पर कह रहा जैसे कोई कि उस छोर पर,
राह मेरी देखती मंज़िल खडी है
आस पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।

10 comments:

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

वंदना जी , ये सच्चाई बहुत कड़वी है पर सच है। औरत अपने पति से सब सह लेती है लेकि जब यही प्रताड़ना उसे अपने बच्चों से मिलती है तो वह सह नहीं पाती और किसी कमजोर क्षण ऐसा ही कोई कदम उठा लेती है।

neelima garg said...

rightly said ...being optimist is best thing....and wish u all a very HAPPY HOLI ...

स्वप्नदर्शी said...

रेनु की कहानी पढ्कर ये समझ नही आता कि सिर्फ लडके की शादी के बाद ही झगडा इतना क्यो बढा? क्या ये बहु की वजह से हुया.

ये सच है कि हिन्दुस्तानी मा-बाप अपने बच्चो के लिये एक तरह से अपनी प्राथमिकताये खत्म कर देते है.
उतना ही सच ये भी है कि वो अपने बच्चो को कई बार निजी सम्म्पति से ज्यादा नही समझते, और बहुतायत मे उनके जीवन के फैसले लेने का हक़ अपने पास रखते है. और ये सिर्फ अपने बच्चो तक सीमीत नही रहता, ये बच्चो के जीवनसाथी, नाती-पोतो तक खत्म नही होता.

रेनु जैसी औरते हज़ारो मर्तबा, अपने दुख और अपने संघर्ष का ठीकरा अपनी बहुओ के सर फ़ोडती है. और बेटे की शादी मे चाहे जितना नाच ले , घर मे आयी नयी बहु के साथ इतनी विनम्रता और सभ्य व्यहार भी नही दिखाती जितना एक पडोसी या अंजान व्यक्ति के साथ.

मेरे ख्याल से औरतो को इस सबसे उपर सोचना चाहिये. अपने बच्चो को पालने मे हर मा-बाप मेहनत करते है. परंतु इसे वो एंजोय भी करते है. अगर बेबसी और अनिर्नय मे भी बच्चे पैदा हुये हो, तब भी, एक पिछडे समाज मे भी, पति-पत्नी के सम्बन्ध मे स्थायित्व आता है, बच्चे जीने की आस बनते है, और घर-बाहर हर जगह हाथ् भी बटाते है. मा होने का दम्भ भी औरते भरती है?
अगर बच्चे न होते तो बांझ्पन और शादी का टूटना भी झेलना पड्ता. भले ही रेनु ने कितने भी दुख झेले ये सब तो उसे मिला ही.

इसका अहसान किसी पर नही जताना चाहिये. अपनी संतान पर भी नही. और खासकर बहु पर तो बिल्कुल नही.

सुजाता said...

वन्दना , आपका प्रश्न और चिंता वाजिब है - क्यो स्त्री को अपना जीवन इतना सस्ता मानना चाहिये ,क्यों उसे परिवार संस्था के ढहते ही सब कुछ खत्म होता नज़र आता है । एक शादी ,एक तलाक ,एक बलात्कार पर ज़िन्दगी खत्म नही होती ,हमे हमारी बेटियों को समझाना होगा ।
स्वप्न्दर्शी जी की बात से भी सहमत हूँ । वह एक दूसरा पहलू दिखाती है ।
अच्छा है कि इस तरह के प्रश्न लगातार उठाये जा रहे है।

आर. अनुराधा said...

'जो हिम्मत परिस्थितियों से लडने के लिए स्त्री में युवावस्था में होती है, वह मध्य वय तक आते आते चुक जाती है'- मुझे लगता है रेनू की कहानी के ट्रैजिक अंत की असल वजह यही है। कम उम्र में सकारात्मक सोचना, जूझना और डटे रहना आसान होता है। लेकिन लगातार झेलते रहने की प्रक्रिया किसी के मन पर लगातार असर करती रहती है।

रेनू का पलायन अचानक हुई घटना नहीं लगती। दरअसल उसने भरसक किया अपने परिवार के लिए, बुरा लगने वाली स्थितियों में भी। बाहर से वह खुश दिखती रही पर अंदर की चोटें ढक कर। लेकिन फिर सहनशीलता की हद पर बैठी रेनू को कोई आखिरी झटका लगा हो और उसने तय कर लिया हो कि अब और दिखावा वह बर्दाश्त नहीं कर सकती। तब उसने अपने मन का रास्ता चुनने की कोशिश की। और मुझे लगता है कि अगर किसी को लगे कि जीवन में सब करके देख लिया फिर भी खुशी नहीं मिलती तो यह रास्ता भी आजमा कर देखना चाहिए। क्यों व्यक्ति हर समय किसी न किसी और के लिए जीता रहे, खास तौर पर महिलाओं के लिए तो परहित के दायरे से बाहर सोचने की भी आजादी/फुर्सत/मोहलत नहीं होती। ऐसे में सारे बंधन तोड़ कर विद्रोह करने की स्थिति भी किसी के लिए आ जाए तो आश्चर्य नहीं। शायह यही रेनू के साथ हुआ।

समयचक्र said...

बहुत बढ़िया होली पर्व की आपको रंगीन हार्दिक शुभकामना

KAMLABHANDARI said...

ye such hai ki cahe film ho ya hakikat aurat ko wo jagha nahi mil pai hia jiski wo hakdar hai.aaj bhi caahe beta kitna hi nikkama kyu na ho parivar ke log phir bhi bete ko jyada mahutva dete hai.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बहुत सधी हुई शैली में
सुविचारित विषय पर
प्रवाह-प्रभाव में दूर तक ले चलने वाले आलेख .
सोच को झकझोरता, समझ को दुरुस्त करता हुआ
जो है उससे बेहतर को पुकारता अंतरजाल पृष्ठ !

बधाई.

अनूप भार्गव said...

सुन्दर, प्रभावशाली और सकारात्मक कविता के लिये बधाई ....

Vandana Pandey said...

स्वप्नदर्शी जी की बात बहुत मामलों में सच होती देखी है। पर इस इल्ज़ाम के भागी पुरुष भी लगभग बराबर से हैं। संतान के जीवन को खुद जीना चाहने वाले माता पिताओं की क्मी नहीं है हमारे समाज में।

सभी पाठकों को उत्साह वर्धन के लिये धन्यवाद।

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