Sunday, May 25, 2008

राह से भटकते युवा कदम..

पहली घटना- आज से सात साल पहले मैं प्रोबेशनर थी और अपना तीन महीने का थानेदारी वाला पीरियड कर रही थी! दीवाली के दिन बड़े जोर शोर से जुआ खेलने वालों को पकड़ने निकली और पांच लड़कों को जुआ खेलते पकड़कर थाने लायी! सभी अच्छे घरों के थे और उनकी उम्र लगभग १६-१७ साल की रही होगी! सभी पकडे जाने के बाद डरे हुए थे और बार बार मुझसे मिन्नत कर रहे थे की मैं उन्हें इस बार छोड़ दूं..आगे से वे ऐसा नहीं करेंगे!पर मैंने उन्हें नहीं छोडा और मुकदमा बना दिया...छोटा अपराध था तो थाने पर ही जमानत पर छूट गए...अगले दिन पता चला उनमे से एक लड़के ने आत्महत्या कर ली! कारण मालूम हुआ की उसके माता -पिता ने बहुत डांटा और उसने शर्मिंदगी के कारण ये कदम उठाया!मुझे पता चला तो मैं स्तब्ध रह गयी...खुद को भी दोषी मान रही थी की अगर एक बार मैं उन्हें छोड़ देती तो शायद एक युवा लड़के की जान नहीं जाती!

दूसरी घटना- चार साल पहले एक १४ साल का लड़का थाने लाया गया! उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर मोटर साइकल चोरी की थी! उसके पिता एयर फोर्स में नौकरी करते थे और अक्सर बाहर ही रहते थे!जब उन्हें पता चला की उनके बेटे ने ऐसा किया है तो सदमे में आ गए!जब वे थाने पर आये तो उनके आंसू नहीं रुक रहे थे!बेटा भी अपनी गलती महसूस कर रहा था...माँ- बाप के सामने बुरी तरह रोते हुए माफ़ी मांग रहा था! एक तरफ अपराध था और दूसरी तरफ बच्चे का सारा कैरियर था! हम लोग भी चाहते थे की एक अवसर उसे सुधरने का दिया जाए वरना अगर एक बार जेल चला गया तो जिंदगी खराब हो जायेगी! इस वक्त पर मोटरसाइकल मालिक ने बहुत दरिया दिली दिखाई! उसने बच्चे को माफ़ करते हुए उसे एक मौका दिए जाने की गुजारिश की!आखिर लड़के को छोड़ दिया और उसने भी आगे पढाई करने का वादा किया!

तीसरी घटना- एक महीने पहले ट्रेन में ज़हरखुरानी करने वालों का एक गैंग पकडा ...उसमे भी लगभग १० लड़के ,जिनमे एक लड़की भी शामिल थी! ६ लड़के तो पक्के अपराधी थे लेकिन बाकी के ४ अच्छे घरों के पढ़ने वाले बच्चे थे जो महज जेब खर्च के लिए इन लड़कों की सोहबत में आकर ये काम कर रहे थे!खैर वो कई घटनाएं कर चुके थे इसलिए उन्हें जेल भेज दिया गया!

चौथी घटना- ताजा तरीन आरुशी केस हमारे सामने है जहाँ उसके कदम भटके और अंजाम हम सभी ने देखा!

इन सभी घटनाओं में जो बात कॉमन है वो ये की सभी अच्छे घरों के बच्चे थे और सभी के माता पिता उनकी गतिविधियों से अनजान!
आज एक ब्लॉग पर पढा की आरुशी हत्याकांड को देखते हुए अब वह वक्त आ गया है की नारियों को घर की और रुख कर लेना चाहिए! किसी दुसरे ब्लॉग पर इस पोस्ट का खंडन किया गया!एक और बहस शुरू...

