Sunday, April 6, 2008

कैंसर से लड़ाई के सबक

आर. अनुराधा

मौत को नजदीक से देखने के बाद ही जिंदा होने का अहसास होना शुरू होता है, जिंदगी के सही मायने और इसकी कीमत समझ में आने लगते हैं। मैंने भी एक बार जीवन के अंत को करीब से देखा था, ठीक 10 साल पहले। कैंसर के साथ अपनी पहली लड़ाई के दौरान एक बार मुझे लगा था कि शायद जिंदगी कमजोर पड़ रही है। उन हालात में, जिंदगी की डोर बस किसी तरह हाथ में कस कर पकड़े रहने की जद्दोजहद और जिद ने मुझे जीना सिखा दिया।


मेरे मामले में शुरुआत ही गलत हुई, जैसा कि हिंदुस्तान में कैंसर के मामलों में आम तौर पर होता है। जब बीमारी को लेकर पहली बार अस्पताल पहुंची तो ट्यूमर काफी विकसित अवस्था में था, स्टेजिंग के हिसाब से टी-4बी। लेकिन अच्छी बात यह थी कि बीमारी किसी महत्वपूर्ण अंग तक नहीं पहुंची थी।

इलाज तय हुआ- तीन सीइकिल कीमोथेरेपी ट्यूमर को छोटा करने और उसके आस-पास छितरी कैंसर कोशाओं को समेटने के लिए, उसके बाद सर्जरी और फिर तीन साइकिल कीमोथेरेपी शरीर में कहीं और छुपी बैठी कैंसर कोशिकाओं के पूरी तरह खात्मे के लिए। उसके बाद रेटियोथेरेपी भी- ट्यूमर की जगह पर किसी कैंसर कोशिका की संभावना को भी जला कर खत्म कर देने के लिए। यानी रत्ती भर भी कसर छोड़े बिना धुंआधार हमले हुए ट्यूमर पर। और आखिर उसे हार माननी पड़ी। लेकिन उस इलाज, खास तौर पर कीमोथेरेपी के मारक हमलों ने कमजोर बीमार कोशिकाओं के साथ-सा नाजुक रक्त कणों को भी उसी तेजी से खत्म करना शुरू कर दिया।

यह समय था जब मुझे खांसी के साधारण संक्रमण से लड़ने के लिए भी सफेद रक्त कणों की पूरी फौज की जरूरत थी और उधर दवाइयों के असर से शरीर में सफेद रक्त कणों की संख्या 6,000 या 8000 के सामान्य स्तर से घटते-घटते चार सौ और उससे भी कम रह गई थी। और मुझे पता था कि कीमोथेरेपी के दौरान ऐसी स्थिति में साधारण खांसी का कीटाणु भी इंसान को आराम से पछाड़ सकता है।

उस समय खुद को किसी नए कीटाणु के हमले से बचाने के लिए खाना-पानी उबाल-पका कर लेने, खाने के पहले साबुन से हाथ धोने और बाद में ब्रश करने, बार-बार गरारे करने जैसे सरल उपायों से लेकर कड़ी एंटीबायोटिक दवाओं और सभी से दूर अकेले कमरे (आइसोलेशन) में 10 दिनों तक रहने और हवा में मौजूद कीटाणुओं को शरीर में जाने से रोकने के लिए नाक पर मास्क बांधे रहने जैसी हर कोशिश की। फिर भी रक्त कणों की संख्या गिरती ही गई। एक समय ऐसा आया जब लगा, मुट्ठी में रेत की तरह जिंदगी तेजी से फिसलती जा रही है और किसी भी समय खत्म हो जाएगी।

तब मुझे याद आए वो अच्छे दिन जो मैंने जिए थे, बिना उनकी अच्छाई का एहसास किए। वो सब लोग जिन्होंने मेरे लिए कुछ अच्छा किया था। यहां तक कि मैंने उन सबकी एक फेहरिस्त बना डाली और तय किया कि अगर जिंदगी बाकी रही तो उनका ऋण मैं किसी तरह उतारने की कोशिश जरूर करूंगी। हालांकि उस कठिन समय से उबरने में कुछ ही दिन लगे, लेकिन वह समय एक युग की तरह बीता। उन तीन-चीर दिनों में लगा कि सिर्फ जिंदा रहना भी एक नेमत है, जिंदगी चाहे जैसी भी हो। सिर्फ जीते रहना भी उतना सहज नहीं, जितना हम सोचते हैं।

