Friday, April 11, 2008

शादी या तमाशा

आज सुबह माँ से बात हुई तो पता चला कि मेरी एक भतीजी की शादी तय हो गई है और दस दिन बाद उसकी गोद भराई की रस्म है। लड़का एक बहु राष्ट्रीय कंपनी में अफ़सर है। मेरे भाई एक डिग्री कालेज में रीडर हैं और मेरी भतीजी एम एस सी पास है। विवाह अगले नवंबर में होगा।
यहाँ तक तो खुशी की बात थी । पर इसके आगे की बात सुन कर मैं सोच में पड़ गई। गोद भराई की रस्म में दूसरे शहर से पच्चीस लोग आ रहे हैं, जिनके ठहरने, खाने-पीने, स्वागत सत्कार और विदाई के उपहार का ’डीसेंट’ इंतज़ाम करना है। यह भी आग्रह है कि लड़के को तनिष्क की ही हीरे की अंगूठी पहनाई जाए ("यदि आप इंतज़ाम न कर सकें तो हमें बता दें, हम साथ ले आएंगे, आप सिर्फ़ बिल चुका दीजिएगा")। गोद भराई की वेन्यू स्टैंडर्ड की होनी चाहिये नहीं तो उनके रिश्तेदार क्या कहेंगे? उनके घर के पहले लड़के की शादी है इसलिए पूरा परिवार लड़की से मिलना चाहता है, कोई नवंबर तक रुकने को तैयार नहीं, सो सबको लाना पड़ रहा है- यह सब जता दिया गया है।
मैं भाई के माथे पर पड़ती चिंता की रेखाओं की कल्पना कर रही हूँ। अध्यापक आदमी, वेतन ही कितना मिलता है। किसान पिता कुछ छोड कर नहीं गए थे सो मकान का इंतज़ाम, दो ब़च्चों की शिक्षा सब इसी नौकरी के भरोसे किया। खींच तान कर बेटी की शादी के लिए कुछ पैसे जोड़े थे, उसमें से आधे तो गोद भराई के समारोह में खर्च हो जाएंगे। शादी में क्या होगा? उस समय और चीज़ों के साथ कार की माँग भी है। बुढा़पे के लिए जो प्राविडेंट फ़ंड जोड़ा था, उसमें से निकालेंगे, काफ़ी कुछ उधार भी लेना पडे़गा। लड़की सत्ताइस साल की हो गई है, वह किसी भी कीमत पर हाथ आए रिश्ते को जाने नहीं दे सकते।
मुझे विवाह के विशाल आयोजन की रोज़ रोज़ बढ़ती इस प्रथा पर ही कोफ़्त होती है। पहले सिर्फ़ विवाह बड़ा समारोह होता था। सगाई और संगीत नितांत घरेलू मामले होते थे जिनमें गिने चुने मेहमानों को घर में ही बना चाय नाश्ता करा दिया जाता था। अब यह दोनों भी बडे़ समारोह बन गए हैं जिनके लिए हाल बुक करना होता है, सजावट होती है, डी जे बुलाया जाता है,केटरिंग कराई जाती है। पहले सोने के गहने काफ़ी होते थे, अब हीरों के सेट के बिना दहेज पूरा नहीं माना जाता। रोज़ रोज़ हमें बताया जो जा रहा है कि Diamonds are a girl's best friends. जीते जागते लोग नहीं, हीरे आपके सच्चे दोस्त हैं। शादी के नाम पर एक पूरी इंड्स्ट्री चालू हो गई है। पत्रिकाएं विवाह विशेषांक छापती हैं जिसमें