समस्या इतनी गंभीर है कि बहस यह नहीं है कि बच्चों को देखने का काम किसका है! निस्संदेह माता पिता दोनों का ही है ! यदि माँ घरेलू महिला है तो स्वाभाविक रूप से वह ज्यादा वक्त दे सकती है.. और यदि दोनों ही कामकाजी हैं तो ज्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है!क्योकी पैरेंट्स की एब्सेंस में बच्चे ज्यादा छूट पा जाते हैं और यदि किशोर होते बच्चों पर उस वक्त ध्यान नहीं दिया गया तो जिम्मेदार भी पैरेंट्स ही होंगे! क्योंकि इस उम्र में बच्चे आसानी से बहक जाते हैं! कई बार माता या पिता में से किसी को अपने काम के चलते लम्बे समय तक घर से बाहर रहना पड़ता है तो जिम्मेदारी और बढ़ जाती है! जैसा कि आर्मी ,पुलिस या अन्य इसी प्रकार की नौकरियों में होता है!

आजकल भौतिक सुख सुविधाओं की होड़ , मूवीज और टेलीविज़न पर दिखाए जाने वाले प्रोग्राम्स ने बच्चों को समय से पहले परिपक्व कर दिया है! स्वस्थ मनोरंजन का घोर अभाव है!संयुक्त परिवारों में शायद थोडा बहुत कंट्रोल अभी भी है लेकिन जहाँ कोई उसकी गतिविधियों को देखने वाला नहीं है वहाँ दिक्कत ज्यादा है

दरअसल मुझे लगता है कि अभिभावकों को ये मालूम होना चाहिए कि उनका बच्चा किन लोगों के साथ उठ बैठ रहा है...जेब खर्च से ज्यादा तो उसके खर्चे नहीं है..और यदि बराबर ध्यान दिया जाए तो उसके रहन सहन के तरीकों में बदलाव आते ही सतर्क होने की ज़रूरत है! यदि बच्चा होस्टल में है तो अध्यापकों से निरंतर सम्पर्क बनाए रखने कि बेहद ज़रूरत है! लड़कियों के मामले में भी बेहद चौकस रहने की ज़रूरत है क्योंकि कम उम्र की लडकियां अक्सर बहक जाती हैं और घर तक से भाग जाती हैं! बड़े होते बच्चों से मित्रता का बर्ताव करने से वे काफी हद तक अपनी बातें शेयर करने लगते हैं लेकिन इसके अलावा भी अगर गलत संगत में बच्चा पड़ जाए तो कठोर कदम भी उठाना उतना ही ज़रूरी है..ताकि बच्चे के साथ पूरे परिवार और समाज का भी नुकसान न हो!

इस बहस में न पड़कर कि ये जिम्मेदारी माँ की है या पिता की...संयुक्त रूप से जिम्मेदारी का निर्वहन करना ही एकमात्र हल है!

12 comments:

Anonymous said...

पर फ़िर भी बच्चा माँ से जितनी बातें शेयर कर सकता है, उतनी बातें पिता से करने की सोच भी नही सकता............... क्योंकि पिता से कही ज़्यादा वह माँ से जुड़ा होता है. और स्वाभाविक रूप से बच्चे को कम-से-कम व्यस्क होने तक काफ़ी टाइम और देखरेख की आवश्यकता होती है.
और पिता नियंत्रण रखने के लिए जितनी कठोरता दिखा सकता है, और कड़ा अनुशासन रख सकता है, उतना किसी माँ के लिए कठिन है.
एकल परिवारों में ज्यादातर पिता के पास ही समय नहीं होता, और माँ के लाड़ प्यार और गलतियाँ नज़रंदाज़ करने से बच्चे अक्सर गुमराह हो जाते हैं. और फ़िर अगर माता-पिता दोनों ही के पास सीमित समय हो तो बच्चे को न तो अपनापन मिलता है और न ही अनुशासन के संस्कार. ऐसे बच्चे आगे जीवन में बीमार मानसिकता वाले न निकलें तो यह चमत्कार ही माना जाएगा.
अभी महाराष्ट्र से दो ऐसी ही खबरें आयीं थीं, पहली में एक १९-वर्षीया किशोरवय लड़की ने सुपारी देकर अपने 18- वर्षीय बॉयफ्रेंड पर एसिड फिंकवा दिया सिर्फ़ इसीलिए क्योंकि वह अभी शादी के लिए तैयार नहीं था.. दूसरी घटना में एक २१-वर्षीय डॉक्टर-पुत्र ने अपनी दादी को सिर्फ़ इसीलिए मार डाला क्योंकि दोनों का कमरा एक ही होने के कारण वह पॉर्न-फिल्में नहीं देख पता था.

