Wednesday, May 14, 2008

न महिला ,न पुरुष....केवल इंसान

कल सुरेश जी की पोस्ट पढ़ने के बाद अपने आप को रोक नहीं सकी ये पोस्ट लिखने से!एक अपराध की घटना इसलिए यहाँ स्थान पाती है क्योकी इसमें महिला शामिल है!कार्यों, व्यवसायों के साथ अब हमने अपराध पर भी लिंग भेद करना शुरू कर दिया है! मुझे आश्चर्य होता है जब कई पढे लिखे लोग मुझसे कहते हैं की अच्छा है आप ईमानदार है, महिलाओं के लिए भ्रष्टाचार ठीक नहीं!पता नहीं कौन सी सोच है जो पुरुषों के लिए भ्रष्टाचार को जस्टिफाई करती है !हम क्यों ये नहीं सोच सकते की अमुक चीज़ इंसानों के लिए गलत है और अमुक चीज़ सही!महिला के सिगरेट, शराब पीने पर आश्चर्य क्यों!कोई पुरुष के लिए तो मैंने किसी को इन चीजों के लिए आश्चर्य करते नहीं देखा! महिला भी एक आम इंसान है...वो भी अच्छी ,बुरी, दोनों तरह की हो सकती है!

२ वर्ष पहले की बात है..ग्वालियर में पहली बार एक महिला को शराब का ठेका मिला!सभी मर्दों के बीच वही एक महिला थी जो उस कार्य को कर रही थी! अगले दिन एक पत्रकार मेरे पास आया और बोला कि इस विषय पर मुझे आपकी राय चाहिए...एक महिला होकर शराब का व्यवसाय कर रही है!आप क्या सोचती हैं? मैंने सहज भाव में उत्तर दिया कि इसमें सोचने जैसी क्या बात है, वो अपनी मर्जी का व्यवसाय कर रही है! उस पत्रकार को मुझ से इस उत्तर की उम्मीद नहीं थी! उसने हैरानी से पुनः प्रश्न किया" क्या आप इसे ठीक मानती हैं कि एक भारतीय महिला शराब का व्यवसाय करे? मैंने इस बार उससे प्रश्न किया "क्या आप शराब के व्यवसाय को गलत मानते हैं" वो बोला "बिलकुल नहीं, लेकिन एक महिला....? मैंने कहा यदि पुरुष के लिए शराब व्यवसाय सही है तो महिला के लिए भी किसी कोण से गलत नहीं है" खैर उसको मन माफिक जवाब नहीं मिला...और उसने मेरे इस बयान को अखबार में स्थान नहीं दिया!

लेकिन मेरे मन में कई प्रश्न कौंध गए! क्या उस पत्रकार की गलती है कि वह ऐसे सोचता है? क्यों महिलाओं को आश्चर्य से देखा जाता है जब वे तथाकथित पुरुषों वाले व्यवसाय में प्रवेश करती हैं? मैंने इन प्रश्नों के जवाब खोजने कि कोशिश की.. वास्तव में मुझे लगता है कि हम जाने अनजाने ही बचपन से ही नन्हें बच्चे ,बच्चियों के मन में बीज पैदा कर देते है कि उन्हें क्या करना है,क्या नहीं! एक छोटा सा उदाहरण लें.....किसी छोटे लड़के के जन्मदिन पर हम जाते हैं तो उसे कोई कार,कोई गेम या कोई बंदूक उपहार में देते हैं जबकि किसी छोटी बच्ची के जन्मदिन पर हम उसे कोई गुडिया ,सॉफ्ट टॉय, पेंटिंग बुक या किचन सेट उपहार में देते हैं! मैंने कभी नहीं देखा कि हम किसी लड़के को किचन सेट गिफ्ट करते हों! जब एक बच्चा पैदा होता है तो सिर्फ उसके बायोलोजिकल जेंडर स्त्री या पुरुष होते हैं....लेकिन धीरे धीरे उसके सोशल जेंडर भी चेंज हो जाते हैं!बचपन से ही उन्हें सिखाया जाता है कि आगे चलकर तुम्हारे रोल क्या होंगे!

