Monday, April 21, 2008

आप गर्भवती तो नहीं हैं ? प्रमाण लाइये !

।सिर्फ यह एक खबर मन को द्रवित कर गयी । मैं नतमस्तक होना चाहती हूँ ऐसे समाज के आगे ।यह एक ऐसी खबर थी जिसे अनिल रघुराज जी ने अपने चिट्ठे पर सजाया था बड़े चाव से । मेरा हृदय कितना प्रसन्न हुआ ,बता नही सकती । इसे पढ डालें फिर बताती हूँ कि यहाँ का सच क्या है ?एक समाज के बतौर हम कितने पीछे हैं और कितनी घटिया सोच है।
हम सब स्त्रियाँ इस दौर से गुज़रती है और सभी पुरुष अपने घरों मे अपनी पत्नियों- बहनों को इस दौर में देखते हैं ,यह किसी अन्य लोक की बात नही किसी खास वर्ग या सम्प्रदाय की बात नही ;प्रजनन हम सभी के जीवन का एक दौर रहा है या होगा ।इसलिए किसी का इस मुद्दे से कोई सम्बन्ध न हो या रुचि न हो तो उसे सामान्य मानव मानने मे मुझे परहेज़ होगा ।



अनिल रघुराज -
"जिस देश में 36 साल तक तानाशाही रही हो, जहां लोकतंत्र अभी 30 साल का हुआ हो, वहां के मंत्रिमंडल में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं का होना चौकानेवाली बात है। लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकानेवाली बात ये है कि वहां की रक्षामंत्री एक महिला है। यह उस स्पेन की बात है जहां एक दशक पहले तक सेना के दरवाज़े महिलाओं के लिए एकदम बंद थे। आज सुबह मैंने अखबारों में स्पेन की रक्षामंत्री Carme Chacon की तस्वीरें देखीं जिसमें वे सैनिकों का निरीक्षण कर रही हैं तो मैं वाकई आश्चर्य-मिश्रित कुतूहल से भर गया।इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं कि Carme Chacon गर्भवती हैं। मैंने पूरी खबर पढ़ी तो पता चला कि Carme Chacon की उम्र महज 37 साल है और वो सात महीने के गर्भ से हैं।

एक महिला का रक्षामंत्री बनना और फिर गर्भवती मंत्री का सैनिक परेड का निरीक्षण करना दिखाता है कि दुनिया में महिलाओं के अधिकारों की स्थिति बदल रही है। स्पेन में इस समय प्रधानमंत्री जोस लुइ रोड्रिग्ज ज़ापातेरो के 17 सदस्यीय मंत्रिमंडल में से नौ महिलाएं हैं। ज़ापातेरो ने एक अलग समानता मंत्रालय भी बना रखा है जिसकी जिम्मेदारी उन्होंने 31 साल की Bibiana Aido को सौंपी है।

ऐसा नहीं है कि स्पेन बहुत खुला हुआ समाज है। वहां की सोच भी बाकी दुनिया की तरह पुरुष-प्रधान है। लेकिन ज़ापातेरो की अगुआई में वहां की स्पैनिश सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी (PSOE) की सरकार महिला-पुरुष बराबरी के नए-नए प्रयोग रही है। स्पेन की सेना में शामिल 1.30 लाख सैनिकों में 15 फीसदी महिलाएं हैं। Carme Chacon ने इसी सोमवार, 14 अप्रैल को औपचारिक रूप से रक्षामंत्री का पद संभाला है।

घुघुती जी ने वहाँ लिखा -" जब कोई स्त्री बच्चे को जन्म देती है तो वह समाज को आगे बढ़ाती है । यदि इस स्थिति में उसे महत्व दिया जाता है तो आप समाज को महत्व देते हैं ।"

*********************


अब मेरा और बहुतों का जाना हुआ भोगा हुआ सच जो यहाँ हमारे सामने है ।
आप सभी से मेडिकली फिट होने का प्रमाण तो मांगा जाता होगा नौकरी जॉइन करने से पहले । लेकिन स्त्रियों से पूछा जाता है कि आप फैमिली वे मे तो नहीं हैं ? नौकरियों में अधिकांश जगह नवविवाहिताओं से नियुक्ति से पहले पूछा जाता हैं -आपकी एल.एम.पी .{आखरी मासिक की तिथि }क्या है यह किसी डॉक्टर से लिखवा के दीजिये ।मेरे साथ की ही एक लड़की ,3 महीने की गर्भवती को सरकारी स्कूल में लिखित परीक्षा के आधार पर नौकरी मिली लेकिन मेडिकली फिट नही करार दिया गया क्योंकि चिकित्सकीय परीक्षण मे ज़रूरी एक्स-रे शुरुआती तीन महीनो मे नही किये जाते ।और उसे कहा गया कि बच्चा हो जाने के बाद वह फिर से उस परीक्षण से गुज़रे और फिर मेडिकली फिट घोषित होने पर वह नौकरी जॉइन करे ।

