Sunday, May 4, 2008

देवी

देवी कह कर, झूटा संतोष दिलाकर
अब न छल पाओगे हमें
क्यूंकि देवियों का दिव्यत्व
खुद में ही लाने की ठान ली है हमने
लक्ष्मी तो हम हैं ही, उसे पैदा करने की क्षमता
भी विकसित करेंगे अपने में
बनना होगा हमें सरस्वती भी, उसकी पूजा करके नही
विद्या को हासिल करके
और दुर्गा भी बनेंगे हम और प्राप्त करेंगे
असीम शक्ती को ताकि कोई भी पुरुष
हमें अपने पैरों तले रौंद कर
आगे निकलने की हिम्मत न जुटा पाये

5 comments:

rakhshanda said...

बहुत खूब,,really so nice...देवी कह कर उसी के सामने उसे पैर की जूती समझने वाले पुरुषों को ऐसे ही जवाब दिया जासकता है...बहुत हो गया...देवी कह कर बेवकूफ बनाने का तमाशा ..अब ख़त्म करो please

राकेश जैन said...

aapne bahut achha likha hai..aur tay hai ki ye soch hi nari ko aage le ja sakti hai. agar hum pahle se khichi hui lakeer ko chhota dikhana chahte hain to hume uske samne us se badi ek lakeer banani hogi.

शोभा said...

आशा जी
बहुत खूब। नारी को अपनी अस्मिता की पहचान होनी ही चाहिए। बधाई

neelima garg said...

rightly said...

Isha said...

apne bahut hi acha likha hai......
stri ko devi ki upma dekar,grahlakshmi,grahshobha bulakar purush ne use hamesha se hi ghar ki chardiwari me bandhne ka prayas kiya kiya hai.....ye kavita us khokhli mansikta ko ek karara jawab hai!!!!

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