Monday, April 28, 2008

एक चोखेर बाली का ब्लॉग , जो अब नही लिखा जाता


एक ब्लॉग जो अब नही लिखा जाता ,लेकिन अगर लिखा जा रहा होता तो अपने आप में एक दस्तावेज़ से कम नही होता । सोचती हूँ कि इतिहास लेखन के पारम्परिक ढर्रे से अलग हटते ही जब हम अगल बगल झाँकने लगते हैं तो इतिहास का एक समानांतर ,वैकल्पिक इतिहास खड़ा होता दिखाई देता है जिसे शायद इतिहास लेखन की कोई भी प्रक्रिया आराम से नज़रन्दाज़ करके आगे चलती रह सकती है । इस मायने मे किरण बेदी का ब्लॉग शुरु होना और 5 पोस्ट के बाद बन्द हो जाना हमें उस वैकल्पिक समनांतर इतिहास से वंचित कर देता है जिसे हम उनकी इस डायरी मे देख पाते । किरण बेदी का ब्लॉग "CRANE BEDI " का लिखा जाना क्यो कर बन्द हो गया , अन्दाज़ा नही है पर इसे देखते ही जो उम्मीदें बन्धी थीं वे टूट कर बिखर गयीं।
ब्लॉग पर आने वाली बातें अनुभव और विचार के रचे पगे वे अंश होते जो शायद ही कहीं और हमारे सामने आ पाते। यह ब्लॉगिंग की ही खासियत है कि वह लेखन के मूल्यवान अंश दर्ज कर लेती है जिन्हें आप कहीं और नही पा सकते ।


घरेलू हिंसा से पीड़ित रश्मि की किताब का ज़िक्र करते हुए वे लिखती हैं
-

Let me explain how? Under the new law all these acts of domestic violence are specific offences, namely: physical or mental abuse for any reason; addiction, extramarital relationships, unlawful demands, harassment, threat, insult, ridicule, name calling, deprivation of economic or financial resources, alienation of assets etc.
Anyone can complain for the aggrieved woman. The Magistrate can call concerned members of the household to be heard. He can counsel, direct or punish as the case may be. It is a civil, summary proceeding. Violation of orders can call for imprisonment of one year, fine or both.

पर साथ ही वे चेताती हैं -

It is for women who genuinely need help. At no stage should this be used falsely by them. Magistrates and Protection officers are for justice and not pro-women and anti-men.. They are there to prevent distress.

एक महिला आई पी एस , पुरुषों के बीच एक साहसी दबन्ग महिला ,सिस्टम से मिली पॉवर का इस्तेमाल जिसने सिस्टम की खामियों को दूर करने के लिए किया और सत्तावानों की आँखो में खटकती रही ,दो बेटियों की माँ ,57 वर्षीया उस चोखेर बाली के पास क्या कुछ था हमें बताने के लिए !!
उम्मीद करती हूँ कि यह ब्लॉग फिर से गुलज़ार हो |

37 comments:

neelima garg said...

good..at least she gave some courage to women in general...
SUJATA..I like ur writings..

pallavi trivedi said...

सच बात है...अगर किरण बेदी जी का ब्लॉग होता तो उनके लम्बे सेवाकाल व अनुभवों का लाभ हम सभी को मिलता! लेकिन उनकी किताबें "गलती किसकी" और "हिम्मत है" उनके अनुभवों को अपने में समेटे हैं! जिन्हें पढ़कर काफी चीजों की जानकारी मिलती है!

राजकिशोर said...

क्रेन बेदी से संपर्क कर उनसे यह अनुरोध किया जाना चाहिए कि वे अपने ब्लॉग को अनवरत करें। कम से कम 10 ईमेल ऐसे जाने चाहिए। उन्हें शायद एहसास न हो कि उनका ब्लॉग कितना उपयोगी था। सुप्तस्य सिंहस्य मुखे मृगाः न प्रविशंति। इसके बाद भी वे न लिखें तो उनकी मर्जी। हो सकता है वे अपना समय कहीं और लगाना ज्यादा जरूरी मां रही हों।

सुजाता said...

शुक्रिया नीलिमा
@पल्लवी ,
सही कहती हो ।
पर ब्लॉग पर शायद नियमित और अपडेट जानकारी मिल पाती और अपनी प्रतिक्रियाएँ व शंकाएँ सामने रख पाते ।खैर !

सुजाता said...

