Sunday, April 13, 2008

एक शादी ऐसी भी

मेरी पोस्ट -शादी या तमाशा- पर जो टिप्प्णियाँ आईं, उनमें उठाए गए मुद्दों को लेकर यह पोस्ट लिख रही हूँ।
२७ जून २००५... आज नेहा की शादी का दिन है। सुबह ड्राइंगरूम का सब फ़र्नीचर किनारे लगा कर कुछ चादरें बिछा दी गईं। नेहा के पिता एक फूल वाले को बुला लाए किसने गेंदे के फूलों की झालरें दीवारों पर सजा दीं। नेहा ने एक हरे रंग की साड़ी और कुछ हल्के गहने पहने। बस, हो गई शादी की तैयारी पूरी।
दस बजे राम कृष्ण मिशन के पंडितजी पूजा का सामान लेकर आ गए और वेदी सजाने में व्यस्त हो गए। ग्यारह बजे बारात आ गई-बारात, यानी दूल्हा विक्रम और उसके माता पिता श्री और श्रीमती अग्रवाल, जिन्हें विक्रम स्वयं कार चला कर ले आया था। बारात का स्वागत किया केवल नेहा के माता-पिता, उसके भाई- भाभी और साल भर की नन्ही भतीजी ने। हल्के जलपान के बाद सब लोग वेदी के चारों ओर बैठ गए और शादी का कार्यक्रम शुरू हो गया। एक बजे शादी समाप्त हुई। शादी में दोनों परिवारों को छोड़ कर कोई शामिल नही हुआ, एक फोटोग्राफ़र तक नहीं। शादी के दौरान तस्वीरें घर के सदस्यों ने अपने कैमरे से खींची। सबके भोजन के बाद नेहा का सूटकेस विक्रम की गाड़ी में रख दिया गया और दुल्हन विदा हो गई। शादी इसी तरह हो, ऐसा प्रबल आग्रह नेहा और विक्रम का था जिसे उनके माता-पिता ने माना। शादी में कोई लेन देन नहीं हुआ।
नेहा मेरी बेटी है। मैंने यह विवरण इसलिए लिखा ताकि यह बता सकूं कि मेरे विचार सिर्फ़ कागज़ी नहीं हैं जैसा कुछ लोग समझ रहे हैं। मेरी अपनी बेटी की शादी निहायत सादगी से हुई है। इसलिए स्वप्नदर्शी की टिप्पणी मुझे बहुत भली लगी। स्वप्नदर्शी के अनुसार उनके घर के दोनों विवाह इस तरह से हो सके क्योंकि वर वधू दोनों ऐसा चाहते थे। ऐसा ही मेरे घर में भी हुआ। नेहा और विक्रम बहुत से लोगों( करीबी रिश्तेदार, नाना-नानी, ताऊ, मामा, बुआ, मौसी, चचेरे-ममेरे भाई बहन आदि) की नाराज़गी के बाद भी यदि अपनी बात पर दृढ नहीं बने रहते, तो उनकी शादी इस तरह से नहीं हो पाती। यह सब उदाहरण सुनील दीपक की राय को सही सिद्ध करते हैं । बदलाव लाने के लिए युवा वर्ग की सोच में बदलाव आना ज़रूरी है।
गगन शेखर सवाल उठा रहे हैं कि मैंने अपनी भतीजी के जीवन को सुधारने के लिये उसके जन्म से लेकर अबतक क्यों कुछ नहीं किया। गगन जी, जन्म से लेकर सत्रह वर्ष तक उसके पालन पोषण में भाई ने कोई कमी नहीं उठा रखी थी। समस्या उसके बाद शुरू हुई। बच्ची का भला चाहने वाले घर के जो भी सदस्य थे, उनकी राय के बावज़ूद वह बेटी को अपने छोटे शहर के बाहर किसी छात्रावास में रह कर कोई व्यावसायिक कोर्स कराने के लिए तैयार नहीं हुए। लिहाज़ा लड़की बिना किसी विशेष लक्ष्य के पढ़ती चली गई और कोई ढंग का रोज़गार पाने में सफ़ल नहीं हुई। उसके विवाह के समय जब भाई दहेज की भारी मांग के चलते योग्य वर नहीं जुटा पा रहे थे, तब हमलोगों ने उन्हें बिरादरी के बाहर के योग्य वर सुझाए जो दहेज मुक्त विवाह करना चाहते थे, पर वह उन पर विचार करने के लिए भी नहीं माने। माना वह बच्ची घर की है, घर के सब सदस्यों को पर उसके जीवन को संवारने का दायित्व है, पर उसके भविष्य को लेकर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार तो उसके माता पिता का ही है। नहीं होता, तो क्या मेरे पति और मैं अपने-अपने परिवारों के कडे़ विरोध के बाद भी नेहा की शादी इतने संक्षेप में कर सकते थे?