अधिकांशत: गर्भवतियों को नौकरी जॉइन कराने से प्रिंसीपल मना कर सकते हैं {यदि चार महीने मुफ्त की तनख्वाह देने से बचाई जा सकती हो तो क्या हर्ज़ है }। नौकरी से बर्खास्तगी या नौकरी छोड़ने की भी यह एक बड़ी वजह बन जाता है । इस समय में साथियों का बर्ताव कई बार तंग करने वाला हो जाता है ।

दिल्ली का एक बहुत ही प्रतिष्ठित स्कूल अपनी किसी अध्यापिका को इसलिए रिज़ाइन करने को मजबूर करता है कि वह गर्भवती हो गयी बावजूद स्कूल द्वारा नियुक्ति के समय अनऑफिशियली यह कहने पर कि आप शुरुआती एक साल में गर्भाधान नही करेंगी । इस शोषण मे स्त्रियाँ भी पीछे नहीं हैं जो खुद उस संस्थान के उच्चतम पदों पर आसीन हैं । उक्त स्कूल की प्रिंसीपल सहित ओनर भी महिला ही है ,और बाकी सभी उच्च पदों पर भी महिलाएँ ही हैं । सत्ता पाने के बाद वे अपने ही समुदाय के विरुद्ध खड़ी हुई दिखाई देती हैं ठीक वैसे ही जैसे कोई आदिवासी मंत्री बनने के बाद अपने ही समुदाय को भूल जाता है ।

और इस तरह गर्भावस्था एक करियर ओरियेंटेड लड़की के लिए अभिशाप बन जाती है क्योंकि गर्भवती को साक्षात्कार मे बड़ी हिकारत से देखा जाता है -कुछ इस नज़र से जैसे फालतू का काम कर रही है और मुफ्त की तनख्वाह लेने चली आयी ।
मैटर्निटी लीव के पैसे बचाना और अपनी गर्भवती कार्यकर्ता के प्रति यह व्यवहार हमारे समाज के लिए शर्म की बात है ।मैं आज भी ये घटनाएँ सोचती हूँ तो मन वितृष्णा से भर उठता है । किसी महिला से उसकी आखिरी मासिक तिथि पूछा जाना अपमान जनक है ,यह उसकी निहायत पर्सनल बात है ।लेकिन जानकारी के अभाव में बहुत सी महिलाएँ इस का विरोध नही कर पातीं । एक अच्छी जगह से मिलती हुई नौकरी को लात मार देना आर्थिक स्थिति के लिए भी उन्हें सही नही जान पड़ता ।

स्त्री ने नौकरी की शुरुआत घर के खर्चों को अच्छे से मनैज करने से की थी जिसमे स्वचेतना और करियर की चेतना बाद मे आ जुड़ी । लेकिन कामकाजी और आधुनिक के लिए हमारे समाज में उलझने सिर्फ बढती गयीं । पारम्परिक भूमिकाओं मे जहाँ कुछ बदलाव हुए वहीं समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी वहीं खड़ा था और खड़ा है जहाँ हमें अब से 100 साल पहले दिखाई देता था ।कामकाजी महिलाओं के लिए सब कुछ कभी से भी आसान नही रहा ।वह दोनों ओर से घर और दफ्तर - दोहरी मार झेलती है । और गर्भावस्था के दौरान कोई स्त्री कभी कभी कितनी लाचार हो सकती है ,यह शायद महिला मित्र अच्छे से जान पायेंगी ।

क्या वाकई समाज की नज़रों मे गर्भवती स्त्री खटकती है ?क्या गर्भावस्था कुछ साधारण नौकरियों के लिए भी अनफिट होने की अवस्था है ? क्या पढी लिखी करियर ओरियेंटेड महिलाएँ जो सिर्फ दो या एक ही बच्चा पैदा करने का फैसला लेती हैं उन्हें भी चार महीने की मैटर्निटी लीव की सैलरी देने में संस्थानों को परेशानी है ?जो कि ताउम्र उस संस्थान की सेवा करने वाली है क्या वह इस दौर में न्यूनतम मानवीय सम्मान की भी हकदार नही ?