रंजू भाटिया said...

आज हमारे समाज में जो भी घट रहा वह हमारा ही किया धरा है ..यह आज बहस का मुद्दा आपको नज़र आता है तो सिर्फ़ इस लिए कि यह हालात हमारे ही पैदा किए हुए हैं और इसका हल भी हमे ही तलाश करना है ...बात स्त्री पुरूष या माता पिता कौन जिम्मेवार है इस से ज्यादा इस पर बात करने की बजाये इस पर करने की है कि जो हालात जो नेतिकता का पतन हमारे समाज में शुरू हो गया है उसका अंत कैसे किया जाए ..समस्या तो अब पैदा हो गई है और हम सब इस के शिकार बन रहे हैं ..अब तो हल तलाश करना है और वह मिल जुल कर ही तलाश करने होंगे न की एक दूसरे पर दोष लगा कर .परिवर्तन वक्त की मांग है पर यह इतना भी न हो कि हम इंसान से हेवान बन जाए और आस पास होने वाले हालात से कुछ महसूस करने वाले हालात में ही न रहे ....मैंने अपने ब्लाग जिसका जिक्र आपने यहाँ किया है उस में भी यही कहा है कि जो भी कुछ करना होगा या मिल जुल कर ही करना होगा . अभी सब यह सब जो घटित हो रहा है सब मिडिया का ही हम सुन रहे हैं ..सच्चाई अभी सामने आने बाकी है ..पर यह तो तय है कि जो भी कुछ हुआ है या हो रहा है समाज में उसको समझाना होगा और मिल जुल कर ही हल निकालना होगा ..

Suresh Gupta said...

आपकी इस बात से में पूर्णतया सहमत हूँ कि इस बहस में न पड़कर कि ये जिम्मेदारी माँ की है या पिता की...संयुक्त रूप से जिम्मेदारी का निर्वहन करना ही एकमात्र हल है! मैंने एक जगह पढ़ा था कि अगर आप अपने बच्चों को अच्छी बातें नहीं सिखायेंगे तब कोई और उन्हें ग़लत बातें सिखा देगा. एक विज्ञापन आता है टी वी पर, जिस में एक महिला कहती हैं - 'बच्चे आपके हैं तो जाहिर है जिम्मेदारी भी आप की है'. इन सब से एक ही निष्कर्ष निकलता है की माता पिता दोनों को बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और उसे पूरा करने के लिए समय निकालना होगा. आज घर के बाहर ही नहीं, घर के अन्दर भी (टी वी इत्यादि) बच्चों को ग़लत बातें सिखाने वाले बैठे हैं.

सुजाता said...

@ vichaar -
"पर फ़िर भी बच्चा माँ से जितनी बातें शेयर कर सकता है, उतनी बातें पिता से करने की सोच भी नही सकता............... क्योंकि पिता से कही ज़्यादा वह माँ से जुड़ा होता है"

****
और पिता नियंत्रण रखने के लिए जितनी कठोरता दिखा सकता है, और कड़ा अनुशासन रख सकता है, उतना किसी माँ के लिए कठिन है.
****
एकल परिवारों में ज्यादातर पिता के पास ही समय नहीं होता, और माँ के लाड़ प्यार और गलतियाँ नज़रंदाज़ करने से बच्चे अक्सर गुमराह हो जाते हैं.
******

vichaar ji ,
तीनों बातों से आपके विचार उलझ रहे हैं ,कुछ स्पष्ट नही हो रहा ।

डॉ .अनुराग said...

