Wednesday, April 30, 2008

Ode to a woman

सुनो ,
तुम जानती हो
मेरा अस्तित्व
तुम से शुरू हो कर
तुम पर खत्म होता है
फ़िर बता सकोगी
मुझे मेरा विस्तार
अनन्त सा क्यों लगता है ?
>
-
{अनूप भार्गव }

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8 comments:

Unknown said...

बेटी के लिये पापा कभी दूर नहीं जा सकते।
विनम्र श्रद्धांजलि।

neelima garg said...

nice poem...

आभा said...

आने वाले को जाना ही है मै भी दुखी हूँ, प्रत्यक्षा के पास उनकी यादें हैं अब इस याद के नाते .....

Udan Tashtari said...

हमारी विनम्र श्रद्धांजलि.

Poonam Agrawal said...

Sharirik roop se na sahi per yaadon mein vo sadaa rahenge.

unkee yaad mein....

सुनीता शानू said...

वक्त कभी रूकता नही चलता ही रहता है...मगर कुछ अहसास जीवन पर अमिट सी छाप छोड़ जाते है...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

प्रत्यक्षा जी के पापा की आत्मा उन्हीँ मेँ बसगयी है
मेरी नम्र श्रध्धाँजलि .

Unknown said...

बहुत अच्छी बात कही है आपने. यह नारी भी जानती है और पुरूष भी जानता है कि नारी के बिना पुरूष अधूरा है. पुरूष का अस्तित्व नारी से शुरू हो कर नारी पर ही खत्म होता है. पुरूष को अपना विस्तार अनंत सा इस लिए लगता है कि वह नारी के साथ मिल कर ही ईश्वरीय अनंत का एक हिस्सा बनता है. अपने आप में वह कुछ नहीं है.

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