Thursday, April 10, 2008

स्त्री-पुरुष समानता की दिशा में

रानी को चाहिए आधा राज-पाट


राजा-रानी का मुहावरा सुनने में बहुत मधुर लगता है। यह आभास भी होता है कि दोनों की हैसियत एक बराबर है। लेकिन इससे बड़ा भ्रम कुछ और नहीं हो सकता। राजा रानी का पति नहीं है, बल्कि रानी राजा की पत्नी है। राज्य का स्वामी राजा है, रानी का उसमें कोई हिस्सा नहीं है। रानी के आने के पहले भी राजा राजा था, लेकिन राजा से परिणय के पहले रानी रानी नहीं थी। यानी राजा रानी के रुतबे में कुछ वृद्धि करता है, पर रानी राजा के रुतबे में कोई वृद्धि नहीं करती। वह राजा के गले में पड़ी हुई माला की तरह है, जिसे राजा जब चाहे गले से निकाल कर फेंक सकता है। दिनकर की एक बहुत खूबसूरत कविता में कहा गया है --
राजा वसंत, वर्षा ऋतुओं की रानी/
लेकिन, दोनों की कितनी भिन्न कहानी/
राजा के मुंह में हंसी, कंठ में माला/
रानी का अंतर विकल, दृगों में पानी।

और यह कोई नई बात नहीं है। दिनकर आगे कहते हैं --

लेखनी लिखे, मन में जो निहित व्यथा है/
रानी की सब दिन गीली रही कथा है/
त्रेता के राजा क्षमा करें यदि बोलूं/
राजा-रानी की युग से यही प्रथा है।

यही बात प्रत्येक युगल -- जो राजा-रानी का ही एक रूप है -- पर लागू होती है। विवाहित स्त्री ज्यादा से ज्यादा स्त्रीधन की अधिकारिणी है। यह वह धन है जो स्त्री को विवाह के समय उपहार में मिलता है। उपहार देनेवाले उसके माता-पिता तथा अन्य संबंधी हो सकते हैं, मित्र और परिचित हो सकते हैं तथा ससुराल पक्ष के लोग भी हो सकते हैं। आम तौर पर यह स्त्रीधन भी ससुराल की सामूहिक संपत्ति का हिस्सा बन जाता है और उस पर विवाहित स्त्री अपना कोई दावा नहीं कर सकती। इस तरह स्त्री को सर्वहारा बना कर छोड़ दिया जाता है। लेकिन विवाद के समय वह चाहे तो स्त्रीधन अर्थात अपनी निजी संपत्ति को वापस मांग सकती है। व्यवहार में जो भी होता हो, कानूनी स्थिति यही है।

आजकल हमारे देश में विवाद का एक नया विषय खड़ा हो गया है। नया कानून यह है कि पिता की संपत्ति में बेटियों का भी हक है। अभी तक माना जाता था कि विवाह के समय दान-दहेज के रूप में बेटी को जो दिया जाता है, वह एक तरह से पिता की संपत्ति में उसका हिस्सा ही है। विवाह के बाद उसके प्रति उसके मायकेवालों की कोई आर्थिक जिम्मेदारी नहीं रह जाती। दहेज-मृत्यु की घटनाओं को देखते हुए यह बात अत्यंत हास्यास्पद प्रतीत होती है। आज हजारों विवाहित महिलाएं जीवित होतीं, अगर उनके माता-पिता ने उनकी ससुराल के धनपशुओं की मांग स्वीकार कर ली होती। लेकिन कानून में परिवर्तन ने स्त्रियों की वैधानिक स्थिति थोड़ी मजबूत कर दी है। अब पिता की संपत्ति में उनका हक उनके भाइयों के बराबर हो गया है।

