Friday, March 28, 2008

मेरी कलम चोरी हो गयी ........


सपना चमड़िया

मेरे घराने की उन नैतिक , पवित्र ,सुन्दर ,सुघड़ औरतों को बस पंख मिल जाएँ................इस कामना के साथ.....


अक्सर मेरी कलम चोरी हो जाती है और हैरत की बात है कि चोरी घर में ही होती है । बहुत बार मैं नयी कलम ले कर आती हूँ लेकिन फिर वही हादसा होता है ।कलम की चोरी ।अगर कभी मिल भी जाती है तो बिल्कुल खाली ,उसके लिखने की क्षमता बिल्कुल खत्म।ठूँठ सी खाली कलम कभी मुझे देखती है और मैं उसे । जी करता है किसी और की कलम चुरा लूँ,लेकिन दूसरे की कलम से अपनी बात कैसे कहूँगी । मुझे तो मेरी कलम चाहिये ,मुकम्मल ।
फिर सोचती हूँ कलम की सलमती हासिल कर भी लूँ तो मेरे पास अपना मुकम्मल वक़्त कहाँ है। कुछ लिखने के लिए कलम मिल भी जाए तो भी वक़्त तो चुराना पड़ेगा-कभी यहाँ से ,कभी वहाँ से और चुराया वक़्त मेरे मुकम्मल वक़्त के आड़े आयेगा । मैं लिखना कुछ चाहूँगी वक़्त कुछ और लिखवायेगा। मुश्किल है मिलना, पूरा वक़्त और सलामत कलम ।
बड़ी हैरत की बात है न कि मेरा वक़्त और मेरी कलम दोनो चोरी हो गये ।यहीं ,इसी जगह,इस तीन कमरों के घर में ,आप लाख चाहें तो भी इसे ढूँढ नही पायेंगे ।लेकिन ऐसे हैरतंगेज़ कारनामे मेरे साथ होते रहते हैं ठीक उसी तरह जैसे बराबरी के झाँसे में आकर औरतें घर से बाहर निकलती हैं और कई तरह के बलात्कार का बोझ लिये घर लौट आती हैं। घर में तो बलात्कार पुरानी आदत बन चुकी होती है ।अगर आप मेरा जीवन उठा कर देखें, हालाँकि वह भी कोई सही -सलामत चीज़ नही है,इसलिए उसे भी इधर-उधर कईं जगहों से उठाकर जोड़-जाड़कर देखना पड़ेगा ,तो ऐसे हैरतनाक वाकयों से भरा पड़ा है मेरा जीवन ।
और वक़्त बिल्कुल नही है मेरे पास । पेशे से मैं एक बेगार औरत हूँ ।25 साल तक मुझे बाकायदा सिलसिलेवार ट्रेनिंग दी गयी बेगारी की और फिर एक बड़े से समारोह में मुझे मेरे मालिक को सौंप दिया गया।दस-बारह साल से निरंतर ,बिना रुके,बिना थके एक ही तरह के काम में मसरूफ हूँ और धीर-धीरे उसी एक काम में निपुणता हासिल करती जा रही हूँ । दर असल जिस घराने से मैं ताल्लुक रखती हूँ उसमें सदियों से यही काम होता आ रहा है। मेरे घराने को आपको थोडा समझना होगा ।मेरी दादी- नानी और माँ तो इसमें आती ही हैं लेकिन मेरी सास का भी घराना यही है ।हाँ ,मेरे मालिक का घराना अलग है ।वही । जिसमें मेरे पिता और ससुर एक साथ आते हैं ।उनके घराने में ज़बर्दस्त एकता है -मसला कोई भी हो सब एक स्वर में बात कहते हैं और भाषा भी एक -सी है। बल्कि गड़बड़ी इधर से ही होती है ,मेरे घराने से , बार-बार यही लोग पाला बदल लेते हैं और हर मुद्दे पर "उनके" साथ हाँ जी हाँ जी करते नज़र आते हैं ।मैने कई बार इन्हे लामबन्द करने की कोशिश की पर अब तक नाकाम! वरना अगर हम मिलकर अपनी बात कहते तो कम से कम हमारी न्यूनतम मज़दूरी तो तय हो जाती !
हाँ ,तो बात हो रही थी मेरे वक़्त की जो कि मेरे पास नही है क्योंकि पेशे से मैं बेगार हूँ । एक बेगार के पास अपना कोई वक़्त नही होता । मालिक को इख्तियार है कि वो जब चाहे मुझे काम में झोंक दे ।

