Wednesday, May 21, 2008

स्त्री विमर्श मे मक्कारी

अभी कुछ दिन पहले एक नया ज़ालिम ब्लॉग “नारी की कहानी” शुरु हुआ , यह ठीक था । सोचा कि चलो कोई शुरुआत करने वाला तो हुआ ।शायद पुरुष की बात पुरुष ज़्यादा अच्छे से सुनेंगे । पर दुखद यह है कि अंतत: सुनील की सोच भी उसी घिसी-पिटी लकीर पर चल निकली । यह ब्लॉग {अपने उदघोष के मुताबिक }“स्त्री की समानता ” की बात नही करता बल्कि स्त्री विमर्श के उमड़ते परिडृश्य मे एक डरे हुए पुरुष की ओर से सफाई पेश करता है । “चोर की दाढी मे तिनका” वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए ।स्त्री विमर्शकार जितना भी चिल्लाएँ चीखें कि लड़ाई पितृसत्ता से है पुरुष से नही ,और पुरुष तब निशाना बनते हैं जब वे पितृसत्ता को प्रिसर्व करने के पुनीत कर्तव्य मे लग जाते हैं ,लेकिन उसका कोई असर नही होता सिवाय इसके कि या तो हमारे विपरीत लिंगी साथी चुप्पी का सुरक्षित जामा पहन लेते हैं या पॉलिटीकल करेक्ट्नेस के चक्कर में हाँ –हाँ करते हैं या तलवारे तमंचे निकालकर उंगलियों पर गिनाए जा सकने वाले स्त्री अपराधों की फेहरिस्त का कवच तैयार कर लेते हैं ।

ऐसे में जो पुरुष सच्चे मन से स्त्री की साथी के रूप में कल्पना करते हैं और परिवर्तन मे सहयोग देना चाहते हैं वे भी हतशा का शिकार होते हैं ।
हाल की अपनी पोस्ट मे सुनील ने जो कहा वह मेरे लिए एक बड़ा सत्योद्घाटन है कि स्त्री के सुहाग चिह्नों का अपने पुरुष से कोई लेना देना नही बल्कि यह सुन्दरता का स्त्री का अधिकार है जिसका कोई भी स्त्री चाहे तो बहिष्कार कर सकती है –


“चूंकि महिला को सुन्दर का अधिकार हैं अतः उसे इन सब चीजों को धारण करने का भी अधिकार है.. हमने तो यहाँ तक पढ़ा है कि पाषंड युग में महिलाएं हड्डियों से बने आभूषण पहनती थी.. अतः आभूषण इत्यादी महिला के सौन्दर्य को निखारने के लिए हैं ना कि किसी और वजह के लिए..”

आपका पढा कहाँ तक सही है {और कहीं पर भी पढा हुआ अमल करने और अंतिम सत्य मान लेना चाहिये ऐसा किसने कहा } लेकिन शायद यह कहना ज़्यादा सही होगा कि “सुन्दरता किसी भी स्त्री का कर्तव्य है ” । सुन्दरता स्त्री के लिए ज़रूरी है ताकि कोई पुरुष उसे पसन्द कर सके । वर्ना यह कैसे होता है कि जो माता पिता बेटी को विवाह से पहले तक सजने सँवरने से मना करते हैं वही विवाह के लिए देखने आये लड़के के सामने उसे सजा-धजा कर पेश करते हैं । कुरूप स्त्री के विवाह मे सौ समस्याएँ आ सकती हैं पर पुरुष के लिए यह कभी कोई समस्या नही रही । पितृसत्ता ने हमेशा स्त्री का अस्तित्व “पुरुष के लिए “ माना और उसके सौन्दर्य का उपासक पुरुष को माना जिसके लिए स्त्री के उत्तेजक रूप और कामिनी रूप की धारणाओं ने ज़ोर पकड़ा ।
अमेरिका मे 60 के दशक मे ब्रा – बर्नर्स का प्रतीकात्मक आन्दोलन इसी सुन्दरता के मूल मुद्दे को लेकर था जिसके दौरान एक ब्यूटी पेजेंट में रेडिकल नारीवादियों ने सरे आम अपनी ब्रा कूड़ेदान में डाली और सौन्दर्य के उपकरणॉं का बहिष्कार किया ।सच मे कोई अंतर्वस्त्र नही जलाए गये थे । यह प्रतीकात्मक विरोध था पुरुष की अपेक्षाओं का । “तुम्हे ऐसा होना चाहिये , वैसा होना चाहिये , ऐसा दिखना चाहिये , वैसा नही दिखना चाहिये , स्तन गठे हुए होने चाहिये ,कमर पतली होनी चाहिये ....” क्यों ? बॉयकट बालों को रखना भी इसी विरोध का एक अंग था । वे साफ कहती थीं – तुम चाहते हो हम सुन्दर बन बन कर तुम्हें लुभाएँ ...यह हरगिज़ नही होगा ।

