Wednesday, April 16, 2008

quid pro quo

एक पुरुष सहकर्मी द्वारा एक दिन मिली टिप्पणी -"मैडम आज तो आप गज़ब ढा रही हैं ,पर आपका कुर्ता कुछ ज़्यादा ही छोटा है ,है न ! ठीक है पर थोड़ा लम्बा होता तो ....अच्छा रहता " एक बारगी समझ नही आया कि क्या कहूँ ....मुस्करा कर निकल गयी ।2 मिनट बाद पलटी यह सोच कर कि थप्पड़ क्यो न जड़ दूँ मुँह पर ।लेकिन देर हो गयी थी ,वह जा चुका था ।लिखित कम्प्लेंट की । ऑफिस में हल्ला हो गया । वह अन्य पुरुष साथियों से मिलकर दबाव बनाने लगा ।घर पर फोन आने लगे । पीछे न हटने पर अखबार में मित्रता कॉलम मे नम्बर प्रकाशित करवा दिया गया और फिर क्या था ....फोन पर फोन !ऑफिस में महिला कर्मचारी मिल गयीं ।लेकिन कब तक ।उन्हें भी धमकाया गया । ऑफिस के मर्दों द्वारा नही ,घर के मर्दों द्वारा -"खबरदार !जो इस पचड़े मे तुम पड़ीं !समाज-सुधार नहीं करना !अपना घर देखो । कल को तुम्हारे साथ कुछ हो गया तो कौन निबटेगा ? वो भी पागल है !चुपचाप चली जाती !छोटी सी बात पर कम्प्लेंट करने की क्या ज़रूरत थी । नौकरी करो चुपचाप ।घर थोड़े ही बसाना है वहाँ ।" और वे सब अपना घर देखने लगीं । क्या करतीं ? इतनी सी बात पर तलाक ले लेतीं ?बच्चे उनका क्या होता ? उसे न्याय मिल जाता पर हमारा घर तो खराब हो जाता !- अब वह अकेली थी !महिला मित्र समझाती रहीं । केस वापिस ले लो । अब चरित्र पर वार करेंगे वे लोग । ये ऐसी ही है। खुद ही उलझती है मर्दों से ।जीना मुश्किल हो जायेगा । ये तो खाली हैं ,इनके घर तो बीवियाँ सम्भाल रही हैं ।कोई टेंशन तो है नही । अपनी बीवियों को घर की बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ थमा कर यहाँ पॉलिटिक्स करते हैं ,करियर बनाते हैं,बदनाम करते हैं ,नाम कमाते हैं ,परेशान करते हैं !तुम ये सब कर सकोगी ? बच्चों पर क्या असर होगा ?रोज़-रोज़ घर में तमाशा देखेंगे !झगड़े देखोगी या घर वालों को खाना खिलाओगी ? सब अस्त व्यस्त हो जायेगा । बेकार के काम में अपनी एनर्जी न लगाओ ! अब भी वक़्त है !
लेकिन ..

