Wednesday, April 23, 2008

कार्य स्थल पर घटता महत्त्व

आज सुजाता जी से बात हुई...कार्य स्थल पर स्त्रियों के कम महत्त्व के बारे में चर्चा हुई! मुद्दा महत्वपूर्ण है और बात गंभीर! जहाँ तक प्रश्न है कि महिलाओं को कमतर आँका जाता है, मैं अन्य विभागों के बारे में उतने विश्वास से नहीं कह सकती !हाँ...पुलिस विभाग में जो देखा है और उसके जो कारण मैं महसूस करती हूँ वो आपके सामने रखना चाहती हूँ!

जैसा कि पूरी दुनिया ने देखा कि श्रीमती किरण बेदी को इस्तीफा देना पड़ा!यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि इस कदर काबिल अधिकारी को उसकी योग्यता के अनुरूप जगह नहीं मिलती!इसके २ कारण मुझे समझ आते हैं! पहला - बहुतहद तक ये बात सच है कि आज भी पुरुष एक महिला को खुद से आगे बढ़ता नहीं देखना चाहता है!शायद कहीं उसका अहम् चोट खाता है! दूसरा- आजकल सभी महत्वपूर्ण पोस्टिंग्स राजनैतिक हो गयी हैं! बिना जुगाड़ या बिना संपर्कों के अच्छी और महत्वपूर्ण पदस्थापना मिलना एक सपने जैसा हो गया है! राजनैतिक हस्तक्षेप इस कदर हावी है कि यदि आपने नेताओं कि मंशानुसार काम नहीं किया तो ट्रांसफर होना तय ही समझिए! और नेताओं को भी महिला अधिकारी के होने से असुविधा ही ज्यादा होती है!इसलिए ईमानदार,कर्तव्यनिष्ठ होने के बाद भी उन्हें वो स्थान हासिल नहीं होता! और जहाँ चयन सिर्फ प्रतिभा के आधार पर होता है जैसे कि निजी सेक्टर में....वहाँ इंदिरा नुई भी काम करती हैं!

ये तो हुआ एक पहलू, अब एक दुसरे पहलू की ओर आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहती हूँ! पूरी तरह पुरुषों या सिस्टम को दोष देना भी न्यायसंगत नहीं है! एक अनुभव बांटना चाहती हूँ!तीन वर्ष पहले मसूरी में पूरे देश की महिला अधिकारियों का एक सेमिनार हुआ! कॉन्स्टेबल से लेकर डी.जी. रैंक की महिलायें उसमे मौजूद थीं! अपने प्रदेश की ओर से मुझे भी जाने का मौका मिला! उत्तरांचल की डी.जी. श्रीमती कंचन चौधरी भट्टाचार्य ने वह सेमिनार आयोजित किया था!तीन दिन तक विभिन्न मुद्दों पर चर्चा चलती रही! जब सभी प्रदेशों की अधिकारियों से समस्याएं पूछी गयीं तो सभी ने सबसे पहले जो समस्या बताई वो काबिले गौर है...आज भी थानों में महिलाओं के लिए अलग से टॉयलेट्स की व्यवस्था नहीं है जो कि मूलभूत आवश्यकता है!यदि लगातार घंटों काम करना हो तो सभी को बहुत समस्या होती है!अधिकारी स्तर पर सुविधाएं है लेकिन निचले स्तर पर सुविधाओं का अभाव है इसलिए भी महिलाओं कि कार्य प्रभावित होता है!

शायद मैं विषय से भटक रही हूँ...लेकिन उस सेमिनार का एक मुख्य मुद्दा था इसलिए लिखने से अपने आप को रोक नहीं पायी! खैर वापस विषय पर आती हूँ! दूसरा मुख्य मुद्दा जो वहाँ उठा वह ये था कि महिला होने के नाते वे क्या सुविधाएं चाहती हैं...उसका जो जवाब था वह अपने आप में इस बात का उत्तर है कि महिलाओं को महत्त्व क्यों नहीं मिलता! ज्यादातर अधिकारियों का कहना था कि उन्हें रात की duty से मुक्ति दी जाए, यदि उन्हें किसी कार्य से बाहर भेजा जाता है तो एक और महिला उनके साथ भेजी जाए!इसके अलावा उन्हें हलके कार्य ही दिए जाएं! मेरे लिए ये सब सुनना अप्रत्याशित था क्योकि मेरा मानना है कि यदि पुरुषों के बराबर वेतन आप पा रहे हैं तो मजबूती के साथ हर काम के लिए तैयार रहना चाहिए!खुद अपने आप को कमज़ोर दिखाकर दूसरों से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि आपको कमज़ोर न समझे!कोई मजबूरी हो तो बात अलग है!एक व्यवहारिक बात है कि यदि जहाँ एक आदमी को भेजने से काम चल सकता है वहाँ कोई भी दो महिलाओं को भेजना पसंद नहीं करेगा! यदि किरण बेदी ने ये सुविधाएँ मांगी होतीं तो शायद आज उन्हें कोई जानता भी नहीं !

