Tuesday, May 6, 2008

33 फीसदी क्यों, 50 फीसदी क्यों नहीं?


हिंदुस्तान की राजनीतिक संस्थाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण के मुद्दे में दिलचस्पी है तो इस तसवीर पर गौर कीजिए। हाल में चर्चित हुई यह तसवीर आपने जरूर देखी होगी। यह गर्भवती महिला हैं, स्पेन की नई रक्षा मंत्री कारमे चाकोन। पूरा नाम है कारमे चाकोन पीकेर्रास जो वहां हाल ही में प्रधानमंत्री जोस लुईस रॉड्रिग्ज़ ज़पातेरो के नेतृत्व में गठित नई सरकार में शामिल हैं। स्पैनिश सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी के ज़पातेरो दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं।

उनके इस नए मंत्रिमंडल की कुछ खास बातें-

--17 सदस्यों के मंत्रीदल में नौ महिलाएं और आठ पुरुष हैं।

--देश की पहली महिला रक्षा मंत्री 37 वर्षीया कारमे चाकोन बनी हैं। पिछले मंत्रिमंडल में वे हाउसिंग मिनिस्टर थीं।

--कारमे चाकोन ने जब अप्रैल में कार्यभार संभाला तब वे सात माह की गर्भवती थीं।

--सबसे सक्रिय मंत्रियों में शुमार चाकोन ने इसी हालत में मज़े से सैनिक परेड का निरीक्षण भी किया।

--10 साल पहले तक यहां महिलाओं के लिए सेना के दरवाज़े बंद थे। आज स्पेन की सेना में शामिल 1.30 लाख सैनिकों में 15 फीसदी महिलाएं हैं।

--पुरुष प्रधान देश में लैंगिक समानता लाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।

--स्त्री-पुरुष समानता के लिए नया समानता मंत्रालय बनाया गया है जिसकी पहली मंत्री एक महिला- 31 वर्षीय विवियाना आइदो हैं। स्पेन के इतिहास में उनका नाम सबसे कम उम्र मंत्री के तौर पर दर्ज हो गया है।

--मारिया तेरेसा फर्नांडेज़ दे ला वेगा 2004 में स्पेन की पहली उप-प्रधानमंत्री बनी थीं। वे नई सरकार में फिर उप-प्रधानमंत्री बनी हैं।

--मॉलिक्युलर बायलोजी की विशेषज्ञ क्रिस्टीना गारमेन्दिया एक और नए मत्रालय- विज्ञान और खोज का काम देख रही हैं।

--सरकार ने तलाक की प्रक्रिया सरल बनाने, नौकरियों में औरतों की संख्या बढ़ाने के लिए कानून बनाए और कंपनियों के बोर्डरूम और चुनावी मैदान में ज्यादा औरतों को जगह देने की जोरदार वकालत की है।

--देश ने 36 साल तक तानाशाही झेली। यहां का लोकतंत्र अभी महज 30 साल पुराना है।

16 comments:

अनूप भार्गव said...

अनुराधा जी:
महिलाओं को उन के पूरे अधिकार और सम्मान देने के पक्ष में हूँ लेकिन एक सांस में बराबरी और समानता के साथ साथ आरक्षण की बात समझ नहीं आती ।
महिलाओं के आरक्षण को व्यवहारिक रूप में कैसे कार्यान्वित किया जायेगा, यह भी स्पष्ट नहीं है । ,यदि कोई इस पर प्रकाश डाल सके तो अच्छा होगा ।
यदि पूरे राष्ट्र के चुनाव क्षेत्रों को बाँट कर उन में से आधे सिर्फ़ महिलाओं के लिये सुरक्षित रख दिये गये तो क्या इस का अर्थ यह हुआ कि उन क्षेत्रों से कोई पुरुष कितना भी योग्य हो , वह कभी भी सांसद या विधायक नहीं बन सकता ?
- स्पेन , जिस देश का उदाहरण आप ने दिया , उस के द्वारा की गई प्रगति सराहनीय है लेकिन जहां तक मेरी जानकारी है , वहां महिलाऒं के लिये किसी तरह का आरक्षण नहीं है । यही बात लगभग हर पश्चिमी सभ्यता के देश के लिये लागु होती है ।

दिनेशराय द्विवेदी said...

