Saturday, March 29, 2008

मुझे बेगार की परम्परा बदलनी होगी

सपना चमड़िया

अब तो इस काम में मैं इतनी निपुण हो गयी हूँ और ऐसी आदत पड़ गयी है मुझे इस काम की कि अगर आप नीन्द में भी उठा कर मुझसे पूछे कि-भिंडी को कैसे छोंकना है तो मैं तुरंत जवाब दूंगी कि"मेथी दाने से" मुझे इसके लिए कुछ सोचना नही पड़ेगा। मैं कितनी ही दुख तकलीफ में क्यों न रहूँ मेरे हाथ अनायास काम करते रहते हैं और मेरे दुखों का असर मेरे बेगार पर कभी नही पड़ता ।बल्कि सच यह भी है कि मुझे अपने काम से प्यार हो गया है-सुनकर बहुत सदमा लगा न ! आपने सोचा होगा कि मैं इस बेगार से सिर्फ नफरत ही करती हूँ और यही यहाँ पर बताना चाहती हूँ। लेकिन मैं जो प्यार की बात कर रही हूँ यह और भी हैरत की और खतरनाक बात है। मैं जब इस घर में नयी नयी आयी तो इस बेगार से मेर आत्मीय सम्बन्ध स्थापित नही हो पाया था-मेरे हाथ से अक्सर बर्तन छूट जाते,कभी झाड़ू फिसल जाता और कभी-कभी तो मैं ही गिर पड़ती।सामने होती मालिकों की एक पूरी जमात जो मेरे बाज़ार जाने पर या किसी रिश्तेदार के यहाँ जाने पर मेरे खिलाफ पंचायत बिठाती और निर्णय सुनाती, फतवे जारी करती। जब मैं वापस लौटती तो मुझे हमेशा घर का माहौल कुछ घुटा ,कुछ कसा ,कुछ बदरंग -सा लगता और मालिकों के मुँह कुछ सूजे हुए दिखते ।
पर सबसे ज़्यादा हैरत की बात है कि इस पूरी बेगार-परम्परा को मैंने जल्द ही आत्मसात कर लिया-ठीक वैसे ही जैसे चिड़िया का बच्चा उड़ना सीख जाता है,साँप का बच्चा काटना ,फूल खिलना ,गरमी के बाद बारिश का आना ।ठीक ऐसे ही औरत की बच्ची ने बेगारों के रजिस्टर में अपना नाम लिखवा लिया। इस रजिस्टर के बारे में तो आप जानते ही होंगे न ,जिसमें अंगूठा लगवाया जाता है 500 की रकम पर पर मिलते हैं सिर्फ 50 रुपए ।
मुझे शर्म आती है यह सोचकर कि मैं खुद भी कितनी उतावली थी इस बेगार की परम्परा में आने के लिए।नए कपड़े ,नए गहने खरीदना,नए घर की कल्पना में डूबे रहना,फिजूल की हँसी-ठिठोली । दुनिया के और रंग मुझ पर खिलते-खुलते उससे पहले ही गहरे लाल रंग नें मुझे ढांक -छिपा लिया।मेरे घराने की कोई सुखी-सम्पना महिला बहुत बेज़ार और दुखी होकर कभी-कभी अपने इमिदियेट मालिक का नाम लेकर कहती है -कि हे प्रभु ,मुझे अगले जनम में न तो इस घर की बहू बनाना न ही इस आदमी की पत्नी ।और मैं सोचती हूँ कि-इस घर या उस घर, यह आदमी या वह आदमी-बहू बनना,पत्नी बनना या बिना सम्पूर्ण तैयारी के माँ भी बनना कोई बड़े सौभाग्य की बात नही है ।आज अपने वक़्त में,अपनी कलम से मैं जो लिखूंगी -सच लिखूंगी। मैने कई बार इन मालिकों के साम्राज्य में रहते हुए सोचा कि कहीं मैं अपना मालिक बदल लूँ.....मैंने खुली आँखों से कल्पना की और अंतत: ईमान से कहती हूँ मैने अपने आप को वहीं पाया-वही घुटी हुई रसोई,वही बिस्तर ,वही बेगार,वही दिन-रात ।मुझे लगने लगा कि मालिक बदलने से कुछ नही होगा,मुझे बेगार की परम्परा बदलनी होगी


"ज़िन्दगी का अनुवाद" -दूसरा अंश

6 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया रहा...

मालिक बदलने से कुछ नही होगा,मुझे बेगार की परम्परा बदलनी होगी

बिल्कुल उचित विचार!!

neelima garg said...

यह एक अलग नज़रिया है वैवाहिक जिंदगी को देखने का..अन्यथा जिंदगी इतनी बुरी तो नही....

आनंद said...

मैं इस ब्‍लॉग की पोस्‍टें पढ़कर यही सोचता हूँ कि मन में इतनी कड़वाहट लिए भला कैसे कोई जी पाता होगा? यह ब्‍लॉग शुरू करने के लिए चोखेरबाली का धन्‍यवाद। हमारी शक्‍लें इतनी भयानक होंगी हमें ही पता नहीं था।

pranava priyadarshee said...

सच है. जैसे जमींदार अच्छा या बुरा नही होता था. वैसे ही अच्छा मालिक या बुरा मालिक नही होता. मालिक तो मालिक होता है. उसे बदलना कोई विकल्प नही. विकल्प है तो नौकर-मालिक के रिश्ते को ख़त्म करना. यह बात बेगार करने वालों को ही समझना होगा. क्योंकि मालिक तो इस रिश्ते को ख़त्म करेंगे नही. यह काम बेगार करने वालों को ही अंजाम देना होगा.
डॉ सपना चमडिया के घराने को जितनी जल्दी यह बात समझ मे आ जाये उतना अच्छा. वैसे यही बात 'रिजेक्ट माल' अपने रिजेक्ट समुदाय के हर सदस्य को भी समझाना चाहता है.
बेहतरीन श्रृंखला के लिए चोखेर बाली और उसके पाठकों को हार्दिक बधाई

Anonymous said...

हाँ , तुम नारी हो

क्यो तुम लड़ती रहीं
क्यो तुम जूझती रहीं
क्यो तुम चाहती हो
बदलना मानसिकता औरो की
क्या फरक हैं फिर तुममे और उनमे
मत जुझो , मत लडो
मत और समय अपना बरबाद करो
मत बदलो किसी की मानसिकता
हो सके तो बदलो अपनी मानसिकता
जियो उस स्वतंत्रता को जो
इश्वरिये देन , जो नहीं कोई और तुमेह देगा
नारी हो नारी ही बन कर रहो
प्यासी हो तो पानी पीयो
भूखी हो तो खाना खाओ
पर मत लडो , मत जुझो
और नारी होने के एहसास से सम्पूर्णता पाओ
अधूरी तुम नहीं हो , क्योंकी तुम जिनसे लड़ती हो
उनके अस्तिव की तुम ही तो जननी हो
तुम ख़ुद आक्षेप और अवेहलना करती हो
अपनी इच्छाओं की ,
कब तक अपनी कमियों का दोष
दूसरो पर डालोगी
समय जो बीत जाता है लौट कर नहीं आता है

ghughutibasuti said...

बहुत सशक्त रचना !
घुघूती बासूती

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