आज भी फिल्मों के हॉट सीन देखकर और हॉट अभिनेत्रियों को देखने की तड़प पुरुष के अन्दर है ....यह सुन्दर दिखने का अधिकार अपने लिये है तब तक माना जा सकता है जब इसका उद्देश्य हो तो इसे अधिकार कैसे माना जाए ...यह तो सेक्सी दिखने का कर्तव्य है ताकि पुरुष दर्शक आकर्षित हो और पैसा आये ।

यह और बात है कि सिन्धु और हड़प्पा सभ्यताओं में पुरुष भी गहने पहना करते थे और सुन्दर दिखना चाहते थे ।सोने के गहने , कुन्दन के गहने , रत्न जड़ित गहने , अन्गूठियाँ इन सभी का शौक राजाओं महाराजाओं को भी था । लेकिन कुछ गहने खास तौर से स्त्री के विवहित होने की निशानी थे जिन्हें धारण करने की विवशता पुरुष के साथ नही थी । । धीरे-धीरे सुहाग चिह्नों मंगल सूत्र , मांग मे सिन्दूर , हाथ मे भरी भरी चूड़ियाँ , बिछुए आदि एक विवाहित स्त्री के लिए अनिवार्य से हो गये । ये उसे बन्धन न लगें इसी लिए यह मानसिकता तैयार की गयी कि गहने किसी स्त्री के सौन्दर्य को निखारते हैं और सुन्दर स्त्री की साख होती है ।
मुझे याद है कि नयी नयी शादी के हफ्ते भर बाद ही जब मुझे बिना चूड़ियों और बिछुए के देखा गया तो घर भर ने टोका था ।धीरे धीरे सबको आदत हो गयी । मांग मे सिन्दूर भरने से हाथ मे चूड़िय़ाँ पहनने से , पांव मे बिछुए पहनने से यदि मेरी सुन्दरता का कोई लेना देना है तो मै शादी से पहले भी करना चाहूंगी .....बाद मे ही क्यों ?
मेरी एक सहेली को सादगी पर इसलिए लताड़ पड़ती थी कि – यह मेरे बेटे के लिये कोई सुहाग चिह्न धारण नही करती , कुलटा है , मेरे बेटे की लम्बी आयु से इसका कोई लेना देना नही ।
स्फेद वस्त्र पहनना अपराध है विवाहित स्त्री के लिए । अब भी नवविवाहिता एक आध साल बाद बेशक सफेद और अन्य किसी रंग का क़ॉम्बिनेशन पहन ले , पर पूरा सफेद कपड़ा धारण नही कर सकती । ऊंचे घराने इससे अलग ही रखिये जहाँ डिज़ाइनर शादियों का रिवाज़ और शोशेबाज़ियाँ चलती हैं ।

आज बाज़ारवाद के चलते फिर से पुरुष के सौन्दर्य की अवधारणा का जन्म हुआ है । बाज़ार अब न सिर्फ स्त्री के शरीर को भुनाने लगा है बल्कि पुरुष के शरीर को भी बेचने के तरीके ईजाद कर लिये हैं ।
लड़का भी गोरा होना चाहता है , सिक्स पैक ऐब्स चाहता है ,कूल लुक्स चाहता है ,कूल शेड्स चाहता है तो लड़कियाँ भी हॉट और परफेक्ट फिगर वाली होना चाहती हैं । इसमे एक मात्र बुराई बाज़ार है , लड़की या लड़का नही ।


इसलिए यह कहना कि “दुर्भाग्य से महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले पुरुषों पर हर तरह के हमले करते हैं..और भूल जाते हैं कि पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं” ..

