Tuesday, April 22, 2008

स्त्रियों के नए हेडमास्टर

स्त्रियां क्या पहनें, क्या न पहनें

राजकिशोर


कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश सीरिएक जोसेफ ने स्त्रियों के आदर्श लिबास पर एक परंपरागत टिप्पणी दे कर अपनी उंगलियां जला ली हैं। अवसर था जुडिशियल इम्पायर नाम की मासिक पत्रिका का लोकार्पण समारोह। इस अवसर पर उच्चतम न्यायालय की एक पत्रिका का भी विमोचन होना था, जिसका संबंध भारतीय विवाह अधिनियम, 1955 से है। बढ़ते हुए अपराधों के कारणों पर विचार करते हुए जज साहब अचानक स्त्रियों की पोशाक की चर्चा करने लगे। उन्होंने कहा कि स्त्रियों के विरुद्ध अपराध इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि वे उत्तेजक कपड़े पहनने लगी हैं। उन्होंने इसका जो उदाहरण दिया, वह कम दिलचस्प नहीं है। जज साहब ने बताया, 'आजकल स्त्रियां मंदिरों और चर्चों में भी ऐसे कपड़े पहन कर आती हैं कि ईश्वर की ओर से हमारा ध्यान उचट जाता है और हम अपने सामने उपस्थित व्यक्ति का ध्यान करने लगते हैं।' आगे उन्होंने फरमाया, स्त्रियां बसों में जिस तरह के उत्तेजक कपड़े पहनती हैं, उससे बसों में यात्रा कर रहे पुरुषों के सामने असमंजस की स्थिति आ जाती है। उन्होंने स्त्रियों को जन हित में शालीन कपड़े पहनने की सलाह दी।

कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश की मानसिकता को हम समझ सकते हैं। वे सीधे-सादे आदमी होंगे और जटिल समस्याओं पर सीधे-सादे ढंग से बोल रहे होंगे। इसके पहले भी अनेक जज तथा समाज सेवी यह विचार प्रगट कर चुके हैं कि उत्तेजक कपड़े पहननेवाली स्त्रियां बलात्कार के लिए आमंत्रण देती हैं। यानी स्त्रियों पर बढ़ते अपराधों के लिए पुरुष नहीं, स्त्रियां खुद जिम्मेदार हैं। बहुत-से लोगों को यह बात सही भी लगती है। लेकिन तनिक-सा विचार करते ही संभ्रम परदा फट जाता है और सत्य सामने आ जाता है। इस सिलसिले में विचारणीय बात यह है कि ज्यादातर बलात्कार किन स्त्रियों के साथ होता है। उन स्त्रियों के साथ नहीं जो उच्च या मध्य वर्ग से आती हैं और ऐसी पोशाक पहनती हैं जो उनके शरीर सौंदर्य को कामुक ढंग से उद्धाटित करने में मदद करती हैं। ये स्त्रियां सामाजिक रूप से पूर्णत: सुरक्षित होती हैं और लोग भले ही पीठ पीछे उनकी रुचियों या इरादों पर टिप्पणी करें, लेकिन उनकी उपस्थिति में अपना मुंह सिला रखते हैं। सचाई यह है कि अकसर बलात्कार का शिकार होती हैं वे औरतें जो दीन-हीन वर्ग से आती हैं। कहते हैं, गरीब की जोरू सबकी भौजाई होती है। इसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि गरीब की बेटी पर पड़नेवाली सारी निगाहें लगभग एक जैसी होती हैं। बलात्कारी सौन्दर्य का उपासक नहीं होता। न आकस्मिक उत्तेजना का शिकार। वह एक ऐसा छिपा हुआ भेड़िया है जो सबसे कमजोर शिकार पर वार करता है।

