Sunday, May 18, 2008

अस्तित्व की जंग

मैं भी एक औरत हूँ शायद इसलिए ही इस विषय का चुनाव किया है, यानि मैं भी स्वार्थी हुई। इस स्वार्थ के लिए क्षमा चाहती हूँ........
चलिए इसकी शुरुआत करते हैं वेदों सें जहाँ नारी पूज्य थी। उसमें एक संस्कार अभीप्सित था। यहाँ ये बता देना आवश्यक है कि संस्कार वो है जो हमारे अंतरतम तक पैठा हुआ है। यह पैठ इतनी गहरी होती है जिसे बड़ी मशक्कत के बाद ही उखाड़ फेका जा सकता है। नारी ने आरंभ से ही अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष किया है, सच यही है।
भले ही वेदों में लिखा गया हो-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता।

लेकिन सच इससे हमेंशा से अलहदा रहा है। मैथिली शरण गुप्त की ये पंक्तियाँ नारी पर हमेशा से मौजूं रही हैं चाहे वो वैदिक कालीन सभ्यता हो चाहे हड़प्पा कालीन चाहे छायावादी युग रहा हो या फिर इक्कीसवीं शताब्दी।
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ।
आंचल में है दूध और आँखों में पानी ।।
एक दिन यूंही अपने घर की छत पर टहल रही थी... हवा तेज़ चल रही थी.... आँखें अनायास ही क्षितिज पर जा टिक रहीं थी। कभी मन बादल की बनती बिगड़ती रेखाओं पर जा टिकता तो कभी एक शायद फालतू समझी जाने वाली चीज़, जी हां क्योंकी स्त्री आज केवल एक चीज़ ही रह गयी है। लेकिन इसके लिए दोशी केवल समाज नहीं काफी हद तक वो ख़ुद है। इसकी अगर गहरी पड़ताल की जाय तो पूरी तरह से वो ख़ुद भी दोषी नहीं ,बल्की घूम-फिरकर बात वहीं संस्कारों पर आ टिकती है कि कहीं न कहीं इसके लिए उसके संस्कार ज़िम्मेदार हैं।
प्रेम,त्याग और भोग की वस्तु समझी जाने वाली नारी में कभी हम उसके प्रगतिवादी रूप की कल्पना नहीं करना चाहते। हमारे लिए उसके इस रूप की कल्पना उसे दुश्चरित्रता की कोटि में ला खड़ा करती है हालाकि कवि दिनकर ने ये बात समझी थी-
दृष्टि का जो पेय है रक्त का भोजन नहीं है ।
रूप की आराधना का मार्ग आलिंगन नहीं है।।

क्रान्ति की बयार कहीं भी बह सकती है, उसकी दिशा निर्धारित नहीं होती।
घर पर बैठकर आँसू बहाना और भाग्य को दोष देना केवल कायर ही कर सकता है, कर्मठ जूझते- लड़ते झंझावातों का सामना करते गन्तव्य तक पँहुच ही जाता है।भले ही इसमें उसे बहुत वक़्त लग जाए और वह लहू लुहान भी हो जाए ।


स्त्री को अबला नाम के चक्रव्यूह् से बाहर निकलने की ज़रूरत है।साथ ही स्त्री की तरक्की के उदाहरण दे कर सब कुछ बदल गया है कि दुहाई देने वालों को भी असलियत से मुँह नही मोडना चाहिये । एक अरब से अधिक की आबादी वाले इस देश में आज महिलाओं से जुड़े उदाहरण हम अपनी उंगलियों पर गिना सकते हैं। ये शर्मनाक नहीं त्रासदीपूर्ण है।

नारी केवल श्रद्धा नहीं है, अबला नहीं है, केवल दया की पात्र नहीं है बल्कि आज उसे ख़ुद अंधेरे गलियारों में टहल कर संभावनाएं तलाशनें की ज़रूरत है। उसके अस्तित्व की जंग अनादि काल से किस काल तक जारी रहने वाली है पता नही , लेकिन यह संघर्ष जारी रहना ज़रूरी है , मशाल का जलाए रखना ज़रूरी है , सवाल उठना ज़रूरी है ... ..............