मुझे जल्दबाज़ी और नासमझी मे दिया गया बयान प्रतीत होता है। यह हाल हमारे अधिकांश मित्रों का है । जैसे ही कोई स्त्री समानता व समस्या पर बात होने लगे उनके गले मे कोई हड्डी फंस जाती है । वे तुरत फुरत स्त्री के दुश्चरित्र होने का कोई प्रमाण ले आते हैं या यह साबित करना चाहते हैं कि स्त्री स्वयम इस अवस्था के लिये दोषी है ।
जिसे सदियॉं तक शिक्षा से दूर रखा गया , जिसे हमेशा गुलामी की ट्रेनिंग दी गयी , जिसे हमेशा दीवारों मे कैद रखा गया , जिसे हमेशा दूसरों की आँखों मे अपना अक्स देखना सिखाया गया ,जो आज भी हाथ भर का घूंघट करती है वह अपनी अवस्था के लिए स्वयम दोषी है । यह तो वैसे ही हुआ कि किसी के हाथ काट कर कहो खुद लेकर पानी पी लो, हमने क्या हाथ बान्धे हैं तुम्हारे ?
ऐसा पुरुष मित्र कैसे हो सकता है जो सम्वेदनशील होने की बजाय अपनी सफाई देने को उद्यत हो । दुर्भाग्य से कुछ पुरुष साथी समस्त स्त्री विमर्श के चलते अपना भविष्य अन्धेरे मे देखते हैं । और दिन रात यही चिंता करते है कि यदि दुनिया भर की औरत सच मे आज़ाद और बराबर हो गयी तो क्या कहर मचायेगी ।वे व्यभिचारिणी हो जायेंगी । वे लिव इन रिलेशन मे रहने लगेंगी । वे सिज़ेरियन बच्चा पैदा करने लगेंगी । वे अल्फा वूमेन हो जायेंगी
हमारी तो सारी व्यवस्था एक मात्र स्त्री पर ही टिकी है ...वह हिली तो सब कुछ ढह जायेगा । उसे बलिदान देना ही होगा ताकि परिवार टिके रहें , ताकि समाज टिका रहे , ताकि संतति {जिसपर उसका कोई हक नही } की उत्पत्ति होती रहे , ताकि मनोरंजन के स्रोत बने रहें ।

मुझे हैरानी है कि ऐसा समाज जो इतनी विषमताओं से भरा हुआ है उसमें परिवर्तन में अपनी ओर से ईमानदार भागीदारी किए बिना कोई उसके टिके रहने की कामना भी क्यूँ और कैसे कर कर सकता है । यदि स्त्री के स्वतंत्र होने से अराजकता आती है तो आ जाने दीजिये न । किसे बचाना है ?डर किसका है ? अब तक जो बहुपत्नीवाद , रखैल उपपत्नीवाद , वेश्यागमन जैसे व्यभिचार पुरुष ने किए एक दो स्त्रियों के वैसा करने से क्यों घबराहट होती है ।
दलित की खून चूसने वाले ब्राह्मण समाज को अब यदि दलितों के आरक्षण सता रहे है ,डरा रहे हैं तो क्यों ? अब तक जो ब्रह्मानन्द आपने लूटा वे भी पा रहे हैं तो तकलीफ क्यों ?
जब आप चिंतित होने के सिवा कुछ नही कर सकते तो ढह ही जाने दीजिये ऐसी व्यवस्था को जो हाशिये के लोगों को जीने का , सांस लेने का हक नही देती । फैलने दीजिये अव्यवस्था । अव्यवस्था मे से ही शायद नये समाज और नयी व्यवस्था के बीज पैदा होंगे ।जिस घर में नवीनीकरण सम्भव नही उसकी इमारत ढहा दीजिये ।

इतिहास और विज्ञान गवाह हैं कि नष्ट होने के बाद हमेशा पुनर्निर्माण हुआ है । सृष्टि हमेशा विकास की ओर चली है ।सभ्यताएँ नष्ट हुई हैं तो फिर बसी भी हैं ।

26 comments:

A mad guy said...