आरक्षण में तो 33% ही चलेगा। वैसे 100% का स्कोप भी है। जरा यहाँ मुंसीपाल्टी का सांड़, और यहाँ साँड, मई दिवस और स्त्रियाँ, नजर डालिएगा।

ab inconvenienti said...

मुझे हाल में ही पढी एक ब्लॉगर की बात याद आ रही है ------- "हम एक सीमा से अधिक लोगों का पेट नहीं भर सकते, अब रोटी चाहे जति के आधार पर बांटी जाए, चाहे धर्म के, चाहे क्षेत्र के, या नस्ल के आधार पर बांटी जायें या फ़िर मेरिट के; एक बात तय है कई लोगों को भूखा सोना पड़ेगा. लोग तो भूखे रहेगे ही, पर अगर आप प्रतिभा और योग्यता को पालते हैं तो कहीं दूर यह सम्भावना बनती है की आगे कम लोग हमारे बीच भूखे होंगे." और हाँ, इस ब्लॉग पर भी ऐसी कई महिलाएं होंगी जो आरक्षण के विरोध में रही होंगी. अब तैंतीस प्रतिशत या पचास प्रतिशत पर उनकी क्या राय है? क्योंकि अक्सर ऐसा होता है की जिस बात से हमें नुकसान महसूस होता है या हमारे लिए न्यूट्रल मगर वैचारिक तौर पर ग़लत होती है हम उसके विरोधी हो जाते हैं. मगर उसी तथाकथित ग़लत बात में हमारा भी फायदा दिखने लगता है तो, हम पाला बदल कर उसके कट्टर समर्थक बन जाते हैं.
और जहाँ तक व्यवस्था सँभालने का मौका देने की बात है, आपकी बात से तो ऐसा लगता है की ऐसा पहली बार स्पेन में ही ऐसा हुआ है. आदिकाल से ही राजा के अयोग्य हो जाने, मौत हो जाने पर राजपरिवार की महिलाओं ने राजकाज संभाला है. यूरोप में तो अक्सर ऐसा ही होता आया है, महा पुरूषवादी मुगलकाल में भी रजिया सुल्ताना का हिदुस्तान की हुकूमत सँभालने पर कोई विरोध नहीं हुआ. कमोबेश उसी काल में रानी लक्ष्मीबाई, रानी अहिल्याबाई होलकर, रानी राष्मोनी, कित्तुर रानी चेन्नाम्मा, रानी दुर्गावती, रानी अवन्तिबाई भी हुईं, क्या उनकी पुरुषों से भरी सेना ने एक औरत के हुक्म की तामिली से बगावत कर दी? एलिज़बेथ और विक्टोरिया के ताज के सामने सर झुकाते समय क्या दुनिया को पुरूषवादी अहम् याद नहीं आया?
याद रहे, भेदभाव या अन्याय किसी के जन्म से या उसके जननांगों के कारण नहीं होता, इस दुनिया में कमज़ोर होना सबसे बड़ा गुनाह है. फ़िर चाहे मर्द हो या औरत ताकत आ जाने पर कोई अन्याय करने में किसी से पीछे नहीं रहता. माफ़ कीजिये, पर मनुष्य अभी भी पशु ही है, एक बुद्धिमान विकृत पशु. अभी सभ्य है तो समाज सिद्धांतों के चलते सभी को मौके दे रहा है पर कभी हमारी यह सभ्यता मिट जाती है, तो फ़िर शरीर की ताकत प्रमुख महत्त्व पा जायेगी. औरतों या नस्लीय तौर पर कमज़ोर लोगों पर फ़िर गुलामी लाद दी जायेगी. अन्याय रोकना है तो जड़ों का इलाज करो, एक-एक पत्तों को क्यों तोड़ रहे हो? शायद इसका कोई इलाज किसी के पास नहीं है. सब दिलासा देने के आस्थाई टोटके हैं, और अगर टेक्नोलोजी से इस भेदभाव को दूर करें, हम सभी को एक सा बना दें, तो हम प्रकृति से खिलवाड़ करेंगे. आप ही कहिये क्या करें?
हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के बहलाने को गाल़िब यह ख्याल अच्छा है ।।

Batangad said...

