Saturday, April 5, 2008

घर परिवार का ढाँचा ज्यादा मानवीय और जनतांत्रिक बनाने की ज़रूरत है

सपना की डायरी के अभी तीन ही छोटे छोटे अंश प्रकाशित किए हैं लेकिन प्रतिक्रियाएँ काफी विविध मिल रही है।आगे के भाग भी प्रकाशित करने हैं ।लेकिन उससे पहले स्वप्नदर्शी जी की एक टिप्पणी भी सामने रखनी है । यह एक और महत्वपूर्ण पक्ष की बात कहती है-

"ग़ुलामी मे एक किस्म का आनन्द भी होता है, सहुलियत होती है, आर्थिक, समाजिक सुरक्षा भी है, इस मायने मे ये बेगारी नही है. और बहुत खुशी से हम मे से बहुत वो सुविधाये पाते है, जिनको अर्जित करने मे जनम लग जाता है. माना कि हमारा समाज ही किसी स्त्री या पुरुष को बनाता है, पर हम रोबोट नही है, हमारा अपना विवेक और अपना स्वार्थ भी होता है. और दिये गये कई विकल्पो मे हमेशा चुनाव हमारा होता है.


मैने आज तक किसी भी गृहणी को तमाम विवशता के बाद भी गुलामो वाली मनस्थिति मे नही देखा. गुस्से मे देखा है, जद्दोजहद करते देखा है, अपनी बात मनवाने के लिये बात-बात पर रोते देखा है, परिवार और बच्चो को गोलबन्द करते भी देखा है. भूत-प्रेत, देवी-देवता, सभी चडते देखा है, बेहोश होते भी देखा है. और ये सब उनकी अदम्य जीवनी शक्ति का प्रमाण है.

आज़ादी भी भीख मे नही मिलती और उसके अपने खतरे है, जिन्हे भी कुछ लोग जानबूझ कर चुनते है. ये दो तरह के पैकेज है जिन्दगी के, दोनो मे कुछ ठीक है, कुछ गलत है. दोनो तरह के सुख बिना जद्दोजहद के मांगना बेवकूफी है.

इतना ज़रूर है कि वर्तमान मे घर परिवार का ढाँचा ज्यादा मानवीय और जनतांत्रिक बनाने की ज़रूरत है, जो असानी से किया जा सकता है. घर के लोग आपको प्यार करते है, एक बार खाना छोड् दो, दो दिन बात मत करो, पिता, पति, पुत्र सबकी हवा सटक जायेगी. पर घर मे भी अगर परेशानी है तो सम्वाद शुरु करने के खतरे तो उठाने ही पड़ेंगे !

उससे लम्बी लडाई और बहुत कठिन है समाज को बदलना, उसे मानवीय बनाना. पर वहाँ भी अपनी बात कहनी पडती है, लड्ना पडता है.
"