पैसे खर्च करने के एक हज़ार तरीके सुझाए जाते हैं। जिनके पास पैसा है, वह शादी में बेतहाशा खर्च करना एक स्टेटस सिंबल समझते हैं। जिनके पास नहीं है, वह उनकी नकल में बूते से ज़्यादा खर्च करते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें घर गिरवी रख कर कर्ज़ ही क्यों न लेना पडे़। शादी एक संस्कार न रह कर एक तमाशा बन कर रह गई है।
मुझे आज के युवा वर्ग पर आश्चर्य होता है, अफ़सोस भी। अच्छी शिक्षा व नौकरी होने के बावज़ूद लड़के को इस बेमतलब के खर्चे में कोई बुराई नहीं नज़र आ रही है। उसके बाप का पैसा थोड़े ही खर्च हो रहा है? यहाँ तो जिसके बाप का पैसा खर्च हो रहा है, उसे भी कोई परेशानी नहीं है। लड़की हज़ारों का लहँगा खरीद कर लाई है मौके के लिए। ब्यूटी पार्लर का पैकेज बुक किया है। वेन्यू की सजावट के लिए खर्चीला डेकोरेटर उसने पसंद किया है। उसकी गोद भराई क्या रोज़ रोज़ होगी? पिताजी का पैसा जाए तो जाए। आखिर बेटी पैदा करने की गलती की है, अब पैसा खर्च करने से क्यों घबरा रहे हैं?
मुझे खीझ होती है आज की शिक्षा प्रणाली पर जो लोगों को सही-गलत में अंतर करना नहीं सिखा पाती। जो नहीं सिखा पाई मेरे पी एच डी भाई को कि किसी की अनुचित माँग के आगे झुकना गलत है, कि उन्हें यह सारे पैसे खर्च करने ही थे तो अपनी बेटी की ऐसी शिक्षा दिलाने में खर्च करने चाहिए थे जो उसे स्वावलंबी बनाती, एक बोझ नहीं जिसे वह अपने कंधे से उतार कर किसी और के कंधे पर डाल रहे हैं। जो नहीं सिखा पाई मेरी एम ए, बी एड भाभी को कि अगर उनकी बिरादरी के लड़के बिना दहेज लिए उनकी सुंदर, शिक्षित बेटी से शादी करने के लिए तैयार नहीं हैं, तो वह उनकी बेटी के लायक नहीं हैं और उन्हें अपनी जात बिरादरी की ज़िद छोड़ कर ऐसे लड़के की तलाश करनी चाहिए थी जिसकी दॄष्टि में लड़की के गुणों का मूल्य होता। जो नहीं समझा पाई मेरी भतीजी को कि अगर शादी की टीम टाम और आडंबर की कीमत पिता को कर्ज़ में डुबाना है तो यह कीमत बहुत ज़्यादा है और चुकाने योग्य नहीं है। जो नहीं सिखा पाई उस लड़के को कि स्वाभिमान किस गुण का नाम है और यह कि दहेज में हीरे की अँगूठी और कार माँगने की बजाय उसे अपनी कमाई पर विश्वास होना चाहिए। नहीं सिखा पाई उसके माता पिता को कि बाहरी दिखावे के लिए आग्रह करके और दहेज माँग करके वह अपनी हैसियत एक याचक की बना ले रहे हैं।
इस विवाह में शामिल होना मेरे लिए ज़रूरी होगा, पर मुझे नहीं लगता कि इस नाटक के किसी भी पात्र की मैं कभी इज़्ज़त कर पाऊँगी।