महिलाओं को ज्यादा मौके ज्यादा अधिकार देने चाहिए। लेकिन, इस तरह के आरक्षण की वकालत हमें कहां ले जाएगी। दूसरे देश के आंकड़े गिनाने से पहले ये भी तो बताइए कि इस देश में कितनी महिलाएं सत्ता के किन पदों पर रही हैं। इंदिरा गांधी के आगे और अब माया, जयललिता के आगेतो अच्छे-अच्छे तुर्रम खां पानी भरते हैं।

आर. अनुराधा said...

साथियो, इन विचारपरक टिप्पणियों के लिए धन्यवाद। मेरी मंशा सिर्फ बराबर की हिस्सेदारी के एक सुंदर उदाहरण को सामने लाने की थी। मेरी अभिव्यक्ति में कुछ कसर रह गई शायद इसलिए कि शीर्षक में इसे मैंने '33 फीसदी' से जोड़ा जो कि महिला आरक्षण के अर्थों में रूढ़ हो गया है। हमारा देश स्त्री-पुरुष समानता के मामले में कहां ठहरता है, और समाज कैसे और किस दिशा में बढ़े/बदले, इस पर फिलहाल मेरी कोई टिप्पणी नहीं हैं।

सुजाता said...

@ ab inconvenienti

आपकी इस बात से सहमत हूँ कि आरक्षण से सभी बातें हल नही होतीं । लेकिन इस बत से कतई असहमत हूँ कि भेदभाव किसी के जननांगों के कारण नही होता ।
अब अगर विचार बदल रहें हैं तो एक तरह से अच्छा ही है लेकिन बदलाव बहुत ऊपरी सतह पर ही तैर रहा है । संरचना और मानसिकता के भीतर जो घुला हुआ है वह अब भी उतना ही पुराना है जितने प्राचीन आपके उपनिषद और वेद हैं ।

स्त्री का गर्भ खेती की ज़मीन है । जिसमें पुरुष ने बीज बोया और फल प्राप्त किया । ज़मीन और फल दोनो पर उसी का अधिकार रहता था {?}
अपनी सम्पत्ति का वारिस अपना ही खून होना चाहिये , इसके लिए ज़मीन को वही जोते और कोई नही इसके लिए उसकी रक्षा भी ज़रूरी थी ,सो पतिव्रता , सती , सावित्री के आदर्श गढ लिए गये ।
स्त्री जितनी उसकी यौनिकता के लिए प्रताड़ित हुई उतनी ही अपनी उत्पादकता की वजह से भी ।

स्त्री का संरक्षण और उसके लिए लड़ाई आज भी होती है और इन सबके मूल में यही कब्ज़े की भावना है ।
नेट पर बैठे पुरुष ज़रूर इन सब बातों मे विश्वास नही करते होंगे ...पर गाँव देहात मे जाक्र देखिये कि सच आज भी नही बदला है ।
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दूसरी बात ,
आरक्षण मिलने के बाद भी कितनी स्त्रियाँ ज़िम्मेदारी उठायेंगी , काम करेंगी या स्त्री जाति की समस्याओं को सुलझा लेंगी - यह कहना मुश्किल है ।लेकिन यह पहल हो तो सही ...मौका मिले तो सही ...

बाकी बातें फिर कभी ...

ab inconvenienti said...