राज किशोर जी ,
उनके प्रोफाइल पर ई मेल होता तो ज़रूर कहती ।बहरहाल ,कोई भी और यह काम कर सके तो अच्छा ।
पल्लवी से अनुरोध किया जाए :-)

Sanjeet Tripathi said...

आमीन!!
वाकई "क्रेन" बेदी जैसी शख्सियत का ब्लॉग अनवरत होना चाहिये था!

किरण बेदी जी पर "चोखेरबाली" संबोधन एकदम सही है।

राजकिशोर जी की सलाह पर काम किया जा सकता है।

पारुल "पुखराज" said...

उम्मीद करती हूँ कि यह ब्लॉग फिर से गुलज़ार हो |
aameen

rakhshanda said...

कितना अच्छा होता यदि वो एक बार फिर उसे लिखना शुरू करतीं.

आभा said...

राज किशोर जी सही कह रहे हैं -पल्लवी सहयोगी होंगी,शुक्रिया सुजाता

Priyankar said...

डॉ. किरण बेदी की पर्सनल वेबसाइट : http://www.kiranbedi.com/ के विज़िटर्स पृष्ठ पर जा कर उनसे ब्लॉग लिखने/पुनः लिखना शुरु करने का अनुरोध किया जा सकता है .

दीपक कुमार भानरे said...

Kiran vedi ji ko apna blog lekhan fir se shuru karna chahiye . unse unke anubhav aur aage badhne ki lalak rakhne wali mahilayon ko prerna aur sambal milega.

Anonymous said...

बस किरण बेदी घरेलू हिंसा को समझाने के साथ जो चेतावनी देतीं हैं, उससे वे महिला सशक्तिकरण की पुरोधा के रूप में सामने आतीं हैं. पर माफ़ कीजियेगा वे चोखेर बाली या रेडिकल फेमिनिस्ट नहीं हैं. उनका ज़ोर इसपर है की किसी के साथ कोई अन्याय न हो सके. पर चोखेर बाली की टोन हमेशा Anti-male रही है (या कम से कम ऐसा लगता है). आप लोगों के तरीके pro-distress हैं, जबकि होना चाहिए pro-equality. कौन भाई चाहता है की उसकी बहन को बराबरी के मौके न मिलें या अपनी बेटी की घरेलु परेशानियों से हर बाप परेशान होता है. पर जब रेडिकल फेमिनिस्म के नाम पर यह कहना की हमें अधिकारों के दुरोपयोग से कोई मतलब नहीं है, हमारा काम केवल औरत को अधिकार दिलाना है. तब एक भले मकसद के अच्छे अभियान में विद्रूपता आ जाती है. जनता हूँ की मुझे काफ़ी आलोचनाओं का सामना करना होगा पर अगर चोखेर बाली की टोन Anti-Male न होकर pro- equality हो तो काफी सारा Resistence अपने आप कम हो जाए. बेदी जी एक महान शख्सियत हैं, और उन्होंने सभी के इन्साफ के लिए लड़ाई लड़ी है न सिर्फ़ महिलाओं के लिए, उन्हें एक दायरे में बंधना यानी परिंदे को पिंजडे में कैद करना है. उनका व्यक्तित्व महिला-पुरूष जैसी संकीर्णताओं से परे है. पर अफ़सोस की हर एक की सोच इतनी ऊँचाइयों को नहीं छू सकती.

डॉ .अनुराग said...

ji haan tabhi unke liye man me samman hai apne anubhavo ko unhone manviyiya drishtikoon se dekha hai..uske liye ek samvedansheel aatma ka hona aavashyaka hai.....
vaise blog par likhna shayad unki vyavasta ke karan na ho raha ho.....

सुजाता said...

@विवेक ,
सही बात है कि किरण बेदी ने इंसाफ के लिए आवाज़ उठाई ,लेकिन वे एक स्त्री हैं ऐसी जो सत्ता की आदत वाले पुरुषों की आँख की किरकिरी थी जिसे बाहर निकाल फेंकने का हर सम्भव प्रयास किया गया । इसलिए उनके लिए यह सम्बोधन है ।
उन्हे दायरे मे बान्धने की कोई कोशिश नही है पर बहुत ओब्वियस है कि एक स्त्री होने के नाते जब वे सत्ता से लड़ी हैं तो और अब भी लड रही हैं तो उनके शब्द हमारे लिए मूल्यवान साबित हो सकते है।

एंटी-पुरुष न होकर प्रो-इक्वालिटी होना होगा- आपने सही बात के लिए आगाह किया ।

इक्वालिटी के मुद्दे पर भी कितना प्रतिरोध है ,बहन के नाम सम्पत्ति होने से भाई जीजा की हत्या करवा सकता है और बहन की भी सुपारी दे देता है । कालकाजी के सुरेश गुप्ता के साथ यही हुआ न !