कुल मिलाकर जो बात मुझे समझ में आई वह ये कि राजनैतिक मुद्दे पर ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता लेकिन जो काम किया जा सकता है वो ये कि स्वयम को कमज़ोर सिद्ध न करें , आत्मविश्वास से आगे बढ़ें और हाँ बेहद ज़रूरी बात खुद को हमेशा अप डेट रखें !महत्त्व अपने आप मिलेगा! आप सभी के विचारों का व अनुभवों का इंतज़ार रहेगा ताकि और अधिक सार गर्भित बिंदु निकल कर सामने आयें!

7 comments:

Krishan lal "krishan" said...

बहुत ही बढिया तरीके से मुद्दा उठाया है आपने और अच्छा विष्लेष्ण किया है बयोलोजिकल अन्तर को छोड़कर नारी कहीं भी और किसी भी फील्ड मे पीछे नही है। और ये हक उसे मिलना ही चाहिये। हँ ये बात किसी हद तक सही है कि नारी् काम मे सुविधये तो नारी के रूप मे चाहे और वेतन या बराबरी पुरुशो के रूपमे तो वो भी ठीक नही
परन्तु मै मानता हू कि नारी शरिरक रूप से कमजोरी की वजह से नही बल्कि मानसिक असुरक्षा की वजह से ऐसा करती ह इस के लिये समाज भी जिम्मेदर है हमारी पुरानी मान्य्ताये भी जिम्मेवार है औरत को जो इज्ज्त की गठरी बचपन मे ही पक्ड़ा दी जाती है सुरक्षित रखने के लिय उस के लिये वो अपनी सारी बाकी जिन्दगी गौण कर लेती है पुरुषो की इज्जत क्यो नही लुटती समझ नही आता बात शरीरक ताकत की नही है असल मे औरत को मन्सिक रूप से कमजोर बना दिया जाता है शुरू से ही
शायद ये सोच बदले अगर आप जैसी विदूषी महिलाये कोशिश करती रहेगी तो वो भी लगातार बार बार

Krishan lal "krishan" said...

पल्ल्वी जी मै अपनी टिप्प्णी पर आप की प्रतिक्रिया चाहूगा ताकि मै भी अपनी सोच को सुधार सकू अगर जरूरत हो तो

Unknown said...

पल्लवी जी, एक अच्छे लेख के लिए आपको वधाई. किरण बेदी को दिल्ली के कमिश्नर पद के न मिलने का मुख्य कारण है उनकी व्यक्तिगत छबि - साफगोई, काम में राजनीतिक दबाब की परवाह न करना और अपराधियों के प्रति एक मानवीय एहसास. इस छबि को किसी भी सरकार के लिए आसानी से पचा पाना आसान नहीं है. जनता ऐसे पुलिस अफसरों को चाहती है पर राजनीतिज्ञ नहीं. उनके लिए पुलिस एक मोहरा है और किरण बेदी जैसे अफसर उन की इस मांग को पूरा नहीं करते.