स्मृति दुबे



स्मृति दुबे दिल्ली की एक सजग टी वी पत्रकार हैं ।पत्रकारिता के हालिया परिदृश्य को लेकर वे चिंतित दिखाई देती हैं लेकिन आत्मविश्वास से भरपूर हैं । स्मृति समाज व राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को लेकर गम्भीर भी हैं । चोखेर बाली में यह उनकी पहली पोस्ट हैं ।उम्मीद है स्वप्नों और हौसलों से भरी यह युवा पत्रकार चिंतन और अनुभवों के बहुत से रंग रूप हमे दिखा पायेंगी ।

6 comments:

Admin said...

ब्लोग जगत में स्वागत है...

लेकिन अस्तित्व की ज़ंग बिलकुल नहीं है.. हाँ एक समय मैं रही होगी जब के आपने उदाहरण दिए हैं.. अब तो जंग है ही नहीं.. अगर है भी तो सक्रियता की और शायद समानता की..

samagam rangmandal said...

मशाळ जलाए रखे...............सवाल उठाते रहें..स्वागत है।

समयचक्र said...

सक्रिय रहने की जरुरत है

Asha Joglekar said...

संघर्ष तो करना है पर वक्त बदल रहा है और और भी बदलेगा ।

Unknown said...

संघर्ष जीवन का एक अभिन्न अंग है. संघर्षशून्य जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती. संघर्ष सब करते हैं, नारी भी और पुरूष भी. श्रद्धा, अबला, 'दया की पात्र' जैसे शब्द नारी को नीचा दिखाने के लिए गढ़े गए. आज की नारी को इस चाल से बचना होगा. उसे ख़ुद अपने लिए सही संभावनाएं तलाशनी होंगी. यह अस्तित्व की जंग नहीं है. यह स्वयं को आगे और आगे ले जाने की मुहिम है. यह सिर्फ़ नारी के लिए नहीं, समूचे राष्ट्र के लिए जरूरी है. राष्ट्र हित में नारी शक्ति का संघटित होना जरूरी है. संघटित नारी शक्ति स्वयं आगे के लिए रास्ते खोलेगी. उसे इस के लिए किसी पर निर्भर नहीं होना होगा. मेरे जैसे पुरूष नारी के इस संघर्ष में उस के साथ हैं. श्रद्धा, अबला, 'दया की पात्र' मान कर नहीं बल्कि इस लिए कि पुरूष का अस्तित्व नारी के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है.

Push said...

Bhartiya nari ke asmita avam uske swatantra bodh par sushri smriti
dubey ne jo prashn cinhlaga kar purush varchsv pradhan smaj ka
chitra ukera hai,wah unke vadushy ko he ingit nahi karta
apitu,bhartiya nari ke mukti andolan ke sari kalai bhi khol deta
hai.Apne paine avam dhardar byan ko sarthakta pradan karte hue
unhone spast keya hai ke nari adi kal se smajik chetna ke avdharna
me,anupat me purush se sdav peche rahi hai,aur yeh shaswat awam
cherantan satya hai prasad ji ke nimna panktiyo se ujagar ho jata
hai:- woh kahti hai-------

PAR AAJ SAMBHAK MAI PAI HOU
MAI DURBALTA ME NARI HOU
AVYAY KE SUNDAR KOMALTA
LEKAR MAI NAR SE HARI HOU.

Tathy to yeh hai ke hamara purush varchsav pradhan smaj he nari ke
unmukt vikas kasabse bada rota hai.Nari adi yug se bhogya ke
sangya pati chali aa rahi hai,aur aaj bhi uski vari muk hai.Is
paripashey me smiti dubey ke kathan ke sarvbhomik sarhana honi
chahiye jo vartman parivesh me nari varchswa ke leya apni bebak
vichardhara se meel ka pathar sidh ho rahi hai.


Ambika Prasad Dubey

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