निर्मल said...

बहुत सही । किरणी जी भी ब्लागिंग में सक्रिय हो सकती है।

Anonymous said...

@ सुजाता
मैंने यह प्रतिक्रिया आरोप-प्रत्यारोप के लिए नहीं दी. मेरा प्रयास समानता के आन्दोलन में एक योगदान का है. अगर हम किसी एक वर्ग की ज्यादतियां गिनने लगें तो कल ऐसा लगेगा की दुनिया में ज्यादतियों के अलावा कुछ है ही नहीं. अगर एक कुछ सासें अत्याचार करतीं हैं तो आप हर बूढी औरत को शक की नज़र से नहीं देख सकते. कुछ परिवारों में incest की घटनाएँ होती हैं पर हम सारे परिवारों को कौटुम्बिक व्यभिचार का अड्डा नहीं मान लेते. बवानखेरी हत्याकांड जैसी घटनाओं के बाद भी कोई अपनी जवान बेटी पर शक नहीं करता. फ़िर समाज की इन isolated घटनाओं का ज़िक्र करने की ज़रूरत ही क्या है? कई बातें पितृसत्तात्मक समाज की उपज मान ली जाती हैं पर वो होती मानव मन की कमजोरियां हैं. पैसा, सेक्स, स्वार्थ, अभिमान, प्रतिरोध, कुंठा की भावनाएं सभी में पायी जातीं हैं, औरत या मर्द. किसी के भी मन में ये विकृतियों का रूप धारण कर सकतीं हैं. ईश्वर के लिए स्त्रीयां अपनी आज़ादी को विकृत न होने दें. मर्दों की विकृति ने हमारी दुनिया में कुछ कम ज़हर नहीं घोला है.

Anonymous said...

@ sujata
कृपया बुरा न मानें पर आप लोग किरण जी को एक दायरे के बाहर क्यों नहीं देख पा रहीं, उन्हें कीमत औरत होने की कम और ईमानदार होने की ज़्यादा चुकानी पड़ी. वरना क्या कारण था की उनपर सबसे ज़्यादा दबाव तब पड़ा जब उन्होंने ऐसे सिस्टम के फोडों को चीरा जिसकी मुखिया एक औरत थी (mid 70's to mid 80's). और उनके इन्ही अहसानों का बदला उन्हें आज मिला जब उनके ऊपर दो औरतें ही काबिज़ थीं. क्या आपका मानना यह है की ईमानदार आदमियों को सिस्टम सह लेता है और बेदी जी जैसी ईमानदार महिलाओं को हटा देता है? शायद नारीवाद ग़लत दिशा में जा रहा है, आज लड़कियों की आदर्श मेरी क्यूरी, किरण बेदी, वंदना शिवा, सू-की, थेचर न होकर ब्यूटी क्वीन्स हैं. क्या आज नारी भी शोर्ट-कट से दुनिया पर छाना चाहती है?

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सुजाता जी,
आप हमेशा सोचने के लिये
आपकी बात "चोखेर बाली " के माध्यम से उठा रहीँ हैँ --
बहस भी जायज है -
और किरण बेदी जैसी बहादुर, इमानदार नारी,
भारत ही नहीँ
सारी दुनिया के सामने एक नई उर्जा
बिखेर रहीँ हैँ ..
बदलाव ऐसे सँघर्षोँ के बाद ही शायद, सम्भव हो !
स्नेह ,
- लावण्या

सुजाता said...

विवेक बुरा मानने की कोई बात नहीं ।
आपकी चिंताएँ दर्ज कर ली हैं ।

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

राजकिशोरजी का सुझाव एकदम सही है, हम सब अगर उन्हें मेल करेंगे तो वो जरूर लिखना शुरू करेंगी।

Udan Tashtari said...

यह ब्लॉग पुनः शुरु हो, यही कामना है.

विखंडन said...

बाकी सब तो ठीक पर ई मेल भेजने का जिम्मा भी तो कोई ले। ब्लोग फिर से शुरु कराने का प्रयास सफल हो बस यही कामना है ।

VIMAL VERMA said...