उस दौरान मैं देख रही थी अपने स्वस्थ लगते शरीर को मौत के करीब पहुंचते, और नहीं जानती थी कि आगे क्या है। उस दौरान मैंने समझा कि जिंदा रहने का अर्थ सिर्फ जिए जाना नहीं है। हर दिन कीमती है और लौट के आने वाला नहीं है। और यह भी कि कोई दिन, कोई भी पल आखिरी हो सकता है और कल हमेशा नहीं आता।

अब बीते कल को पीछे छोड़ चुकी हूं, लेकिन उसके सबक आज भी मेरे सामने हैं। ठीक होने के बाद कोई औपचारिक संगठन बनाए बिना ही, कैंसर से लड़ कर जीत चुकी कुछ और महिलाओं के साथ या अकेले ही कैंसर जांच और जागरूकता शिविरों में शामिल होती हूं, अस्पतालों के कैंसर ओपीडी में अपने अनुभव और जानकारी वहां इलाज करा रहे मरीजों के साथ बांटती हूं, उनकी जिज्ञासाओं, आशंकाओं, उलझनों को दूर करने की कोशि करती हूं तो लगता है जीवन सार्थक है। और अपने इन्हीं अनुभवों को ज्यादा-से ज्यादा लोगों से बांटने के मकसद से उन्हें पुस्तक रूप भी दे डाला- ऱाधाकृष्ण प्रकाशन (राजकमल) नई दिल्ली से छपी- ' इंद्रधनुष के पीछे-पीछे : एक कैंसर विजेता की डायरी '।

इलाज के उस 11 महीने लंबे दौर ने मुझे सिखाया कि खुद को पूरी तरह जानना, समझना और अपनी जिम्मेदारी खुद लेना जीने का पहला कदम है। अगर मैं अपने शरीर से परिचित होती, उसमें आ रहे बदलावों को पहले से देख-समझ पाती तो शायद बेहद शुरुआती दौर में ही बीमारी की पहचान हो सकती थी। और तब इलाज इतना लंबा, तकलीफदेह और खर्चीला नहीं होता।

अपने इस सबक को औरों तक पहुंचाने की कोशिश करती हूं। स्तनों को अपने हाथों से और आइने में देख कर खुद जांचने का सरल, मुफ्त लेकिन बेशकीमती तरीका महिलाओं को बताती हूं ताकि उन्हें भी वह सब न झेलना पड़े जो मुझे झेलना पड़ा। अफसोस की बात है कि हिंदुस्तान के अस्पतालों तक पहुंचने वाले कैंसर के चार में से तीन मामलों में बीमारी काफी विकसित अवस्था में होती है जिसका इलाज कठिन और कई बार असफल होता है किसी बढ़ी हुई अवस्था के कैंसर की जानकारी पाकर हर बार सदमा लगता है कि क्यों नहीं इसकी तरफ पहले ध्यान दिया गया।

अफसोस इसलिए और बढ़ जाता है कि खास तौर पर महिलाएं अपनी तकलीफों को तब तक छुपाए रखती हैं, सहती रहती हैं, जब तक यह उनकी सहनशक्ति की सीमा के बाहर न हो जाए। (और सबसे खतरना बात यह है कि आम तौर पर कैंसर में दर्द सबसे आखिरी स्टेज पर ही होता है। यह बिल्ली की तरह दबे पांव आने वाली बीमारी है, और शरीर के किसी वाइटल अंग में पहुंचने के बाद उसके कामकाज में रुकावट डालती है, तब ही इसके होने का एहसास हो पाता है।) शायद यह सोच कर कि अपनी तकलीफों से दूसरों को क्यों परेशान किया जाए। जबकि बात इसके एकदम उलट है। परिवार की धुरी कहलाने वाली महिला अगर बीमार हो तो पूरा परिवार अस्त-व्यस्त हो सतका है। इसलिए ज़ंग लगने के पहले से ही धुरी की सार-संभाल होती रहे तो जीवन आसान हो जाता है।

