Tuesday, April 29, 2008

सोचें, बार बार सोचें...

जब महिला दिवस आता है तो मेरी व्यस्तता थोडी बढ़ जाती है! कई संस्थाएं जो इस दिन कार्यक्रम आयोजित करती हैं, चाहती हैं कि मैं वहाँ जाकर कुछ बोलूँ! मैं जाती भी हूँ! एक बार मानव अधिकार आयोग कि किसी ब्रांच ने भी एक कार्यक्रम आयोजित किया और मुझे आमंत्रित किया! मैं पहुंची तब तक कार्यक्रम शुरू हो चुका था!हॉल महिलाओं से खचाखच भरा हुआ था और वक्तागण बोलना प्रारंभ कर चुके थे! मैं भी रुचिपूर्वक सभी के विचार सुनने लगी!श्रोताओं में सभी सुशिक्षित महिलायें थीं! सभी वक्ताओं ने लगभग एक जैसी कही कहीं जिनमे महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाना, उन्हें उचित महत्त्व न मिलना, उनके हकों से वंचित रखा जाना इत्यादी विचार शामिल थे! और मज़े की बात यह थी कि लगभग ७०% वक्ताओं ने अपना भाषण "यत्र नारी पूज्यन्ते,तत्र रमन्ते देवता" या " अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी" से शुरू किया! खैर सभी ने अच्छा बोला और सभी ने काफी सराहा!

अंत में मेरा भी नंबर आया..मैं सबसे पहले श्रोता महिलाओं से पूछा कि कौन सी चीज़ है जो उन्हें दोयम दर्जे का महसूस करवाती है!यह दोतरफा संवाद था! अधिकांश महिलाओं ने बताया कि ये घर से ही शुरू हो जाता है! घर के फैसलों में उनकी राय नहीं ली जाती..बच्चे भी बड़े हो जाते हैं तो सलाह लेना बंद कर देते हैं!ठीक...मैंने उनके सामने पांच प्रश्न रखे ,जो इस प्रकार थे-
१- दुनिया में कितने महाद्वीप हैं?
२-भारत के विदेश मंत्री कौन हैं?
३-भारत का राष्ट्रीय खेल कौन सा है?
४-नक्सलवाद कहाँ से प्रारंभ हुआ?
५-झारखंड किस स्टेट से अलग होकर बना है?

ये सभी बहुत सामान्य प्रश्न थे लेकिन शायद दो या तीन महिलायें ही एक दो प्रश्नों के सही जवाब दे सकीं...बाकी खामोश रहीं! साफ था कि ज्यादातर घरेलु महिलायें अखबार भी नहीं पढ़ती हैं..अगर पढ़ती भी हैं तो मधुरिमा या अन्य महिलाओं से संबंधित पेज! मैंने उन्हें सिर्फ इतना बताया कि जरूरी नहीं कि नौकरी करने से ही महत्त्व मिले....महत्त्व पाने और फैसलों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ज्ञान होना बहुत ज़रूरी है! मैं भी कोई बहुत ज्ञानी नहीं हूँ...न ही रोज़ मनोरमा इयर बुक पढ़ती हूँ! लेकिन जो हाथ में आ जाए ,सब कुछ रूचि से पढ़ती हूँ! मेरा कहना सिर्फ इतना था कि पढ़ने कि आदत डालें और अपने बच्चों को भी पढ़ने के प्रति रूचि जगाये!

मैंने देखा है कि न केवल महिलायें बल्कि पुरुषों में भी ये प्रवत्ति होती है कि ज्यादातर चीजों को बिना सोचे समझे मानते चले आते हैं! बचपन से सुनती चली आ रही थी कि रात को नाखून नहीं काटते हैं, बिल्ली रास्ता काटे तो रुक जाना चाहिए! हमेशा इन बातों को लेकर सवाल किया लेकिन बड़े लोगों से यही जवाब पाया कि ज्यादा प्रश्न मत करो...जो होता है चुपचाप मान लो!खैर बड़ी हुई तो इन सवालों के जवाब भी मिल गए! यही सवाल उस सभा में महिलाओं से किये तो उन्हें भी जवाब नहीं मालूम थे!लेकिन सब मानती चली आ रही थीं! जब मैंने उन्हें बताया कि रात को नाखून तब नहीं काटे जाते थे जब गाँव में बिजली नहीं थी...रात को कम उजाले में नाखून काटने से चोट लगने के डर के कारण यह कहा जाता था!लेकिन आज भी जब रात में भी भरपूर उजाला रहता है..हम यही बात मानते चले आ रहे हैं!दूसरा बिल्ली रास्ता काटने वाली बात...जब पक्की सड़कें नहीं थीं तब कच्ची सड़क के दोनों और आबादी न होकर जंगल थे! और यदि बिल्ली दौड़कर निकली है तो शायद कोई जानवर उसके पीछे होगा, इसलिए थोडी देर रूककर फिर आगे बढ़ते थे! ये बात भी आज के दौर में लागू नहीं होती! जाहिर है...पहली बार महिलाओं सहित वक्ताओं को इन बातों के जवाब मिले थे!

जो लोग सोचते हैं...बार बार सोचते हैं उनकी सभी शंकाओं का समाधान होता है! लेकिन दिक्कत ये है कि हम सोचना ही नहीं चाहते! मैं श्रीमती किरण बेदी और श्रीमती सुधा मूर्ति से बड़ी प्रभावित हूँ,इनकी कुछ किताबें मैंने पढीं! दोनों में जो बात कॉमन है वो ये कि दोनों ही अपने आस पास कि घटनाओं को अपने नज़रिये से सोचती हैं! कई जगहों पर में किरण बेदी जी के विचारों से सहमत नहीं होती लेकिन ये सिर्फ नज़रिये का फर्क है...अच्छी बात ये है वे छोटी छोटी सी बातों के बारे में सोचती हैं और गहराई से उनका विश्लेषण करती हैं! नजरिया भी सोचने समझने से ही विकसित होता है! इसलिए जहाँ तक हो सके हम सभी क्या स्त्री,क्या पुरुष सभी को ज्ञान अर्जित करने में पीछे नहीं रहना चाहिए! शायद यही है जो हमें महत्त्व दिलायेगा!