बताइये जब किरण बेदी का ब्लॉग आया था तो लगा था कि उनसे लोग रूबरू होंगे...विचारों का आदान प्रदान होगा....पर सुजाता जी आपने महत्वपूर्ण काम किया है कि इस ओर सबका ध्यान दिलाया है....भाई इस ब्लॉग को फिर से ज़रूर शुरू कराया जाय.....यही अपनी भी कामना है....विकास और आपकी बहस अच्छी चल रही थी...इसे ज़ारी रखें...कम से कम महिला आंदोलन के प्रति लोगों की समझदारी तो बढ़ेगी ही...

राजकिशोर said...

किरन बेदी का महत्व उनक ईमानदारी, कर्मठता और लीक से हट कर चलने में है, इसमें संदेह नहीं। लेकिन उनका महत्व इस बात में कतई कम नहीं है कि स्त्री होते हुए भी वे यह सब कर दिखाने में सफल रहीं। इस तरह वे स्त्री-पुरुष, दोनों समुदायों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं, लेकिन स्त्रियों के लिए खास तौर से, क्योंकि स्त्रियों से इतना साहसी होने की उम्मीद नहीं की जाती। कहा जाता था कि एपने कैबिनेट में इंदिरा गांधी अकेली मर्द थीं। किरऩ दीदी के बारे में भी कोई कह सकता है कि वे पुलिस विभाग में अकेली मर्द थीं। स्त्री-पुरुष की छवियों में विषमता का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि जब किसी स्त्री को दृढ़ और साहसी पाया जाता है, तो उसे मर्द कहा जाने लगता है। मेरे खयाल से, किरन इस तरह की उपमा बिलकुल पसंद नहीं करेंगी। वे कहेंगी कि क्यों, स्त्रियां मजबूत नहीं हो सकतीं? किरन बेदी का महत्व यही हैं। स्त्री के सशक्तीकरण की मूर्ति बन कर वे स्त्रियों को समानतावादी धरातल पर ले जा रही हैं। अगर वे स्त्री न होतीं, तो उनकी पूजा होती और उन्हें आदर्श पुलिस अधिकारी बताया जाता, जैसे एक समय में खेरनार, शेषन आदि के गुन गाए जाते थे। लेकिन उनका स्त्री होना ही गुनाह हो गया। इसलिए समानता के मूल्य को बढ़ावा देने की खातिर भी श्रेष्ठ स्त्रियों के व्यक्तित्व को सामने लाने की चेष्टा बराबर की जानी चाहिए। इसके दो परिणाम होंगे। एक, पुरुषों में यह एहसास पैदा होगा कि स्त्रियां उनसे हीन नहीं हैं। दो, स्त्रियों को मां,बहन और पत्नी के साथ-साथ दूसरी भूमिकाएं निभाने की भी प्रेरणा मिलेंगी। उनके मन में यह बार-बार आएगा कि उनका जन्म चपातियां बेलने और पुरुष आकर्षण का लक्ष्य बने रहने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, प्रशासनिक आदि क्षेत्रों में रोल मॉडल बनने के लिए हुआ है। इसके साथ ही, उन पुरुषों की भी सराहना होनी चाहिए जिनके लिए स्त्रियां हीनतर प्रजाति नहीं हैं। इससे दूसरे पुरुषों को अपनी मर्दना छवि से मुक्त होने की प्रेरणा मिलेगी और स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देते हुए उनमें यह झिझक नहीं पैदा होगी कि वे मर्द नहीं, हिंजड़े हैं।

Anonymous said...