"अपनी सम्पत्ति का वारिस अपना ही खून होना चाहिये , इसके लिए ज़मीन को वही जोते और कोई नही इसके लिए उसकी रक्षा भी ज़रूरी थी ,सो पतिव्रता , सती , सावित्री के आदर्श गढ लिए गये ।
स्त्री जितनी उसकी यौनिकता के लिए प्रताड़ित हुई उतनी ही अपनी उत्पादकता की वजह से भी ।"
इसका तो एक ही मतलब निकलता है, यौन स्वतंत्रता, पर कितनी प्रबुद्ध महिलाएं हैं जो इस बात पर न भड़क उठें, अगर उनसे कहा जाए की आप अपने पिता द्वारा पैदा नहीं हुईं हैं. आम स्त्रीयां ही नहीं, उच्च शिक्षित डॉक्टरेट डिग्रीधारी महिलाएं भी यह जानने के बाद की उनकी माँ 'सेक्सुअली फ्री' थीं. गहरे सदमे में आ जाएँगी और शायद अपनी माँ का दुबारा चेहरा तक न देखें. एक परिवार को तो मैं भी जनता हूँ. और अगर औरत को हक़ है की वह अपने पति के जींस अपनी संतान को न देना चाहे तो आदमी के पास भी यह हक होना चाहिए की वह (चाहने पर) एक संतान को अपना अंश दे सके. अगर आपकी कल्पना सच हो गई तो संतानोत्पत्ति का विशेषाधिकार 'अल्फा मेल' को ही रहेगा.

सुजाता said...

@ ab inconvenienti
यौन स्वतंत्रता की या व्यभिचार की बात ही नही है , बात तो किसी को उसके लिंग के कारण झेले जाने वाले भेदभाव की कर रहे थे आप .. उसी से मैने असहमति जताई । आप बार बार कहिये कि स्त्री अपने स्त्री होने के कारण अपमान नही झेलती मै मही मान सकती । और इसके लिए कोई एक पुरुष या एक स्त्री दोषी नही है सम्पूर्ण संरचना है , उसके बिहाफ पर तो आप कतई नही कह सकते कि भेदभाव का कारण लिंग या जाति नही होती हाँ अपनी व्यक्तिगत मानयाताओं के आधार पर ज़रूर कह सकते हैं ।
दूसरी बात , बेटे की चाह का यही कारण होता था कि घर की सम्पत्ति घर में रहे । इसके लिए कुछेक स्थानों पर एक ही घर मे कई बेटो की एक ही पत्नी की परमपरा भी रही है ताकि सभी भाइयों की सम्पत्ति भी घर मे ही बनी रहे ।लडकी को सप्मत्ति पर अधिकार भी इसीलिए नही दिया जाता कि हमारी सम्पत्ति {हमारी का मतलब तो आप समझते होंगे }हमारे ही घर में रहे , किसी अन्य खानदान मे न चली जाए ।
हम जो सोचते हैं , जो करते हैं , वह पिछली परम्पराओं और अतीत से काट कर देखा जा सकता है क्या ?
यौन स्वतंत्रता तो बहुत दूर की बात है , हम तो अभी स्त्री को मानवीय गरिमा भी देने मे हिचकिचाते हैं ।
शायद आपको मैं समझा नही पाई कि मेरी असहमति का कारण क्या था । खैर ....

आर. अनुराधा said...

"पर कितनी प्रबुद्ध महिलाएं हैं जो इस बात पर न भड़क उठें, अगर उनसे कहा जाए की आप अपने पिता द्वारा पैदा नहीं हुईं हैं. आम स्त्रीयां ही नहीं, उच्च शिक्षित डॉक्टरेट डिग्रीधारी महिलाएं भी यह जानने के बाद की उनकी माँ 'सेक्सुअली फ्री' थीं. गहरे सदमे में आ जाएँगी और शायद अपनी माँ का दुबारा चेहरा तक न देखें."
mera vinamra observation hai ki ise mahilao se zyada purush mudda banate hain. Shayad isliye ki ek mahila doosri mahila ko thoda bahut zaroor samajhti hai. Aur phir, kripayaa koi mujhe bataaye ki 'harami' ka stree ling kya 'haraamini' hota hai?

travel30 said...

mai @ab inconvenienti ke vicharo se sahmat hu.. yaha par sirf usi ki nahi chalti hai jo kamzor hai phir chahe woh purush ho ya stri.

राजकिशोर said...

हरामी शब्द उभयलिंगी है। बाकी सभी बातों में मैं अनुराधा और सुजाता से सहमत हूं। जोड़ना यह चाहूंगा कि निजी संपत्ति को खत्म किए बगार कोई ऐसी व्यवस्था बन नहीं सकती, जिसमं समानता हो। स्त्री तभी संपत्ति बनी, जब जमीन, पशु आदि पर पुरुष का कब्जा हो गया।

आर. अनुराधा said...