ab pita ka roop bhibaal raha hai khas taur se madhyam varfgiya parivro me .darasal ye samaj ka badalta varoop hai aor ghate samajik mulua aor ekal parivaar jiski vajah se ye samsyaaye apna doosra roop le rahi hai...bachpan kho raha hai aor samay sepahle un bato ko exposre ho raha hai jo uske baal man ko kahi galat disha me bhi le ja sakte hai. jimmedari ham sab ki hai ....vastav me sampatti ka atyadhik pradarshan .ameeri gareebi ke beech badhti khai...bhoutik sukho ko aldi se jaldi prapt karne ki hod....hame ye bhi niyam banana chahiye ki koi bachha school me mobile na laye .darasl bahs kafi lambi hai par jimmedari samaj aor maa bap dono ki hai....isliye ek achha pados ek achha mohalla ab mahtvpurn hai na ki apne apne gharo me dubke log.....

Anonymous said...

विषय ही ऐसा है, पर एक एक पेड़-पत्ते को गिनने के बजाय पूरे जंगल का परिदृश्य देखना होगा. फ़िर भी,
बाप कितना ही अच्छी परवरिश कर ले वह माँ की जगह नही ले सकता, और पिता के बिना भी बच्चे के व्यक्तित्व का सही और पूरा विकास नहीं हो पता.
एक ऐसे इन्सान की मानसिकता देखें, जिसके जीवन में किसी एक अभिभावक की कमी शुरू से रही हो या जो कलही-तनावपूर्ण वातावरण में बड़ा हुआ हो.
अब किसी ऐसे इन्सान के बारे में सोचें जिसकी परवरिश एक सामंजस्यपूर्ण परिवार में हुई हो, जिस परिवार में माता-पिता दोनों के वेल डिफाइन्ड रोल हों. हालांकि सुखी परिवार लगभग विलुप्ति की कगार पर हैं, पर आपके ज्ञान में कोई न कोई ज़रूर होगा. अन्तर अपने आप सामने आ जाएगा.
अक्सर ऐसा भी देखने में आता है की पिता भले ही अपराधी ही क्यों न हो, अगर माँ सौम्य स्वाभाव की है तो संतान काफी सभ्य-सुशील निकलती है (पर व्यक्तित्व मे कोई न कोई ग्रंथि-कुंठा अवश्य ही छिपी रह जाती है).
पर अगर माँ ग़लत राह पर हो तो बच्चे का भविष्य निश्चित ही बर्बाद है. क्योंकि फ़िर वही बात, की माँ से बढ़कर कोई गुरू नहीं हो सकता और पिता कभी चाहकर भी माँ की जगह नहीं ले सकता.
डॉक्टर आर्य की बात भी सही है.
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All said and done, but I still want to add that, every bachelor has 4 or 5 theories about raising up children, but when he has his own children he has no theories but responsibilities and frustrations.

Anonymous said...

किस आयु सीमा को हम नयी पीढ़ी कहेगे ।
क्या ४० -५० साल तक की आयु सीमा नयी पीढ़ी मे आती हैं ।
क्या ३० -४० साल तक की आयु सीमा नयी पीढ़ी मे आती हैं ।
या २० -३० साल तक की आयु सीमा नयी पीढ़ी मे आती हैं ?
या १० -२० साल की आयु सीमा नयी पीढ़ी मे आती हैं ?