18 comments:

Anonymous said...

is vivah mae shaamil naa hokar aap apni ashmati to darj karaa saktee haen . mushkil haen , jaantee hun par is post ko likh kar apne man kii ghutan ko vyakt kardaesae kya ho jayaga . kuch nahin sab yahee kar rahey haen
sab achchey baney rehna chahtey haen to buraaii kya koi bahar sae aakar dur karega

RC Mishra said...

बढ़िया है, शादी की बधाई!

सुजाता said...

रोज़ रोज़ हमें बताया जो जा रहा है कि Diamonds are a girl's best friends. जीते जागते लोग नहीं, हीरे आपके सच्चे दोस्त हैं। शादी के नाम पर एक पूरी इंड्स्ट्री चालू हो गई है।
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वन्दना जी ,
यह बिलकुल सही बात कही आपने ।टीवी और विज्ञापन बिल्कुल पीछे नही है गलत बातों के प्रचार में ।पितृसत्ता को तो बाज़ार ने सपोर्ट ही किया है ।
अगर हम यह समझ पा रहे हैं तो समझिये कि बदलाव की शुरुआत की नींव तो पड़ ही गयी है ।

Priyankar said...

देखिए रामचंद्र जी बधाई दे रहे हैं . ये है नेट की त्वरा और ये है नेट का विमर्श . पितृसत्ता को मित्रसत्ता में तब्दील करिए तभी कुछ हो सकेगा .

Anonymous said...

वंदना जी, सब कुछ पेट भरने के बाद भजन करने जैसा....और साफ करूँ तो ब्लोग्गिंग आप सब सुविधा-सम्पन्न महिलाओं का किट्टी पार्टियों के बाद एक और टाइम-पास का जरिया भर है और कुछ नहीं....बचपन से BBCHINDI सुनने की आदत रही है और जब 'आजकल' की शुरुआत में एक पटना के फुटपाथ पर खीरा बेचने वाली बोलती है की आप सुन रहे हैं 'आजकल' और फिर उद्घोषक बोलता है की आपका आज-आपका कल तो यही सोचता हूँ की किसका आज और किसका कल....आज भी आप जैसों का है और कल भी आप जैसों का ही रहेगा.... और आप सब महिलाएं ही क्यों ज्यादातर पुरुषों का भी यही हाल है जिसमें ज्यादातर अपनी पत्रकारिता के कैरिएर को नया आयाम देने में जुटे हुए हैं और बाकि बचे अपने बुढापे में टाइमपास कर रहे हैं ....किसी classical music(ख़ुद को बौधिक या प्रगतिशील जो दिखाना है) की धुनों पर काफ़ी के छोटे-छोटे घूँट के साथ कंप्यूटर के की-बोर्ड पर यंत्रवत थिरकती उंगलियाँ....नारीवाद, ,जातिवाद, आरक्षण, दलित-विमर्ष, पानी की समस्या और भी ना जाने कैसे-कैसे मुद्दे....किसको बेवकूफ बना रहे आप लोग....कभी ख़ुद से नज़र मिला के देखियेगा सब कुछ समझ में आ जाएगा....यहाँ पर मुद्दे फुटबाल के खेल में फुटबाल जैसी हैसियत रखते हैं उससे ज्यादा कुछ नहीं....जिसे बस इस पैर से उस पैर ठोकर ही खाना है....कोई भी मुद्दों को लेकर गंभीर नहीं है....सब मुखोटा लगाये राग आलाप रहे हैं....ब्लोग्गिंग से कमाई पर कोई लेख देखते ही आप सब ब्लोग्गारों के शरीर में झुरझुरी दौड़ जाती है....सबसे जयादा हिट्स पाने वाला लेख बन जाता है वो....और विरोधाभास देखिये की लगता है अगला समाजवाद आप जैसों के भरोसे ही आएगा....सुकून है की मेरा कोई ब्लॉग नहीं है....हिट्स की दरकार नहीं, टिप्पणियों की चाह नहीं और कमाई तो छोडिये भी....बस कभी-कभी आप सबको आइना दिखाने की इच्छा जरूर हो जाती है सो दिखा देता हूँ और आगे भी ऐसा करता रहूँगा....सच्चाई हमेशा से कड़वी होती है....अगर मेरी किसी बात से किसी को दुःख पहुँचा हो तो उसके लिए माफ़ी चाहता हूँ....यायावर

Sunil Deepak said...

मेरे विचार में असली बात है कि लड़का और लड़की क्या सोचते हैं, अगर उनमें हिम्मत हो तो बाकि सबको बता समझा सकते हैं. पर अगर वही इस ओर नहीं सोचेंगे तो बाकी के लोगों के लिए कठिनाई हो जाती है. आज सब ओर जो उपभोक्तावाद की धूम है उसमें इस तरह की बातों से पीछे जाना बहुत कठिन लगता है.

चंद्रभूषण said...

रचना जी की बात से पूर्ण सहमति जताते हुए चोखेर बाली से मेरा आग्रह है कि वह शादी-ब्याह के मामले में न्यूनतम आग्रहों वाला एक शपथपत्र तैयार करे और अपने दायरे में मौजूद स्त्री-पुरुषों को उसे भरने के लिए राजी करने का प्रयास करे। इसमें हर स्तर पर सहयोग देने के लिए मैं तैयार हूं। शपथपत्र सिर्फ एक पंक्ति का हो सकता है कि 'मैं ऐसे किसी भी वैवाहिक समारोह में शामिल नहीं होऊंगी/होऊंगा, जिसमें तिलक-दहेज, अनावश्यक तड़क-भड़क या अन्य किसी भी जरिये से वधू पक्ष के उत्पीड़न/भयादोहन की आशंका मौजूद हो।'

आभा said...