रचना इस विवाह में मेरे शामिल होने को गलत मान रही हैं। समस्या इतनी सीधी सादी नहीं है। जो भाई मेरे जीवन के हर सुख दुख में अपनी हर परेशानी को अलग रख कर मेरे साथ खड़े रहे हैं, उनसे इस बात पर मैं अलग तो नहीं हो सकती। एक दूसरे से घोर असहमति के बावज़ूद एक परिवार के रूप में हम एक दूसरे से जुडे हैं। वह न मेरी बेटी के अंतर्जातीय विवाह से तनिक भी सहमत थे, न उसके विवाह के अति संक्षिप्त तरीके से, फ़िर भी वह विवाह के पश्चात मेरी बेटी दामाद से मिलने आए और उन्होंने नव वर-वधू को हृदय से आशीर्वाद दिया। अब यह करने की बारी मेरी है। हाँ, दिनेश राय द्विवेदी और चंद्र भूषण जी के सुझाव के अनुसार समाज की इन कुरीतियों को दूर करने के लिये कोई समूह बने तो उसका भाग ज़रूर होना चाहूंगी। मैं अकेले विरोध करके ’अकेला चना भाड़ नहीं फोड सकता-’ इस कहावत को ही सिद्ध करूंगी।
स्वप्नदर्शी का यह कहना भी ठीक है कि ऐसे मामलों में केवल वर पक्ष को दोष देना उचित नहीं है, कई बार लड़की का पिता बेतहाशा खर्च करके अपनी सामाजिक साख बनाने का प्रयास करता है। ऐसे खर्च करके वह यह भी मान बैठता है के उसने बेटी के प्रति अपनी सब ज़िम्मेदारी पूरी कर दी और अब उसे बेटी को उत्तराधिकार में कुछ देने की ज़रूरत नहीं। साख अपनी बढ़ाई, बेटी के नाम कुछ किया नहीं और मान लिया कि बेटी को उसका हिस्सा मिल गया, अब जो कुछ पास है, बेटों का ही उसपर हक है। अजीब बात लगती है न? पर ऐसा सोचने वाले न जाने कितने माता पिता हमारे आस-पास ही हैं।
यायावर जी की समस्या क्या है, समझ में नही आया। उन्हें ब्लाग पर अपनी बात लिखने वाले लोगों से इस कदर शिकायत क्यों है, जबकि हमारा देश एक गणतंत्र है जहाँ हर किसी को अपनी बात कहने का पूरा हक है। उन्हें यह भी लगता है के ब्लागर सिर्फ़ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातें कर रहे हैं, कोई कुछ ठोस करना नहीं चाहता। यायावर जी, विचार-विमर्श करना किसी भी कदम उठाने की पहली सीढ़ी है। यह आशा करना कि हर ब्लागर झटपट सोशल एक्टिविस्ट बन जाए, अव्यवहारिक है। ब्लाग के ज़रिए लोग अपनी तरह सोचने वाले लोगों के संपर्क में आते हैं और मिल जुल कर कुछ करने की सोच तो सकते हैं। महिला ब्लागरों के बारे में उनकी राय सबसे दिलचस्प है। उनका खयाल है कि ब्लाग लेखन अमीर महिलाओं के लिये किट्टी पार्टी के बाद का अगला टाइम पास है। जानना चाहूंगी कि इस निर्णय पर वह कैसे पहुँचे कि सब ब्लागर लेखिकाएं अमीर हैं। एक ओर वह उन्हें निहायत अमीर घोषित करते हैं, और दूसरी ओर उन पर इल्ज़ाम लगाते हैं कि वह ब्लागिंग करने का उनका एकमात्र उद्देश्य इसके ज़रिए कमाई करना है। यह विरोधाभास समझ में नहीं आया। खैर...
सभी पाठकों का आभार..