मैंने अपने कार्यकाल में यह महसूस किया है की कार्य स्थलों पर सामान्य तौर पर पुरूष दो तरह के होते हैं. एक वह जो अपने बल बूते पर आगे बढ़ते हैं, और दूसरे वह जो चमचागिरी और चुगली को आगे बढ़ने के लिए इस्तेमाल करते हैं. पहले प्रकार के पुरूष अपने कार्य स्थल पर नारी और पुरूष में कोई भेदभाव नहीं करते. उन्हें अपने काम से मतलब होता है. दूसरे प्रकार के पुरूष नारी को अपने से आगे बढ़ने देना नहीं चाहते. इस के लिए वह कुछ भी उचित या अनुचित करने के लिए तैयार रहते हैं. लेकिन यदि उनका स्वार्थ किसी नारी के आगे आने से पूरा हो सकता है तब वह नारी की किसी हद तक भी चमचागिरी करने को तैयार हो जाते हैं. इंदिरा गाँधी और सोनिया गाँधी इस का ज्वलंत उदाहरण हैं. पुरुषों ने इनकी जी हजूरी में नए आयाम स्थापित किए हैं. इस पुरूष प्रधान समाज में नारी को आगे आने के लिए अपने आप को पुरूष से कम्पटीशन में पड़ कर अपनी शक्ति बेकार नहीं करनी चाहिए. उन्हें बस अपने मार्ग पर लगातार आगे बढ़ते रहना चाहिए. किसी स्तर पर उन्हें यदि उनका मार्ग रोकने वाले पुरूष मिलते हैं तब अपने से नीचे स्तर पर कार्यरत चमचे पुरूष भी मिलेंगे.

डॉ .अनुराग said...

पल्लवी आपके सारे लेख का सार आपकी अंतिम ५ पंक्तियों मे है जो कि काबिले तारीफ है ओर रही बात समाज कि तो जो भी इन्सान ईमानदार ओर नेक हो चाहे वो किसी भी शेत्र मे हो ,फ़िर उसका लिंग ओर जात महत्वहीन हो जाता है अब्दुल कलाम को देखिये सब उनकी तारीफ करते रहे पर उन्हें दूसरा कार्यकाल नही दिया गया ...आप जैसी महिलायो से हमे उम्मीदे है......इन्हे बनाये रखिये....

आर. अनुराधा said...

विषय भले ही पुराना हो, इस पर व्यापक और सार्थक तर्क-वितर्क की बहुत जरूरत और गुंजाइश है। किसी भी जगह, चाहे नौकरी हो या घर, कोई भी व्यक्ति, चाहे पुरुष हो या स्त्री, बहुत बार लोग अपने लिए थोड़ी और सहूलियत, थोड़ी और पैर फैलाने की जगह खोजते रहते हैं। अंगुली पकड़ में आ जाए तो पोंहचा पकड़ने का लोभ कितने लोग संवरण कर पाते हैं। और सरकारी नौकरी की सुरक्षा में अगर औरत होने के बहाने से कुछ और सहूलियतें मिलने की गुंजाइश हो, तो कौन मना करता है। यही कारण है कि जिसे मौका मिलता है, अपने लिए और आश्वासन पाने की कोशिश करता है और पुलिस विभाग कोई अपवाद नहीं।

pallavi trivedi said...

कृष्ण लाल जी....मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ. अभी बहुत समय लगेगा इन सदियों पुरानी मान्यताओं को बदलने में!लेकिन आज की पीढ़ी की सोच बदल रही है,ये हर्ष की बात है! बस...हम सभी कोशिश जारी रखें!

सुनीता शानू said...

किरन बेदी जी का कमिश्नर न चुना जाना और दो साल जूनियर श्री वाई.एस डडवाल के कमिश्नर चुने जाने के कई कारण हैं...सबसे पहला और मुख्य कारण उनका ईमानदार,और गर्म मिजाजी होना है,...दूसरा कारण किरन बेदी नेताओं के हाथ की कठपुतली नही थी जिसे जब चाहा नचाया...
तीसरा कारण भी कम मायने नही रखता कि दिल्ली के उपराज्यपाल की सिफ़ारिश के बावजूद गृहमंत्रालय द्वारा किरन बेदी को नापसंद किया गया...गृह मंत्रालय में ब्यूरोक्रेट्स के एक बड़े ग्रुप ने किरन बेदी जी के कमिश्नर पद के लिये अयोग्य ठहराया था...क्योंकि उनका मानना था कि किरन बेदी जरूरत से ज्यादा गर्म मिजाज वाली हैं...औरतों की नित्य प्रति बढ़ती हुई सफ़लाताओं को देखते हुये आज यह बात किसी भी मायने में सत्य नही है कि औरत किसी भी अवस्था में मर्द से कमजोर है...

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