सचमुच ऐसी शादियाँ शादी नहीं तमाशा होती हैं , ळोग दिखाते हैं -हम देखते हैं । यह बन्द हो जाए तो नाक छोटी न हो जाएगी.....

रवीन्द्र प्रभात said...

सुंदर अभिव्यक्ति, बधाईयाँ !

डॉ .अनुराग said...

हम जिस समाज मी रहते है उसे बेहतर बनाने के लिए इतना कर सकते है की हम जो सोचते है उसे व्यक्तिगत जीवन मे उसे आचरण मी उतर कर बाकियों के लिए उदारहण रखे...

स्वप्नदर्शी said...

खैर आज से नही, जब से होश सम्भाला है, मेने किसी ऐसी शादी मे शिरकत नही की, जो धूम-धाम वाली, दहेज वाली हो.
मेरा हमेशा से आग्रह रहा है कि शादी दो तीन धंटे मे दिन के समय हो जानी चाहिये और बहुत मामूली खर्च के साथ, पर फिर भी तनाव्मुक्त और मज़े के लिये जगह होनी चाहिये.

अपनी शादी मे मुझे और मेरे पति को इस ढंग़ से करने के लिये, अपने परिवार जनो को एक साल तक समझाना पडा.

अनत्: हमारी एक रविवार को, दोपहर 12-3 प्म को हुयी, और सिर्फ 12 दोस्त, और एक जज के सामने. दोस्तो पर कुछ न कुछ खाना बना कर लाने का भार था. और हिन्दुस्तानी थीम की पौशाक पहनने का.

पिछ्ले साल भाई की शादी के लिये पिताजी ने हल्वाई, पंडाल आदि क इंतेज़ाम किया था, पर मेरा भाई सब कैंसिल करवा दिया. सो घर मे जितने यार-दोस्त, नाते-रिश्तेदार आये सब ने मिलकर 100 लोगों का खाना बनाया, और इतना अच्छा कि शायद ही किसी बारात मे मिले.
उसके साथ्, रात भारत गाना-बजाना चलता रहा, और 5-70 साल वाले सभी लोगों ने धमाल किया.

कम से कम दस बार हाथ जोड्कर भाभी के पिता को समझाना पडा कि वो कुछ न दे, हमारे घर मे रखने की जगह नही है. पर किसी किस्म की कमी भी नही है.

ये सभी चीज़े हो सकती है,

सिर्फ वर-पक्ष पर दोश ठीक नही है, वधू के पिता को भी अपनी समाजिक साख बनाने की बहुत उतावला पन होता है.

दूसरा पक्ष ये भी है, कि दिखावे की शादी करने के बाद, बेटी का बाप, अपने अपराधो का सामाजिक प्राय्स्चित करता है. उन पापो का, जो उसने अपनी बेटी के पालान मे दोगलेपन का किया. और इस बहाने अपनी जायजाद के बडे हिस्से से बेटी को बेदखल करता है.

दिनेशराय द्विवेदी said...

बातों से कुछ न होगा। ठोस काम करना होगा। व्यक्तिगत स्तर पर भी और सामाजिक स्तर पर भी। पहले एक समूह बनाऐँ ऐसे लोगों-परिवारों का जो विवाह को सादा और पारिवारिक समारोह बनाने के लिए सहमत हों। फिर सामूहिक रुप से कार्रवाई शुरू की जाए। आज भारत में कोई भी सामाजिक सुधार का आँदोलन नहीं है, इसे प्रारंभ करना चाहिए। चोखेर बाली ही इस की शुरुआत क्यों न करे?

Anonymous said...

