Sunday, May 4, 2008

संग और संगिनी

एक लड़की ने ईमेल में अपने प्रेमी को संगी कह कर संबोधित किया और अपने को उसकी संगिनी बताया। साथ ही, उससे अनुरोध किया कि संगी के नाते तुम्हारा एक कर्तव्य यह है कि मुझे दलदल से निकालो। संगी ने जवाब में पूछा कि संगिनी शब्द का अर्थ क्या है। लड़की ने बताया कि हर भाषा में संगिनी का एक ही अर्थ हैः संगिनी। जवाब में उसके संगी ने जो लिखा, वह शायद पढ़ने लायक हैः


संगिनी का अर्थ अंग्रेजी और अन्य सभी भाषाओं में एक ही है। यानी यह प्रजाति हर देश में, हर काल में पाई जाती है। इसका मतलब है सभी जगह इसका रंग-रूप एक ही होता है। नहीं, मैंने गलत कहा। रंग बदल सकता है - काला, गोरा, पीताभ, रक्ताभ। रूप भी एक जैसा नहीं हो सकता। कोई कम रूपवती, कोई सिर्फ रूपवती, कोई महा रूपवती। कोई रूप-गर्विता, कोई रूप-शर्मिता। लेकिन तुम कहती हो, सबका चरित्र एक ही होता है। चूंकि यह किसी संगिनी की ही व्याख्या है, इसलिए इस पर बहस नहीं की जा सकती। लेकिन इस संगिनी ने क्या अन्य संगिनियों को भी देखा है? तर्कशास्त्र के अनुसार सिर्फ एक कौए को देख कर यह घोषणा नहीं की जा सकती कि सभी कौए काले होते हैं। जब तक दुनिया के हर कौए को देख न लिया जाए, तब तक कोई साधारणीकरण नहीं हो सकता। अगर एक भी कौआ छूट गया है, तो यह संभावना बनी रहती है कि वह सफेद हो सकता है। इसलिए सभी संगिनियों को जाने बिना अगर कोई समय से पूर्व पक्व लड़की संगिनी होने का दावा करती है, तो वह ठीक-ठीक बता नहीं सकती कि संगिनी शब्द का अर्थ भले ही हर भाषा में समान हो, पर संगिनी होना वास्तव में होता क्या है।

एक दूसरा पहलू लिया जाए। हो सकता है, इस लड़की ने कई संगियों के साथ संगिनी की भूमिका अदा की हो। इसलिए वह संगिनी होने का अर्थ खूब जानती हो। लेकिन संगिनी का पूरा अर्थ जानने के लिए क्या इतना अनुभव काफी है? यह दुनिया भर में देखा गया है कि संगी का चरित्र संगिनी को प्रभावित करता है। दूध को कोयले पर ढाला जाए, तो उसके रंग में कालापन आ जाएगा। दूध को मधु के साथ मिला दिया जाए, तो वह सुनहला हो जाएगा। दूध और पानी मिलें, तो पानी गाढ़ा और दूध पतला हो जाएगा। संगी भी आखिर एक जीवित प्राणी है। इसी तरह, संगिनी भी। हर जीवित प्राणी अपने परिवेश से प्रभावित होता है और उसे प्रभावित करता है। तो जिसने भी कई बार कई संदर्भों में संगिनी की भूमिका की हो, उसके प्रत्येक बार के अनुभव एक नहीं हो सकते। चूंकि हर संगी विशिष्ट होता है, इसलिए हर संगिनी भी विशिष्ट होती है।

इसलिए तर्क से यह सिद्ध हुआ कि न तो कोई संगी कॉमन हो सकता है और न कोई संगिनी। इनका साधारणीकरण नहीं किया जा सकता।

इसलिए तर्क से यह सिद्ध हुआ कि हम वास्तव में संगी या संगिनी होते नहीं, ऐसा होने की कामना करते हैं। यह तमन्ना ही हममें प्राण का संचार किए रहती है।