13 comments:

राजकिशोर said...

वंडरफुल। रात में नाखून न काटने के पुराने तर्क का मैं अनुमान कर सकता था, पर बिल्ली के रास्ता काटने की व्याख्या पढ़ कर मन खुश हो गया। धन्यवाद, पल्लवी, बहुत-बहुत धन्यवाद।

ऐसे ही सोचती और लिखते रहिए।

Neeraj Rohilla said...

आपने पाँच सवालों के माध्यम से समस्या के मर्म पर चोट की है । काफ़ी पुरूषों के लिये भी यही बात सही है ।

आगे भी लिखती रहें, इन्तजार रहेगा ।

अनूप शुक्ल said...

अच्छा लिखा! लिखती रहें।

सुजाता said...

बहुत सही कहा पल्लवी । अखबार वाली बात जाने कब से सोच रही हूँ ।वाकई ज़्यादातर महिलाएँ जो कामकाजी है वे तक अखबार मे रुचि नहीं लेतीं ।न मुद्दों पर वे अपनी राय कायम कर पाती हैं ।
शिक्षा सशक्तिकरण के लिए हो सिर्फ नौकरी या अच्छी जगह शादी के लिए न हो तो स्त्री की अधिकांश समस्या हल हो जाए ।
धन्यवाद पल्लवी !

विजय गौड़ said...

अच्छा आलेख है. तर्क पूर्ण है पर यदि इसे और आगे बढाये तो स्त्री जीवन के विभिन्न पहलुओं से आपको खुद भी ट्कराना पढ सकता है. और तब इन सामान्य से प्रश्नओं के सही जवाब न दे पाने के कारणों को भी खोजा जा सकता है. शायद ऎसा करते हुए ही कोई नतीजा निकाला जा सकता है.

Priyankar said...

बहुत-बहुत धन्यवाद पल्लवी जी !

आभारी हूं . यही असली नारीवाद है जिसकी भारत को ज़रूरत है . इधर का नारीवाद नेताओं की तरह बोलता बहुत है , ज़मीनी स्तर पर परिवर्तन बहुत कम घटित करता है .

आपका आलेख सबके लिए बेहद ज़रूरी पाठ होना चाहिए .

pallavi trivedi said...

विजय जी...आपका कहना सही है!जीवन के अनेक पहलू हैं...अपनी अपनी मजबूरियाँ हैं !लेकिन मैं फिर भी यही कहूँगी कि जितना संभव हो कोशिश करना चाहिए! जहाँ कोई मजबूरी हैं वहाँ सोचा जा सकता है लेकिन मेरा जोर उन लोगों पर है जो सिर्फ इच्छा शक्ति की कमी के कारण रूचि नहीं लेते हैं! मैंने अपनी माँ को हमेशा देखा कि सारे घर का काम निपटाने के बाद दोपहर में अखबार लेकर बैठती थीं...और करेंट अफेयर्स पर उनका ज्ञान हमसे कहीं ज्यादा होता था. और आज भी है!

आभा said...

आप के पाँच सवाल झकझोर गए कि आभा देख अपनी औकात फिर कुछ भी बोल , बार बार सोचूगीं ..... अब अखबार पढते समय आप को जरूर याद करूगी। सारी बातें बिलकुल सही .

Rachna Singh said...

aap ka likha hua har vaakya satya haen aur satey mae achchaa yaa bura nahin hota

L.Goswami said...

sab thik ho jayega.aap keon top lable ki bat karti hai.sabhy samaj me niche rahne walon ko dekhiye badlaw dikhega.aajkal mhilaye "kamin" se hatkar "RAJMISTRI" ka kaam karne lagi hai.nariyal utarne pedon par chadne lagi hai (jabki yah purush pradhan kam tha.har bar bdlaw whin nhi hota jhan dikhta hai.kranti sbhi parton par hoti hai.

डॉ .अनुराग said...

अच्छा लगता है आप जैसे लोगो के विचार जानकर ..जो केवल इंसानी तरीके से सोचते है न महिला ओर पुरूष बनकर ,किरण बेदी, म्रनाल पाण्डेय ,अमृता प्रीतम ,शिवानी ,जैसी महिला हमे भी उतना ही प्रभावित करते है जितना आप लोगो को......

neelima garg said...

I am totally agreed with u Pallaviji - firstly knowledge and then to get the things implemented ...at least wherever we r we can do this much for women.

Unknown said...

महिला दिवस. वर्ष का एक दिन हम मनाते हैं महिला दिवस के रूप में. क्या वर्ष के बाकी दिन महिला दिवस नहीं हैं? क्या एक दिन भी यह संसार महिलाओं के बिना चल सकता है?

में आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि जरूरी नहीं कि नौकरी करने से ही महत्त्व मिले....महत्त्व पाने और फैसलों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ज्ञान होना बहुत ज़रूरी है! आज की नारी को यह बात समझनी होगी. जो शक्ति वह स्वयं को पुरूष के बराबर साबित करने में गवां रही है उसे स्वयं का विकास करने में लगानी होगी. मेरा यह अटल विश्वास है की स्वयं का विकास नारी को पुरूष से कहीं आगे ले जाएगा.

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