Tuesday, May 27, 2008

शर्मिन्दगी के पल

दो दिन हुए ब्लॉग जगत के माहौल में एक अजीब सी गन्ध उड़ रही है । शुरुआत हुई एक टिप्पणी से जिसकी सच्चाई और विश्वसनीयता तमाम ब्लॉगरों द्वारा सन्दिग्ध मानी गयी । लेकिन पत्रकारों के ब्लॉग जगत में होने से इतना तो उपकार हुआ है कि कुछ खबरें हमें फर्स्ट हैण्ड् मिल जाती है । यह भी मिली । पुष्टि हुई कि यश्वंत नामक एक ब्लॉगर ने नौकरी के लिए दिल्ली आयी एक लड़की का बलात्कार करने की कोशिश की ।
यह निहायत शर्मनाक है । और दुखद है कि ब्लॉग जगत में स्त्री विमर्श करते हुए जब हम सब लगातार स्त्री की गरिमा, सम्मान,और बराबरी के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं तब भी ऐसी असम्वेदनशीलता पुरुष मानस मे मौजूद है । बहुत सी अभद्रताएँ जो अब तक भाषाई रूप में सामने आती रहीं वे इस प्रकरण में शारीरिक अब्यूज़ तक पहुँच गयीं ।और बहुत प्रतिबद्धताओं के बावजूद भी पुरुष अपने संसकारों के चलते स्त्री के विरुद्ध खड़े पाए गये ।

कोई हैरानी नही कि आस-पास हमारा पुरुष समाज स्त्री के प्रति ऐसी हेय दृष्टि रखता है । यह वो समाज है जहाँ आरुषि हत्याकांड तक में पुलिस स्त्री के चरित्रहीनता के प्रमाण ढूंढ लाती है ।14 साल की बच्ची और पिता जैसे नौकर को आपत्तिजनक हालत मे पिता द्वारा देखा जाना कारण बताया जाता है कत्ल का । पिता के भी कथित नाजायज़ सम्बध हैं ।
स्करलेट कीलिंग का बलात्कार और उसके बाद उसकी हत्या झकझोरने वाली है बावजूद इसके कि यह ऐसी रोज़ाना होने वाली घटनाओं में से ही एक है । लेकिन क्या वाकई समाज इन हादसों से दहलता है ?
बलात्कार के साएँ में ही हमारा समाज लड़की को बड़ा करता है और हमेशा यह डर उसके भीतर पैठा रहता है कि जाने कब ऐसी किसी स्थिति से उसका सामना हो जाए ।
इस शर्मिन्दगी के इस पल में हम यशवंत नामक व्यक्ति और प्रवृत्ति की निन्दा करते हैं । पत्रकार जल्द ही सारा मामला साफ करेंगे ऐसी उम्मीद है ।

13 comments:

आलोक said...

आशा है कि यह लेख लिखने से पहले दूसरे पक्ष से पूछताछ की गई होगी, क्योंकि लेख में कहीं भी 'अगर' शब्द का इस्तेमाल नहीं है।

वैसे आप पूर्णविराम के पहले खाली स्थान न छोड़ें तो सही रहेगा। और पूर्णविराम के बाद एक खाली स्थान छोड़ें। जैसे कि पिछले दो वाक्यों में।

सतीश पंचम said...

Theek hi likha hai. baar baar naari ye, naari wo aur baad me khud lapete me aa jaane waale logon se aisi umeed to na thi. Lekh achha lika hai.
Safed Ghar

विनीत कुमार said...

आपको गंध औऱ भभका इसलिए महसूस हो रहा है क्योंकि ब्लॉग पर भी कटेगा तो बटेगा वाला फार्मूला काम करता है और कटे हुए दो दिन हो गए जबकि बंटने का काम जारी है। जरा बीच-बीच में नींबू निचोड़ते रहिए, गंध नहीं आएगी और जायका भी बदलेगा.।

Unknown said...