बहरहाल, बहुत कम परिवार ऐसे हैं जहां बेटियों के इस हक का सम्मान होता है। इसका एक कारण तो परंपरा है, जिसमें बेटी के कोई कानूनी अधिकार नहीं होते थे। उसे पराया धन माना जाता रहा है (अब भी माना जाता है), जिसका उचित स्थान उसकी ससुराल में है। मायके में वह आती-जाती रह सकती है, पर वहां की किसी चीज में वह हस्तक्षेप नहीं कर सकती। जो उसका घर ही नहीं है, उस पर उसका क्या हक। लेकिन समानता का कानूनी अधिकार मिल जाने के बाद भी उसकी बुनियादी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। अगर वह अपना हिस्सा मांगती है, तो मायके के सारे लोग, उसके भाई, विधवा मां आदि, उसके खिलाफ हो जाते हैं और उसे धन पिशाचिनी मानने लगते हैं। इस डर से ऐसे दावे अकसर नहीं किए जाते। परंपरा कानून पर भारी पड़ती है। लेकिन कभी-कभी ऐसे दावे होते भी हैं और तब मामला अदालत में पहुंच जाता है।

पिता की संपत्ति में हिस्सा इस तथ्य की याद दिलाता है कि वह संपत्ति माता-पिता की नहीं है, सिर्फ पिता की है। पिता के मरने के बाद ही मां को उसका एक हिस्सा मिल पाता है -- उसकी संतानों के साथ, लेकिन पिता के जीते जी उसकी संपत्ति में मां का कोई हिस्सा नहीं होता। वह सर्वहारा का जीवन जीती है। यही नियति उसकी बेटियों की होती हैं। जब वे एक नए परिवार में शामिल होती हैं, तो उस नए परिवार में चाहे जितनी संपत्ति हो, उनकी अपनी हैसियत अपनी मां जैसी हो जाती है -- धन और संपत्ति से विहीन। इसका सबसे दुखद परिणाम तब सामने आता है, जब तलाक की नौबत आती है। तलाक के बाद उसे अपनी पति की संपत्ति का कोई हिस्सा नहीं मिलता। उसे अगर कुछ मिलता है, तो सिर्फ गुजारा भत्ता या तलाक भत्ता (एलिमनी)। आजकल, कम से कम पश्चिम में, विवाह के वक्त ही अकसर यह तय कर लिया जाता है कि तलाक की स्थिति में एलिमनी की रकम क्या होगी। मुस्लिम विवाह में इसे मेहर कहते हैं। तलाक देने के बाद शौहर को मेहर की रकम देनी पड़ती है। पूर्व-निर्धारित एलिमनी और मेहर में एक पेच यह है कि विवाह के बाद शौहर की आमदनी कई गुना बढ़ जाए, तब भी इस रकम में कोई वृद्धि नहीं होती। औरत की जो कीमत एक बार तय हो गई, वह हो गई। पति चाहे जितना मालदार हो जाए, पत्नी का मेहर-मूल्य नहीं बदलता। दूसरी बात यह है कि जिस शख्स में मेहर चुकाने की जबरदस्त क्षमता हो, वह शादी पर शादी कर सकता है। कहते हैं, मुसलमान पुरुषों को चार शादियां तक करने की छूट है। लेकिन यह सीमा एक समय में चार तक लागू होती है। एक को तलाक दे कर दूसरी शादी करने की स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए मुस्लिम पुरुष चाहे तो अपने जीवन काल में एक के बाद एक कर सैकड़ों शादियां कर सकता है। एक-विवाह की परंपरा ईसाइयत की देन कही जाती है। लेकिन अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस आदि में हर पुरुष और हर स्त्री औसतन तीन विवाह करते हैं। मरलिन मुनरो ने शायद पंद्रह या सोलह विवाह किए थे। इस कायदे को क्रमिक बहु-विवाह माना जाता है, जिससे एक-विवाह की प्रथा भी बनी रहती है और बहु-विवाह की स्वतंत्रता भी।