हा हा हा.. कल तक जब प्रशंसा हो रही थी तो सब ठीक था.. अब जबकी बुराई भी नहीं हुई है, बस एक विचार का मेल नहीं हुआ है तो आसमान सर पर उठा लिया..

सही है.. सही है.. वाह नारीयों की महान नेता.. :D

admin said...

बहुत देखें हैं ऐसे !!

Pratik Pandey said...

अच्छा लिखा है।

siddheshwar singh said...

अच्छा लिखा
अच्छा लगा

Ghost Buster said...

कितने ही छोटे बड़े मुद्दे उठा लें, आखिरकार हल केवल एक ही है, महिला शिक्षा और स्वाबलंबन. सानिया मिर्जा की नोज रिंग किसी कर्तव्य या मजबूरी का परिणाम नहीं है. इसी तरह चाय की ट्रे उठाकर संभावित ससुरालीजनों के सम्मुख प्रस्तुत होने वाली लड़की का सजावट से इनकार करना भी उसके हाथ में नहीं है.

बढ़िया लेख, दमदार अंदाज, हमेशा की तरह.

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

सुजाता बहुत छोटी थी तो एक बार मां से जिद करने लगी कि मैं भी सिंदूर लगाऊंगी। मां ने कहा बेटा शादी से पहले नहीं लगाते। वैसे मेरी मां को मैंने बचपन से कभी बिन्दी, सिंदूर, पाजेब, बिछिया में नहीं देखा।
जब मेरी शादी हुई, तो चुभने की वजह से पाजेब बिछिया कभी पहनी नहीं, ट्राउजर के साथ सिंदूर बिंदी लगाती नहीं थी, आदत भी नहीं थी। रिपोर्टिंग पर जाती तो अकसर लोग आश्चर्य करते आपकी शादी हो गई है, लाख बताती कि भैया नाम के आगे मिसेज लिख पर फिर आवाज आती मिस अरोड़ा।
दरअसल सुजाता गलती सुनील या उनकी तरह सोच रखने वाले रोज मिलने वाले पुरुषों की नहीं है, उन्हें समाज ने यही सिखाया है कि विवाहिता तो वही है जो सिंदूर लगाए जो बिंदिया लगाये। इस बाक्स से बाहर महिलाओं को देखते ही तकलीफ शुरू हो जाती है तब कभी इसे श्रंगार का नाम दिया जाता है तो कभी सुन्दरता का। पर इस बाक्स के बाहर देखने की सोच नहीं दी और जिस दिन यचे सोच शुरू हो गई तो महिलाओं की आधी जंग जीत ली जाएगी।

विजय गौड़ said...

बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाये हैं, बह्स होनी ही चाहिये. अच्छा है आलेख.

Anonymous said...

ये पोस्ट सुजाता को समर्पित हैं क्योकि वह भी प्रतीक हैं आज कि नारी कि , महिला सशक्तिकरण कि ।

गौरव सोलंकी said...

हाँ, वह पोस्ट ऐसी ही है...पुरुष की सफाई की तरह।
लेकिन पुरुष नारी को सुन्दर देखने की जो चाह रखता है, उसमें मेरे विचार से उसकी सोच का दोष नहीं है। वह प्राकृतिक है।
लेकिन वह उस तक सीमित रहे तो बेहतर है। किसी को जबरन सुन्दर दिखने पर मजबूर करना गलत है। और जिन श्रंगार साधनों की बात हो रही है या जिनको न पहनने पर नवविवाहिताओं को अपमानित किया जाता है, क्या ऐसा कहने वाली भी अक्सर घर की बड़ी स्त्रियाँ नहीं होती?
आप उन स्त्रियों की मानसिकता कैसे बदलेंगी, जिसे सिखाया गया है कि पारम्परिक न होना चरित्रहीन होना है। और इसमें उनकी उतनी गलती नहीं है, जितनी उनकी माँ की....और यही सिलसिला ऊपर तक चलता है।
वैसे बहुत अच्छी पोस्ट थी। बहुत सी बातें कहनी हैं, बाकी बाद में...

