Friday, May 2, 2008

न रहेगा बांस तो कैसे बजेगी बांसुरी


लेखिका -
लावण्या शाह




भ्रूण हत्या पर काबू पाने के लिए एक उपाय यह किया जा सकता है कि गर्भ मे आते ही शिशु की माँ का रजिस्टर में नाम लिख लिया जाए और जन्म तक उस शिशु पर यानी गर्भवती माँ पर निगरनी रखी जाए और गर्भपात यदि आवश्यक हो तो उसके लिए पहले सरकार से अनुमति ली जाए । यानी गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण !माने जनता तो नही सुधरेगी ,इसलिए नियम बनाया जाए । बाहर से आने वाले इस फोर्स से कब तक कामयाबी मिल पाएगी कहना मुश्किल है ।भारत की महिला और बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी गर्भवती के महिलाओं के पंजीकरण के पक्ष में हैं.रेणुका चौधरी का कहना है कि इससे भ्रूण हत्या पर काबू पाया जा सकेगा. पंजीकरण के बाद सरकार भ्रूण हत्या पर रोक लगा सकेगी जो उत्तर भारत के कई इलाक़ों में धड़ल्ले से होती है.साथ ही विशेष परिस्थितियों में सरकार की तरफ से गर्भपात की इजाज़त देने का प्रावधान भी होना चाहिए.


वैसे उन्होंने यह नहीं बताया कि वो परिस्थितियाँ क्या होंगी.लेकिन जानकारों का कहना है कि इस क़दम से लोगों की व्यक्तिगत आज़ादी का उल्लघंन होगा और इसका ग़लत इस्तेमाल भी हो सकता है.यूँ गलत इस्तेमाल हर कानून का हुआ ही है ।पिछली राष्ट्रीय जनगणना के अनुसार देश में हज़ार लड़कों पर सिर्फ़ ९२७ लड़कियाँ ही थीं.ये एक बढती समस्या है जिसका कडा विरोध मारत के प्रधान मँत्री श्री मममोहन सिँह जी ने भी किया।

देश के अमीर राज्यों में घटते लिंग अनुपात की समस्या को विकट बताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दिल्ली में लड़की बचाओ विषय पर आयोजित एक राष्ट्रीय बैठक का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा, कहा कि भारत प्रतिकूल लिंग संतुलन के कलंक के साथ जी रहा है."पिछली जनगणना ने घटता लिंग अनुपात दिखाया था. हमारे देश में पैत्रिक समाज की वजह से लड़कियों और महिलाओं के ख़िलाफ़ पक्षपाती रवैया बन गया है."यह शर्मनाक है और हमें इस चुनौती को स्वीकार करना होगा. कोई भी राष्ट्र, समाज या समुदाय जब तक इस आधी आबादी के खिलाफ़ होने वाले पक्षपात का विरोध नहीं करेगा, तब तक अपना सिर ऊँचा नहीं कर सकता और न ही वह किसी सभ्य समाज का हिस्सा होने का दावा कर सकता है.उन्होंने कहा, "हमारी सभ्यता पुरानी है और हम ख़ुद को आधुनिक देश कहते हैं. लेकिन फिर भी हम महिलाओं के खिलाफ़ सामाजिक पक्षपात की वजह से पनपे प्रतिकूल लिंग संतुलन के कलंक के साथ जी रहे हैं."


"जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि देश के कुछ अमीर राज्यों में यह समस्या ज़्यादा विकट है जैसे पंजाब जहाँ प्रति एक हज़ार लड़कों पर सिर्फ़ 798 लड़कियाँ हैं, हरियाणा में 819, दिल्ली में 868 और गुजरात में 883 कन्याएं हैं."इससे संकेत मिलते हैं कि बढ़ती आर्थिक संपन्नता और शिक्षा के विकास ने भी इस समस्या को कम नहीं किया है.उन्होंने कहा, ""हमें सामाजिक जागरूकता और जन्म से पूर्व भ्रूण के लिंग परीक्षण आदि के खिलाफ़ कानून को कड़ाई से लागू कर इस समस्या को सुलझाना चाहिए.मैं सभी संबंधित लोगों से अपील करता हूँ कि वे जीवन बचाने की इस तकनीक के दुरुपयोग पर रोक लगाएँ.""इससे भी ज़्यादा ध्यान महिलाओं की शिक्षा पर दिया जाएगा ताकि आज हमारे देश में लिंग अनुपात की जो समस्या है उसके बारे में लोग भी समझें.""हमें समाज के नेताओं, ख़ासतौर पर धार्मिक नेताओं को इस दिशा में अग्रसर करने की ज़रूरत है, कि वे समाज में महिलाओं के प्रति हो रहे हर तरह के भेदभाव के ख़िलाफ़ राष्ट्रव्यापी अभियान चलाएं.