तर्क से यह भी सिद्ध हुआ कि हर संगिनी को अपनी तरह के संगी की तलाश रहती है और हर संगी को अपनी तरह की संगिनी की। लेकिन बिना संगी हुए कोई किसी संगिनी को पूरी तरह क्या जान सकता है? इसी तरह, बिना संगिनी हुए क्या कोई किसी संगी को पूरी तरह जान सकती है? संग को इतने समय तक ट्रायल पर रखा गया, तो क्या इतना समय नहीं निकल जाएगा कि परिणाम पर विचार करने की गुंजाइश ही न रह जाए? मान लिया जाए कि जिस समय चयन और ग्हण किया गया था, उस समय ये परफेक्ट थे, तब कैसी स्थिति बनती है? चूंकि व्यक्ति स्वभाव से ही परिवर्तनशील है, इसलिए जो संगी या संगिनी चुने गए, जरूरी नहीं कि संग की पूरी अवधि के दौरान वे वैसे ही बने रहें। फिर संग का क्या होगा? उसका चरित्र बदलता है, तो संगी और संगिनी की पारस्परिक भूमिका भी बदलेगी। उसके बाद क्या दोनों अपने संग के भविष्य पर पुनर्विचार करेंगे? या, दोनों संगजनित मोह के कारण एक-दूसरे से यानी अपने आपसे समझौता करेंगे?

तो तर्क से यह भी साबित हुआ कि संगी या संगिनी मात्र सुविधाजनक शब्द हैं उस तलाश को व्यक्त करने के लिए जो प्लेटो के अनुसार जन्म से ही शुरू हो जाती है। प्लेटो मानते थे कि हर संगी की एक खास संगिनी और हर संगिनी का एक खास संगी होता है। जब दोनों का सम्मिलन होता है, तभी वे पूर्ण होते हैं और किसी प्रकार का असंतोष नहीं बच रहता। लेकिन अनेक संगियों और संगिनियों का संग पाए बिना कोई जानेगा कैसे कि उसकी खोज पूरी हो चुकी है? क्या इसीलिए नीरज को लिखना पड़ा कि मैं पा गया तुम्हें था, घर बदल-बदल कर?

अगर ऐसा है, तो क्या तो संगी और क्या तो संगिनी! दोनों एक ही तालाब की मछलियां जान पड़ती हैं। ऐसी मछलियां जो महासागर में तैरते हुए प्रियतम की खोज में लगी रहती हैं। प्रश्न यह उठता है कि जब तक वह नहीं मिलता या नहीं मिलती, तब तक क्या वे अंडे देना स्थगित किए रखें? इस तरह क्या उनका जीवन ही स्थगित नहीं हो जाएगा? संगी या संगिनी की तलाश जीवन के लिए है या जीवन संगी या संगिनी की तलाश के लिए? या, दोनों एक-दूसरे के पर्याय हैं?

अब दूसरे प्रश्न पर विचार किया जाए। क्या कोई संगी किसी संगिनी को दलदल से निकाल सकता है? दलदल से निकाल कर वह जहां ले जाएगा, इस बात की गारंटी क्या है कि वह जमीन ठोस तो दिखेगी, पर दलदली नहीं होगी? क्या यह पूरी धरती ही एक बड़ा दलदल नहीं है? नहीं तो लोग मुक्ति की तलाश में क्यों रहते हैं? फिर इस बात की भी गारंटी क्या है कि जिससे यह अपेक्षा की जा रही हो कि वह अपनी संगिनी को दलदल से निकाल ले, वह स्वयं किसी दलदल में न पड़ा हुआ हो? क्या ऐसा अकसर नहीं होता कि जो अपने को ठोस जमीन पर खड़ा मान रहा हो, उसके पैरों के थोड़ा नीचे वाकई कोई दलदल होता है? इसी तरह, अगर किसी लड़की को अपनी जमीन दलदली नजर आ रही है, तो क्या इस संभावना को खारिज किया जा सकता है कि वास्तव में वह दलदल सिर्फ पांच इंच ऊंचाई का हो और उसके नीचे ठोस जमीन हो? यानी जैसे ही वह अपने दलदल में थोड़ा और धंसेगी, अपनी साबुत जमीन पर पहुंच जाएगी ? यानी वह जिसे दलदल समझ रही थी, वह सिर्फ उसकी नजर में दलदल था और दलदलों का विशेषज्ञ समझ रहा था कि यह लडकी बेकार ही घबरा रही थी । इसलिए अपने दलदल की जांच करना, अपने दलदल का वास्तविक चरित्र जानना ही दलदल से निकलने की एकमात्र शर्त है ?
तो तर्क से यह सिद्ध हुआ कि संगी या संगिनी दलदल को समझने में मदद तो कर सकते हैं, पर दलदल से निकलना तो अपना ही निर्णय और अपना ही कर्म होगा।

