Tuesday, May 20, 2008

मृगमरीचिका

जब से पत्रकारिता की इस मायावी दुनिया में कदम रखा है एक स्त्री होने के नाते बहुत सारे अच्छे बुरे और बेतुके अनुभव हुए हैं लेकिन एक बात जो नर्विवाद रूप से सामने आयी है वो ये पत्रकारिता अब महज़ बिज़नेस बनकर रह गया है जहां ईमान की बातें करना अपना मखौल उड़वाना है , जिसके तहत कई बार मैनें भी अपना मज़ाक उड़वाया है। ये एक मृगमरीचिका बन गया है। दूर से देखने में सबकुछ सच सा भ्रम पैदै करता है लेकिन जब हम सच से बावस्ता होते हैं तो उस मृगमरीचिका की स्वर्णमयी जलराशि, रूखे बेजान चुभने वाले बालू में तब्दील हो जाती है।
एक ख़बर जो सच से कोसों दूर होती हुई भी सच है। क्योकि आज के ख़बरिया चैनल वही दिखाते हैं जो सच है।
पढा था दुष्यन्त कुमार को-
कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता ।
एक पत्थर तो तबीयत से उछालों यारों ।।
आप अपनी तबीयत से पत्थर उछाल-उछाल कर थक जाएंगे लेकिन सूराख है कि होने का नाम ही नहीं लेगा और ऐसे न जाने कितने करोड़ो पत्थरों को उछालने के बाद अंतत इस खोखली व्यावसायिकता का हिस्सा बनने पर मजबूर हो जाएंगे। इस भीड़ का मुसाफिर बनना शायद एक स्त्री पत्रकार के लिए ज़्यादा सहज हो जाता है। लेकिन ये सहजता कब तक स्वीकार्य होगी। प्रश्न जटिल है लेकिन सोचने योग्य..........

6 comments:

rakhshanda said...

सचमुच सोचने की बात तो है लेकिन कोशिश करते रहना ही जिंदगी है,वो आपको करनी होगी.

डॉ .अनुराग said...

कम से कम जिस तरह से नॉएडा डबल मुर्डर काण्ड के पीछे मीडिया हाथ धोकर पड़ा है उससे आपकी बात साबित होती है ,जिम्मेदारी भी इस पेशे का एक अंग है ,हर बात को सच की लकीर से वाजिब ठहराना अपनी कमियों को छुपाना है......ये सच बोलने वाले इतने खरे नही है....... अभी मीडिया को किसी पहरेदार ओर आत्मनिरीक्षण की जरुरत है ......

Unknown said...

"पत्रकारिता अब महज़ बिज़नेस बनकर रह गया है" इस से क्या आप यह कहना चाहती हैं कि पहले यह बिजनेस नहीं था? क्या पहल लोग इस में धन कमाने की इच्छा लेकर नहीं जाते थे? इतना कहा जा सकता है कि अन्य बिजनेस की तरह इस में भी ख़बर की गुणवत्ता पैसे कि भेंट चढ़ गई है. अब ख़बर दी नही जाती, बनाईं जाती है. जो ख़बर दी जानी चाहिए, छुपाई जाती है. और यह सब पैसे के बल पर होता है.

Smriti Dubey said...

सुरेश जी
एक समय था जब पत्रकारिता सच को सामने रखने के लिए थी।पेट की भूख उस पत्रकारिता के रास्ते में रोड़ा नहीं बनती थी। माना कि समय बदल गया है और आज हर चीज़ पैसै के लिए और पेट की भूख के लिए की जा रही है। लेकिन ख़बरों का सौदा करनेवाले इन दिग्गजों का पेट इतना बड़ा हो गया है कि भरने का नाम ही नहीं लेता।

Asha Joglekar said...

सही कहा है । लोकिन आप जैसे जिम्मेदार पत्रकार ही एक छोडासा ही सही सूराख आसमान में जरूर करेगे चाहे पत्थर कितने ही लगें ।

Doobe ji said...

smriti ji namaskar apka blog dekha acha laga ek request hai ki bhartiye hone mein hamesha garva kariye

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...