जाहिर है, पति-पत्नी के बीच यह आर्थिक व्यवस्था स्त्री की हैसियत को कमजोर करती है। पूंजीवादी व्यवस्था में आपकी हैसियत उतनी ही है आपकी जेब में जितने पैसे हैं। इस संदर्भ में याद किया जा सकता है कि स्त्रियों की परंपरागत पोशाक में जेब ही नहीं होती थी। जब पास में पैसे ही नहीं हैं, तो जेब की क्या जरूरत है। यह स्त्री के स्वाभिमान और अपने निर्णय खुद लेने की उसकी क्षमता पर जबरदस्त प्रहार है। सर्वहारा स्त्री का सामना संपत्तिशाली पति से पड़ता है और वह उसकी चापलूसी करने के लिए बाध्य हो जाती है, जिसे उसके प्रेम के नाम से जाना जाता है। स्त्री को आर्थिक रूप से स्वतंत्र करते देखिए, फिर उसके प्रेम की परीक्षा कीजिए। तब हो सकता है, बहुत-से पुरुषों को निराश होना पड़े। अभी तक उन्होंने ऐसी स्त्री का ही प्रेम जाना है जो उनके सुनहले या रुपहले पिंजड़े में कैद है। इस कैद में अपने को सुखी रखने के लिए स्त्री को पता नहीं कितने छल-छंद सीखने पड़ते हैं, जिसे त्रिया चरित्र के नाम से जाना जाता है।

इसका एक ही समाधान है कि विवाहित पुरुष की संपत्ति और आय में उसकी पत्नी का हिस्सा बराबर का माना जाए। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। बल्कि यह हर दृष्टि से स्वाभाविक और तार्किक है। लोकतंत्र के युग में रानी की हैसियत राजा के बराबर होनी ही चाहिए। तभी राजा-रानी के बीच प्रेम स्वाभाविक रूप से स्थायी हो सकता है। मजबूरी में दिया जानेवाला प्रेम प्रेम नहीं, चापलूसी है। इस चापलूसी के कारण रानी को मांग होने पर अपना शरीर भी समर्पित करना पड़ता है, इससे बड़ी व्यथा और क्या हो सकती है। पुरुषों को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़े, तब उन्हें पता चलेगा कि प्रेमहीन समर्पण कितनी अश्लील चीज है -- यह आदमी का स्वाभिमान नष्ट करती है और उसे गुलाम बनाती चीज है। अगर हम अपनी सभ्यता को सभ्य बनाना चाहते हैं, तो इस आर्थिक असमानता को नष्ट कर देना जरूरी है। तब तलाक के बाद अपने भरण-पोषण के लिए स्त्री अपने पुरुष की मुखापेक्षी नहीं रह जाएगी। पति और पत्नी की आर्थिक हैसियत एक जैसी होगी। इस व्यवस्था के तहत वैवाहिक जीवन में भी स्त्री पुरुष से हीन नहीं रहेगी। दोनों बराबरी का आनंद उठाएंगे और एक दूसरे को सताने के बारे में नहीं सोचेगा।

इस परिकल्पित व्यवस्था के पीछे एक मजबूत आर्थिक तर्क भी है। जब लड़की अपने मां-बाप के साए में रहती है, तो वह एक आर्थिक इकाई का सदस्य होती है। अगर मां-बाप पुरुषवादी नहीं हुए, तो उसे भी उतना ही प्रेम और सम्मान मिलता है जितना उसके भाइयों को। विवाह के बाद इस आर्थिक इकाई से उसका संबंध टूट जाता है और वह दूसरी आर्थिक इकाई का सदस्य हो जाती है। यह तार्किक नहीं है कि उसे दो-दो आर्थिक इकाइयों का लाभ मिले। इसलिए यदि यह व्यवस्था बनाई जाए कि उसे अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा न मिले, बल्कि नई आर्थिक इकाई में उसे बराबर का हिस्सेदार बनाया जाए, तो यह शायद ज्यादा उचित और व्यावहारिक होगा। मैं यह दावा नहीं करता कि यह व्यवस्था ही उत्तम है। पिता की संपत्ति में बेटी का हिस्सा रखते हुए भी ऐसी व्यवस्था बनाई जा सके जिसमें विवाह के बाद नए परिवार में उसके साथ समानता का बरताव किया जाए, तो इससे बेहतर क्या हो सकता है। लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सोचते समय हमें यह खयाल भी रखना चाहिए कि जिस आर्थिक इकाई को वह छोड़ आई है, वहां बहुएं आएंगी और उन्हें नई आर्थिक इकाई में समान हिस्सा मिलेगा। इसलिए एक परिवार पर दुहरा बोझ नहीं डाला जा सकता। एक दूसरी व्यवस्था यह हो सकती है कि विवाह के बाद वर-वधू को उनका हिस्सा दे कर एक स्वतंत्र आर्थिक इकाई बनाने को कहा जाए। लेकिन मैं इसके पक्ष में वोट नहीं दूंगा, क्योंकि यह संयुक्त परिवार की अवधारणा के विरुद्ध है, जो एकल परिवार से हमेशा और लाख गुना बेहतर है।