हमारे सामजिक ढांचा ही ऐसा है! अभी पिछले हफ्ते मैंने एक टी.वी प्रोग्राम पर अभिनेत्री तनुजा का स्टेटमेंट देखा जिसमे उन्होने बताया कि उन्हें और उनके भाइयों को एक साथ खाना बनाना, कपडे धोना और बाहर साइकल चलाना सिखाया गया!मुझे अच्छा लगा...लेकिन आज भी कितने ऐसे परिवार हैं जो लड़कों से रसोई में उतना ही काम करवाते है जितना कि लड़कियों से! हांलाकि सोच बदल रही है लेकिन परिवर्तन लाने के लिए हर एक को अपने विचारों में परिवर्तन लाना होगा! ये काम भाषण देने से नहीं होगा हम खुद अमल करेंगे तब दुसरे खुद बा खुद समझेंगे!हर समाज की अपनी मान्यताएं हैं...जब मैं गोवा गयी तो मैंने देखा वहाँ वाइन शॉप पर लडकियां ही काम कर रही थीं और वहाँ पर यह उतना ही सामान्य था जितना हमारे यहाँ लड़कियों का ब्यूटी पार्लर में काम करना!

जेंडर इशू पर एक बार एक सज्जन ने कुतर्क करते हुए कहा कि कल को आप माओं को भी कहेंगी कि बच्चे पालना उनका काम नहीं है...मुझे उन्हें ये बात समझाने में काफी समय लगा कि मातृत्व एक प्राकृतिक गुण है जो माँ बनने के साथ ही जन्म लेता है!और ये भावना तो जानवरों में भी पायी जाती है जो जेंडर से बिलकुल परे हैं! खैर ख़ुशी कि बात यह रही कि वो सज्जन अंततः कुछ कुछ समझ गए! शायद धीरे धीरे समाज भी समझ जाए!

16 comments:

डा. अमर कुमार said...

कमेन्ट्स ?
नहीं जी, नो कमेन्ट !
इतनी सोच वाला होता तो ब्लागर पे आपसब
के संग धक्के खा रहा होता ।

सारी,नो कमेन्ट्स फ़ार नाऊ !

harminder singh said...

शबनम से प्रभावित होकर ही एक मुरदाबाद की 13 वर्षीय किशोरी ने अपने प्रेमी संग मिलकर अपने पिता को मरवा दिया। उसने अपने प्रेमी से कहा था,‘‘उसने सात मारे, तू एक भी नहीं मार सकता।’’
आप की बात बिल्कुल ठीक है कि अपराध से लिंग, जाति या धर्म का कोई लेना देना नहीं। औरत को माता, बहन, बहू, बेटी कहा जाता है। वह जननी है।
पल्लवी जी, आपको एक बात और बता दूं कि बावनखेड़ी और उसके आसपास के क्षेत्र में शबनम नाम जिन लड़कियों के थे, उनके नाम बदलवा कर कुछ और रख दिये गये।
हसनपुर तहसील के लोगों में अधिकतर महिलायें थीं जो ये कह रही थीं कि इसे तो फांसी पर लटका देना चाहिये। जबकि पुरुषों ने ऐसा कम ही कहा। महिलाओं को अधिक दुखद पूर्ण लगी ये घटना। वे भावुक हृदया जो होती हैं।
शबनम की मां हाशमी नहीं चाहती थी कि उसकी बेटी की शादी सलीम से हो। जबकि पिता शौकत अली बेटी की बात मान गये थे। वे राजी हो गये थे। तो क्या हम यें कहें कि एक महिला के कारण दूसरी महिला हिंसक बनी या यह शबनम की अपनी मानसिकता का फल है या कुछ ओर।
मुझे ऐसा लगता है कि ये बहस शायद आगे भी चोखेर बाली पर जारी रहे।

Neeraj Rohilla said...

पता नहीं किन सुरेशजी की कौन सी पोस्ट का जिक्र कर रही हैं । अगर आप पोस्ट का लिंक देंगी तो कांटेक्स्ट समझने में आसानी होगी ।

pallavi trivedi said...

Tuesday, May 13, 2008
औरत ऐसी भी होती है क्या

meri post ke theek neeche wali post.

सुजाता said...

नीरज जी
लिंक लगा दिया है ।

Udan Tashtari said...

सही कह रही हैं-हम तो टिप्पणी कल ही दर्ज कर आये थे वहाँ.

Anonymous said...

यह बिलकुल सही है। काश और लोग भी ऐसा सोचते।

डॉ .अनुराग said...

सुरेश जी ने एक अख़बार की कतरन को उठाकर रख दिया ओर हल्ला मच गया कमाल की बात है क्या महिला जेल ओर महिला अपराध पहले नही होते थे ....ये तो सदियों से राजायो के जमाने से होते आ रहे है ,समय बदल रहा है एकदम क्रांति की उम्मीद न रखे ....मैंने १० साल गुजरात मे गुजारे है ,वहां किसी ने मेरी जात नही पूछी ओर लड़कियों की स्वतंत्रता देख बाकि देश शरमा जाये.... अपनी लड़कियों को आत्मनिर्भरता दे......यही पहली कड़ी है ...पल्लवी की बातो से सहमत हूँ.......