दूसरी बात यह है कि स्त्रियां क्या पहनें और क्या नहीं, इसका फैसला करनेवाला पुरुष कौन होता है? क्या पुरुष स्त्रियों से अनुमति ले कर अपनी पोशाक तय करते हैं? ऐसा लगता है कि पुरुष किसी न किसी रूप में स्त्रियों के जीवन पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं। जब वे निजी जीवन में पराजित हो जाते हैं, तो सार्वजनिक मंचों से स्त्रियों पर हमला बोल देते हैं। लेकिन मामला उतना सीधा नहीं है जितना सतही तौर पर दिखाई पड़ता है। अगर हम यह मानते हैं कि स्त्रियों की भड़कीली पोशाक देख कर पुरुषों के मन में कामुकता का संचार होने लगता है, तब तो अमीर लोगों को मंहगी गाड़ियों में चलते देख कर गरीब राहगीरों के मन में ईर्ष्या का ज्वार उठना चाहिए और इन्हें अमीरों पर हमला कर देना चाहिए। इसी तरह, बैंकों में जमा लाखों-करोड़ों रुपयों को भी जन हिंसा का कारण बन जाना चाहिए। या रेल यात्रियों को हवाई अड्डों पर नजर पड़ते ही कुपित हो जाना चाहिए। मिठाई की दुकानों में प्रदर्शित मिठाइयों को देख कर भी हमारे मुंह में पानी आ जाता है, लेकिन हम इन दुकानों से मिठाई उठा कर खाने तो नहीं लगते। कानून कहिए या सभ्यता, कुछ है जो ऐसे सभी मौकों पर हमें रोकता है और हम आत्मनियंत्रण का परिचय देते हैं। फिर स्त्रियों के मामले में ही हम फिसलने का अधिकार क्यों अपने पास रखना चाहते हैं? क्या इसलिए कि स्त्रियां हमारी निगाह में भोग का सामान हैं और उनका भोग करना पुरुष वर्ग का नैसर्गिक अधिकार है? जैसे ही हम स्त्रियों को मनुष्य के रूप में देखना शुरू करेंगे, उनके मानव अधिकारों का सम्मान करना शुरू कर देंगे, जिसमें यह भी शामिल है कि वे क्या पहनें और क्या न पहनें, यह तय करने का अधिकार उन्हें ही है, किसी और को नहीं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आधुनिक पूंजीवाद के दबाव से, जिसमें विज्ञापन तथा मास मीडिया उद्योग अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए लगातार स्त्री देह का शोषण करता रहता है, हमारे इर्द -गिर्द कामुकता का आक्रामक वातावरण तैयार करने का सुनियोजित अभियान जारी है। यह पश्चिमी सभ्यता का एक ऐसा मधुर आक्रमण है जिसके कड़वे जहर को अब पहचाना जाने लगा है। कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश अगर यह कहते कि कामुकता की यह संस्कृति हमारे जीवन को एकायामी बना रही है और इस विनाशकारी संस्कृति में स्त्रियों को अपनी सही भूमिका पहचाननी चाहिए, तो वे शायद एक भला और जरूरी काम कर रहे होते। लेकिन एक सभ्यतागत समस्या पर विचार करने के स्थान पर उन्होंने अपनी निगाह सिर्फ स्त्रियों की पोशाक पर केंद्रित की, जिससे उन्हें सार्वजनिक आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है। सवाल यह नहीं है कि कोई स्त्री क्या पहनती है, सवाल यह है कि नई संस्कृति में पोशाक से किस तरह का काम लिया जा रहा है, फिल्मों में और टीवी पर दर्शकों को लुभाने के लिए स्त्रियों को किस तरह पेश किया जा रहा है।