जो लोग समानता और स्वतंत्रता के समर्थक हैं (और आजकल कौन नहीं है?), उन्हें इस प्रश्न का जवाब देना होगा कि अगर परिवार के भीतर ही अ-समानता और अ-स्वतंत्रता बनी रहती है, तो सामाजिक ढांचे में समानता और स्वतंत्रता कहां से आ सकती है? व्यक्ति को समाज की इकाई माना जाता है, लेकिन मुझे अब इसमें संदेह होने लगा है। जैसे आजकल शब्द को नहीं, वाक्य को भाषा की इकाई माना जाता है, वैसे ही तर्क कहता है कि व्यक्ति को नहीं, परिवार को समाज की इकाई माना जाए। बहुत-से पुरुष और स्त्रियां अकेले रहते हैं, लेकिन यह स्वाभाविक नहीं, अस्वाभाविक स्थिति है। ऐसे व्यक्तियों के असामाजिक हो जाने की संभावना बढ़ जाती है। ज्यादातर व्यक्ति परिवार में पैदा होते हैं और परिवार में ही जीवन व्यतीत करते हैं। इसलिए व्यक्ति का कोई अर्थशास्त्र नहीं हो सकता। अर्थशास्त्र होगा, तो पूरे परिवार का होगा। वही मूलभूत आर्थिक इकाई है। जो लोकतंत्र को मानता है, वह इससे इनकार कैसे कर सकता है कि इस इकाई के सभी सदस्यों का हक बराबर हो? यहां तक कि बच्चों का भी। 000
राजकिशोर

14 comments:

ab inconvenienti said...
This comment has been removed by a blog administrator.
ab inconvenienti said...
This comment has been removed by a blog administrator.
L.Goswami said...

rajkishor jee mhilaon ke pakchh me bolne ki ye aapko yhi sja dete agr inka bs chlta

सुजाता said...

अपनी औकात खटराग ने बता दी है । कोई पुरुष साथ खड़े होने लगे तो खटराह जैसे फ्यूडल को कितनी दिक्कत हो सकती है वह ऊपर के दोनो अश्लील भद्दे कमेंट से ज़ाहिर हो गया ।शायद वह अपनी पत्नी और बहन के पक्ष मे भी बोलने की हिम्मत भी नही करते होंगे ।

सुजाता said...

खटराग ब्लॉग शायद सिर्फ गालियाँ देने के लिए ही बनाया गया है -देखिये ज़रा -http://limestone0km.blogspot.com/

Neelima said...

खटराग महोदय की टिप्पणी पढकर बहुत अफसोस हुआ ! बहुत ही निंदनीय है यह सोच !खटराग का खटमल राग बहुत बेशर्म ,कुंठित,सामंतवादी ,लिंगपूजक का पागलगान है ! कान देने की जरूरत नहीं है इसपर !!

