Wednesday, April 9, 2008

शाम के 6 और साढे 6 के बीच आपने मुझ औरत को कहीं देखा है ?

सपना की डायरी के अगले भाग को यहाँ देने से पहले यह बताना ज़रूरी लग रहा है कि यह केवल अपनी स्थिति की आलोचना नही है वरन आस-पास देखे सुने का विश्लेषण भी है ।जो औरत सपना है वह वही सपना नही है जिसे आप हम देखते हैं वह हर उस औरत के भीतर समा जाती है जो शाम के 6 साढे 6 के बीच सिन्दूर लगा,चूड़ियाँ और साड़ी पहन बालकनी से खड़े होकर पति का इंतज़ार करती है और नीचे खेलत हुए अपने बच्चॉ को भी देखती जाती है और पड़ोसन से बातें करती जाती है ।जितना बोलती जाती है उतना चुकती जाती है।वह उस स्त्री के मन मे घुस जाना चाह्ती है ।उसे उसके हाल पर छोड़ देना नही चाहती । सपना खुद को स्त्री जाति के अतीत और परम्परा से बाकी स्त्री समुदाय से काट कर नही देखती । वह उसी का एक हिस्सा है ।किसी स्त्री की सोच का दायरा बस इतना सा ही है , क्या हमें उस औरत की लानत मलामत करनी चाहिये ? पूंजीवाद मज़दूर को लेज़र टाइम नही देना चाहता क्योंकि मज़दूर में सोचने की प्रक्रिया शुरु हो गयी तो वह मालिक के प्रति विद्रोह कर देगा ,वह कम मज़दूरी पर काम नही करेगा । कुछ ऐसा ही समाज स्त्री के साथ नही करता ? वह रेलिंग से लटकी औरत खाना क्या बनाऊँ की जगह सोच रही होती कि अगली पोस्ट क्या लिखूँ .....
पांचवा अंश
"ज़िन्दगी का अनुवाद"


