Saturday, May 17, 2008

" कर्म - योगिनी "

कर्म योगी बनो ,कहा हमेँ हरि मधुसूदन ने,
गीता का अमर सँदेश हुआ आम आज घर घर मेँ


क्या भारत या क्या विदेश ,
नारी बनी " कर्म - योगिनी "
आज वो नही थकती ,
अपनों के लिए , स्वयं के लिए ,
वह क्या कुछ आज , नही किया करती !


किँतु, आज भी प्रश्नोँ के चक्रव्युहोँ से नहीँ उभरी,


अभिमन्यु, बीँध गया शर से, हो गया अमर !


नारी, पीती रही कई घूँट, हाला के,


ना बन पाई "नीलक़ँठी" ना बन पाई अमर !


- लावण्या

3 comments:

समयचक्र said...

क्या भारत या क्या विदेश
नारी बनी " कर्म-योगिनी "
आज वो नही थकती,
अपनों के लिए,स्वयं के लिए
वह क्या कुछ आज,नही किया करती

आज की नारी अबला नही अब सबला है .लोकतंत्र मे उन्हें समान अधिकार प्राप्त है . बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति

Unknown said...

नारी स्रष्टि के प्रारम्भ से ही कर्म-योगिनी रही है. हर युग में नारी के कर्म-योग ने समाज को प्रभावित किया है. आज भी नारी यही कर रही है.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

महेन्द्र जी,सुरेश जी,
धन्यवाद,
आपकी टिप्पणीयोँ के लिये !
- लावण्या

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...