जाहिर है, फिल्मों और टीवी की नायिकाओं के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि अभिनय करते समय वे वही पहनती हैं जो वे चाहती हैं। इतनी आजादी उन्हें कहां। वे निर्देशक के हुक्म की गुलाम होती हैं और यह वही तय करता है कि उसकी अभिनेत्रियों को कब और कहां अपने को कितना छिपाना है और कितना दिखाना है। यह सौंदर्य के प्रदर्शन का मामला नहीं है। सौन्दर्य की अनुभूति हमें अनिवार्य रूप से कामुक नहीं बनाती। वह हमारे सौन्दर्य बोध को तृप्त करती है और उसका परिष्कार भी करती है। सिनेमा और टीवी अभिनेत्रियों की इस पेशागत मजबूरी को न समझ कर जब अन्य स्त्रियां उनकी नासमझ नकल करने लगती हैं, तो इससे यही पता चलता है कि व्यावसायिकता का दबाव कितना गंभीर है। पहले गृहस्त्र स्त्री और पतुरिया की पोशाक अलग-अलग होती थी। अब दोनों में भेद मिटता जा रहा है। नहीं, सर, नहीं, हम कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश की बात को दूसरे तरीके से दुहरा नहीं रहे हैं। हम इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि धीरे-धीरे यह तय करना कठिन होता जा रहा है कि कौन-सी रुचि हमारी अपनी है और कौन-सी रुचि हम पर लादी जा रही है। बहरहाल, स्थिति जो भी हो, कानून के द्वारा या फतवे जारी कर हम स्त्रियों के विकल्पों को सीमित नहीं कर सकते। हां, इस विमर्श में स्त्रियों को जरूर आमंत्रित कर सकते हैं कि कहीं वे अनजानत: किसी भयानक सांस्कृतिक षड्यंत्र का शिकार तो नहीं हो रही हैं।

17 comments:

अनुराग अन्वेषी said...

राजकिशोर जी,
लिबास के ऐसे ठेकेदारों का क्या किया जाये? जो जज यह भी जज न कर पाये कि अपराध की वजह कहां है, उससे यह समाज क्या उम्मीद करे। दरअसल - मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ है, क्या मेरे हक़ में वो फैसला देगा - यह है तो एक ग़ज़ल की लाइन, पर है बेहद सटीक।

Pooja Prasad said...

न्यायिक सक्रियता भले ही देश हित में गई हो, मगर ``न्यायधीशीय`` सक्रियता देश हित में नहीं जाती दीख रही है। कभी दिल्ली के एक जज बलात्कारी से विवाह करने की ``नेक`` सलाह दे डालते हैं और अब, कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश सार्वजनिक मंच से ऐसी सलाह दे रहे हैं। दुभाZग्यपूर्ण है यह।

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

ये बाजारवाद का जमाना है, यहां पहनने वाला तय नहीं करेगा कि उसे क्या पहनना है, यहां पर बाजार तय करेगा कि उसे क्या पहनना है।
वैसे भी पुरुष स्त्रियां क्या पहनें इस पर बरसों या यूं कहें सदियों से आदेश देते आए हैं इसमें नया कुछ नहीं है। एक और जज ने भी दिया तो कोई अंतर नहीं पड़ता कौन सुनेगा और कौन सुनता है।
इससे पहले स्कूलोँ और कालेजों में ये बातें सुन-सुनकर बड़े हुए हैं कि स्कर्ट और जीसं की जगह सूट पहन कर आए हैं , तब एक छोटा सा लड़कियों का ग्रुप ये फैसले ले लेता था कि वो मैनेजमेंट या किसी छात्र संगठन के तय किए हुए कपड़े नहीं पहनेंगी तो अब किसमी इतनी हिम्मत है जो ये तय करे कि हम क्या पहनेंगे।

रश्मि शर्मा said...

बहुत सही उदाहरण दिया है आपने. जब हम और चीजों को देखकर वैसा उन्मुकत आचरण नही करते तो फिर स्त्री के कपड़े को देखकर पुरुषों का व्यवहार क्यों बदलता है

Priyankar said...

सच के सभी छोर संभाले बेहद संतुलित लेख . पर प्रतिक्रियाएं कुछ स्टीरियोटाइप लग रही हैं . उत्तेजक कपड़ों और अपराध का संबंध मुझे भी नहीं जंचता पर धार्मिक और सांस्कृतिक अवसरों पर -- तीज-त्योहारों और विवाहादि के अवसर पर -- आपकी वेषभूषा आपकी अभिरुचि और आपका सलीका बयान करती है और आपका सांस्कृतिक परिवेश अभिव्यक्ति पाता है . कपड़े अन्ततः आपके व्यक्तित्व का विस्तार माने जाते हैं -- वे एक तरह का 'स्टेटमेंट' होते हैं . मुझे नहीं पता न्यायाधीश महोदय ने ठीक-ठीक क्या कहा . ईसाई समुदाय भारत में अपेक्षाकृत आधुनिक समाज माना जाता है . अगर न्यायाधीश महोदय ने कुछ अतिरेकपूर्ण कहा भी तो उसे दरकिनार कर हमें उनके मूल अभिप्राय से ज्यादा सरोकार रखना चाहिए . वरना एक ओर कठमुल्लेपन का और दूसरी ओर चिरकुट नारीवाद का कोरस चलता रहेगा और सुधार का -- विकास का -- मूल स्वर उपेक्षित रह जाएगा .