रेवा स्मृति (Rewa) said...

नारी’ कमजोर ना थी, ना है! ‘नारी’ पर कॉमेंट करने के पहले हर एक पुरुष अपनी पुरुष जाति को आईना दिखाए, तब समझ मे आएगा कि “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय, जो मन खोजा आपना, मुझ-सा बुरा न कोय!’


@Sudeep, aur aapko dharti per hi baithe-2 mirchi kyun lag rahi hai? Abhi to bus aasman hi sir per uthaya hai...abhi to Lord Shivaji ki tisri netra bhi khulne wali hai. Tab kya hoga yeh sochiye.


kya burai karenge nariyon ka yesab...kisi bhi purush ko burai karne bhi aata hai kya? Nahi aata hai dhang se burai karna to fir ham unhe burai karne ki kala bhi aur achhe se sikha denge. Badai karna to aata nahi dhang se aur badi chale sab burai karne.

Anonymous said...

@Gauravji, "लेकिन पुरुष नारी को सुन्दर देखने की जो चाह रखता है, उसमें मेरे विचार से उसकी सोच का दोष नहीं है। वह प्राकृतिक है।"


dekhne ke liye kab mana kiya gaya hai aur fir isme jyada energy bhi nahi lagta hai? Are bhai dekhe sab but saaf dirshti se dekhe. Problem dekhne mein nahi hai balki yeh log हंस(Swan) बने बैठे हें बाहर से, अंदर से विषधर नाग(Snake) हें”. ओर "जिनकी नियत में ही खोट हो वो साड़ी, बुर्के ओर सलवार पहनी लड़कियों को भी ग़लत नज़रों से देखते हें."

regards,
Rewa Smriti
www.rewa.wordpress.com

Anonymous said...

वो पोस्‍ट मैंने देखी नहीं। देखना भी नहीं चाहता। लेकिन आपकी दलील भी भौं-भौं ही है। लडाई तो सचमुच पितृसत्तात्‍मकता से ही, पुरुष से तो है नहीं। दहेज हत्‍या में ज़्यादातर आरोपी महिलाएं ही होती हैं - जो दरअसल पुरुष सत्ता से संचालित होती हैं - इस बारे में आपका विमर्श भी शायद इसी निष्‍कर्ष पर पहुंचता होगा। मेरी गुज़ारिश है कि डिक्‍शनरी में एक शब्‍द है ब्‍लाइंड फेमिनिज़्म। इसका अर्थ जान-समझ लें, क्‍योंकि ये आप जैसी चोखेरबालियों पर ज़्यादा मुफीद बैठता है।

pallavi trivedi said...

तुमने सही सवाल उठाये सुजाता...अच्छी लगी तुम्हारी पोस्ट!बहस होनी चाहिए!पता नहीं क्यों शादी के बाद किसी लड़की के सिन्दूर न लगाने या मंगलसूत्र न पहनने पर बुजुर्ग महिलाओं के अलावा आज की पढी लिखी लडकियां भी सवाल उठाने लगती हैं!यदि सिर्फ सुन्दरता के लिए ही पहनना है तो शादी के पहले भी तो पहने जा सकते हैं ये गहने....

आर. अनुराधा said...

सच कहा सुजाता- पुरुषों के समाज में सुन्दरता स्त्री के लिए ज़रूरी है ताकि कोई पुरुष उसे पसन्द कर सके!!!