"ज़िन्दगी का अनुवाद "से पहला अंश ।



सपना जी दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन करती हैं । प्रबुद्ध लेखिका हैं ,कवयित्री हैं ।इसके अलावा भी उनका एक परिचय है जिसे बताना ज़रूरी नही क्योंकि उसका अनुमान लगा लिया गया होगा ।महत्वपूर्ण यह है कि उनकी स्त्रीवादी सोच किताबी न होकर जीवन के साथ -साथ परिपक्व हुई है और अपने आस-पास जो भी कुछ उन्होने देखा समझा उसे विचार में बान्धने की कोशिश की है । जब भी उन्हें विषय अवसर देता है, वे अपनी कक्षाओं में स्त्री-विमर्श के लिये सहजता से जगह बना लेती हैं ।
डॉ.सपना चमड़िया की डायरी के अंश हम सिलसिलेवार प्रकाशित करेंगे ।यह डायरी उन आपबीती और जगबीती अनुभवों के अधार पर लिखी गयी है जिन्हें विचार की आंच में पकाया गया है । इसमें निजी कुछ नही है ,सब सांझा है ,हम सबका भोगा हुआ । बस उसे शब्द मिल गये हैं ।जब मैने आरम्भ के 3-4 पृष्ठ पढे तो लगा मेरी-सी बातें सपना जी की कलम से लिखी गयी हैं ।अपने लिए मुझे भी वक़्त चुराना पड़्ता है ,पर अपने मुकम्मल वक़्त की ख्वाहिश बरकरार है ,आखिर चोरी में छुपा ग्लानि भाव भी तो लेखन के आड़े आता है । आभा भी कुछ ऐसा ही कहती हैं -कि मेरा घर ज़रूरी है या ब्लॉग का "अपना घर"................घरबारी रहते हुए स्त्री के लिए "लिखना "{या पढना या गृहस्थी के अलावा कोई काम ,नौकरी भी आजकल गृहस्थी के लिए ही है }इतना दुश्कर क्यों है ?

5 comments:

अनूप भार्गव said...

अच्छी सोच है सपना जी की । और कड़ियों का इन्तज़ार रहेगा ।
काश ये दो घराने कभी सोच सकें कि अंतिम मंज़िल तो एक ही है , तो फ़िर ये सब ज़द्दो ज़हद क्या सिर्फ़ रास्ते में अधिक आराम के लिये है ?

चंद्रभूषण said...

डॉ. सपना चमड़िया, चोरी चाहे वक्त की हो या किसी और चीज की, उसकी शुरुआत ही मुश्किल होती है। यह हो जाए एक बार, फिर तो धीरे-धीरे डाके डालने में भी कोई हिचक नहीं होती। उम्मीद है, आपकी शुरुआत औरों के लिए भी प्रेरणा बनेगी।

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा सपना जी को पढ़ कर...आगे और पढ़वायें. प्रस्तुति के लिये आपको साधुवाद.

Neelima said...

सपना जी बहुत अच्छा लगा आपको यहां पढकर ! आगे भी ये क्रम ज़ारी रखें!

Unknown said...

कितने तरीकों से एक ही बात कही जा सकती है.....पर कभी कभी कोई बात ऐसे कहता है जिसे सुनते ही सब समझ आ जाता है..शब्द खुद चल कर जहन में बैठ जाते हैं....सपना जी के शब्दों में कुछ ऐसा ही जादू है..
बात और कहने का अंदाज़ बेहद पसंद आया।

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...