हमें यह तो समझना ही होगा कि आधुनिकता का संबंध विचारों से ज्यादा है और पहनावे से कम . स्त्रियों की शिक्षा और उनके सशक्तीकरण पर बहस करते-करते जब हम कपड़ों और यौनिकता(?) आदि पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं तो बहस कुछ 'डाइल्यूट'होने लगती है और छिछले चिड़ीमारों की बन आती है.

राज किशोर जी ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में बहुत मार्के की बात कही है,उस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए :

" इससे बहुत ज्यादा घबराने की बात नहीं हैं। स्त्रियां बाहर निकली हैं, तो उन्हें अपने आसपास संयम का वातावरण बनाने की ओर विशेष ध्यान देना ही होगा। ऐसा बड़े पैमाने पर होने से पुरुष भी सभ्य होने का आत्मसंघर्ष करेंगे। वैसे, छोटे-छोटे मजाकों पर, तब भी जब वे वे पूर्णतः निरामिष न हों, गरम हो जाना ठीक नहीं है। स्त्री-पुरुष के समीप आने पर या एक ही वातावरण का अंग होने पर यदि रस के कुछ छींटें न बिखरें - वल्गरिटी की दीवार के इस ओर,तो ईश्वर की सारी योजना ही ध्वस्त हो जाएगी। "

डॉ .अनुराग said...

सारे उदारहण तर्कसंगत है...सच बात तो यही है की राम हो या गाँधी ....घर की दहलीज़ तक पहुँचते पहुँचते सिर्फ़ पुरूष रह जाते है....

Manas Path said...

मैंने एक टिप्पणी इस पोस्ट पर की थी. कहां गई.

Anonymous said...

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pallavi trivedi said...

बहुत सटीक लेख... न जाने क्यों महिलाओं पर घटित होने वाले अपराधों का जिम्मा उसके पहनावे को दिया जाता है!एक महिला को पूरा अधिकार है कि वह अपनी इच्छा अनुसार वस्त्र पहने! यदि वह फिर भी किसी अपराध की शिकार होती है तो गलती उसकी नहीं , बल्कि पुरुष की है जो अपनी जानवराना हरकत का जिम्मेदार महिला के पहनावे को ठहराता है और दुर्भाग्य यह है कि तथाकथित पढे लिखे लोग भी यही सोच रखते हैं..

ghughutibasuti said...

दोष तो सदा कमजोर का ही होता है । यदि पति या घर के लोग डाँटें पीटें तो वे पागल थोड़े ही हैं । वह तो स्त्री जवाब बहुत देती थी, खाने में नमक अधिक डाल दिया था आदि आदि । यदि उसका बलात्कार होता है तो ऐसी सुनसान जगह पर क्यों गई थी, ऐसे कपड़े क्यों पहने थे, इतनी देर रात क्यों घर से बाहर गई थी ? याद नहीं, वह बकरे और मैमने की कहानी ? मैमने को तो शेर ने हर हाल में खाना ही है । यह तो उसकी भलमानसता है कि खाने के लिए कोई बहाने तो बनाए ।
सो जीना है तो शक्तिशाली बनना होगा । माँगने से अधिकार नहीं मिलेंगे । उन्हें छीनना होगा । यदि शारीरिक बल नहीं है तो फिर शायद हमें भी बन्दूक रखनी होगी परन्तु कुछ तो करना ही होगा । यूँ मिमियाते तो नहीं रहना होगा ।
घुघूती बासूती

KAMLABHANDARI said...

rajkishorji sach baya kiya hai aapne .aadmi humesha yahi chhata hai ki aurat uski mitthi me rahe.isliye tarha-tarha ke bandhan lagata hai uspar.
shyad wo darta hai ki agar aurat ko aajad kar diya to uski pooch kam ho jaayegi . wah darta hai uski karya kusalta se , uske dimaag se.