सभी, खास तौर पर महिलाएं जागरूक होना सीखें, अपने शरीर और सेहत के बारे में और बीमारयों के बारे में, ताकि जहां तक हो सके उन्हें दूर रखा जा सके या शुरुआत में ही पता लगाकर खत्म किया जा सके। जीने के और भी कुछ गुर हैं- शरीर और जिंदगी को थोड़ा और सक्रिय बनाने की कोशिश, कसरत और खान-पान की अच्छी आदतों के अलावा नफा-नुकसान का हिसाब किए बिना कभी-कभी किसी के लिए कुछ अच्छा करने की कोशिश। तभी हम भरपूर जी पाएंगे, सही मायनों में जिंदगी।

cancer ,women ,inspiration,joy of cancer

10 comments:

Anonymous said...

BRAVO BRAVO BRAVO
the life must have learnt a leason on how to live

आर. अनुराधा said...

इतनी तेजी से प्रतिक्रिया मिलेगी, अंदाजा नहीं था। शुक्रिया।

अनूप शुक्ल said...

वाह, बधाई ब्लाग शुरू करने और अपने अनुभव बांटने के लिये। कैंसर विजेता की डायरी मैंने कई बार पढ़ी और कई लोगों को इसके बारे में बताया भी। यहां अनुराधाजी को लिखते देखना सुखद अनुभव है। मेरी मंगलकामनायें कि आप सदैव स्वस्थ रहें।

सुजाता said...

जीवन की इतनी कड़ी लड़ाई जीत कर बहादुरी और हौसले के साथ बाहर आने के लिए बहुत बधाई और शुभकमनाएँ ।बहुत सी बातें कह डाली आपने । यहाँ भारत में स्त्री पता नहीं क्यों अपने शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति इग्नोरेंट है । करीब 90% प्रतिशत महिलाएँ एनीमिया से पीड़ित हैं । क्या हमारे पालन -पोषण में ये अपने प्रति इग्नोरेंट रवैया पैदा किया जाता है ?बहुत सोचने पर लग रहा है कि अपनी माँ को हमेशा ऐसे ही देखा है ।वह खुद भी नौकरी,घर ,बच्चे ,पति ,रिश्तेदारी सब निबाहती चली जाती है बिना किसी मदद के तब तक जब तक कि किसी दिन चक्कर खाकर गिर न पड़े या इतनी बीमार हो जाए कि हिल न सके । हर शारीरिक तकलीफ मे उसे काम करते देखा है । वहीं से अनजाने में यह सीख लिया कि स्वयम को सबसे पीछे रखो यदि परिवार चलाना है तो ।जबकि अनुराधा जी की बात बिलकुल सही है कि जो स्त्री घर की धुरी है उसके स्वास्थ्य के प्रति तो हमे ज़्यादा सजग होना चाहिये ।मैं खुद भी ऐसी ही स्त्री रही हूँ । अब थोड़ा बहुत जागरूक रहना सीखा है ।जब यह महसूस हो गया कि अनतत: मेरा स्वास्थ्य ही मेरे काम आने वाला है और जब तक मैं चल फिर रही हूँ सब मेरे साथ हैं जैसे ही मैं बिस्तर पकड़ गयी मुसीबत हो जाउंगी ।
बहुत समय तक कोई यह नही पूछता था कि तुम्हारा व्रत था ,रात के 11 बज गये तुमने कुछ खाया कि नही ? अब मैने व्रत पूजा उपवास सब कुछ छोड़ दिया है ।अपनी माँ की तरह शायद एक दिन नही जी पाउंगी ऐसे हालात हो चुके हैं ।
एक और स्थिति की भुक्तभोगी रही हूँ जो बहुत आम है भारतीय परिवारों में ।गर्भावस्था के दौरान शायद हम स्त्रियाँ सबसे कड़्वे अनुभव पाती हैं ।शुरुआती समय बहुत नाज़ुक होता है और मूड स्विंग्ज़ आते हैं ,किसी भी महक से उलटी आ सकती है , कोई नही समझना चाहता ।धीरे धीरे लगातार खड़े रहने पर पाँव हाथी के पाँव हो जाते है,कमर दर्द से बुरी हालत हो जाती है किसी को परवाह नही । कोई तुम पहली नही जो बच्चा जनने जा रही हो ।उलटी हमे भी आती थी ।हम भी काम करते थे ।ऐसे वाक्य सुनने को मिलते हैं । और घर के पुरुष तो अक्सर ऐसी बातों के प्रति बेपरवाह होते हैं ।
उससे भी बड़ी बात है कि यहाँ स्त्रियाँ अपने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर तो और भी ज़्यादा अनभिज्ञता का शिकार हैं क्योंकि मानसिक अस्वथता तो दर्द भी नही करती ।भ्रमों में खुद को पड़े रहने देना , जलना , झूठी छवि बनाए रखना ,रसोई-पॉलिटिकस मे उलझे रहना,छोटीछोटी घरेलू बातों में क्रेडिट लेने की होड़ करते रहना और बहुत कुछ जिसे हम जनाना मान कर या त्रिया चरित्र कहकर अनदेखा करते आ रहे हैं वह मानसुक अस्वस्थता का ही लक्षण हैं ।
अनुराधा जी एक बहुत ज़रूरी विषय छेड़ा है जिसपर बहुत जागरूकता की ज़रूरत है ।पता नही क्या क्या कहना चाहती हूँ , शायद टिप्पणी मे समाएगा ही नही ।