"मौन आपातकाल :

महिला और शिशु विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने घटते लिंग अनुपात को 'मौन आपातकाल' बताया.उन्होंने कहा, "ऐसा काम करने वाले लोग शिक्षित और संभ्रांत हैं. इससे उन महिलाओं पर शारीरिक दबाव भी बढ़ता है जो बेटे की ख़्वाहिश में कई संतानों को जन्म दे देती हैं."एक सवाल फिर भी बचा रह जाता है कि यदि शिक्षित लोग भी ऐसा कर रहे हैं तो फिर त्रुटि कहाँ है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि शिक्षा अपने उद्देश्यों मे सफल ही नही हो पा रही ! या कहें शिक्षा का कोई उद्देश्य जीवन और मानवीय मूल्यों से जुड़ा रह ही नहीगया है ?

जो भी है यह वाकई शर्मनाक है किलिंग अनुपात की राष्ट्रीय दर- 933 है और सभी प्रयासों के बाद भी बढ नही पा रही ।# नक्शे में लिखे गए अंक के समकक्ष प्रदेश और केंद्रित शासित प्रदेश का नाम नीचे लिखा गया है.

वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लिंग अनुपात:( कोष्ठक में दिया गया आँकड़ा 1991 की जनगणना का है)1. अरुणाचल प्रदेश- 901 (859)
2. नगालैंड- 909 (886)
3. मणिपुर- 978 (958)
4. मिज़ोरम- 938 (921)
5. त्रिपुरा -950 (945)
6. मेघालय- 975 (955)
7. असम -932 (923)
8. पश्चिम बंगाल- 934 (917)
9. झारखंड- 941 (922)
10.उड़ीसा- 972 (971)11. छत्तीसगढ़ -990 (985)
12.मध्य प्रदेश- 920 (912)
13.गुजरात -921 (934)
14.दमन एवं दीव -709 (969)
15.दादर एवं नगर हवेली- 811 (952)
16.महाराष्ट्र- 922 (934)
17.आंध्र प्रदेश -978 (972)
18.कर्नाटक- 964 (960)
19.गोवा -960 (967)
20.लक्ष्यद्वीप- 947 (943)21.केरल- 1058 (1036)
22.तमिलनाडु- 986 (974)
23.पांडिचेरी- 1001 (979)
24.जम्मू और कश्मीर- 900( 876)
25.हिमाचल प्रदेश- 970 (976)
26.पंजाब- 874 (882)
27.चंडीगढ़- 773 (790)
28.उत्तराखंड -964 (936)
29.हरियाणा- 861 (865)
30.दिल्ली- 821 (827)
31.राजस्थान- 922 (910)
32.उत्तर प्रदेश- 898 (876)
33.बिहार -921 (907)
34. सिक्कम- 875 (878)
35.अंडमान निकोबार द्वीप समूह 846 (818)
(
बी.बी. सी . से साभार )


- लावण्यमय अंतर्मन ----

12 comments:

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

लावण्या आपने बिलकुल सही बात कही है। इस बात का हल्ला तो बहुत मचता है कि लडकियों की संख्या घट रही है, कन्या भ्रूण ह्त्या हो रही है पर इसे रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाना चाहता। ये एक स्वाग्त योग्य पहल है कि मां के गर्भ में आने के बाद से ही बच्चे का रजिस्ट्रेशन हो व उसका जन्म सुनिश्चित हो। बेटियों को बचाने के लिए यह सुझाव अच्छआ है।

Singhai Raj Kumar Jain said...
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Singhai Raj Kumar Jain said...

ठीक लिखा है और बेटों के ब्लाग पर भी दर्शन दें

डॉ .अनुराग said...

अरे आपने तो हमारी P. S.M की किताब की याद दिला दी ,पर इन आंकडो मे एक हैरानी की बात है की बिहार ,राजिस्थान ,ओर उ.P मे आंकडे सुधरे है ....परन्तु सरकारी रजिस्टर के सारे आंकडे विश्वास योग्य नही है क्यूंकि उच्च वर्ग कई बार इन आन्क्दोमे शामिल नही किया जाता या वे लोग जिनके पास राशन कार्ड या वोटर कार्ड नही है इसमे उनकी गन्ना नही होती खैर पर यहाँ वो मुद्दा नही है .....अब भी पढे लिखे ओर सम्पान घरो मे भूर्ण हत्या हो रही है ....मेरी राय मे गर्भवती स्त्री का रजिस्ट्रेशन आसन करने के लिए हर अस्पताल ,नर्सिंग होम को अपने यहाँ जन्मे शिशु का भी रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य होना चाहिए .....ओर ये दूर दराज के गाँवों मे भी लागु हो.....

स्वप्नदर्शी said...
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स्वप्नदर्शी said...

I do not believe that this is the solution of the problem. This type of law will further open new opportunity for corruption and will make women life worse.

In any case I support a women right to choose or to seek abortion, if she wishes. violating this basic right will prevent women from seeking medical help and they will end up doing it illegally in the less safer environment, with quacks. and therefore, will end up with severe infections, will die or it will cost them fortune to seek a good medical help illegally. But abortion will not stop.
Because having a medical access to abortion and facility of ultrasound is not the root cause of natality. It will put women's health under severe risk and abandonment of lots of girl children, their neglect.