Anonymous said...

sujata
all such comments which you delete from blog post please try to make one post on the same . why should we refrain from highlighting comments that are casted against us . they try to humilialte nit you but woman folk and once we start putting these comments on the blog post it will be understood that we have are not annoyed , we are not amused but we are higlighting the " trash " so that all woman writers specially young girls who are coming in blogging know for sure that still in 21 st centuary the "man " and his mental level has seen no growth
woman are growing , reaching heights not just professionally but mentally as well . they are breaking records and boundries and in contrast the man is still where he was in his thinking . and a time will come when like honey bee the role of man will become restricted to be used for raising the next generation .
with love to you and all other woman bloggers . we among us may have differences of opinion but in this blog world we stand united with each other to face the volleys of foul language and comments . our opinion may vary on issues because we have the capabilty to think and move ahead with time but we are UNITED .

ab inconvenienti said...

मेरी बातें गाली क्यों लग रही हैं? मैंने दोनों कमेंट्स में कहीं भी असंवैधानिक या अनर्गल शब्द का प्रयोग नहीं किया. (किया हो तो हाईलाईट करें). पहला कमेन्ट राजकिशोर भाई को था, उसमे ग़लत क्या था? सही बात कड़वी लगती है........... महिलाओं को अपना हक बिना किसी पुरूष के समर्थन के चाहिए, उन्हें डर है की कल को उनकी सफलता का श्रेय पुरुषों के एक वर्ग को न मिल जाए. मैंने इसी बात को लेकर आगाह किया था.
और दूसरे कमेन्ट पर मैं क्या कहूँ................ सदियों से विश्व भर में लगभग सभी शासक युद्ध में बंदी बनाये गए योद्धाओं को castrate करके उनसे अपने रानिवासों और परिवार की स्त्रियों की खिदमत करवाते थे. And without exception अंग भंग होने के बाद वही पुरूष स्त्रौन (effaminate) होकर खुशी खुशी रानियों की सेवा करता था. मेरी तो सभी युवा स्त्रियों को सलाह है की वे सभी अपने बच्चों का castration का ऑपरेशन करा कर उन्हें पुरूष होने के पाप से बचाएँ. एक तीर से दो शिकार, बच्चे जीवित भी रहेंगे और उनके अन्दर का पुरूष भी मर जाएगा. अगर गाँधीवादी तरीके अपनाएँगी तो काम लगभग असंभव है, उनके अन्दर की पुरूष प्रवृत्ति गाहे बगाहे सिर उठाएगी ही ........... पर इस तरीके से तो अगले 15 साल में समस्या जड़ से समाप्त हो जायेगी. क्यों एक औरत अपने लड़के का नपुंसक होना बर्दास्त नहीं कर सकती?और कोई औरत क्यों हमेशा अपने से intellectully supirior से ही शादी करना चाहती है, और अपने से कम बुद्धि वाला उन्हें सहन नहीं होता? आख़िर क्यों? खैर, अगर आप में से किसी भी की पहचान किसी Endocrinologist or psychiatrist or neurologist से पहचान हो तो आप मेरी इस बात को कन्फर्म करें और साथ ही testastorone and its effects on human emotional state and psychology पर भी जानकारी लें. ज़रा हिम्मत दिखाएँ और मेरे सारे कमेंट्स को एक नए ब्लॉग पोस्ट पर शो करते हुए, मेरे इस एक सवाल का जवाब विस्तृत रूप से दें. Dare this?

सुजाता said...

आपका मानसिक संतुलन गड़बड़ाया हुआ है लगता है ।इतनी खुन्दक और् नफरत !!
***
महिलाओं को अपना हक बिना किसी पुरूष के समर्थन के चाहिए, उन्हें डर है की कल को उनकी सफलता का श्रेय पुरुषों के एक वर्ग को न........

***
समर्थन की बिल्कुल ज़रूरत है मिल भी रहा है ,पर आप जैसे कुछ लोगों को इसमे दिक्कत हो रही है ।बड़ा प्रश्न यह है कि आप जैसों को कैसे सेंसिटाइज़ किया जायेगा जिनके मन मे स्त्री के खिलाफ इतनी कटुता हो ।

मसिजीवी said...