सपना चमड़िया
सुना है प्रेम-प्यार कोई बड़ी सी चीज़ है,आत्मा को स्पन्दित कर देने वाली,फूलों में रंग भर देने वाली इत्यादि -इतयादि ।पर हम सद गृहस्थ औरतों की ज़िन्दगी में इसके लिए कोई जगह नही है बल्कि हमें हमेशा यह दिखाना पड़ता है कि हम एकदम पवित्र और अनछुए हैं जो कुछ है वर्तमान में हमारे मालिक हैंहमारे कर्ता-धर्ता ,हमारे ज़मीन आसमान हमारे सबकुछ ।हमने उन्हीं से प्रेम सीखा और उन्हीं को प्रेम किया। और इसलिए हम-सब औरतें जब इकट्ठे होकर बैठती हैं तो अपने भोलेपन ,अनाड़ीपन की कहानियाँ एक दूसरे से होड़ लगाकर सुनाती हैं ।हमारे प्रेम का हमारे दिल दिमाग से कोई रिश्ता नही होता बल्कि हमारे मालिकों के घराने में चले आ रहे रीति-रिवाज़ों से होता है।मालिक अगर शिव से प्यार करता है तो मुझे भी कहना होता है'जय भोले नाथ' और राम से प्यार करता है तो कहना होता है'जय श्री राम'।अगर गान्धीवादी है तो मुझे अपने सारे गुस्से तो त्याग कर अहिंसक हो जाना पड़ता है। कॉंग्रेसी है तो मैं भी कॉंग्रेसी ,भाजपाई है तो मै भी भाजपाई,मार्क्सवादी है तो मैं भी मार्क्सवादी। {मन से न भी होऊँ तो दुनिया यही कहेगी कि पति मार्क्सवादी है तो पत्नी भाजपाई कैसे हो सकती है} ।यह तो फिर भी ऊंची बात हुई,स्थिति यहाँ तक है कि मालिक को पूड़ियाँ पसन्द हैं तो मुझे भी और मालिक को जलेबी पसन्द है तो मुझे भी जलेबी ही पसन्द है।शोर पसन्द है तो हमे भी शोर पसन्द है एकांत पसन्द है तो हमें भी एकांत ।उन्हें कमल पसन्द है तो हमें भी, उन्हें कीचड़ पसन्द है तो हमें भी कीचड़ ही पसन्द होना ही चाहिये ।इस 'होना ही चाहिये'की मेरी ज़िन्दगी में बड़ी भूमिका है।इसने मुझे क्या बना दिया इसके बारे मे आप जानते ही होंगे लेकिन मुझे लग रहा है कि आगे बढने और कुछ कहने से पहले मुझे अपना परिचय आपको दे देना चाहिये ताकि मै जब भी आपसे मिलूँ आप मुझे पहचानने में भूल न करें।परिचय इसलिए नही कि मैं आपसे बहुत दूर रहती हूँ या कभी कभी मिलती हूँ,परिचय इसलिए कि मैं निरंतर आपके साथ हूँ,आपके लिए हूँ और रोज़मर्रा के जीवन में आपके सबसे ज़्यादा काम आती हूँ और आप मुझे ही अनदेखा करके , बल्कि कोहनी मार कर ,आगे निकल जाते हैं ।
स्त्री विमर्श की किसी पत्रिका के मुखपृष्ठ पर आपने मेरी कोई तस्वीर नहीं देखी होगी, मैने भी नही देखी ,तो मुझे ही अपने सकुशल हाथों से अपनी एक तस्वीर बनानी होगी। कभी आपने 6 और साढे 6 के बीच,जब मालिक घर नही लौटे होते हैं और उनके बच्चे बाहर खेलने गये होते हैं;बाल बनाए ,हाथ में चूड़ियाँ पहने घर की रेलिंग से आधी लटकी हुई पड़ोस की किसी दूसरी महिला से निरंतर बात करती हुई एक औरत को देखा है ---जो जितना ज़्यादा बोल रही होते है उतनी ही चुकती जाती है ।अधिक से अधिक सुर्ख रंगों में सजी पर उतनी ही काली उदासी में लिपटी सुबह और रात के बिलकुल बीचों बीच पुराने जटिल मौत के सहोदर ब्राह्मणी संसकारों में फ्रीज़ ठीक 6 और साढे 6 के बीच आपने मुझ औरत को कहीं देखा है ?{अपने घर में ही तो नही ? }क्या आप बता सकते हैं यह औरत इस वक़्त क्या सोच रही है ?दुनिया के पढे लिखे बन्धु बान्धव क्या बता सकते हैं कि एक खास फ्रेम में जड़ी यह औरत इस वक़्त क्या सोच रही है ?नहीं न ?{आप तो कह देंगे -स्त्री को तो भगवान भी नही समझ सके }
मैं बताती हूँ ..........यह औरत इस वक़्त यह सोच रही है कि रात के खाने में क्या बनाऊँ? बड़े मालिक को गोभी नही पसन्द,मझँले मालिक रोटी के साथ चावल भी लेंगे।छोटे मालिक हो सकता है खाना बाहर से खाकर आएँ।दिन की दाल पड़ी है -मेरा तो हो जाएगा ।


पिछले सभी भाग "सपना की डायरी" लेबल के तहत देख सकते हैं ।

5 comments:

Unknown said...

यह सपना तो सच पर सच बोलती जा रही हैं!!

आभा said...

सपना की डायरी की बात नहीं बल्कि हकीकत है,पर सपना की डायरी मे एक बात जोडना चाहूँगी कि बहुत हुआ बहुत तकलीफ दे ली । अब ज्यादा सताया तो श्राप दूँगी , नाश हो तुम्हारा मै क्या भगवान करेगा ,पत्नि से नहीं भगवान से डरेगा
नहीं भगवान से पति क्या भूत भी डरता है ,.....

आर. अनुराधा said...

"दिन की दाल पड़ी है -मेरा तो हो जाएगा ।"
Unstoppabe Sapna and her irresistable post. I can never have enough of it. Awaiting the next post.

राजकिशोर said...

बहुत अच्छा। कमाल का।
पति की तरह पत्नी भी साफगो और तर्कशील है।
बधाइयां।
राज

संगीता मनराल said...

आपने जो लिखा वो सच है, और मुझे पङकर लगा कि मैं खुशकिस्मत हूँ| मेरे पास मेरे हिस्से कि ज़मीन है, जहाँ मैं अपने मन मुताबिक चल सकती हूँ, मेरे पति ने वो ज़मीन मुहय्या करई है, लेकिन फिर भी कई बार समाज के ठेकेदारों को ये सब मंजूर नहीं|

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