जो कुछ हुआ वह ग़लत हुआ, और जो कुछ हो रहा है वह भी ग़लत हो रहा है. पर इस ग़लत को सही कौन करेगा? अधिकांश पुरुषों के दो चेहरे हैं. एक चेहरे के साथ वह नारी का वंदन करते हैं और दूसरे चेहरे के साथ उसका वलात्कार. बेटी कह कर उसके सर पर हाथ रखेंगे और मन ही मन उसे वस्त्रहीन कर देंगे. नारी ने बहुत तरक्की की है. घर के बाहर अपनी योग्यता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं, पर अपने ही घर में वह और अधिक असुरक्षित हो गई है. बेटी पिता से असुरक्षित हो, ऐसे समाज को तो पाताल में चले जाना चाहिए.

Unknown said...

बाकी सब तो अपनी जगह है, पर अरुशी के मामले में मीडिया और पुलिस को तो धन्यवाद देना चाहिए............. क्यों भला? उसने कम से कम नौकर और अरुशी के अवैध सम्बन्ध बताये वरना ये लोग तो यह भी साबित कर सकते थे की बाप-बेटी में अवैध सम्बन्ध थे. और डॉक्टर राजेश को यह बात सार्वजनिक हो जाने का डर सता रहा था. कोई भी मर्डर वगैरह हो बस 'अवैध-सम्बन्ध' की थ्योरी लगा दो मामला सोल्व हो जाता है.
---meera aggarwal

स्वप्नदर्शी said...

Dear,
enable moderation on comments and contents.

I am shocked to see what is going here in the blogs....

अनूप भार्गव said...

सुजाता:
’चोखेर बाली’ को अपने उद्देश्य से भटकने से बचाओ ..

Anonymous said...

अनूप भार्गव जी, आपको कैसे लगता है कि चोखेर बाली अपने उद्देश्‍य से भटक रहा है? ख़ास कर इस पोस्‍ट के संदर्भ में मैं आपसे ये सवाल कर रहा हूं।

अनूप भार्गव said...

अविनाश जी:
अच्छा लगा आप को ’चोखेर बाली’ में देख कर । अधिक बहस करने ले लिये न समय है और न ही ’मूड’ ।

मेरा सोचना था कि ’चोखेर बाली’ और ’मोहल्ला’ में कुछ अन्तर है । समझ रहे हैं ना ?

’चोखेर बाली’ से व्यापक विषयों (larger issues) को ले कर रचनात्मक सुधार के लिये कदम बढाने की और या कम से कम इस क्षेत्र में सुझावों की अपेक्षा करता हूँ ।

आर. अनुराधा said...

किसी भी मामले में व्यापक मुद्दों के साथ-साथ 'छोटे' मुद्दे भी फोकस में रहते हैं क्योंकि वे भी उसी व्यापक पहल का हिस्सा होते हैं। बड़ी नदी अचानक अवतरित नहीं होती, उसके लिए कई छोटी-छोटी धाराओं को जुड़ना पड़ता है जो नदी के बराबर ही महत्वपूर्ण होती हैं। चोखेर बाली में विषय कोई भी विषय से हटकर नहीं आया है, ऐसा मुझे लगता है। वैसे, चोखेर बाली और मोहल्ला का अंतर क्या है और क्यों बना रहे, इस बारे में अनूप जी कृपया साफ करें।

अनूप भार्गव said...

अनुराधा जी:
Smaller or individual cases are important as long as they help us in understanding the larger issues/trends and we can learn lessons from them.

Simply reporting individual cases without trying to understand the issue and offer solution is not what I expect in Chokher Bali. I can easily read that in the 'Crime Section' of any newspaper.

May be it is my ignorance but I could not understand what we were trying to say in this post ? Reference to an unconfirmed crime with vague details. Who is Yashwant
? What has he done and under what circumstances? If we take this as individual case then what can we do to help the victim and bring the culprit to justice? If we take this as larger issue then what is the cause, lesson learnt and solution to the problem?

Every blog has a purpose. What may be sensational and appropriate for Mohalla does not automatically make it appropriate for Chokher Bali. I could be wrong in my understanding about the goals of Chokher Bali.

अंग्रेजी में लिखने के लिये माफ़ी चाहता हूँ , हिन्दी में गद्य लिखनें में प्रवाह की समस्या होती है ।

Anonymous said...
This comment has been removed by a blog administrator.
شہروز said...

मज़मून गर जल्दी बाजी में ख़त्म न होता तो बेशक बात विस्तार से की जा सकती थी , बहुत पहले कहा एक शेर याद आया
बच कर जाएं भी तो किधर जाएं
घर आँगन में जिनाकार मिले

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