@ राजकिशोर
"इस तरह वे स्त्री-पुरुष, दोनों समुदायों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं"
स्त्री और पुरूष, नर या मादा, कोई समुदाय नहीं हैं, भले ही आपने गलती से (inadvertently) इस शब्द का प्रयोग कर लिया हो, फ़िर भी, ये दोनों कोई अलग-अलग समुदाय न होकर, प्रकृति द्वारा जीवन को आगे बढ़ाने के लिए बनाये गई एक ही व्यवस्था के अभिन्न हिस्से हैं. ठीक वैसे ही जैसे लॉकिंग सिस्टम में हम ताले को अलग और चाभी को अलग नहीं मानते हैं. केवल एक का ही अस्तित्व आपने आप में निरर्थक है. आजकल काफ़ी नारिवादियों को कहते सुना जा रहा है की विज्ञान आदमी की ज़रूरत ख़त्म कर देगा, उसका काम स्पर्म डोनर से ज़्यादा है ही क्या? अब जबकि टेक्नोलोजी ने दिखा दिया है की गर्भाधान लैब में हो सकता है, पुरूष की कोई ज़रूरत नहीं रह गई, वह अब प्रकृति का एक गैर ज़रूरी हिस्सा ही रह गया है.
क्या सच में? आज हमारे पास जब लैब में गर्भाधान के उपकरण है तो सिर्फ़ कुछ दशकों की ही बात और है, हम कृत्रिम गर्भाशय बना कर नारी की आवश्यकता समाप्त कर देंगे. हमने कभी भी दोनों को समुदायों में बांटने की हिमाकत नहीं की थी. आदिकाल से ही मानव प्रजाति में तरह तरह के भेदभाव रहे हैं, पर शायद आज पहली बार है की इतने मूलभूत स्तर पर द्वंद पैदा हो गया है. इसकी स्वभाविक परिणिति यह होगी की कल मानव समाज आपने अस्तित्व को मशीनों को सौंप देगा.
"अगर वे स्त्री न होतीं, तो उनकी पूजा होती और उन्हें आदर्श पुलिस अधिकारी बताया जाता, जैसे एक समय में खेरनार, शेषन आदि के गुन गाए जाते थे। लेकिन उनका स्त्री होना ही गुनाह हो गया।"
Gen-X यानि मेरी पीढ़ी ने सबसे पहले जिस भी चर्चित आई पी एस अफसर का नाम पहली बार सुना था वह किरण बेदी ही थीं, शायद बेदी जी ही पहली और मात्र गवर्मेंट सर्वेंट हैं जिनके जीवन पर आधारित एक टी.वी. सीरियल (उड़ान) बना. शेषन और खैरनार किसी भी मामले में किरण बेदी से ज़्यादा लोकप्रिय नहीं रहे. शेषन कुछ साल चमके और जनता उन्हें भूल गई, खैरनार की भी कोई ख़बर नही है, बेदी तो आज भी लोगों के सर आंखों पर हैं. और कौन कहता है की शेषन और खैरनार की पूजा होती है? बेदी जी को भारत की जनता ने हर वह सम्मान, वह आदर दिया है किसका कोई भी ईमानदार इंसान हकदार होता है. मेरी पिछली प्रतिक्रिया का इशारा समझ लेना चाहिए, इंदिरा की व्यवस्था से उन्होंने इस कदर टक्कर ली थी की इसकी एक बार उन्होंने प्रधानमंत्री की ग़लत पार्क की गई कार तक क्रेन द्वारा जब्त करवा ली थी. (इसी लिए उन्हें क्रेन बेदी कहा जाता है.) इन्दिराजी तो हिसाब बराबर करने से पहले ही सिधार गयीं, पर आज जब अपमानित करने का मौका हाथ आया तो उनकी बहू, और एक खासम्खास मुख्यमंत्री ने फिसलने नहीं दिया. बाकी सवालों के भी सटीक जवाब मेरे पास हैं, पर मेरी प्रतिक्रियाएं ही मूल पोस्ट से कहीं ज़्यादा बड़ी हो गई हैं, इसीलिए अगर फ़िर कभी मौका आता है तो अपनी बात साफ करने की कोशिश करूँगा.
मैं अपनी बात रखने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकता, पर pro-distress और Anti-male होना misandry प्रवृत्ति दर्शाता है. इसकी प्रतिक्रिया में misogyny का आन्दोलन खड़ा हो जाएगा. और यहाँ कोई भी यह तो नहीं चाहता होगा!

सुजाता said...