एफ आई आर दर्ज करवा दी गयी ।

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काल्पनिक कहानी नही है यह । एक करीबी मित्र की है ।
अनाहिता मोसानी की भी यही कहानी है । और न जाने कितनों की की है जो चुप रह जाती हैं या छोड़ जाती हैं क्योंकि इन मोर्चों पर लडाई हमेह्सा अकेली होती है और अंजाम तक आते आते भारी कीमत वसूल लेती है ।आज स्वप्न्दर्शी जी ने उन्मुक्त जी की यह पोस्ट देखने को कहा तो तुरंत दिमाग मे सारा अतीत कौन्ध गया ।उस केस का आज भी कुछ नही हुआ । वह आज भी बड़े मज़े से ऑफिस में घूमता है ।और वह आज भी वहीं काम करती है,बिन्दास! लेकिन आज भी वह जब तब मौके की तलाश मे होता है ,अपमान का बदला लेने के लिए ।
विशाखा के केस में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एक ऐतिहासिक निर्णय था ।जिसके बारे मे बहुत कुछ उन्मुक्त जी ने बताया ।इसके लिए उनका आभार । इस उम्मीद के साथ कि वे आगे भी इसे जारी रखेंगे हम केवल कुछ महत्वपूर्ण बातें रेखांकित करना चाहते हैं ।सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद भी आज इस तरह की बातें छुपाई जाती हैं जिसमें ज़्यादातर सामाजिक मर्यादा और परिवार वालों का दबाव ही काम करता है ।आखिर इस सेक्शुअल हरास मेंट मे क्या क्या बातें आती हैं ..सुप्रीम कोर्ट के अनुसार -:
1- Physical contact and advances
2- A demand or request for sexual favor,
3- Sexually colored remarks
4- Showing pornography
5- Any other unwelcome physical, verbal or non- verbal conduct of sexual nature. इसमें पाँचवा बिन्दु अत्यंत महत्वपूर्ण है । ऊपर उद्धृत केस में यही कारण था जिसे हम “चलता है यार ! या जाने दो !” की श्रेणी मे रखते हैं । और ज़्यादातर इसे ही अनदेखा किया जाता है ।
इसके अलावा है quid pro quo { this for that } यानी इसके बदले में वो ,यानी सेक्सुअल फेवर्स के बदले में प्रमोशन अन्यथा बर्खास्तगी ।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार हर ऑफिस ,संस्थान में शिकायत कमेटी में 50% महिलाओं के होने से इस तरह की शिकायतों पर कारगर तरीके से कदम उठाया जा सकेगा इसलिए आज अधिकांश संस्थानों ,कॉर्पोरेट दफतरों ,सरकारी महकमों मे इस तरह की शिकायत समितियाँ गठित की गयी हैं ।

कुछ रेयर केसिज़ को छोड़ दिया जाए महिलाएँ सच में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकार होती हैं और इस या उस कारण से वे चुप रहती हैं या सबसे बेहतर लगता है नौकरी छोड़ देना । लेकिन जब नौकरी करते रहना मजबूरी हो तो चुप रहना ही समाधान लगता है । ऊपर के उदाहरण में आपने देखा कि उसके साथ कोई खड़ा नही होता जो महिला ऐसी शिकायत करती है और बहुत से उदाहरणो मे स्वयम पति भी पीछे हटने की सलाह देता है ।
किसी महिला सथी के लिए अपमान जनक कार्य स्थितियाँ बनाना ,गन्दे चुटकुले सुनाना ,लगातार घूरना या सर से पाँव तक घूरना ,शारीरिक आकृति –पहनावे –अपियरेंस पर टिप्पणी करना ऐसी अनेक उदाहरण हैं जिन्हें लिस्ट करने बैठे तो बहुत लम्बी सूची बन जायेगी ।
यौन उतपीड़न पुरुष या स्त्री दोनो का हो सकता है ।लेकिन स्त्री द्वारा यौन उत्पीड़न जहाँ रेयर है वहीं केवल उस स्थिति में होता है जब स्त्री पुरुष से ज़्यादा बड़े ओहदे पर हो ,कमांडिंग पोज़ीशन मे हो ।जबकि भारतीय परिस्थितियों में न तो ज़्यादातर स्त्रियाँ ऊंचे ओहदो पर है न ही कमांडिंग पोज़्र्र्शन में और पुरुष द्वारा स्त्री सहकर्मी और सबॉर्डिनेट का यौन उत्पीड़न कहीं अधिक है , व्यापक है और उसका प्रभाव भी उत्पीड़ित स्त्री पर उत्पीड़ित पुरुष से कहीं अधिक पड़ता है । {मैं कल्पना करना चाहती हूँ कि किसी स्त्री द्वारा अपने पुरुष सहकर्मी को यह बोला गया होता –“आप तो आज गज़ब ढा रहे हैं ”इसका क्या वही असर होता जो एक स्त्री कर्मी पर हुआ ? }
ऐसे में मुझे उन्मुक्त जी के यहाँ यौन उत्पीड़न पर आयी पोस्ट की कुछ टिप्पणियाँ उद्धृत करना ज़रूरी लग रहा है क्योंकि वे मुझे लगातार हैरान कर रही हैं ।