Unknown said...

राजकिशोर जी, एक सारगर्भित लेख के लिए आपको वधाई. कपड़े शरीर के भद्देपन को छिपाने और सौन्दर्य को प्रकट करने में सहायक होते हैं. अब कौन कैसे कपड़े पहने यह तय करने का अधिकार तो कपड़े पहनने वाले को ही मिलना चाहिए. पर इस अधिकार का प्रयोग सोच समझ कर किया जाए तो बहुत अच्छा है. कपड़े शालीन भी होते हैं और उत्तेजक भी. एक ही पौशाक को अलग अलग स्त्रियाँ इस तरह से पहन सकती हैं कि एक शालीन लगे और दूसरी उत्तेजक. साड़ी को ही ले लीजिये.

मैं यह मानता हूँ कि पौशाक शालीन होनी चाहिए. और यह बात स्त्री और पुरूष दोनों पर लागू होती है. आज कल बहुत से पुरूष कान में बाली पहनते हैं और बाल स्त्रियों की तरह लंबे करके रबर बैंड से बाँध लेते हैं. इस में शालीनता कहाँ रही? पर यह उन का अपना मामला है. कोई क्या कह सकता है? इसी प्रकार बहुत सी स्त्रियाँ पुरुषों की तरह पैंट, शर्ट, छोटी स्कर्ट पहनती हैं. मेरे एक मित्र ऐसी स्त्रियों को बहुत पसंद करते हैं. लेकिन वह अपने घर की स्त्रियों को ऐसे कपड़े पहनने की इजाज़त नहीं देते. अब ऐसे दोगलेपन को आप क्या कहेंगे?

अगर बात करें, पौशाक की वजह से अपराध होने की, तब हर अपराध को इस से जोड़ देना ग़लत होगा. मैं वस्त्रों में शालीनता का समर्थक हूँ पर किसी पौशाक विशेष के पहनने से किसी पुरूष को किसी नारी पर हमला करने का अद्धिकार नहीं मिल जाता. क्या वह किसी ऐसी परिश्थिति में अपने ही घर की किसी स्त्री के साथ ऐसा व्यवहार करेंगे?

अनूप भार्गव said...

राजकिशोर जी:
एक अच्छे लेख के लिये बधाई । आप की यह बात बहुत पते की लगी कि :
बलात्कारी सौन्दर्य का उपासक नहीं होता। न आकस्मिक उत्तेजना का शिकार। वह एक ऐसा छिपा हुआ भेड़िया है जो सबसे कमजोर शिकार पर वार करता है।

कुछ बातों से असहमति हैं , उन्हें यहां लिख रहा हूँ :

आप ने कहा :

"जाहिर है, फिल्मों और टीवी की नायिकाओं के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि अभिनय करते समय वे वही पहनती हैं जो वे चाहती हैं। इतनी आजादी उन्हें कहां। वे निर्देशक के हुक्म की गुलाम होती हैं और यह वही तय करता है कि उसकी अभिनेत्रियों को कब और कहां अपने को कितना छिपाना है और कितना दिखाना है।"

>किस जमाने की बात कर रहे हैं आप ? आज की अभिनेत्री और नायिका इतनी कमजोर नहीं है । जो कुछ हो रहा है , उस में उन की उतनी ही सहमति है जितना कि किसी और का दबाव ।

आप ने कहा :
यह सौंदर्य के प्रदर्शन का मामला नहीं है। सौन्दर्य अनुभूति हमें अनिवार्य रूप से कामुक नहीं बनाती। वह हमारे सौन्दर्य बोध को तृप्त करती है और उसका परिष्कार भी करती है।

>> जिस पहनावे की बात की जा रही है उसका लक्ष्य, ’सौन्दर्य बोध की तृप्ति और उस का परिष्कार’ नहीं लगता ।