विवेक यह बात बेवकूफी की है कि पुरुष स्पर्म डोनर से ज़्यादा कुछ नहीं और स्त्री को उसका साथ नही चाहिये लेकिन जब दो लोगों को एक ही चीज़ चाहिये होती है जिनमें से एक को हमेशा पाने के उस वैध अधिकार् से दूर रखा गया हो तो अक्सर वह लड़ाई का रूप ले लेती है ।निश्चित रूप से कामना साथ की ही है ।चोखेर बाली कोई रेडिकल फेमिनिस्म की जगह नही है न ही हम सब उग्र रूप से सब कुछ नष्ट कर देने की बात करते हैं । पर वक़्त पड़ने पर उग्र हो जाना भी कुछ गलत नही है ।
आपके दिमाग मे नारीवादियों के लिए जो सोच है उसे ही आप यहाँ लागू करने की चेष्टा कर रहे हैं जो कि पूर्वाग्रह ग्रस्त होना है ।चोखेर बाली में पुरुष भी हैं और हमेशा उनका स्वागत रहेगा यह और बात है कि उनमें से कुछ को यहाँ लिखना वे अपनी शान के खिलाफ् लगे और मित्र उनका मज़ाक उड़ाएँ ।
चोखेर बाली का नारीवाद {यदि कोई है तो } किसी किताब का नही है,किताबी बातें सहायक हो सकती हैं लेकिन उन से जीवन तभी सधता है जब अपनी भी समझ का इस्तेमाल किया जाए ।
चोखेर बाली जेंडर सेंसिटाज़ेशन् करने के लिए सम्वाद करने के लिए और अभिव्यक्ति के लिए है ।मेरे साथी एक दूसरे से भी सहमत होने के लिए बाध्य नही हैं ।सभी प्रबुद्द्ध हैं । हम उग्रवादी संगठन नही हैं इसलिए इतने भयभीत होने की आवश्यकता नही कि हमारी दिशा गलत है , हमारी सोच गलत है , हमारे आदर्श मिस ब्यूटी हैं ।हम पता नही क्या बना देंगे दुनिया को ।
आप पहले अपने पूर्वाग्रहों से बाहर आइये ।

Priyankar said...

विवेक के. चौकसी जो भी हों नारीवाद के कोरस में एक भिन्न स्वर लेकर आए हैं और सुगम संगीत की तरह चल रही बहस को एक शास्त्रीय ऊंचाई दे रहे हैं . उनसे असहमत हुआ जा सकता है पर उनके विचारों की जड़ किस्म की अवहेला या उनसे गैरज़रूरी सतही ज़बांदराज़ी, विमर्श के नुकसान की कीमत पर ही की जा सकती है .

उनकी बात धीरज से सुनी जानी चाहिए और वैसी तार्किक बहस की जानी चाहिए जैसी राजकिशोर कर रहे हैं .

राजकिशोर said...

सुजाता ठीक कहती हैं। चोखेर बाली में तरह-तरह के स्वर सुनाई पड़ें, यह स्वाभाविक हैं। लेकिन एक सम्यक दृष्टि व्यापक रूप से दिखाई देती है। एक बार मैंने लिखा था कि पुरुषों ने पिछले कुछ हजार सालों में स्त्रियों के साथ जो सलूक किया है, उसे देखते हुए स्त्रिया अगर पुरुषों को शहर के चौराहे पर रोज चार जूते मारें, तो भी यह कम होगा।

सुजाता said...

प्रियंकर जी ,

मेरी फूहड़ ,अतार्किक ज़बानदराज़ी के लिए क्षमा। लेकिन अवहेलना किसी की नही की जा रही । सभी की बात सुनी जानी चाहिये । अनगढ वाणी एक बार और खोलना चाहूंगी ।कुछ बातें हैं , जाने तुक बने कि नहीं पर कह रही हूँ ...
आप जिसे नारीवाद का कोरस कह रहे हैं , उसे ही विवेक जी बहुत देर से अपनी टिप्पणियों में अभिव्यक्त कर रहे हैं ।लेकिन अच्छा हो वे और आप दोनों आगे भी अपनी बात ज़रूर कहें। एक संरचना के दोनो अवयव एक दूसरे के संघर्षों को किस तरह देख रहे हैं यह भी समझने मे मदद मिल रही है ।

अक्सर नारीवाद पुरुष उपेक्षा का शिकार रहता है जब कि उसका सीधा सरोकार पुरुष से है ।कारण भी वाकई ऐसे नारीवादी हैं जो उग्र स्वभाव और आमूल परिवर्तन मे यकीन रखते है ,जो लतियाते और धकियाते हैं ।
लेकिन ऐसे नारीवादियों का जन्म शास्त्रीय बहसों के बीच नही होता ,ज़मीनी सच्चाइयों के बीच होता है ।वे सुसंस्कृत पुरुषों से नहीं टकरातीं ,उनका सामना विकृत मानसिकता से हुआ होता है । जब बात जान बचाने की हो तो उग्रता को भी मैं बुरा नही मानती ।
पूरे विश्व में नारीवाद क्या एक ही एजेंडा और एक ही राह पर चल रहा है ? बहुत स्तर हैं ।स्त्री की मुक्ति के भी और इस बहस के भी । अलग अलग आवज़ें हैं ।देखें इनसे क्या बनता है ...कहाँ जाते हैं ।