ललित said...
कटु सत्य है कि आजकल इस कानून का दुरुपयोग करके कई महिलाओं कर्मचारियों द्वारा अपने सहकर्मियों/अधिकारियों पर झूठे आरोप के मामले लगाकर उनका जीवन बर्बाद कर दिया जा रहा है। अब तो महिलाएँ ही पुरुषों से छेड़छाड़ से लेकर.... तक अनेक प्रकार के अत्याचार कर रही हैं।
5:59 PM
बोधिसत्व said...
मेरा मानना है कि बिना आंशिक सहमति के छेड़छाड़ की कोशिश को कर ही नहीं सकता। वो सहमति भले ही दबाव से बनी हो।
आप की प्रस्तुति अच्छी है।
11:28 PM
BLAST TIMES said...
मेरी राय में छेड़छाड़ के बारे में महिला की मूकदर्षिता या छेड्ख़ानी के लिये पुरूष को प्रेरित करने का व्यवहार,पहनावा या बातचीत का लहजा अधिक जिम्मेदार है। आपका लेख हकीकत बयां कर रहा है।

swapandarshi said...
apakaa bahut dhanyavaad is post ke liye.
@bodhi (I do not know from where this enlightenment came to you?). and other who
share similar opinion!!!
The sexual haraasment at workplace has deep roots in male psyche, in the social structure which is aggressive against women and sometimes that is the only way to put down a women competitor, when she is outstanding in her profession or work.
We are still a savage society which puts blame on the victim and provides sympathy to the culprit, and even deny the recognition of the problems. More so because the crime against women are so wide spread. and now the violence against women is a collective efforts, in all fronts?
3:11 PM


स्त्री द्वारा यौन उत्पीड़न कितनी आबादी का सच है ?छेड़खानी के लिए पुरुष को प्रेरित करने का मायना क्या है ? आंशिक सहमति क्या है ?कौन सा बातचीत का लहज़ा जो पढे-लिखे समझ दार पुरुष को एक नालायकी करने को मजबूर करता है ?दोषारोपण की प्रवृत्ति से क्या वे बच जायेंगे जो किसी भी स्त्री द्वारा प्रलोभन दिये जाने पर या मित्रवत व्यवहार करने पर इसे फ्लर्टिंग का निमंत्रण मान लेते हैं । हाथ मिलाया ,मुस्कराई --ओह she is available ...!! और अपनी नैतिकता भूल कर मज़े लेने लगो ...और बाद मे अनैतिक कपड़ो और व्यवहार को दोषी ठहराओ ।
क्या इस गली -सड़ी बातों से कोई भी हल होने वाला है ?अभी तक तो हम इसी बात पर हैरान हैं कि स्त्री के लेखन में एक पुरुष में क्यों कुछ सेंसुअस पाने की कुत्सित चाह है,भारत भारद्वाज का लेख उदाहरण है
quid pro qou के मायने "जैसे को तैसा भी हैं " ; क्या उत्पीड़ित स्त्री यह कर पायेगी ?

22 comments:

Rajesh Roshan said...

महिलाओ को लेकर हमारा समाज हमेशा चटखारे लेने के मूड में होता है. सवेंदना वह खत्म हो जाती है. लोग मिर्च मसाला लगा कर बातें करते हैं.

गिरिराज जोशी said...

अच्छा लिखा है... पहले भी लिखा गया है... भविष्य में भी संभवत: लिखा जायेगा... अच्छी बात है... हमारे आस-पास क्या होता है, हमें पता होना चाहिए...