"समान कपड़ों और बालों वाले समूह में स्त्री-पुरुष की पहचान करनी हो तो नजर सबसे पहले सीने की तरफ जाती है। यह स्त्रीत्व का बाहरी निशान है। मेडिकल तथ्य यह है कि इसका आकार-प्रकार बच्चे को दूध पिलाने का अपना मकसद पूरा करने में आड़े नहीं आता। लेकिन पुरुष प्रधान समाज में इसे ही स्त्रीत्व मान लिया जाता है।

एक तरफ तो बार्बी डॉल जैसे अवास्तविक आदर्श हैं और मर्लिन मुनरो जैसी फैंटसी, जिनसे बराबरी की भावना समाज बचपन से ही हमारे मन में लगातार भरता रहता है। और इसी लक्ष्य को पाने की कोशिश में हम कभी अपने शरीर के इस हिस्से को जैसा है, उसी रूप में स्वीकार नहीं कर पातीं। उसमें हमेशा कमी-बेशी नजर आती है। हमें हमेशा याद दिलाया जाता है कि यही हमारे नारीत्व का केंद्र है और इसे आदर्श रूप में रखना है।

दूसरी तरफ हमें उसी पर शर्मिंदा होना भी सिखाया जाता है। शो बिजनेस से जुड़ी औरतें शरीर के इस हिस्से का प्रदर्शन कर सकती हैं। लेकिन सामान्य ' भद्र' महिला से उम्मीद की जाती है कि वह लोगों के बीच इसे ठीक ढंग से ढक-छुपा कर रखे। 'प्लेबॉय' और 'कॉस्मोपॉलिटन' के कवर पेज पर इस प्रदर्शन का स्वागत है लेकिन आम औरत का सार्वजनिक रूप से इस तरह के गैर-इरादतन व्यवहार का अंश मात्र भी निंदनीय और दंडनीय है।"
- 'इंद्रधनुष के पीछे-पीछे: एक कैंसर विजेता की डायरी' से।
लेखक: आर. अनुराधा

Anonymous said...

जनानखाने में एतने पुरुष काहे भर रखे हैं चोखेरबालियों उनके बिना काम नहीं चलता का ?
:) :)

और ब्‍लागरोलवा में शब्‍दों का सफर को दुई दुई बार चेंपे हो कौनो बिसेस मो‍होब्‍बत चक्‍कर है का ?

सुजाता said...

अनाम भाई ,
यह जनानियों का मोहल्ला नही है , न ही अस्पताल का मैटर्निटी वार्ड है जहाँ पुरुष का आना प्रतिबन्धित हो । हमारी बात तो सभी से है चाहे वे आप जैसे पुरुष हों या आप जैसी स्त्रियाँ । इसलिए आपका हार्दिक स्वागत है ।
और विशेष मोहब्बत तो है ही हमें पाठकों से भी और सभी साथियों से भी ,पर कभी कभी भूल से गलती हो ही जाती है । आप तक से हो जाती है तो हम तो बेचारी औरतें हैं । पुरुषों के बिना काम वाकई नही चलता ....इसलिए अनुरोध है कि आप सच्चे मित्र बनिये न दूर से खिल्ली उड़ाने की बजाए और आलोचक बनने की बजाए ।
सादर

Anonymous said...

हम तो बेचारी औरतें हैं..

अबकी सही कहा..

A mad guy said...

सच्चे मित्र बनिये न दूर से खिल्ली उड़ाने की बजाए और आलोचक बनने की बजाए ।

मित्र बनने जो भी आये, अगर उससे विचारों का मेल ना हो तो बस गई मित्रता भाड़ में.. इस जगह वही टिकता है जिसके विचार आपलोगों से मिलते हैं या फिर जो हर बात में जी-हूजूरी लगाता हो..

गौरव सोलंकी said...