निश्चित रूप से प्रो-समानता होना ही श्रेय है ।उससे कोई विरोध नही । असहमति उस पूर्वाग्रह ग्रस्त सोच से है जिसकी वजह से "चोखेर बाली " सम्बोधन सहा नही जा रहा ।आज पुलिस में स्त्री के लिए आसान प्रवेश और स्थिति किरण बेदी के बाद ही संभव हुई है ,जो लोकप्रियता उन्हें मिली वह इनसाफ पसन्द होने के कारण मिली ,स्त्री होने की भूमिक इसमे कम नही । आरम्भिक संघर्ष तो स्त्री होने के कारण ही था , आरम्भ में तो वे टकराई ही थीं , उन्हें हतोत्साहित किया ही गया था । देश की महिला प्रधानमंत्री महिलाओं की प्रतिनिधि नहीं थी वह एक राजनैतिक प्रतिनिधि थी ।स्त्री अस्मिता से कहीं ऊपर उसकी राजनीतिक पहचान थी ।इसलिए सामुदायिक हित से ज़्यादा राजनैतिक हित सक्रिय रहे ।
किरण बेदी हो या इन्दिरा गान्धी पहली औरत का रास्ता कभी आसान नहीं रहता ।और औरत की पहल भी आसान नही रहती .....शुरुआत में उसे कोई फूलों के हार नही पहनाने आता ...वह चुभती ही है आँखों में ...
कामना है कि ऐसा भविष्य़ हो जहाँ ऐसी बातें दृष्टांत न हों । सामान्य हों ।

Priyankar said...

मुझे विवेक चौकसी ज्यादा संतुलित और संयत नज़र आ रहे हैं . मैं भी यही चाहता हूं कि " चोखेर बाली में तरह-तरह के स्वर सुनाई पड़ें" ,वह स्त्रियों की आवाज़ बने,परिवर्तन की वाहक बने . पर यह 'हाईपिच्ड श्रिल' से नहीं समझदारी भरी संयत बातचीत से ही संभव होगा . क्रांतिकारी बातें कहने का हुनर हममें से बहुतों के पास है . पर उसके असर के लिए गांधी होना होता है .

अनूप भार्गव said...

मुझे प्रियंकर और विवेक जी की बातों में संतुलन नज़र आ रहा है । बहुत सरल था उन दोनो के लिये चुप रहना । विवेक जी के उठाये कई सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं । मेरी हर बात तर्कसंगत और आप का हर विरोध का स्वर ’पूर्वाग्रह का शिकार’ वाला ऐटीट्यूड भी सही नही है ।
ध्यान रहे कि "चोखेर बाली" कहीं सिर्फ़ ’मेल बैशिंग’ का अखाड़ा न बन कर रह जाये ।

@राजकिशोर जी की यह बात गले नही उतरी :

"पुरुषों ने पिछले कुछ हजार सालों में स्त्रियों के साथ जो सलूक किया है, उसे देखते हुए स्त्रिया अगर पुरुषों को शहर के चौराहे पर रोज चार जूते मारें, तो भी यह कम होगा।"

क्या सिद्ध करना चाह रहे हैं वो ?
इस तर्क के अनुसार तो हर भारतीय को अंग्रेज के साथ और हर शूद्र को ब्राह्मण के साथ यही व्यवहार करना चाहिये ।
Generalization does nor help and exceptions do not prove a point.

सुजाता said...