तर्क से यह भी सिद्ध हुआ कि एक दलदल से निकल कर दूसरे दलदल में जाना काम्य है या ठोस जमीन पर जाना, यह निर्णय किए बिना कोई प्रयास करना व्यर्थ है। ठोस जमीन किसे कहते हैं, जिसे ठोस जमीन माना जाता है, कहीं वह भी एक नई किस्म का दलदल तो नहीं है, इन जटिल प्रश्नों का उत्तर निश्चित किए बगैर प्रयास में तत्परता कैसे आएगी?

5 comments:

सुनीता शानू said...

राजकिशोर जी,अकारण ही इतना गम्भीर चिंतन नही होता...मगर आपका लेख पढ़ कर वाह कहने को मन करता है...ये जिंदगी वास्तव में एक दलदल ही है अब तक कौन समझ पाया है मनुष्य के मन को...मगर मै जो समझती हूँ अच्छा संगी तलाश करना कोई कठीन कार्य नही है,न ही अच्छी संगीनी बनना...तलाश उम्र भर रहती है यही सच है कभी दोस्त की कभी प्रियतम की तो कभी मोक्ष की तलाश तो रहती ही है...
आपके सभी प्रश्नो का जवाब है भी और नही भी...प्रश्न ऎसे है जो मन स्वीकार कर रहा है कि हाँ एसा ही है इस महासागर में संगी की खोज इंसान को कहाँ से कहाँ पहुंचा देती है...मगर आत्मा प्रतिकार करती है आपके सवाल का कि मनुष्य समझोता कर ही लेता है अपनी चाहत से जिसे एक बार चाह लेता है वो फ़िर चाहे दलदल में ले जाये या ठोस जमीन पर तलाश खत्म हो जाती है वो जगह जो संगी की होती है कोई ले नही सकता और अगर जरूरत समझ ले भी लेता है तब भी मन का कोई कोना रिक्त ही रहता है...मनुष्य का मन ऎसा ही है...
आपका प्रश्न सचमुच विचारणीय है जवाब होते हुए भी देना मुश्किल लग रहा है...शब्द गुम से लग रहे हैं...एक दलदल से निकल कर दूसरे दलदल में जाना सचमुच बुद्धिमानी नही है...परन्तु यह जरूरी नही की वह दलदल ही हो...आत्मविश्वास के साथ जिसका वरण होगा मेरे खयाल से वहाँ स्वतः ही ठोस जमीन हो जायेगी...

सुनीता शानू said...
This comment has been removed by the author.
सुनीता शानू said...

उस लड़के के द्वारा उठाये गये प्रश्नो का जवाब मै दे पाई हूँ कि नही जानती नही मगर आपसे अपेक्षा करती हूँ कि आप उत्तर जरूर बतायें....

Asha Joglekar said...

संग का शब्दकोश में दिया गया अर्य़ हुआ साथ इसके अनुसार जो साथ है वह संगी या संगिनि । अब यह साथ कुछ पल का हो सकता है या कुछ वर्षों का या पूरी उम्र का लेकिन उस विशिष्ट समय तक तो वे संगी या संगिनि ही हुए न ? रही बात दलदल से निकलने की तो जो एक के लिये दल दल है वही दूसरे के लिये ठोस जमीन हो सकती है । तो यह स्वयं को ही तय करना है कि उसकी ठोस जमीन क्या है और वहाँ कैसे पहुँचा जा सकता है संगी या संगिनि इसमें मदद तो कर सकते हैं लिकलना तो स्वयं को ही पडेगा ।

Asha Joglekar said...

pl read निकलना

अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से ...