Neelima said...

अनुराधा आपकी यह पोस्ट बहुत अहम सवालों को उठाती है ! हमारे समाज में स्त्रियों के स्वास्थ्य के प्रति बहुत संकुचित नजरिया है ! इस नजरिये के खिलाफ स्त्री को खुद ही खदा होना होगा और अपने शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य के प्रति बिना कुंथा के जागरूक होना होगा ! आपकी यह किताब बहुत समय पहले पढी किताब "ज्वाय ऑफ केंसर " की याद दिलाती है ! बीमारी भी यदि किसी व्यक्ति को आध्यात्मिक दार्शनिक उंचाइया दे सकती है तो इसका अर्थ है कि उस व्यक्ति के व्यक्तित्व में अवश्य कोई विशिष्ठता है !आपका लेखन सचमुच प्रेरणास्पद है !

आर. अनुराधा said...

मेरे अनुभवों के मर्म को समझा गया, इसकी मुझे खुशी है। अगर यह बात वैचारिक विमर्श से आगे बढ़ कर ऐक्शन में तब्दील होती दिखे तो मैं समझूंगी, मेरा भोगना और लिखना सार्थक रहा।

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

अनुराधा, आपकी हिम्मत की दाद देनी ही चाहिए। आप कैसंर जैसी भयानक बीमारी से जीतकर जी रही हैं और उससे भी बड़ी बात की आप उससे एक बेहतर इंसान बन कर लौटी हैं। पर ये तो सच है कि हम स्त्रियां तब तक सब करती रहती हैं जब तक थक कर गिर ना जाएं और घर की ये धुरी जब धीमे होकर बंद पड़ती है तो पूरा घर जैसे बंद सा हो जाता है। पर शायद ये हमारी प्रकृति में भी है या बचपन से हमें सिखा दिया जाता है तब तक मुंह मत खोलो जब तक दर्द असहनीय ना हो जाए।

अनूप भार्गव said...

आप का स्वयं लड़ाई को जीतना तो सराहनीय है ही लेकिन उस से अधिक सराहनीय है ’दूसरों को इस लड़ाई से लड़ने के लिये बेहतर तैयार करना’।

इन्दु said...

तुम्हारी कैंसर से लड़ाई भी हमने देखी है, उसके बीच ज़िंदगी के जज्बे से भरी तुम्हारी आँखों में सुखद और आशावादी ख्वाब भी देखे हैं। तुम्हारी किताब इन्द्रधनुष के पीछे-पीछे तुम्हारे हौसलों की गवाह है अनुराधा.बहुत प्रेरक पोस्ट.
मैंने एक बार बताया था अपनी स्टोरी के बारे में,क्या मुझे कुछ और कैंसर मरीजों के बारे में बता सकती हो, जो अभी इस से लड़ रहे हों और जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का कोई मकसद बनाया हो?

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

कल 04/07/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...