Sunday, March 23, 2008

हमें बताया गया ............




हिमांशी खरे

हमें बताया गया
कि स्त्री प्रेम की देवी होती है.
पर जब हमने
प्रेम किया तो
हमें नाक कटाऊ कहा गया
हमें बताया गया
कि स्त्री में भीषण कामाग्नि होती है
पर हमने देखा
कि स्त्री ही
हमेशा बलात्कार की शिकार होती है.
हमें बताया गया
कि स्त्री नरक में ले जाती है
पर हमने देखा कि
नरक में जाने की इच्छा रखने वालों की तादाद
हद से ज्यादा है.
इतनी ज्यादा
कि नरक में जगह कम पड़ जाए.
हमारी देह-
विमर्श का सदाबहार विषय है.
हम प्रेम करें
तो कामुक कहलाती हैं
और यदि
अपनी इच्छाओं का दमन करती रहें
तो हम आदर्श होती हैं
हमारी ज़रूरतें
बस भरपेट रोटी
और तन भर कपडा मानी जाती है
इससे ज्यादा की मांग करना
हमारी खुदगर्जी होती है
" औरत को क्या चाहिए-
पेट की संतुष्टि
और पेट के नीचे की संतुष्टि "
ये फतवा जारी करने वाले ने
हमारे शोषण
और
हमारे साथ होने वाले बलात्कार का
अधिकार-पत्र जारी कर दिया है.

*****
हिमांशी जी की यह कविता यहाँ भेजने के लिए अनूप भार्गव जी का धन्यवाद ।
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6 comments:

विनीत खरे said...

हिमांशी जी, आपने जो सच्ची बात कविता में बया की है वह दिल को छू जाती है

विनीत कुमार said...

shuru me mujse yae samajne me dhokha hua tha ki pada-likha purush shaayad isse kuch alag soachta bhi hai, sochta bhi hai lekin isse bhi khatarnaak ki aap likhte rahiyae kuch ahi honewala, kudrat ne jo kar diya so kar diya, isme hum aur aap soachkar bhi kya kar sakte hai. inme kai aise bhi hai jinke soacne se waakai kuch ho sakta hai

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

" Women on a pedestal
Or
trying to stand up ?

Activists in the field say the position of women in India is another problem.
Society puts them on a pedestal as mothers and wives, but doesn't allow for their protection from domestic abuse.

Voices from the Silent Zone pinpoints another problem facing victims of abuse in India -
the complete absence of any structure outside the family to help with abuse."
और नारी की मनोदशा बखूबी बयान की है कविता में --
अनूप भाई ने सही कविता भेजी
-- लावन्या

सुनीता शानू said...

हिमांशी जी आपकी कविता आक्रोश और प्रश्नो की बौछार कर रही है उस समाज पर जो आज भी औरत को अपने पैर की जूती समझ रहा है...यह भूल जाता है कि वह एक औरत ही है जिसने माँ बनकर उसे जन्म दिया और पत्नी बन कर उसके वंश को बढ़ाया...हर हाल में औरत ही मर-मर कर जीती है...फ़िर भी हर इतने सारे इल्जाम? सचमुच कविता एक ऎसे विषय की तरफ़ ले जाती है जो आज बहुत जरूरी हो गया है,जो औरत जागरूक है वह अपने अधिकारों के लिये लड़ती है मगर एक आम औरत आज भी वैसी ही है जैसी इस कविता की नायिका है...जाने कब तक पतन होता रहेगा...और कब वो अपने अधिकारों के लिये आवाज उठा पायेगी...

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

जानती हैं समस्या शुरू कब होती है, जब आप और हम उस बने-बनाये ढांचे को स्वीकारने से मना करते हैं। अपनी इच्छाओं को मारने से मना करते हैं। औरत का अपने ढंग से जीना इस समाज के लिए बड़ी समस्या है और उसे रोकने के लिए यौन अत्याचारों के सिवा पुरुषों को कुछ सूझता नहीं है। कभी ये बलात्कार का रूप होता है तो कभी नंगा करके घुमाना या फिर कभी कुछ और नया। लेकिन कुल मिलाकर प्रश्न वही का वही रहता है अपना दिमाग मत इस्तेमाल करो जो हम चाहते हैं वो करो और अगर नहीं करोगी तो हम कुछ भी कर सकते हैं।

neelima garg said...

बहुत विचारोत्तेजक कविता है ......झकझोर दिया.....

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