6 comments:

PD said...

सारी पोस्ट पढता रहा हूं भले कोई टिप्पणी नहीं किया.. आज के आपके पोस्ट से मैं पूर्ण सहमत हूं..

rajendra kumar tiwari said...

congratulations!All the people
should follow suit and stop wasting
a lot of money which can be utilised for some constructive ideas.The fact is we are a poor
country only because we want to
show what we are not.Why should one
want to become a prince for one night and suffer for the whole life
in paying back the loan instalmens
It is your deeds that matter not your caste.I really appreciate your
contribution to society by not wasting the resources unnecessarily

स्वप्नदर्शी said...

वन्दना जी, इस इमानदार पोस्ट के लिये बहुत बहुत शुक्रिया. सतही तौर पर बेटी के पैदा होने से लेकर, मरने तक, उनके बोझ का रोना हमारे समाज मे मा-बाप रोते है, और देहेज जुटाने के नाम पर हर सही गलत काम को सही ठहराते है, जिनमे लडकी को अच्छी शिक्सा से वंचित रखना, घरेलू कामो को ज्यादा तरजीह देकर,उन्हें पढने के लिये भरपूर समय न देना, उन्हें अपने जीवन साथी का चुनाव न करने देना, आदि है. और समजिक रूप से भ्र्स्टाचार के लिये एक कवर गढना भी.
पर हकीकत यही है, कि सम्पन्न वर्ग बेटी को बेटे के मुकाबिले, एक छोटा स हिस्सा ही देता है, केवल सम्पति मे हि नही, बल्कि, साहसिक रूप से आगे बढने मे , अपने समय और ऊर्जा मे भी. और धूम-धाम वाली शादी भी, अपनी समाज मे साख के कारण ज्यदा है, न कि बेटी के भले के लिये.
अमूमन कम से कम 200-400 बरतियो की खातिर्दारी और लेन-देन मे एक मध्य्वर्गीय परिवार आज 5-10 लाख खर्च करता है. परंतु कोई अपनी बेटी से नही पूछता कि इस पैसे को जो उसका हिस्सा कहा जाता है, वो कैसे उपयोग करना चाहती है?
कई बेटीया, बकायदा आज के समय मे इतने पैसे मे कोई प्रोफेसनल कोर्से करना चाहती है, परंतु उनके पिता नही करने देते. एक रात की सजावट, 500 लोगों क खाना-पीना और कुछ घरेलु सामान ससुराल वालो के काम आ जाता है, जो साल-दो साल मे टूट जाता है.
और नयी बहू, एक पराये घर मे पैसे-पैसे को मोहताज़ रहती है. ससुराली और पति समझ्दार हुये तो उसे कुछ पैसे मिलते है, और एक अलग परिवार, स्वतंत्र हैसीयत बनते-बनते 10-15 साल बीत जाते है. एक विस्थापित व्यक्ति, जो साधन् हीन भी है, उसके पास एक ही चारा है, सबकी हूकूमत बजाना, अपने आत्म को मारना.
कठिन परिस्थति मे मा-बाप के पास अक्सर कुछ बचा नही रह जाता, लडकी को सहारा देने के लिये,

शादी के कई सालो तक वर की अपने पैत्रिक घर से अलग घर बनाने की न हैसीयत रहती है, न हिम्मत, न विजन. और कानूनी रूप से भी ससुराल वाले जब चाहे बहू को घर से बाहर निकाल सकते है. सास-ससूर की सम्पति पर और उनके घर पर उनकी मर्ज़ी के खिलाफ बहू रहने का दावा नही कर सकती.
इसी तरह के कुछ फैसलो के बारे मे लोकेश की अदालत वाले ब्लोग पर जानकारी है.

ऐसी स्थिति मे अगर पिता वाकई बेटी से प्यार करता है, तो उसे लडकी के हिस्से को अपने मनमाने तरीके से खर्च नही करना चाहिये. और बेटी की रज़ामन्दी ज़रूर होनी चाहिये कि वो क्या करें अपने हिस्से का.

जो मा-बाप अपने बेटी की शिक्शा और पालन मे कमी नही करते, उनसे बेटी को अपने विवाह, और सम्पति मे हिस्से के लिये आगह्र नही करना चाहिये.

R.ChamberofBeauty said...

bahot achhi post hai,kaash ham sabhi aisa hi kar saken.

mamta said...

एक अच्छी पोस्ट के लिए बधाई।

आर. अनुराधा said...

मेरी अपनी शादी घंटे भर में मिबट जाने वाली शादियों की सूची में रही। अब वक्त यही मांगता है- शादी में दिखावे और सामाजिक साख की बजाए उसके जरूरी व्यावहारिक पक्षों- आपसी ताल-मेल, आर्थिक स्वावलंबन, सेहत जैसे मुद्दों पर फोकस हो। इस पोस्ट से मुद्दा पूरी तरह साफ हो गया। शुक्रिया इस आम लेकिन जटिल विषय को उठाने के लिए।

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