आर. अनुराधा said...

बाकी सारी बातें ठीक हैं, पर आखिरी पैरा में एक जगह नजर रुक गई। बच्चे की देखभाल आदमी क्यों नहीं कर सकते भला? यह काफी हद तक आदत की भी बात है। बच्चा पैदा होने पर सिनेमा स्टाइल में अचानक ही ममत्व उमड़ पड़ता है, इससे मैं सहमत नहीं। मैंने अपने बच्चे को जब पहली बार देखा, तो लगा कि ये नन्हा सा जीव कौन है। उसे अपना बच्चा समझने और प्यार कर पाने में कुछ समय लगा था। शायद इसलिए कि मैंने कभी इतने छोटे बच्चे को गोद में नहीं उठाया था। और दूसरी तरफ, मेरे पति ने बड़ी सहजता से उसकी देखभाल की, उसे उठाया, उसके नैपी बदले, सुलाया। इसलिए कि उन्होंने अपने भांजों, भतीजों के जन्म और बढ़त को काफी करीब से देखा था। यानी यह आदत की भी बात है।

pallavi trivedi said...

अनुराधा जी...आपकी बात बिलकुल सही है!आदमी ही उतने ही प्यार से बच्चे की देखभाल कर सकते हैं और करना भी चाहिये!लेकिन मैंने ये बात इस संदर्भ में कही है क्योकि माँ बच्चे से उसके पैदा होने के पूर्व से ही जुडी होती है और उसके बाद फीडिंग का काम भी माँ का ही है जो उसे स्वाभाविक रूप से बच्चे से जोड़ता है! इस विषय में मेरी जानकारी किताबों और अन्य महिलाओं के अनुभवों पर ही आधारित है..शायद मैं गलत भी हो सकती हूँ!लेकिन बच्चे की परवरिश में पिता की भी बराबर की भागीदारी होना चाहिए, इससे सहमत हूँ!

Asha Joglekar said...

स्त्री या पुरुष सामान्यता अपराध की तरफ प्रवडत्त नही होते । क्या होती हैं वे परिस्थितियाँ जो उन्हे अपराध की तरफ ढकेलती हैं इसके बारे में और गहरे जानने की जरूरत है ।सामान्यत: जो दिखता है उससे कहीं ज्यादा छिपा रहता है । नारी अपराध
के प्रसंग अपेक्षाकृत कम होते हैं इसीलिये उनपर बवाल ज्यादा मचता है ।
अनुराधा जी
समय बदल रहा है । और भी बदलेगा । काफी पुरुष बच्चों की देख भाल बडे प्यार से कर लेते हैं और काफी महिलाओं को बच्चे पालने में बडा कष्ट होता है । कई पुरुष खाना बनाने में माहिर होते हैं और स्त्रियाँ काम चला लेती हैं । मुझे लगता है यह व्यक्ति पर भी निर्भर करता है । पर यह भी सही है माँ को यह देन प्रकृतिसे ही मिलती है कि वह बच्चे को प्यार करे और देखभाल करे । यह प्राकृतिक आवश्यक्ता है ।

Unknown said...

मेरे मन में यह बात कहीं नहीं थी कि यह पोस्ट इसलिए लिखी जाए कि इस में अपराधी एक स्त्री है. हम रोज अखबार में इस तरह की घटनाओं के बारे में पढ़ते हैं. दुःख होता है. यह दुःख उनके लिए होता है जिनकी जान गई. किसने यह सब किया वह मन में नहीं आता. पल्लवी जी, आपने मेरी पोस्ट को ग़लत रूप में ले लिया. मेरे मन में एक जिज्ञासा थी. क्या चल रहा होगा शबनम के मन में? किस प्रकार उसने अपने आप को तैयार किया होगा इस के लिए? आज की बौद्धिक नारी इस पर कोई प्रकाश डाल पायेगी, इसलिए मैंने यह पोस्ट लिखी. इस से किसी का मन दुखा तो में छमाप्रार्थी हूँ.

pallavi trivedi said...