कठपिंगल जी, आपके इरादे नेक हैं लेकिन बात में ज़रा सा फ़र्क है। यह पुराना तरीका है कि दिखाने को तर्क न हों तो सामने वाले को अन्धा कहना बेहतर है।
सुदीप जी, बेहतर होता कि आप पूर्वाग्रहों की रट लगाए बिना अपनी बात कहते। अगर सुजाता गलत कह रही हैं तो भी कहते और सही कह रही हैं तो भी...
और झगड़ा पुरुष से है भी नहीं, उन औरतों से भी है, जो आज़ादी के ख़िलाफ़ हैं।
अनुराधा जी, आपसे हल्की असहमति है। क्या स्त्रियाँ सुन्दर नहीं दिखना चाहती कि पुरुष उन्हें पसन्द करें और क्या पुरुष आकर्षक नहीं दिखना चाहते कि स्त्रियाँ उन्हें पसन्द करें? यह मोह और आकर्षण ही प्रकृति का केन्द्रीय तत्व है।
सौन्दर्य सिखाया नहीं जाता, न ही समाज तय करता है, यह व्यक्तिगत कंसेप्ट है। किसी के लिए कोई हिस्सा महत्वपूर्ण है और किसी के लिए कोई।
यदि आप जबरन किसी के सौन्दर्य के मापदंड बदलना चाहें तो यह उसके साथ भी तो अन्याय है।
वैसे इस पर और बहस की जा सकती है। मैं गलत भी हो सकता हूं।

Asha Joglekar said...

सुजाता जी अच्छी लगी आपकी पोस्ट और आपकी पोस्ट का अंतिम परिच्छेद तो बहुत ही जबरदस्त है और सही भी । पर सुंदर दिखने दिखाने के बारेमें मै जरा अलग विचार रखती हूँ । सुंदर दिखने की चाह प्राकृतिक आवश्यक्ता है चाहे वह पुरुष की हो या स्त्री की । It is needed for propagation of species. और प्रकृती ही ऐसी इच्छा युवाओं में उत्पन्न करती है । इसीसे लडकियाँ सजतीं संवरतीं हैं । बाकी जमाना बदल रहा है तेजी से और मेरे जैसी पुरानी पीढी के लोग भी जबरन कुछ भी किसी पर थोपना नही चाहते यह व्यक्ती की अपनी इच्छा है । पर यह समाज हमने ऐसा नही बनाया यदि इस समाज में लडकी की सुरक्षितता की दृष्टी से माँ या सास कुछ कहतीं हैं तो उसे उस हिसाब से भी देखा जाना चाहिये । सिर्फ विरोध के लिये विरोध तो कोई बात नही हुई ।

आर. अनुराधा said...

@ गौरव सोलंकी और आशा जोगलेकर
बात सजने-संवरने की नहीं, उसके मानकीकरण और सामान्यीकरण की और उन कथित अलिखित/लिखित मानकों के जबरन लागू किये जाने की है। कोई भी व्यक्ति कैसा रहे तो सुदर दिखे, और किसके लिए सुंदर दिखना जरूरी है, किसके लिए नहीं, कौन किस तरह सजे-संवरे या न सजे-संवरे और सुंदर या कहें मौके के अनुकूल दिखने के लिए शरीर के किस हिस्से को कब दिखाए या न दिखाए, उसकी सार-संभाल करे, न करे, किस तरह, किस हद तक करे, न करे,....इन सारे सवालों पर व्यक्ति के निजी स्तर पर फैसले हों, करने वाले अपनी पसंद खुद तय करे- वो चाहे धार के साथ बहने की हो या उसके खिलाफ जाने की। इसके लिए किसी पर समाज, परिवार या व्यक्ति का प्रत्यक्ष या परोक्ष दबाव न हो। और - "सौन्दर्य सिखाया नहीं जाता, न ही समाज तय करता है, यह व्यक्तिगत कंसेप्ट है। किसी के लिए कोई हिस्सा महत्वपूर्ण है और किसी के लिए कोई।" तो जनाब मैं इससे सहमत नहीं हूं, और गहराई से सोच देखें तो आप भी समझेंगे कि हमारे समाज में पुरुष तय करते हैं कि उनकी बीबी, बेटी, कई बार तो -बहन और मां तक, कैसी रहे और किस फ्रेम में सही फिट होती महिलाएं सुदर हैं और किस फ्रेम की नहीं।

गौरव सोलंकी said...