महिलाओं के कड़े विरोध से ही इस पर रोक लग सकती है, प्रत्यक्ष रूप से सभी इसका समर्थन करेंगे... महिलाओं की चुप्पी/सब्र जब मौन सहमति समझी जाने लगे तो उसे तोड़ देना चाहिये

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

ब्लाग के लिए बहुत सार्थक मुद्दा चुना है आपने सुजाता। दरअसल ये समस्या कार्यस्थल पर यौनशोषण केवल अनाहिता मोसानी, विशाखा या नीरा की समस्या नहीं है। ये काम करने वाली 90 फीसदी महिलाओं की समस्या है। सुजाता, अच्छी पहल है, इसे जारी रखिए। उससे भी बड़ी बात कि हमें इसका कोई ठोस हल खोजना चाहिए। अमेरिका में केवल दस साल में पचास हजार यौन शोषण के केस दर्ज हुए। भारत में तो यह संख्या अब भी लगभग नगण्य है।

मुझे लगता है कि महिलाओं को यौन शोषण के मुद्दे पर एजुकेट करने की जरूरत है। इसे रोकने के लिए पुरुषों को बेहतर ढंग से कम्युनिकेट किया जाए। इस तरह के सुझावों के बारे में सोचा जाना चाहिए और उन पर अमल किया जाना चाहिए।

Anonymous said...

@ नीलिमा सुखीजा जी ने बहुत सही बात कही कि ऐसे मुद्दे चोखेर बाली पर लगातार उठने चाहिए।लेकिन कौन उठायेगा और उससे क्या हासिल होगा ? ज़्यादातर पुरुष ईमान्दारी से इस पर बात करने का साहस ही नही जुटा पाएंगे । लेकिन स्त्रियाँ खुद भी कहाँ इस मुद्दे पर कोई विचार व्यक्त करने लायक हैं ?कुछ अन्दज़ा तो टिप्पणियों से भि हो रहा है । न कोई आकर यह कहेगा कि हमने इसे सहा न यह कहेगा कि हमने भी विरोध किया ।ऐसे विषयों पर बात करने का साहस ही नही है लोगों में । सब भूल जाते हैं कि ये उंके घर का मुद्दा भी हो सकता है ।

PD said...

मैं सबसे पहले यहां ये कहना चाहता हूं कि मेरी बात से कोई ये ना समझे की मैं उस पुरूष का समर्थन नहीं कर रहा हूं..

मैंने कई बार ये भी देखा है कि कई लोगों को ये समझ में नहीं आता है की वो कब और क्या कह रहें हैं और उसका सामने वाले पर क्या प्रभाव पर रहा है.. कई बार मेरी कई महिला मित्र भी मुझे ऐसे ही मजाक में कुछ छेड़ जाती हैं..

अगर कोई पुरूष दिल्ली के किसी महिला कालेज के सामने से अकेले में गुजरेंगे तो उन्हें भी कमेंट्स सुनने को मिल जाता है..

कई बार यूं ही बहुत कुछ हो जाता है.. मेरा मानना है कि खुद को सरल बना कर रखो, मगर इतना भी नहीं कि कहीं से कोई आक्रमण कर सके..

आपने जिस महिला के बारे में बताया उसके पहले कदम के बारे में मैं संसय में हूं कि उन्होंने सही किया या गलत क्योंकि मैं नहीं जानता हूं की वहां सही में क्या हुआ होगा.. हां मगर मैं उनके अपने पक्ष को सबित करने के लिये दृढ बने रहने की मैं दिल से सराहना भी करता हूं..

Anonymous said...

मेरी इस चिट्ठी पर गौर करने के लिये शुक्रिया।
काम करने की जगह पर महिलओं के साथ उससे कहीं ज्यादा छेड़छाड़ होती है जितना पुरुष वर्ग उसे स्वीकारता है।
मैं किसी भी जगह महिलाओं के साथ वह बातें या वह व्यवहार ठीक समझता हूं और अपने जीवन में करता हूं जो बात अपनी छोटी बहन या मां का साथ रहने पर कह सकूं या कर सकूं। यह बात संयत व्यवहार करने में उचित मार्ग दर्शन करती है।
मैंने अपने उन्मुक्त चिट्ठे पर महिला सशक्तिकरण की श्रंंखला कई कड़ियों में लिखी थी। इन कड़ियों का पॉडकास्ट भी मैंने बकबक पर किया है। उसके बाद सारी कड़ियों को संजो कर अपने लेख चिट्ठे पर आज की दुर्गा - महिला सशक्तिकरण नाम से रखी है।

सुजाता said...