@सुरेश जी...आप क्षमा न मांगिये! आपने जिस संदर्भ में यह पोस्ट लिखी वह शायद लेख से स्पष्ट नहीं हो पाया और इसलिए मैंने जो समझा उसके मुताबिक अपने विचार रखे! यदि आपकी पोस्ट का अभिप्राय यह था की शबनम के मन में क्या चल रहा होगा या उसकी क्या मनः स्तिथी होगी अपराध करते वक्त...तो इस पर दूसरी तरीके से विचार होने चाहिए! दरअसल क्रिमिनोलोजी के अध्ययन से इन बातों पर काफी हद तक प्रकाश पड़ता है की कोई भी महिला या पुरुष क्यों अपराधी बनते हैं व इसके पीछे मुख्य कारक कौन कौन से होते हैं...यहअपने आप म्में बड़ा विषय है लेकिन चर्चा योग्य है...

Unknown said...

जिस गाँव की यह घटना है वहाँ चोखेरवाली पर लिखने वाले बौद्धिक लोग नहीं रहते. उनका मानस इसे किस तरह ले रहा है इस की कुछ झलक हरमिंदर सिंह जी की टिप्पणी में नजर आती है. वह उसी क्षेत्र में रहते हैं. इस घटना से सभी प्रभावित हुए हैं, पुरूष भी और स्त्री भी. स्त्रियाँ शायद ज्यादा प्रभावित हुई हैं. उन्हें शायद इसलिए ऐसा लगता है कि एक स्त्री इस सबके लिए जिम्मेदार है.

Unknown said...

ये घटना एक वानगी है उस नव चिंतन की जिसमे अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए रिश्तो की ऐसी तैसी करना कोई मुश्किल नहीं है. इसी तरह का एक मामला प्रकाश मे आया था जब बुलंदशहर जिले के एक बैंक अधिकारी और उनके पत्नी की ह्त्या उनके ही बेटी ने अपने प्रेमी से करवाई थी. पिटा ने पुत्र को शिक्षा के लिए किसी बड़े शहर मे भेजा था और लडकी को मोहल्ले के किसी आवारा लड़के से प्रेम हो गया था और शादी करना चाहती थी. उसके पिता किसी वेहतर लड़के से उसकी शादी की इच्छा रखते थे, टालमटोल देखकर लडकी ने प्रेमी के साथ मिलकर माता-पिता की ह्त्या का षडयंत्र रचा और जव वो उसे ट्रेन में बैठाकर वापस लौट रहे थे तो उनके ह्त्या कर दी गयी.
यक्ष प्रश्न ये है कि क्या माता-पिता गलत हैं यदि वे बच्चो का वेहतर भविष्य सोचे. क्या अपने मनचाहे लड़के से विवाह करने के लिए लड़कियों को अपन पैरो पर खड़े होने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए. क्या इसे प्रेम कह सकते हैं. ये सब कहने का उद्देश्य ये नहीं है कि सब लड़कियों को कटघरे मे खडा करना है लेकिन वोद्धिक उन्नति को प्राप्त लोग ये भी विचारे कि इस स्वेच्छाचारी सोच के चलते अपनी जान कैसे बचाई जाए.

Unknown said...

ये घटना एक वानगी है उस नव चिंतन की जिसमे अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए रिश्तो की ऐसी तैसी करना कोई मुश्किल नहीं है. इसी तरह का एक मामला प्रकाश मे आया था जब बुलंदशहर जिले के एक बैंक अधिकारी और उनके पत्नी की ह्त्या उनके ही बेटी ने अपने प्रेमी से करवाई थी. पिता ने पुत्री को शिक्षा के लिए किसी बड़े शहर मे भेजा था और लडकी को मोहल्ले के किसी आवारा लड़के से प्रेम हो गया था और शादी करना चाहती थी. उसके पिता किसी वेहतर लड़के से उसकी शादी की इच्छा रखते थे, टालमटोल देखकर लडकी ने प्रेमी के साथ मिलकर माता-पिता की ह्त्या का षडयंत्र रचा और जव वो उसे ट्रेन में बैठाकर वापस लौट रहे थे तो उनके ह्त्या कर दी गयी.
यक्ष प्रश्न ये है कि क्या माता-पिता गलत हैं यदि वे बच्चो का वेहतर भविष्य सोचे. क्या अपने मनचाहे लड़के से विवाह करने के लिए लड़कियों को अपन पैरो पर खड़े होने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए. क्या इसे प्रेम कह सकते हैं. ये सब कहने का उद्देश्य ये नहीं है कि सब लड़कियों को कटघरे मे खडा करना है लेकिन वोद्धिक उन्नति को प्राप्त लोग ये भी विचारे कि इस स्वेच्छाचारी सोच के चलते अपनी जान कैसे बचाई जाए.

अनुप्रिया के रेखांकन

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