स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं किसी भी तरह के ’गैर कानूनी’ व्यवहार और बलात्कार जैसा कर्म (जिसे किसी भी स्थिति में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता) का समर्थन नहीं कर रहा हूँ लेकिन क्या यह यह अपेक्षा भी उचित है कि :
"एक भरी बस या मंदिर में ’मिनी स्कर्ट’ पहने स्त्री की ओर सभी पुरुषों की निगाहें उसी तरह उठें जैसी कि एक सामान्य वस्त्रों में स्त्री के लिये उठती है" ?
ये भी माना कि आदर्श स्थिति में दोनो में कोई अन्तर नहीं होना चाहिये लेकिन क्या हम उस आदर्श स्थिति के आस पास हैं और यदि नहीं तो हमारे क्या विकल्प हैं ?
हर बात को ’नारी स्वतंत्रता’ से जोड़्ना भी ठीक नही है ।

आप ने कहा :

सिनेमा और टीवी अभिनेत्रियों की इस पेशागत मजबूरी को न समझ कर जब अन्य स्त्रियां उनकी नासमझ नकल करने लगती हैं, तो इससे यही पता चलता है कि व्यावसायिकता का दबाव कितना गंभीर है। पहले गृहस्त्र स्त्री और पतुरिया की पोशाक अलग-अलग होती थी। अब दोनों में भेद मिटता जा रहा है। नहीं, सर, नहीं, हम कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश की बात को दूसरे तरीके से दुहरा नहीं रहे हैं। हम इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि धीरे-धीरे यह तय करना कठिन होता जा रहा है कि कौन-सी रुचि हमारी अपनी है और कौन-सी रुचि हम पर लादी जा रही है।

>> मुझ पर अगर कुछ लादा भी गया है तो अन्त्तत: उस की जिम्मेदारी तो मुझ पर ही होगी ना ? सिर्फ़ स्त्री ही नहीं , हम सब को अपने व्यवहार के लिये किसी हद तक जिम्मेदार होना होगा चाहे वह ’फ़िल्म की नायिका हो’ और या सताई हुई नारी ........। जिन के साथ अत्याचार हो रहा है , उनके सिर्फ़ कोसने मात्र से ’व्यवस्था नहीं सुधर जायेगी । पहला खिलाफ़त का कदम तो उन्हें ही उठाना होगा । हां यह हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम उस उठाये गये कदम को बढावा दें और उस पहले कदम के लिये लोगों को राह दिखायें ।

जानता हूँ कि जो लिख रहा हूँ वह शायद ’पोलिटिकली करेक्ट’ न हो लेकिन हमेशा उसी के बारे में भी तो नहीं सोचा जा सकता ?

राजकिशोर said...

अतुल जी के लिए ... आपकी टिप्पणी वहीं गई जहां उसे जाना चाहिए था। सर, यह शरीफों की बस्ती है। यहां जबान संभाल कर बोलने की जरूरत है। आशा है, भविष्य में आप कुछ ऐसा लिखेंगे, जो प्रकाशित करने योग्य हो।

Anonymous said...

Roman mein hindi ke liye kshama.
Ye baat un logon ke liye jo kapdon ko shaleen aur uttejak kah rahe hain.
Kapde kapde hi hoten hain ve na to uttejak hote hain aur nahi shaleen.
Shaleenta aur uttejakta to dekhne vale ke dimag aur drishtikon ki baat hain.
To jise kapde uttejak lagte hain vo jakar apne dimag ka ilaaj karaye na ki pehnne valey ko rokey.
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Ab doosra point ye kapdey jinhe log uttejak keh rahe hain ye hindustan mein hi kyon logon ko baltakar ke liye uksatey hain yahan se jyada to ye aur deshon mein pehne jatey hain vahan to inse logon ko kuch nahin hota. To ye hindustan ke aadmi ka hi dimag kyon kharab ho jaata hai. hindustan mein Purushon ko apney dimag ka ilaj karana chahiye. Aur hum sab ko milkar is samaj ki ulti seedhi sadi gali manyattayen aur reeti rivaj fenk dene chahiye.

सचिन्द्र राव said...

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