उन्मुक्त जी इस विषय पर लिखने के लिए आपका बहुत आभार ,यदि आपकी अनुमति हो तो उन्हें चोखेर बाली पर भे दिया जाए ।

उन्मुक्त said...

सुजाता जी,
मेरे सारे चिट्ठों और पॉडकास्ट की चिट्ठियां, प्रविष्टियां - कॉपीलेफ्टेड हैं आपको तथा हर किसो को उन्हें किसी प्रकार से (जैसी हैं या फिर संशोधित कर) प्रयोग करने की अनुमति है। उसके लिये मेरी अनुमति लेना आवश्यक नहीं है। यदि आप लिंक देगी तो मुझे प्रसन्नता होगी। मुझे प्रसन्नता होगी कि मेरे पॉडकास्ट का प्रयोग ऐसे व्यक्तियों के लिये हो सके जिनकी आंखें कमजोर हैं। यह बात मेरे चिट्ठों तथा पॉडकास्ट पर लिखी है। मेरी पत्नी यह बात कुछ विस्तार से यहां लिखी है।

अनूप भार्गव said...

कुछ अलग अलग विचार रख रहा हूँ , शायद कुछ अर्थ बने :
-किसी भी तरह के शोषण के खिलाफ़ आवाज़ शोषित को ही उठानी होगी ।
-यह अपेक्षा करना कि शोषण करने वाला खुद सुधर जायेगा , गलत होगा ।
-शोषण जितना स्वीकार किया जायेगा , उतना ही बढेगा ।
-दूसरे कदम का आधार पहले कदम की सफ़लता ही होती है ।
-आवाज़ उठाने पर कटिनाइयां तो आयेंगी ही , उन के लिये तैयार रहना होगा ।
-विपक्ष इतना बलवान नहीं है जितना दिखता है । यदि ज़वाब सब के सामने दिया जाये तो शायद अधिक प्रभावकारी हो ।
-बात आत्मविश्वास दिखाने की है ।
-काम पर होने वाले यौन शोषण को ’आइसोलेशन’ में नहीं देखा जा सकता । समाज में जो हो रहा है , यह उसी का ’एक्स्टेन्शन’ है ।

neelima garg said...

nice that u people are raising voices...

rakhshanda said...

aapne sahi likha,girls ke sath ye problem sadiyon se chali aarahi hai,lekin aaj tak iska koi hal samajh mein nahi aaya,kahne ko isey koi seriously nahi leta lekin road se lekar collage or office se lekar market tak aisa lagta hai jaise logon ke paas girls ko ghoorne or comments pass karne ke alava koi kaam nahi hai,ek ajeeb si tension mein jeeti hain ladkiyan...mama kahti hain akele kahi mat jana,reason hota hai..zamana bahot kharab hai..lekin kyon?zamana sirf hamaare liye hi kharab kyon hai? kisne kiya zamaane ko kharab? kya koi subah aisi bhi niklegi jab ladkiyan bina kisi dar ke ghar se baahar,kahin bhi kabhi bhi aa jaa sakengi?

Unknown said...

कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न को नकारा नहीं जा सकता. यह होता रहा है, हो रहा है और होता रहेगा. इस का विरोध जरूरी है. न सिर्फ़ नारी द्वारा बल्कि पुरुषों द्वारा भी इस का विरोध किया जाना चाहिए. कानून भी बने हैं, उन का फायदा उठाना चाहिए. कुछ महिलायें अपने ही कारणों से यौन उत्पीड़न का शिकार हो जाती हैं. कहावत है, ऊँगली पकड़ने दो तो लोग पहुंचा पकड़ने लगते हैं. नारियों को अपनी ऊँगली मुट्ठी के अन्दर बंद करके रखनी चाहिए. बंद मुट्ठी की कभी भी जरूरत पड़ सकती है.

Unknown said...
This comment has been removed by the author.
Unknown said...