राजकिशोर जी, अर्थ स्पष्ट करने के लिए धन्यवाद। यहां मेरे सवाल का एक मकसद यह जताना भी था कि यह गाली पुरुष को दी जाती है क्योंकि उसे ही ज्यादा लगती है। यह बहस का एक छोटा हिस्सा था। मुख्य मुद्दे पर मैं आपसे सहमत हूं कि निजी संपत्ति माने जाने के बाद से ही परिवार-समाज में स्त्री की स्थिति दोयम दर्जे की हुई। फिर भी 100 फीसदी नहीं तो कुछ कम ही सही, समानता के लिए सबको सोचना ही पड़ेगा, इससे पहले कि इस लक्ष्य की तलाश में चलती औरत को समाज के अनियोजित टूटन का जिम्मेदार करार दिया जाए।

डॉ .अनुराग said...

चलिए कुछ साल तक दे दिया जाये.....वैसे आज शाम तक सदन मे सिर्फ़ हंगामा रहा......राजनीती की ना कोई जात होती है ना कोई सेक्स .......

राजकिशोर said...

अनुराधा जी, समज टूटे तो टूटे। इसकी चिंता वे क्यों करें जो इसका पुनर्निर्माण करना चाहते हैं। ईसा मसीह का प्रसिद्ध वाक्य है कि मैं बाप को बेटे से, भाई को भाई से और पति को पत्नी से लड़ाने आया हूं। जब द्वंद्व होगा, तो पक्ष लेना ही होगा। लेकिन मैं उन्हें मक्कार मानता हूं जो कहते हैं कि जब तक क्रांति न हो जाए तब तक स्त्रियां अपनी वर्तमान भूमिका स्वीकार किए रहें। इस बारे में epw में पिछले दिनों एक अच्छा लेख छपा है - नक्सल आंदोलन में एक महिला के अनुभव। मेरा विश्वास है कि झटके से होनेवाली क्रांतियां सफल नहीं हो सकतीं। परिवर्तन क्रमिक और तेज होना चाहिए। इस प्रक्रिया में महिलाओं की हैसियत एक-एक दिन कर सुधरनी चाहिए। हरामी वे हैं जो महिलाओं को भुलावे में रख कर पुरुष सत्ता का रूपांतरण करना चाहते हैं। एक अध्ययन में पाया गया था कि सोवियत संघ के प्रायः तमान स्कूलों में शिक्षक महिलाएं थीं और हेडमास्टर पुरुष। मेरा खयाल है, चीन में भी यही स्थिति होगी। नेपाल के माओवादी महान हैं, पर उनके यहां शीर्ष स्तर पर क्या कोई महुला है? भारत में वृदा करात हैं, पर मेरा अनुमान है, प्रकाश करात के कारण।

ab inconvenienti said...

@ R Anuradha
गालियों और समाज पर इनका असर के बारे में शायद आप कुछ और जानना चाहें. हो सकता है आपके विचार इस ब्लॉग को पढने के बाद कुछ बदलें . और अगर बुरी बातों के बारे में भी ठंडे दिमाग से लिखने का हुनर आप रखतीं हैं तो इस ब्लॉग के निष्कर्षों की व्याख्या भी चोखेर बाली पर देखना रोचक होगा.
http://gaaliyan.blogspot.com/

Suresh Gupta said...

आरक्षण द्वारा ही महिलाओं की प्रगति सम्भव है, ऐसा सोच क्यों है? आज बहुत सी महिलायें महत्वपूर्ण स्थानों पर हैं. क्या यह सब आरक्षण की कृपा से हैं? यदि राजनितिक पार्टियां महिलाओं को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं देतीं तब महिलाओं को अपनी राजनितिक पार्टी बनानी चाहिए. एक तिहाई क्यों, उससे अधिक क्यों नहीं. मैं मानसिक रूप से स्वतंत्र नारी को वोट दूँगा.

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...