अगर पहला वर्ग और दूसरा वर्ग इसमे आता हैं तो आज की हर सामाजिक बुराई की जिम्मेदारी उसकी है । क्योकि इस पीढ़ी को यौन शिक्षा नहीं मिली , क्योकि इस पीढ़ी को हमेशा “सेक्स” शब्द को “पर्दे मे रखना ” सिखाया गया सो इस पीढ़ी ने हर गलत काम को किया और आज भी कर रही हैं । इस पीढ़ी मे किसी भी नयी बात को सुनने की क्षमता नहीं हैं । क्योकि उसको सिखाया ही नहीं गया हैं की “ओपेनेस” जरुरी हैं । “ओपेनेस” को वह सीधा नगनता से जोड़ते हैं । अगर इस पीढ़ी {४० -५० साल तक की आयु सीमा ।} को यौन शिक्षा मिली होती तो शायद वो इतनी कुंठित ना होती । हमेशा ग़लती ना तलाशती दूसरो मे । और वोही गलती ना करती जो उसके साथ हुई । समाज मे नगनता इस लिये बढ़ रही हैं क्योकि हम अपनी गलतियों पर परदा डाल कर जीने के आदी हैं ।
इंटरनेट , मीडिया आजाने से सब कुछ हमारे पहुच मे हैं और हम जिज्ञासु हो कर सब कुछ खंगाल कर अपने अज्ञान को दूर कर रहे है क्योकि हमारे समय मे हमे अंधरे मे रखा गया । अपने बच्चो को यौन शिक्षा जरुर दे हम सब ताकि सेक्स से हिंसा को अलग किया जा सके ।
टीवी पर जो आज कल दिखाया जाता हैं वह सब इस लिये क्योकि लोग वह सब जानना चाहते हैं जो दबा हुआ सबके मन मे । नगनता ना आए इसके लिये यौन शिखा जरुरी हैं ।

pallavi trivedi said...

@विचार...
आज पिता की भूमिका भी बदल रही है...कई बच्चे पिता से भी उतने ही खुले होते हैं जितने की माँ से!कई बच्चों को मैंने अपने पिता को आदर्श मानते हुए देखा है और उनको फॉलो करते देखा है!

@अनुराग
आपकी बातों से सहमत हूँ...बच्चों को स्कूल मोबाइल ले जाने पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए!

@रंजू
आपकी पोस्ट भी मैंने पढी है....सहमत हूँ आपकी बातों से!

@रचना
आपने एक अच्छा विचार रखा है...यौन शिक्षा बहुत ज़रूरी है! जिससे बच्चों की मानसिकता को दूषित होने से बचाया जा सके!

Asha Joglekar said...

अच्छी बहस है । तो निर्णय तो यही हुआ न कि जिम्मेदारी दोनो की है । माँ से बच्चे ज्यादा घुले मिले होते हैं और पिता का अनुशासन और थोडा बहुत डर भी बहुत जरूरी है ।

samagam rangmandal said...

आपने जो किया प्राकृतिक न्याय के सिध्दांत से बिलकुल सही किया।वरना कितनो को अपराधी बनने से रोका जा सकता था। मै आपकी प्रक्रिया और चिंतन की दाद देता हूँ।बहूत सी बाते घटनाए जानता हूँ,लिख सकता हूँ,किंतु आपकी पोस्ट से जाहिर है, आपका दृष्टिकोण अपराध रोकना,अपराधी होने से रोकना है। माता पिता से आपकी अपेक्षा सही है। आपको ढेर सी बधाई!

Doobe ji said...

parents ka behavier hi bachhon ke man par asar karta hai isliye mata pita ko accha acharan karna chahiye taki bacche unhein dekh kar follow karein

Amit K Sagar said...

Dear Respected Ma'am
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आपने इस बहस के बारे में अपने ब्लोग पर जो लेख पब्लिश किया है उसे मैं आपकी अनुमति से "उल्टा तीर" पर कमेंट्स के साथ प्रकाशित करना चाहता हूँ !!साथ ही मैं दिल से आभारी हूँ कि आपने इस मुद्दे को लेके लिखा. सहयोग की अपेक्षा है !
विनम्र!
*अमित के सागर
http://ultateer.blogspot.com

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