चोखेरबाली भला क्‍यों पाठकों की क्षमता पर इतना संदेह करती हैं कि सदैव ही नीजर्क रिएक्‍शन से बात करती हैं...हम जैसे लेट लतीफ जो अब पढ़ने बैठे हैं समझ ही नहीं पा रहे कि कहा क्‍या गया कि उसे मिटाया गया - एकाध गाली होगी- जब आप सड़क पर निकलती है तब भी खटरागी गालियॉं कहते सुनते ही हैं।
टैगलाइन बदली हुई है, माडरेशन लागू है चोखेरबालियॉं तो एकाध लुच्‍चई से ही दुपट्टा संभालने लगीं

अनौपचारिक चैलनों से पता कर सकते हैं कि क्‍यों इतना भय, पर सब पाठकों के पास तो ये चैनल उपलब्‍ध नहीं।

Unknown said...

मैं किसी विवाद में पड़ना नहीं चाहता, इस लिए जो मैं कहने जा रहा हूँ उस का सीधा मतलब लगाएं. धन्यवाद.

ईश्वर ने स्त्री और पुरूष की रचना जिस प्रकार की है उस से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि स्त्री और पुरूष स्वयं अपने आप में पूर्ण नहीं हैं. विवाह के बन्धन मैं जुड़ कर ही वह एक दूसरे को पूर्ण बनाते हैं. ईश्वर का अर्ध-नारीश्वर रूप भी इसी और संकेत करता है. इस लिए स्त्री को पुरूष से कम आंकना ईश्वर के विधान की अवमानना करना है. जो लोग ऐसा करते हैं वह जान बूझ कर इस वास्तविकता से आँखें मूँद रहे हैं. इन बंद आंखों के पीछे छुपे पुरुषों ने स्त्री पर बहुत अन्याय किए हैं.

मुझे बचपन में यही शिक्षा दी गई थी कि जहाँ स्त्री का सम्मान होता है वहाँ देवता निवास करते हैं. मैंने जीवन भर इस शिक्षा को मूर्त रूप होते देखा है. मेरे परिचित परिवारों में, जहाँ भी स्त्री को सम्मान मिलता है वहाँ सुख, शान्ति और सम्पन्नता नजर आती है. जिन परिवारों में स्त्री का अपमान किया जाता है वहाँ हर समय दुःख, अशांति और अभाव ही नजर आता है. इस पुरूष प्रधान समाज में यह बात जितनी जल्दी समझ ली जाए उतना अच्छा है. यदि भारतीय समाज में हो रहे विघटन को रोकना है तब स्त्री को ईश्वरीय विधान के अनुसार सम्मान देना होगा. सिर्फ़ क़ानून बनाने से कुछ नहीं होगा. अपने नकारात्मल सोच को बदलने की जरूरत है.

राजकिशोर said...

एक खटराग ने कुतर्कों का सहारा ले कर,
विग्य लोगों की बहस की दिशा बदल डाली !

Anonymous said...

इसका एक ही समाधान है कि विवाहित पुरुष की संपत्ति और आय में उसकी पत्नी का हिस्सा बराबर का माना जाए। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। बल्कि यह हर दृष्टि से स्वाभाविक और तार्किक है।

आपकी यह बात जमी नहीं. क्या तलाक की स्थिति में भी पुरुष की पैतृक संपति महिला को मिलेगी. तब तो एक महिला कई विवाह कर अकूत संपत्ति इकट्ठा करने लगेगी. वैसे जितना जोर इस दिशा में लगे उतना जोर पिता की सपत्ति पर वास्तविक कब्जा दिलाने में क्यों नहीं लगना चाहिए. कृपया maitry.blogspot.com पर बीना अग्रवाल का एक इंटरव्यू देखें.

Okkokkplooll said...

sugarka.com

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...