Thursday, April 24, 2008

Raah

उत्ताल तरंगों को देखकर
नही मिलती
सागर की गहराई की थाह
शांत नजरों को देखकर
नही मिलती
नारी मन की राह

टुकडों में जीती जिन्दगी
पत्नी ,प्रेमिका ,मां ,
अपना अक्स निहारती
कितनी है तनहा

सूरज से धुप चुराकर
सबकी राहें रोशन करती
अपने उदास अंधेरों को
मन की तहों में रखती

सरल सहज रूप को देखकर
नही मिलती
नारी मन की राह

9 comments:

Neelima said...

कविता सुन्दर है !

pritima vats said...

बहुत अच्छी कविता है।

pallavi trivedi said...

सूरज से धुप चुराकर
सबकी राहें रोशन करती
अपने उदास अंधेरों को
मन की तहों में रखती

isi roop ko to badalne ki zaroorat hai.sabki raahen roshan karne se pahle apni raah bhi roshan karti hai aaj ki naari.baharhaal achchi kavita hai.....

neelima garg said...

Thanks for comments n encouragement. I wrote this poem when a friend of mine told me how depressed she was after the marriage of her daughter n son for being left alone...

सुनीता शानू said...

उत्ताल तरंगों को देखकर
नही मिलती
सागर की गहराई की थाह
शांत नजरों को देखकर
नही मिलती
नारी मन की राह

यही सच है,
खूबसूरत भावप्रद कविता है...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

टुकडों में जीती जिन्दगी
सरल सहज रूप को देखकर
नही मिलती
नारी मन की राह
बिलकुल सही --
मानव मन की थाह निस्सँदेह एक अनबूझ पहेली ही रहेगी !

राजकिशोर said...

गहराई से निकलो दीदी
अपना असली रूप दिखाओ
तभी तुम्हारी राह मिलेगी
चाहे कुछ दिन गच्चे खाओ

Suresh Gupta said...

अच्छी कविता लिखी है आप ने. हम क्यों जीते हैं जिन्दगी टुकड़ों में? अगर हम इस पर विचार करें तब कुछ अचरज भरे तथ्य सामने आयेंगे. पहले तो हम स्वयं को टुकड़ों में बाँट लेते हैं और फ़िर हर टुकड़े की जिन्दगी अलग अलग जीते हैं. स्वयं को पूरे रूप में देखिये. जिन्दगी ख़ुद पूरे रूप में नजर आएगी.

Poonam Agrawal said...

Tukdo mein jiti jindgee.
un tukrdo ko jodker dekhe to bantee hai sampurn naaree...
Bahut sunder...

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