@अनूप भार्गव -ध्यान रहे कि "चोखेर बाली" कहीं सिर्फ़ ’मेल बैशिंग’ का अखाड़ा न बन कर रह जाये ।
******
बखूबी ध्यान है अनूप जी , और विरोध भी दर्ज किये जा रहे हैं ।।ध्यान दीजिये कि मैने पहली दो टिप्पणियों मे कह दिया था कि विवेक ने सही बात के लिए आगाह किया और उनकी चिंताएँ दर्ज कर ली हैं । इसलिए मैं सही हूँ , दूसरा नही : यह ऐटीट्यूड तो है ही नहीं जैसा आपको दिख रहा है ।
आत्मालोचन समय समय पर ज़रूर होते रहना चाहिये ।सभी स्त्रियाँ हमेशा सही हैं , ऐसा कोई दुराग्रह नही है ।
मुझे भी लगता है कि इस मंच के क्रियाकलापों से प्रभावित हो कर ही विवेक के मन में यह चिंता जागी कि चोखेर बाली को बाकी अतिवादी नारीवादियों जैसा नही होना चाहिये ।
लेकिन्
आजकल की काफी नारीवादी जो सोचती हैं उन्हें यदि वे चोखेर बाली के सन्दर्भ में लागू करने की कोशिश करेंगे तो यह पूर्वाग्रह ही कहा जायेगा ।
और मेरी आपत्ति इसी पूर्वाग्रह से है कि जब भी किसी स्त्री द्वारा विचार व्यक्त किये जायेंगे उन्हें रेडिकल फेमिनिस्म के नज़रिये से ही देखा जायेगा ।ऐसा यहाँ कभी नही कहा गया कि पुरुषो की ज़रूरत नही और उन्हे धकिया देना चाहिये ।
यहाँ ज़्यादतर स्त्रियाँ व पुरुष परिवार संरचना के भीतर हैं ,विवाहित हो या अविवाहित :इसलिए कोई भी नही चाहेगा कि यह "मेल बैशिंग का अड्डा बने "।
दरकार है कि सोच के एक चौखटे के बाहर निकल कर इन प्रयासों को देखा जाए ।

राजकिशोर said...

दोस्तो, इस बहस को अब यहीं रोक देना चाहिए। सभी पक्षों ने अपनी-अपनी बात कह ली है। यह चर्चा आगे भी होती रहेगी।

एक बात मैं स्पष्ट कर दूं। जूते मारने से मेरा अभिप्राय यह था कि स्त्रियां जूते मारें और पुरुष स्वेच्छा से जूते खाएं -- परिताप की भावना के साथ। गांधी जी ने कहा है कि दलितों के साथ हमने जो व्यवहार किया है, उसे देखते हुए अगर वे हमारे मुंह पर थूकते भी हैं, तो यह कम है। जाहिर है, बात मुहावरे में ही कही गई है। वैसे, कोई स्त्री चौराहे पर, मेरे ही चौराहे पर, चार जूते लगाना चाहे, तो मैं उसे आमंत्रित करता हूं। सभी पुरुषों की ओर से मैं यह चोट सहर्ष स्वीकार करूंगा।

अनूप भार्गव said...

राजकिशोर जी:
माफ़ कीजिये , मजाक नहीं कर रहा हूँ लेकिन बाज़ार पर खड़े हो कर जूते खाने का निर्णय आप का निजी है , कृपया इसे सम्पूर्ण पुरुष जाति की ओर से स्वीकार न करें । यह अधिकार न तो आप को बनता है और न ही दिया गया है ।
मुझे उतना ही कष्ट होता है - चाहे जूते मुझे पड़ें या मेरी वज़ह से मेरे मित्र को ।
मालूम है कि आप बात मुहावरे में कर रहे हैं लेकिन मर्म अगर ज़िन्दगी भर Guilty Feeling के साथ जीने से है तो मुझे इस से ऐतराज़ है ।
मैं यदि अपने आचार और विचार में नारी के प्रति समानता को जी सकूँ तो अपना काम पूरा समझूँगा । कुछ ऐसे भी प्रयास करने को तैयार हूँ कि मेरे बेटे को ऐसे सवालों के ज़वाब न देने पड़े लेकिन इस से अधिक नहीं ।

Unknown said...

में आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ. ऐसे अर्थपूर्ण, व्यवहारिक, जानकारी देने वाले ब्लाग चलते रहने चाहियें. किरण बेदी से इस बारे में आग्रह किया जाना चाहिए.

विजेंद्र एस विज said...

Haan unka blog punah shuru hona chahiye...es post par to meri najar hi nahin gayi kabi..yah to kaafi purani post hai...mujhe personnely unse milne ka saubhagya mila hua hai auir aaj bhi woh yahan noida hamare office aayin hui thin..Mission www.saferindia.com , UP & Uttaranchal office ke inaugaration ke silsile me...unka vyaktigat email id to yahan nahin diya ja sakata hai..haan es post ko poora ka poora copy/paste kar unhe email kar diya hai...ummeed hai un tak hamari baat pahcuh sakegi.

Aabhar.

Anonymous said...

लो जी, अब आप लोग भी खुश हो जाईये। 'क्रेन बेदी' ने लम्बे समय बाद अपने ब्लॉग को गुलजार किया है।

उनकी ताजा पोस्ट 25 फरवरी को आयी है। देख लीजिये http://kiran-bedi.blogspot.com/2009/02/whos-human-rights.html

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