A larger section, may choose not to go to hospital and women will not even have prenatal care. Specially these days even large number of villagers are seeking prenatal care, which is good for women. This law will send people back to stone age. It will not only compromise the prenatal care but prevent vaccination of the new born under the fear of law and corruption, and eventually, epidemics of infectious diseases will break out.



Natality or abortion of a female feutus is a larger issue, and unless our society, government and people are unable to make a safe environment for women to live, or have proactive program, initiatives and sustained efforts, nothing will work.


Ask your leaders, including prime minister, if he is really serious, how about bringing empowerment to women?
what has he done in his capacity as a leader to bring change in position of women in India? why should a women who has seen misery all her life, should decide to give birth to another girl to fall victim of this society? Why anybody wants to have a child if they can not dream of a safe and humane life for their child?

if government is worried, provide equal opportunity for half the citizens. remove gender inequality from law, and share socio-economic-political power with women, in proactive manner.


How about, free education for women of weaker sections?

giving benefit to people who marry without dowry?

reservation for women in jobs, politics, policy making at all levels?

strong laws for dealing with the violence against women?
seeking justice affordable and in timely manner?

making women equal stake holder in family property?


if society needs girl, bring a change so that a girl is desirable,

and as a society, lets stop preaching our daughters, daughter-in Laws that their primary aim in life is to serve others in family. Bring a humanity, new morality, to our family system, where all members are equal, in terms of responsibility and respect and freedom.

All these things will bring empowerment to women and if this comes, then a girl will be as desirable to society as son is.

I urge all men and women, to oppose this dreadful law in the interest of the health of their family and attack the problem of natality in positive manner. treat the cause not symptoms.

Sujata, I am traveling, if you want to translate in hindi, please feel free.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

नीलिमा जी,
स्त्रीयोँ को गर्भवती होते ही रजिस्ट्रेशन करवाना आवशयक है बात मैँ नहीँ कह रही - रेणुका चौधरी जी ने कही है !
मैँने ये खबर बी बी सी पर पढी और यहाँ सबके साथ शेर करना जरुरी समझा --

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

" अब भी पढे लिखे ओर सम्पान घरो मे भूर्ण हत्या हो रही है ...."
ये बात आज के भारत मेँ बिलकुल एक कठोर सत्य है -

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Swpnadarshi ma'am,
yes,
i respect your thoughts on this sensitive & poignent matter which is facing the literate as well as the uneducated callss & mass of today's INDIA.
Primi minister Man Mohan Sigh ji has shown grave concern regarding the trend of "aborting the girl fetus " which is prevalant in India among the well to do section of society -
Renuka chowdhery has proposed this scheme of "Registration of ALL , females who are pregnant "
The Central Government wants to provide better care & educate the Girl child & subsequent mothers in the betterment of both.
How successful they are will be for all of us to be seen & for the Census bureau to count as to the Gender in Equality's curse
being eradicated from India or to report its failure.
The real crux of the matter is to combat the " mind set " of the people & to encourage schemes for improvement of Girl Child as you have suggested.
I am glad we are thinking about such issues & trying to find plausible solutions in this regard.
( Sujata ji, you can translate this as well or may be i will )
Thank you for your time & patience you all * warm regards,
Let us help those who need it the most !
Amen !
-- Lavanya

pallavi trivedi said...

achcha lekh hai....janm se poorv hi regisration ka sujhaav swaagat yogya hai. isse shaayad samasya se kuch had tak mukti mil sakegi.lekin abhi bhi kai gaaon mein prasav ghar par hi hote hain...wahaan rokna mushkil hoga.

Unknown said...

एक अच्छे विस्तृत लेख के लिए आप को वधाई. कितने कानून बनाएँगे हम? क्या मानव जीवन का हर पहलू कानून द्वारा ही नियंत्रित किया जाएगा? अगर शिक्षित लोग ही लिंग भेद से ग्रसित हैं तब तो यही कहा जाएगा की हमारी शिक्षा ही ग़लत है. ऐसी शिक्षा का क्या फायदा जो केवल पैसा कमाने की मशीनें ही तैयार करती है. कोई मानवीय भावनाएं नहीं, कोई मानवीय मूल्य नहीं. बस पैसा ही पैसा और उस के लिए कुछ भी कर गुजरना. मुझे लगता है आधुनिकता और प्रगतिशीलता के नाम पर हम एक अंधे रास्ते मैं चल निकले हैं. कहाँ जायेंगे कुछ पता नहीं.

Asha Joglekar said...

लावण्यम जी मुद्दा आपने दुरुस्त उठाया है परंतु कानून बना कर इस समस्या का हल होता नही दिखता । कानून तो इस देश में बहुत हैं पर कितनों का पालन हो रहा है ? और जैसे कि स्वप्नदर्शीजी ने कहा इसमें स्त्रियों के ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होता है और दुरुपयोग होने की पूरी पूरी संभावना है । इसके लिये समाज की सोच बदलनी होगी और शुरुआत हम स्त्रियाँ अपने घर अपनें बच्चों खास कर बेटों से करे उन्हें बहन, माँ, दादी नानी का सम्मान करना सिखायें। पुरुष भी अपनी पत्नी अपनी माँ को पूरा सम्मान दे तभी यह संभव होगा ।

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