All womens if stop this at first instance and also encourage others to raise voice against sexual harrasement then this problem can be addressed to some extent. But if one is raising voice and other are not even supporting then one or the other day they will be having the same fate as their collegue.
Good start , let us come together to stop all kind of harrasement against womens

makrand said...

gone thhrough u r article
just one word social system neeed to be educated

Anonymous said...

Interesting to know.

Unknown said...

Suresh guptaji ka kahna bilkul shi hai aur is par lagam laganen ke liye jaroori kadam uthane hi padenge varna yah vardat hmare bhi gharo me ho sakti hai parantu ek baat najar andaj nahi kar sakte ki koi bhi mard sadhi simpal bina makeup ki hui salvaar,sadi,pahani ladki ke saath chedkhani nahi karta jarurat hai yah yaad rakhne ki ke ham bhartiy hai sabhyata, sanskar, charitray yhi hamari pahchan hai hame use bhulna nahi chahiye

DOCTOR SB. said...
This comment has been removed by the author.
RAMESH KUMAR VATAN said...

इतना बबाल तो मचा ली, पर ये कभी नहीं सोचा अपने (सुजाता जी) अगर आपकी सहेली पुरे कपडे पहन कर घर से बहार निकले तो कोई टिका तिपनी नहीं करता|
ये तमासा नहीं होता| आपको इतना नहीं लिखना परता|
ताली एक हाथ से नहीं बजती,याद रहे| जो कुछ समाज से पनप रहा है उसके लिए कम से कम ५०% आपलोग भी जिमेबार है भले आप या आपकी सहेली न सही दूसरी ओउरते एवं लडकिय|

आर. अनुराधा said...

इस पोस्ट पर इतने दिनों बाद आई टिप्पणी अपने मेल बॉक्स में देखकर फिर इस पोस्ट लिंक पर आना हुआ। फिर पढ़ा और लगा कि बिल्कुल दर्ज करने और चर्चा लायक विषय है। तीन साल में ब्लॉग्स पर इतने स्त्री विमर्शों को पुरुषों ने झेला होगा कि उनके विचार जो तब तक पुरातन और कही-सुनी को ही मानने वाले थे, अब कुछ बदले होंगे। क्या वे बताएंगे कि क्या उनकी सोच में स्त्रियों के कार्य-स्थल या पब्लिक में कहीं भी अपमान को वे किस नजर से देखते हैं? और क्या वे इसमें भी महिलाओँ के वस्त्रों, बातचीत, तौर-तरीकों 'संकेतों' आदि को जिम्मेदार मानते हैं?

tor potky chody said...

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Unknown said...

समाज अगर हाशिये पे एक वर्ग को लाता है तो उसे इससे निकालना भी समाज की जिम्मेदारी है ..जरुरी नहीं की जिसे चोट लगे ,इलाज भी वही ढूंढे -जब समाज जख्म कुरेद सकता है ,कमेंट कर सकता है ,अपना ज्ञान परोस कर मामले में judgemental हो सकता है तो फिर प्रोटेस्ट की जिम्मेदारी सिर्फ victim की क्यों ? ऐसे मंच काम कर रहें होंगें पर हमें कुछ और बनाने की जरुरत है जो ऐसे मामले को कानूनी अंजाम पहुंचा सके ,वितिय व्यवधान न आयें और स्वैच्छिक रूप से लडाई लड़ने वाले वकीलों की टीम को इससे जोड़ा जा सके , बुद्धिजीवियों का वर्ग वहां जाकर गवाहों को उत्साहित करे और विक्टिम की post-traumatic injury (घटना के बाद का जख्म जो रिश्तों या समाज द्वारा inflict किया जाता है -ताने बाने के रूप में,) की काउंसलिंग की जा सके- ऐसा कर के ही समाज सदियों से करती आ रही अपनी अपराधों की क्षतिपूर्ति/प्रायश्चित कर सकता है -और ये सब किसी को हेल्प करने हेतु नहीं बल्कि अपने लिए सभ्य समाज तैयार करने हेतु है - काश हमसब अपनी व्यस्तताओं से कुछ समय निकाल पायें !

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...