@ अनुराधा
सौन्दर्य व्यक्तिगत अवधारणा ही है। मुझे कभी किसी ने नहीं कहा कि लड़कियों में इस गुण के होने पर या नाक, कान, चेहरे या किसी और अंग के इस तरह होने पर वे सुन्दर होंगी। अपनी aesthatic sense हर आदमी अपने आप विकसित करता है। हाँ, यह हो जाता है कि ज्यादा लोग एक तरह के होते हैं तो कुछ अवधारणाओं का सामान्यीकरण किया जा सकता है। लेकिन तब भी प्रत्यक्ष रूप से उसे जबरन लागू कोई नहीं करता।
हर व्यक्ति इतना बुद्धिजीवी भी नहीं होता कि उसे समझ में आए कि शरीर की सुन्दरता महत्वपूर्ण नहीं है। और ये स्त्रियों पर भी लागू होता है। क्या लड़कियों को लड़कों के नैन-नक्श से फ़र्क नहीं पड़ता? यदि थोड़ा भी पड़ता है तो यह बात बेमानी है कि सौन्दर्य के मापदण्ड पुरुष तय करते हैं। शादी से पहले लड़कियाँ जिस राजकुमार के सपने देखती हैं, वह बदसूरत तो नहीं होता ना।
मैं दोनों तरफ से ही इस तरह की सोच का विरोधी हूं और मेरे ख़याल से इस विषय को स्त्री विमर्श से जोड़ना, राह से भटकना ही है।
इसकी चर्चा मानव समाज के भौतिकवादी होने की चर्चा करते समय की जा सकती है।

Suresh Gupta said...

'पुरुष की बात पुरुष ज़्यादा अच्छे से सुनेंगे', यह आपने कैसे सोच लिया? पुरूष जो कहता है, पुरूष जो सुनता है, सब दिखाबा है. आपको ऐसे पुरूष ज्यादा मिलेंगे जो यह दिखायेंगे की वह नारी मुक्ति के समर्थक हैं. यह पुरूष नारी की तारीफ़ में गला फाड़ कर चिल्लायेंगे पर कोई मौका नहीं चूकेंगे उसे बेइज्जत करने का. यह पुरूष बेटी कह कर पीठ पर हाथ रखेंगे पर मन ही मन उसे वस्त्रहीन कर डालेंगे. नारी को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि कभी पुरूष उस की मुक्ति को समर्थन देंगे. में मानता हूँ कि ऐसे पुरूष भी हैं जो चाहते हैं कि नारी को समाज में बराबर का स्थान मिले. पर ऐसे पुरुषों कि संख्या बहुत कम है.

नारी को अपने और समाज के हित में संगठित होना होगा. इधर उधर की बातों में समय और शक्ति नष्ट न करके उसे स्वयं को सशक्त बनाना होगा. परिवार से शुरू करके राष्ट्र तक जाना होगा. पहले परिवार में हो रहे अत्त्याचार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलिए. हर सास, हर जेठानी और हर ननद को यह प्रतिज्ञा करनी होगी कि वह घर में आई नई दुल्हन पर कोई अत्त्याचार नहीं होने देंगी. किसी दुल्हन को जलने नहीं देंगी. किसी कन्या को गर्भ में मरने नहीं देंगी. जब अपने परिवार में नारी सुरक्षित हो जाए तब पड़ोस की नारी और फ़िर समाज की हर प्रताड़ित नारी को सुरक्षित करेंगी. और यह काम उसे ख़ुद करना होगा.

Anonymous said...

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अफ़लातून said...

@ कठपिंगल,
"दहेज हत्‍या में ज़्यादातर आरोपी महिलाएं ही होती हैं"- यह गलत है।किसी भी जेल में चल कर देख लें ।
"जो दरअसल पुरुष सत्ता से संचालित होती हैं "-सत्य वचन !

एस एम् मासूम said...

दहेज हत्‍या में ज़्यादातर आरोपी महिलाएं ही होती हैं.

सत्य है क्यों की बहुत को सताने वाली औरतें ही हुए करती हैं. इस ज़ुल्म मैं मर्द साथी अवश्य होता है और सजा भी वही पता है.

अनुप्रिया के रेखांकन

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