बहुत सही और महत्वपूर्ण बात है कि आज़ादी के लिए खतरे उठाने पड़ते हैं ।इससे मेरा पूरा इत्तेफाक है ।लेकिन इसमे कुछ बातें और जोड़्ना चाहूंगी ।पहला ,कि इतनी शिक्षा और समझ लड़की को दी जाए कि वह आज़ादी का महत्व समझ सकें तभी वह आज़ादी पाने को आतुर होगी।एक् सरकारी दफ्तर का एक हेड क्लर्क जो किसी तरह बेटी को अच्छे कॉलेज से बी. ए करा दे रहा है उस बेटी को कभी किताबी शिक्षा का अनुसरण करने देगा ? उसे आज़ादी का आइना देखने देगा ? वहा बार बार अपनी इज़्ज़त और लाचारी का जुआ उस लड़की के कन्धे पर नही डालता रहेगा ?आज भी माएँ अपनी बेटियो को अगर यही शिक्षा देंगी कि "बेटी ! आदमी आदमी होता है औरत औरत ! औरत ही घर को चलाती है " तो मुझे नही लगता कि उसके मन में कभी भी आज़ादी का सपना पनप पायेगा ।गाँवों में तो हालात बहुत बदतर हैं ।मेरे घर काम करने आने वाली लक्षमी बताती है कि उसकी बहन को वहाँ घूंघट न करने पर घर के सभी लोग पीटते थे अब वह सर ढँकती है । वह भागे भी तो भाग कर कहाँ जाए । अनपढ है । कोई और फायदा नही उठा लेगा राह में इसकी क्या गारंटी है ?माँ बाप कैसे बुला लें अपने पास वापस , घर की इज़्ज़त चली जायेगी ।वह मुझ जैसी मुँहजोर नही है , गऊ है ।
दूसरा , ज़िन्दगी भर उपेक्षित रहने और घर में महत्वहीन माने जाने पर कभी कभी भावुक क्षण में स्त्रियों को बेहोश होते मैने भी देखा है । यह मानसिक विकृति है जो लगातार मानसिक दबाव औत घुटन से उपजती है ।लेकिन कोई बड़े फैसले वे नही करवा पातीं । मेरी सास ऐसे ही बेहोश होती है जब बेटा अपना मकान खरीदने लगे या कोई बेटा विदेश जाने लगे । लेकिन वे पति के जायदाद आदि के बड़े फैसलों में और अपने मायके के पक्ष में कभी उनके फैसलों को चुनौती नही दे सकतीं ।
आजीवन दमन के बाद ऐसे मे स्त्रियों के हाथ सत्ता आती भी है तो केवल बहू की ,रसोई की । और ऐसे में वे उसका भरपूर शोषण करना चाहती हैं । वे अपना मानसिक स्वास्थ्य खो चुकती हैं और बहू धीरे धीरे खोने लगती है । और घर के पुरुष इसे जनानियों की बकवास समझ कर अनदेखा करते हैं ।
तीसरा , आज़ादी के खतरों को चुनने के लिए परिपक्व सोच भी नही मिलती लड़कियों को ।या कहें परिवार संरचना को तोडकर सीधे बाहर आ जाना स्त्री-पुरुष किसी के लिए आसान नही । फर्क सिर्फ यह है कि परिवारवाद की पुष्टि में पुरुष को सहूलियतें बहुत अधिक हैं इसलिए उसे तोड़ना उसे हितकारी नही लगता । और एक आम स्त्री को तो यह आज तक समझ ही नही आया कि परिवारवाद और पितृसत्ता को पोषित ही कर रही है वह और वही उसके सबसे बड़े दुश्मन हैं ।
चौथा , स्त्री की समझदानी मे यह बात आती ही नही कि जिन सुविधाओं और आर्थिक सुरक्षा के बदले वह अपनी आज़ादी गिरवी रख रही है वे कितनी तुच्छ हैं । मेरी कुछ मित्र बैंक नही जाती ।अपना अकाउंट नही देखतीं । वे बैंक के पचड़ों मे पड़ने से पति द्वारा बचा ली जाती हैं । उन्होने हमेशा से ऐसा ही देखा है । यही ट्रेनिंग ली है ।वे धीरे धीरे मूर्ख साबित हो रही हैं । पर क्या करें ? नौकरी करें बच्चे को स्कूल से लेने जाएँ , खाना बनाय और परोसे कि बैंक के पचड़े ले बैठें ।

और बहुत कुछ कहना है .....शायद सब्र न रहे पढने वालों में .....इसलिए अभी इतना ही ।

6 comments:

Anonymous said...

yae tippani dinesh raay diwedi ki haen . sameer kii beti ka baap vali post dekhiyae
swapnadarshi nae kewal us vichar ko vistar diya haen

सुजाता said...

भूतनाथ जी वैसे आप कड़ी नज़र रखे हैं ब्लॉग जगत पर । भूतों वाला काम ही तो है !हौंट करना । हें हें हें ।
दिनेश जी की बात का पूरा सम्मान है । उसके अलावा जो कहा स्वपदर्शी ने उसे भी पढे।

अजित वडनेरकर said...

बढिया है जी।

Ghost Buster said...

पहले तो ये कि ऊपर वाला कमेन्ट किसी डुप्लीकेट का है जो तब से अवतरित हुए/हुई हैं जब हमने अनिल रघुराज जी के ब्लाग पर आईडी चोरी के खिलाफ कुछ राय रखी थी. हम रोमन लिपि में हिन्दी नहीं लिखते.

गुलामी में भी सुविधा और आनंद? अजब सोच है. आपके कोपभाजन का शिकार होने का खतरा उठाते हुए भी हम फिर कहेंगे कि बदलाव आ रहा है, धीमे ही सही. सिर्फ़ एक या दो बेटियों वाले परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. शिक्षा और आत्मनिर्भरता पहली सीढ़ी हैं महिलाओं को सक्षम और समर्थ बनने के लिए और अपना वाजिब हक़ छीनने के लिए.

Anonymous said...

duplicate ka kament kehen sae kyaa hoga ?? kya ghost buster name ko kisii nae branded karaya haen
aur kaun kab avtarit hota haen aur kab tirohit hota haen iskaa faisla naa hi kare toh behtar hoga
ek naam haen aapne bhi rakha kissi aur nae bhi ab janam kii tarikh aur karan ka pataa ??

Udan Tashtari said...

और भी कहिये न!!! हम सुन तो रहे हैं. :)

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...