8 comments:

Anonymous said...

नीरा माथुर की कहानी भी कुछ इस तरह की थी। कानून ने उसकी कैसे सहायता की आप यहां पढ़ सकती है।

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

ये बेहद निजी सवाल हैं जो किसी भी महिला से नहीं पूछे जाने चाहिए, ऐसा ही एक फैसला महिला आईएएस अधिकारियों के लिए भी लाया जा रहा था लेकिन समय रहते उनके विरोध ने इसे लागू नहीं होने दिया। जरूरत है अपने अधिकारों को जानने की और उसका विरोध करने की।

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...
This comment has been removed by the author.
लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

हरेक कार्यरत स्त्री को हक्क है कि जब तक वह काम कर सके, उसे करने की खुली छूट होनी चाहीये -
उस पर पाबँदी लगाना, गैर कानूनी व अवैध्य है
-लावण्या

गौरव सोलंकी said...

हम अब भी वैसे ही हैं। अन्दर से उतने ही खोखले और पुराने...

स्वप्नदर्शी said...

भारत ही नही, दुनिया के विकसित कहे जाने वाले देश भी गर्भवति महिलाओ को रोजगार देने के मामले मे भेदभाव करते है. मुझे अमेरिका मे भी इसका अनुभव हुया है.
भारत मे कम से कम तीन महीने की छुट्टी तो मिलती है, अमेरिका मे 4-6 हफ्ते, बस, और बहुत सा काम जो घर से हो सकता है, वो किया ही जाता है. अत्यधिक काम के दबाव के चलते, मेरी डेट के तीन हफ्ते पहले बेबी आ गया.
मुझे तो पिछले साल अस्पताल मे डीलीवरी के चार घंटे बाद, पूरा दिन बैठ्कर अगले दिन का लेक्चर बनाना पडा. और पूरे तीन दिन अस्पताल मे भी लग्भग 6 घंटे कम्पुटर पर काम करना पडा. और उसके बाद अगले तीन हफ्ते तक, जब तक कोर्से खत्म नही हुया, सारा काम करना पडा.
मेरे पति ने घर और दो बच्चे किसी तरह से सम्भाले, और घर पर मुझे कुछ नही करना पडा, पर नौकरी ....

डॉ .अनुराग said...

आपने कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये है ,ओर जिन किस्सों का आपने जिक्र किया उन्हें पढ़कर लगा इतने पढे लोग भी कानून से अन्जान है ,किसी व्यक्ति को एड्स होने के बावजूद आप नौकरी से नही निकल सकते ...भारतीय संविधान मे इसके लिए अलग से कानून है ...शायद इसी पर कोई article मैंने २ महीने पहले हिंदुस्तान न्यूज़ पेपर मे पढ़ था ,ओर जिन सवालो का आपने जिक्र किया ,वे बेहद निजी सवाल है इन्हे पूछने का किसी को कोई हक नही .....

Unknown said...

मेरे विचार में समाज की नज़रों मे गर्भवती स्त्री नहीं खटकती है, अगर ऐसा खटकना कहीं हैं तब वह स्कूलों और अन्य दफ्तरों के मालिकों और प्रबंधकों के मन में है. वह महिला कर्मचारी के गर्भवती होने को अपने व्यापार में नुकसान के रूप में देखते हैं. ऐसा पुरूष और महिला मालिक और प्रबंधकों दोनों पर लागू होता है. एक पुरूष या फ़िर एक महिला व्यवसाई से इस बात की अपेक्षा करना कि वह महिला कर्मचारिओं को तनख्वाह सहित गर्भ धारण करने के लिए छुट्टी देने में खुशी महसूस करेंगी, केवल एक बहस की बात हो सकती है, हकीकत में कहीं कोई ऐसा मिल जाय तो एक आश्चर्य ही होगा.

अक्सर दफ्तरों में दो घंटे की छुट्टी मांगने पर आधे दिन की छुट्टी लेने को कहा जाता है. यह कर्मचारी सारी जिन्दगी इन दफ्तरों में काम करते हैं पर दो घंटे की छुट्टी भी आसानी से नहीं मिल पाती. इस बात को नारी और पुरूष में भेदभाव के रूप में देखना शायद सही नहीं होगा. समाज में बहुत सी समस्याएं हैं, सभी नारी और पुरूष पर लागू होती हैं. महिला कर्मचारिओं के गर्भधारण की स्तिथि अलग है. इस पर व्यवसायिक संस्थानों में जितना सकारात्मक दृषटिकोण अपनाया जा सके उतना अच्छा है.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...