ऐसा क्यों किया आपने, वो बच्ची जिसकी शादी पर आज आप दुख जता रही हैं। उसे जन्म की पहली घड़ी से जानती है, आखिर आप भी तो उसी परिवार की बेटी हैं, परिवार को भी जानती हैं तो जब उसके भविष्य का फैसले हो रहे थे, मैं शादी के फैसले नहीं, तीन दिन की मासूम बच्ची के पच्चीस साल की युवती होने के बीच के सालों में होने वाले अनगिणत फैसले की बात कर रहा हूं। उस वक्त क्या कर रही थीं आप, क्यों नहीं उठाए कदम, अगर कदम उठाने के बाद भी कुछ नहीं कर पाई तो भी आप भी उतनी ही जिम्मेदार है, अपनी भतीजी को इस लाइक बनाने के लिए कि कोई उससे अपनी शर्तों पर शादी करने आए ऐसे आने वाले लोग तो जो है सो हैं. आपने क्यों नहीं किया कुछ,और अब क्या, परीक्षा के वक्त सवाल के जबाव रटने का कोई फायदा नहीं, रिजल्ट तो तय हैं. तो भतीजियों के साथ अगर ऐसा होता है तो बुआ और चाचा भी दोषी है। बराबर के दोषी क्योंकि भतीजियां उनकी भी संतान हैं. उनके ही परिवार की संतान।

तो अब ये दुख क्यों

ये क्या नाटक हैं, ज्ञान बघारने बुद्धिजीवी बनने और दुनिया की फिक्र में दुबले होने का ड्रामा।

खुल के बोल said...

जब टकराव सिस्टम और इंडीविज़ुअल के बीच होता है तो बहुत मुश्किल है कि व्यक्ति बाहर से रहकर सिस्टम को बद्ल पाए और इतिहास गवाह है इस बात का कि ज़्यादातर जगहों पर जब भी बदलाव आया है तो उन व्यक्तियों के द्वारा ही लाया गया जो उसका हिस्सा थे क्योंकि पहले वे उसको समझते हैं ,हर दाँव पेंच को समझते हैं और फिर उसमें बदलाव की कोशिश करते हैं,इसलिए यह कहना कि वन्दना जी को उस विवाह् मे शामिल नही होना चाहिये यह कहना ठीक बात नही है।
और ऊपर से इस विवाह का बॉयकॉट करके तो वे कुछ भी नहीं कर पायेंगी ।
सुनील दीपक की बात से सहमत होते हुए मै भी यह मानता हूँ कि पीछे हटने की बजाये आगे चलते हुए देखना चाहिये ।

Anonymous said...

aapne bilkul sahiikehaa khul kae bol jee
shaadi mae bahut lena dena hota haen sab kuch mil jaaye phir system mae reh kar system ko gaali daegae
jaldi hee kyaa haen
samaj kehaa bhaga jaa rahaa haen
aur abhi to ham sab bachchey haen jab badey ho jaayaegae tab karae gae badlav per baat chit . aap kae kament sae mae vaakyi prasan hun kyoki mujeh jarur ek disha mil gayee haen
rachna

rakhshanda said...

aaj shaadi sachmuch ek tamasha ban gayi hai,shayed isiliye shaadi ka naam sunkar khushi ke bajaye dar lagta hai.lekin dukh is baat ka hai ki bura lagne ke bavajood jab hamara time aata hai to ham bhi unhin logon mein shaamil ho jaate hain.majboori mein hi sahi,par yahi sachayi hai.

Vandana Pandey said...

टिप्पणियों के लिए और बधाइ के लिए हार्दिक धन्यवाद.

Unknown said...

आप ने ठीक कहा कि इस नाटक के किसी भी पात्र की इज़्ज़त कर पाना आसन नहीं होगा। समस्या बहुत गहन है. अब मात्र वर पक्ष के लोग ही धूम धाम नहीं चाहते. दुल्हन और उस के घरवाले भी अपनी आर्थिक स्तिथि से बाहर जा कर धूम धाम करते हैं. सब दिखावट है, पर इस दिखावट से वधु का पिता ही हलाल होता है. जो मांगता है वह निस्संदेह याचक है, पर इस याचकी को अब अति शिक्षित समाज में प्रोग्रेसिव होना माना जाता है.

अनुप्रिया के रेखांकन

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